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RBSE Solutions for Class 11 Biology Chapter 28 जीवन की उत्पत्ति एवं जैव विकास

June 17, 2019 by Prasanna Leave a Comment

Rajasthan Board RBSE Class 11 Biology Chapter 28 जीवन की उत्पत्ति एवं जैव विकास

RBSE Class 11 Biology Chapter 28 पाठ्यपुस्तक के प्रश्न

RBSE Class 11 Biology Chapter 28 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
फिलोसॉफी जूलोजिक (Philosophie Zoologique) नामक पुस्तक के लेखक हैं
(अ) डार्विन
(ब) लेमार्क
(स) वीजमान
(द) वैलेस

प्रश्न 2.
समरूप अंग होते हैं
(अ) उत्पत्ति में समान, कार्य में भिन्न
(ब) उत्पत्ति में भिन्न, कार्य में समान
(स) उत्पत्ति व कार्य दोनों में समान
(द) उत्पत्ति व कार्य दोनों में भिन्न

प्रश्न 3.
कौन सा सैट समजत अंगों का है
(अ) चमगादड़, तितली एवं पक्षी के पंख
(ब) पक्षी के पंख व मनुष्य के हाथ
(स) मनुष्य का हाथ व चमगादड़ के पंख
(द) पक्षी के पंख व व्हेल के फ्लिपर

RBSE Solutions for Class 11 Biology Chapter 28 जीवन की उत्पत्ति एवं जैव विकास

प्रश्न 4.
इनमें से कौनसी संरचना मानव में अवशेषी नहीं है
(अ) निमेषक पटल
(ब) इलियम
(स) कर्ण पेशियां
(द) वर्मीफार्म अपेन्डिक्स।

प्रश्न 5.
गैलेपेगोस द्वीप समूह किस वैज्ञानिक से सम्बन्धित है?
(अ) माल्थस
(ब) डार्विन
(स) वैलेस
(द) लैमार्क

प्रश्न 6.
निम्न में से कौन संयोजी कड़ी है
(अ) आर्कियोप्टेरिक्स
(ब) निओसेरोटोडस
(स) डार्विन की फिंच
(द) ड्रोसोफिला

प्रश्न 7.
उविकास के सबसे ठोस प्रमाण मिलते हैं
(अ) अवशेषी अंगों से
(ब) तुलनात्मक संरचना से
(स) तुलनात्मक भौणिकी से
(द) जीवाश्म से

प्रश्न 8.
जनसंख्या सिद्धान्त नामक लेख किसने लिखा
(अ) लैमार्क
(ब) वीजमान
(स) माल्थस
(द) डार्विन

RBSE Solutions for Class 11 Biology Chapter 28 जीवन की उत्पत्ति एवं जैव विकास

प्रश्न 9.
पैन्जेनिसिस सिद्धान्त (पेन्जीनवाद) किसने प्रस्तुत किया
(अ) डार्विन
(ब) ऑपेरिन
(स) लेमार्क
(द) ह्यूगो डि ब्रीज

प्रश्न 10.
जाति उद्भवन के लिए उत्तरदायी कारक है
(अ) पृथक्करण
(ब) उत्परिवर्तन
(स) संकरण
(द) उपरोक्त सभी

प्रश्न 11.
प्रकृति में प्राकृतिक वरण द्वारा किस प्रकार के प्राणियों का चयन किया जाता है
(अ) अनुकूलतम
(ब) कमजोर
(स) वन्य प्रजाति
(द) सामान्य

प्रश्न 12.
किस प्रकार की विभिन्नताएं उविकास की दृष्टि से महत्वहीन होती हैं?
(अ) कायिक विभिन्नताएं
(ब) जननिक विभिन्नताएं
(स) सतत विभिन्नताएं
(द) असतत विभिन्नताएं

प्रश्न 13.
धनात्मक व ऋणात्मक विभिन्नताओं का दूसरा नाम है।
(अ) कायिक विभिन्नताएं
(ब) निर्धारी विभिन्नताएं
(स) सतत विभिन्नताएं
(द) असतत विभिन्नताएं

RBSE Solutions for Class 11 Biology Chapter 28 जीवन की उत्पत्ति एवं जैव विकास

प्रश्न 14.
नदियां, पहाड़, मरुस्थल आदि बाधाएं किस प्रकार का पृथक्करण उत्पन्न करती हैं
(अ) भौगोलिक
(ब) आवासीय
(स) ऋतुनिष्ठ
(द) कार्यिकीय

प्रश्न 15.
भिन्न-भिन्न भौगोलिक क्षेत्र की जातियों को कहते हैं
(अ) निओपैट्रिक
(ब) सिम्पैट्रिक
(स) एलोपैट्रिक
(द) सिबलिंग

प्रश्न 16.
आनुवांशिक विभिन्नताओं को प्राथमिक स्रोत कौनसा है
(अ) उत्परिवर्तन
(ब) पुनर्योजन
(स) अ व ब दोनों
(द) उपरोक्त में से कोई नहीं

प्रश्न 17.
जीन अन्तर प्रवाह को रोकने वाली प्रक्रिया कहलाती है
(अ) जाति उद्भवन
(ब) अनुकूलन
(स) पृथक्करण
(द) उपरोक्त में से कोई नहीं

RBSE Solutions for Class 11 Biology Chapter 28 जीवन की उत्पत्ति एवं जैव विकास

प्रश्न 18.
डार्विन के मतानुसार नई जातियों की उत्पत्ति किसके द्वारा होती
(अ) उत्परिवर्तन द्वारा
(ब) प्राकृतिक चयन द्वारा
(स) संकरण द्वारा
(द) उपार्जित लक्षणों की वंशागति द्वारा

प्रश्न 19.
डार्विन ने अपनी विचारधारा किस पुस्तक में व्यक्त की
(अ) सिस्टेमा नैचुरी
(ब) पैलेन्टोलॉजी
(स) फिलोसॉफी जुलोजिक
(द) ऑरीजिन ऑफ स्पीशीज

प्रश्न 20.
लैमार्कवाद के समर्थक वैज्ञानिक थे
(अ) समनर
(ब) टॉवर
(स) मैकडूगल
(द) उपरोक्त सभी

उत्तर तालिका
1. (ब)
2. (ब)
3. (स)
4. (ब)
5. (ब)
6. (अ)
7. (द)
8. (स)
9. (अ)
10. (द)
11. (अ)
12. (अ)
13. (स)
14. (अ)
15. (स)
16. (स)
17. (स)
18. (ब)
19. (द)
20 (द)

RBSE Solutions for Class 11 Biology Chapter 28 जीवन की उत्पत्ति एवं जैव विकास

RBSE Class 11 Biology Chapter 28 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
समजात एवं समवृत्ति अंगों को एक-एक उदाहरण दीजिये।
उत्तर-
समजात अंग-मनुष्य के हाथ
समवृत्ति अंग-पक्षी के पंख

प्रश्न 2.
सरीसृप एवं पक्षियों के बीच की योजक कड़ी का नाम लिखिये।
उत्तर-
आर्कियोप्टेरिस।

प्रश्न 3.
चार्ल्स डार्विन द्वारा लिखी गई पुस्तक का नाम लिखिये।
उत्तर-
“प्राकृतिक वरण द्वारा जाति की उत्पत्ति” (Origin of species by natural selection)

प्रश्न 4.
जीन्स या गुणसूत्रों में अचानक परिवर्तन होने की क्रिया को क्या कहते हैं?
उत्तर-
उत्परिवर्तन (Mutation)

प्रश्न 5.
लैमार्क द्वारा दिए गए सिद्धान्त को क्या कहते हैं?
उत्तर-
उपार्जित लक्षणों की वंशागति का सिद्धान्त (Theory of inheritance of acquired characters)

प्रश्न 6.
चार्ल्स डार्विन ने किसे जहाज पर यात्रा की थी?
उत्तर-
“वीगल”।

RBSE Solutions for Class 11 Biology Chapter 28 जीवन की उत्पत्ति एवं जैव विकास

प्रश्न 7.
उत्परिवर्तनवाद के जनक ह्यूगो डि ब्रीज ने किस पौधे पर प्रयोग किया था?
उत्तर-
इवनिंग प्रिमरोज (Oenothern lamarekiand)

प्रश्न 8.
जीन विचलन (genetic drift) किसे कहते हैं?
उत्तर-
आप्रवासी (Immigrants) एवं उत्प्रवासी (Emigrants) सदस्यों द्वारा एलीलो (जीन्स) के जोड़ने व घटाने की क्रिया को जीन विचलन कहते हैं।

प्रश्न 9.
जाति (Species) के उपसमूहों के नाम बताइये।
उत्तर-
जाति को डीम्स (Demes), प्रजाति (race), सिबलिंग (sibling) आदि उपसमूह हैं।

प्रश्न 10.
जैव विकास में पृथक्करण का महत्व सर्वप्रथम किस वैज्ञानिक ने बताया था?
उत्तर-
वेगनर (Wagner)

प्रश्न 11.
राजस्थान के घना पक्षी अभयारण्य में किस देश के पक्षी प्रवास हेतु आते हैं?
उत्तर-
साइबेरिया

प्रश्न 12.
प्राकृतिक चयन को और किस नाम से जाना जाता है?
उत्तर-
विभेदक प्रजनन (Differential reproduction)

प्रश्न 13.
जीन विनिमय के द्वारा उत्पन्न होने वाली विभिन्नताओं को क्या कहते हैं?
उत्तर-
पुनर्योजन (Recombination)

RBSE Solutions for Class 11 Biology Chapter 28 जीवन की उत्पत्ति एवं जैव विकास

प्रश्न 14.
पूर्वजता (Atavism) का एक उदाहरण दीजिये।
उत्तर-
कुछ मानवों में पूरे शरीर पर लम्बे वे घने बाल (कपियों के समान) पाये जाते हैं।

प्रश्न 15.
डायनासौर किस काल (युग) में पाये जाते थे?
उत्तर-
मीसोजोइक युग में पाये जाते थे।

RBSE Class 11 Biology Chapter 28 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
अवशेषी अंग किसे कहते हैं? मनुष्य में ऐसे चार अंगों के उदाहरण दीजिये।
उत्तर-
जीवों में उपस्थित ऐसे अंग जो शरीर के लिए अनावश्यक है, अवशेषी अंग कहलाते हैं। उदाहरण

  • मानव की आहारनाल में स्थित कृमि रूपी परिशेषिका (Vermiform appendix)
  • कर्ण पल्लव की पेशियां
  • निमेषक पटल (Nictitating membrane)
  • तीसरा मोलर दांत (Third molar tooth)

प्रश्न 2.
जीवाश्म किसे कहते हैं? जैव विकास में इनका क्या महत्व है?
उत्तर-
लाखों करोड़ों वर्षों पूर्व जो जन्तु एवं पेड़-पौधे भूमि में दब गए उनके अवशेष या चिन्ह जो खुदाई के दौरान पाये जाते हैं, उन्हें जीवाश्म कहते हैं। जीवाश्म जैव विकास की प्रक्रिया को समझाने के लिए ठोस प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। जीवाश्मों के अध्ययन से यह स्पष्ट किया जा सका है कि किस काल में किस प्रकार के जन्तु और पौधे पृथ्वी पर उपस्थित थे।

RBSE Solutions for Class 11 Biology Chapter 28 जीवन की उत्पत्ति एवं जैव विकास

प्रश्न 3.
लेमार्क व डार्विन के सिद्धान्तों की तुलना जिराफ के उदाहरण से कीजिये।
उत्तर-
लेमार्क ने बताया कि जिराफ लाखों वर्षों पूर्व एक साधारण हिरण के समान जीव था। यह वहां मैदान पर घास चरता था किन्तु वातावरणीय कारणों से वहां की घास सूखती गई जिससे फिर जिराफ को पेड़ों की पत्तियों पर निर्भर रहना पड़ा। भोजन के लिए जिराफ को अगली टांगों को अधिक ऊंचा रखते हुए गर्दन को निरन्तर ऊपर खींचना पड़ता था। अतः जिराफ ने पेड़ों की पत्तियों को खाने के लिए गर्दन व अगली टांगों का अधिक उपयोग किया, इसी के कारण जिराफ की अगली टांगें और गर्दन लम्बी होती गई और पीढ़ी दर पीढ़ी वंशागत होकर वर्तमान जाति का स्थाई लक्षण बन गया।

डार्विन के अनुसार वातावरण संघर्ष (घास का खत्म होना व पेड़ों की पत्तियों पर निर्भर होना) तथा जीवन के लिए संघर्ष करने के कारण जिराफ में यह अन्तर आया।

प्रश्न 4.
विभिन्नताओं को विकास का कच्चा माल (raw material) क्यों कहा जाता है?
उत्तर-
विश्व में कोई भी दो प्राणी पूर्ण रूप से समान नहीं होते हैं। निकट सम्बन्धी जीवों (सजातीय जीवों) के सदस्यों के लक्षणों में पाये जाने वाले अन्तर या असमानताओं को विभिन्नताएं कहते हैं। विभिन्नताओं से ही जैव विकास बढ़ता या प्रगामी (progressing) होता है। विभिन्नताएं वातावरणीय कारक, आनुवांशिक पदार्थ की संख्या व संरचना में परिवर्तन के कारण या लैंगिक जनन के दौरान दो जीवों के आनुवंशिक पदार्थ मिल जाने से विभिन्नताएं उत्पन्न होती हैं। इसी कारण विभिन्नताओं को विकास का कच्चा माल कहते हैं।

प्रश्न 5.
नव डार्विनवाद से आप क्या समझते हैं?
उत्तर-
डार्विनवाद की आलोचना के बाद डार्विन के समर्थक वैज्ञानिकों ने प्रयोगों एवं अनुसंधानों से इस सिद्धान्त में स्थित कमियों को दूर करके डार्विनवाद को संशोधित एवं रूपान्तरित रूप में प्रस्तुत किया। इसे ही नव डार्विनवाद (Neo-Darwinism) कहते हैं । वेलेस, डेवनपोर्ट, वेल्डेन आदि डार्विनवाद के समर्थक वैज्ञानिक थे। इन्होंने डार्विनवाद में निम्न महत्वपूर्ण परिवर्तन किए

  • अर्जित तथा कायिक विभिन्नताएं आनुवांशिक नहीं होती हैं। और न ही इनकी वंशागति होती है, ये जैव विकास की दृष्टि से महत्वहीन होती हैं।
  • केवल गुणसूत्रों एवं जीवों में उत्पन्न विभिन्नताएं ही वंशागत होती है एवं इन्हीं विभिन्नताओं के संचरण से नई जाति की उत्पत्ति होती है

RBSE Solutions for Class 11 Biology Chapter 28 जीवन की उत्पत्ति एवं जैव विकास

प्रश्न 6.
समजात व समवृत्ति अंगों में अन्तर स्पष्ट कीजिये।
उत्तर-

समजात अंग (Homologous organ) समवृत्ती अंग (Analogous organ)
1. समान उद्भव व समान मूल संरचना के आधार पर विभिन्न जीवों के अंगों में पाई जाने वाली समानता को समजातता कहते हैं। 1. समान कार्य करने पर विभिन्न जीवों के अंगों में पाई जाने वाली बाह्य आकारिकी (Morphological) समानता को समरूपता (समवृत्तिता) कहते है।
2. इनमें मूलभूत संरचना समान होती है। 2. इनमें मूल संरचना (Anatomy) भिन्न होती है।
3. इनमें अंगों का भ्रूणीय उद्भव (origin) समान होता है। 3. इनमें अंगों का भ्रूणीय उद्भव (origin) बिल्कुल भिन्न होता है।
4. इनमें अंगों के कार्य एवं बाह्य संरचना भिन्न-भिन्न होती है। उदाहरण-मनुष्य के हाथ, घोड़े के अग्रपाद, व्हेल की फ्लिपर 4. इनमें अंगों के कार्य एवं बाह्य संरचना समान होती है। उदाहरण-पक्षी के पंख, चमगादड़ के पंख एवं कीट (तितली) के पंख।

प्रश्न 7.
जैव विकास के आधुनिक दृष्टिकोण में किन तथ्यों का समावेश किया गया है?
उत्तर-
चार्ल्स डार्विन ने जैव विकास को स्पष्ट करने के लिए तर्कसंगत एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया था किन्तु डार्विन के समय आनुवंशिकी का ज्ञान नहीं था इसलिए उनके सिद्धान्त में अनेक कमियां रह गई थी। बाद के वर्षों में वैज्ञानिकों ने आनुवंशिकी के ज्ञान की सहायता से अनुसंधान करके विभिन्नताएं (variations), उत्परिवर्तन (Mutation), पुनयों जन (Recombination), अभिगमन (Migration), प्राकृतिक वरण (Natural Selection) आदि तथ्यों को सम्मिलित करते हुए डार्विनवाद का आधुनिक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया ।

प्रश्न 8.
उत्परिवर्तन किसे कहते हैं? ये कितने प्रकार के होते हैं? संक्षिप्त में टिप्पणी लिखिये।
उत्तर-
जीवों में अचानक प्रकट होने वाले व वंशानुगत होने वाले परिवर्तनों को उत्परिवर्तन कहते हैं । उत्परिवर्तन प्राणी की जीन संरचना में परिवर्तन के कारण उत्पन्न होते हैं। उत्परिवर्तन के विषय में हॉलैण्ड के वैज्ञानिक ह्युगो डि ब्रीज (Hugo de vries) ने बताया था ये उत्परिवर्तन आनुवांशिक होते हैं तथा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में संचरित होते हैं। उत्परिवर्तन ही विकास का कारण है। उत्परिवर्तनों को तीन भागों में बांटा जा सकता है।

(1) जीन उत्परिवर्तन (Gene Mutation)-
जीन (DNA अणु) की संरचना में होने वाले परिवर्तनों को जीन उत्परिवर्तन कहते हैं। ये भी दो प्रकार के होते हैं

  • बिन्दु उत्परिवर्तन (Point Mutation) DNA संरचना में किसी क्षारक (Nitrogenous base) के बदलने से ये उत्परिवर्तन उत्पन्न होते हैं। ये भी दो प्रकार के होते हैं
    (अ) संक्रांति (Transition)-इसमें एक प्यूरीन क्षारक का स्थान दूसरा प्यूरीन क्षारक या एक पिरामिडीन क्षारक का स्थान दूसरा पिरीमिडीन क्षारक ले लेता है।
    (ब) अनुपथन (Trans-version)-इसमें प्यूरीन व पिरीमिडीन क्षारक की स्थिति आपस में बदल जाती है अर्थात् प्यूरीन क्षारक के स्थान पर पिरामिडीन एक पिरीमिडीन के स्थान पर प्यूरीन आ जाती है।
  • समग्र उत्परिवर्तन (Gross Mutation) DNA की किसी लम्बी श्रृंखला में परिवर्तन समग्र उत्परिवर्तन कहलाते।

(2) गुणसूत्रीय उत्परिवर्तन (Chromosomal Mutation)-
गुणसूत्रों पर जीन की संख्या एवं अनुक्रम में परिवर्तन होने को गुणसूत्रीय उत्परिवर्तन या गुणसूत्रीय विपथन (Chromosomal aberration) कहते हैं। ये चार प्रकार के होते हैं
(अ) विलोपन या न्यूनता (Deletion or Deficiency)
(ब) द्विगुणन (Duplication)
(स) स्थानान्तरण (Translocation)
(द) प्रतिलोमन (Inversion)

(3) जीनोमेटिक उत्परिवर्तन या बहुगुणिता (Genomatic Mutation or Polyploidy)-
जब जीवधारियों की निश्चित गुणसूत्र संख्या में परिवर्तन (कमी या अधिकता) हो जाता है तो इसे बहुगुणिता कहते हैं।

प्रश्न 9.
जाति की अवधारण (Concept of Species) स्पष्ट कीजिये।
उत्तर-
जाति की अवधारणा (Concept of Species)
स्पेशीज (Species) एक लेटिन शब्द है जिसका तात्पर्य प्रकार (kind) से है। परिभाषा के अनुसार जाति जीवों का वह समूह है जिसमें समान आनुवांशिक लक्षण होते हैं वे आपस में प्रजनन योग्य होते हैं। जिससे सन्तान की उत्पत्ति कर सकते है। जाति वर्गीकरण की सबसे छोटी इकाई है।

जाति अन्र्तप्रजनन करने वाले जीवों का समूह होता है। परन्तु जाति के वे छोटे समूह जिनके बीच आनुवंशिक समानता होते हुए अन्र्तप्रजनन संभव होता है किन्तु ये भौगोलिक रूप से पृथक होती है, इन्हें डीम्स (demes) कहा जाता है। इसी प्रकार असमानता वाले जाति के छोटेछोटे समूह जिनमें भौगोलिक पृथक्कता हो उन्हें प्रजाति (race) कहो जाता है। जब दो जातियां आकारिकी में समान हो पर अन्र्तप्रजनन नहीं कर सके तो उन्हें सिबलिंग (sibling) जातियां कहते हैं, जैसेड्रोसोफिला, स्यूडोप्स्क्योरा एवं ड्रो. परसिमिलिस।

RBSE Solutions for Class 11 Biology Chapter 28 जीवन की उत्पत्ति एवं जैव विकास

प्रश्न 10.
पृथक्करण (Isolation) पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिये।
उत्तरे-
पृथक्करण (Isolation)
किसी जाति के जीवों का छोटे-छोटे समूहों या उपजातियों में विभक्त होने की क्रिया को पृथक्करण कहते हैं। अन्य परिभाषानुसार . सजीवों के समुदायों या जातियों के बीच जीन प्रवाह को रोकने वाले विकल्प को ही पृथक्करण कहते हैं। पृथक्करण की जैव विकास में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसके कारण जातियां उपजातियों में बंट जाती है व अपनी मूल पैतृक जाति के साथ अन्र्तप्रजनन न होने से नई जाति विकसित हो जाती है। समुदायों के बीच भौतिक, भौगोलिक या अन्य प्रकार के अवरोध (barriers) के कारण पृथक्करण होता है। सर्वप्रथम वेगनर (Wagner) ने जीवों में पृथक्करण का महत्व बताया था। मैटकॉफ (Met calf) के अनुसार कोई भी कारक जो एक ही जाति के सदस्यों को आपस में स्वतंत्रतापूर्वक प्रजनन से रोकता है तथा उन्हें समूहों में विभक्त करता है, पृथक्करण कहलाता है।

वैज्ञानिक केलाग का मानना है कि यह एक ऐसा जैविक उत्प्रेरक (Biological catalyst) है जिससे ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न होती हैं। कि जीवों में परिवर्तन उत्पन्न होते हैं और प्रकृति स्वयं उनका चयन कर लेती है। वैलस ने भी पृथक्करण को प्राकृतिक वरण में सहायक माना है। पृथक्करण का कारण समुदायों के बीच किसी भौतिक, भौगोलिक या अन्य प्रकार के अवरोध (barriers) होते हैं।

प्रश्न 11.
जाति उदभवन के कारक बताइये।
उत्तर-
जाति उद्भवन के कारण –
जाति उद्भवन के मुख्य कारण अभिगमन (migration), आनुवंशिक विचलन (genetic drift), उत्परिवर्तन (mutation), लैंगिक पुनर्मिलन (sexual recombination), संकरण (hybridization), प्राकृतिक वरण (natural selection), पृथक्करण है।

प्रश्न 12.
बहुगुणिता (Polyploidy) किसे कहते हैं? इसका क्या महत्व है?
उत्तर-
गुणसूत्रों की संख्या में परिवर्तन के कारण उत्पन्न परिवर्तन को बहुगुणिता कहते हैं। बहुगुणिता कई प्रकार की होती है जैसे
(i) स्वबहुगुणित (Autopolyploids)
(ii) पर बहु गुणित (Allopolyploids) एवं
(iii) खण्डीय परबहुगुणित (Segemental Allopolyploids)।

(i) स्वबहुगुणित (Autopolyploids)-
ये बहुगुणित, जिनमें मूल गुणसूत्रों के समान दो से अधिक गुणसूत्रों के समुच्चय पाये जाते हैं, स्वबहुगुणित (Autopolyploids) कहलाते हैं।

(ii) परबहुगुणित (Allopolyploids)-
दो विभिन्न जातियों (Species) से व्युत्पन्न F1 संकर संतति में गुणसूत्र संख्या को दोगुना करने के फलस्वरूप भी बहुगुणित उत्पन्न हो सकती है। इससे संकर संतति में गुणसूत्रों के दो अलगअलग समुच्चय आ जाते हैं। इन दोनों समुच्चयों में से प्रत्येक में से गुणसूत्रों की संख्या भिन्न हो सकती है।

(iii) खण्डीय परबहुगुणित (Segmental Allopolyploids)-
कुछ परबहुगुणितों में पाए जाने वाले विभिन्न संजीन आपस में लगभग समान होते हैं। अतः इन बहुगुणितों में पाये जाने वाले विभिन्न संजीनों के गुणसूत्र कुछ सीमा तक परस्पर युग्मन कर लेते हैं और बहुसंयोजक बनाते हैं। इससे यह ज्ञात होता है कि कुछ गुणसूत्रों के केवल कुछ खण्ड ही समजातीय होते हैं। अतः स्टेबिन्स (Stebbins) के अनुसार इस प्रकार के परबहुगुणित, खण्डीय परबहुगुणित कहलाते हैं। ये खण्डीय परबहुगुणित, स्वबहुगुणितों और परबहुगुणितों के मध्वर्ती होते हैं और अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis) में गुणसूत्रों के व्यवहार द्वारा पहचाने जा सकते हैं।

RBSE Solutions for Class 11 Biology Chapter 28 जीवन की उत्पत्ति एवं जैव विकास

प्रश्न 13.
अभिगमन या प्रवास (Migration) किस प्रकार जैव विकास में सहायक होता है?
उत्तर-
अभिगमन (Migration)
जीवों में अभिगमन या प्रवास प्रक्रिया भी एक प्रमुख उविकासीय | कारक (Evolutionary agents) का कार्य करती है। अनेक जीव जातियों में इनकी भिन्न-भिन्न समष्टियों (Populations) के बीच इनके सदस्यों का आवागमन होता रहता है। इस क्रिया को अभिगमन या प्रवास कहते हैं। किसी समष्टि में अन्य समष्टि से आए हुए जीवों को अप्रवासी (immigrants) कहते हैं जबकि अपनी समष्टि से अन्य समष्टियों में चले जाने वाले जीवों को उत्प्रवासी (emigrants) कहा जाता है। प्रवास की इस प्रक्रिया में कभी-कभी अप्रवासी सदस्यों द्वारा प्रवासी सदस्यों के साथ जनन की प्रक्रिया हो जाती है। स्थानीय समष्टि के उत्प्रवासी सदस्य भी समष्टि की जीन राशि में से कुछ जीवों को बिल्कुल हटा देते हैं या ऐलीली जीन्स की आवृत्तियों को बदल देते हैं। इसी प्रकार इमाइग्रेन्ट्स (immigrants) जीव स्थानीय समष्टि में कुछ जीन, जीन पुल में जोड़ देते हैं व जीनी-आवृत्ति में परिवर्तन ला सकते हैं। इस क्रिया को जीन विचलन (genetic drift) कहते हैं। प्रवासी व उत्प्रवासी सदस्यों द्वारा एलीलों को जोड़ने या घटाने की क्रिया से जीन वहन होता है। इस प्रकार अभिगमन उद्विकासीय प्रक्रिया के कारक के रूप में कार्य करता है। उदाहरण के लिए रूस के साइबेरिया प्रान्त से साईबेरियन क्रेन्स (पक्षी) वर्षा ऋतु में राजस्थान के भरतपुर स्थित घना पक्षी अभ्यारण्य में आते हैं एवं वर्षा ऋतु के पश्चात् पुनः साईबेरिया चले जाते हैं।

प्रश्न 14.
आधुनिक मत के अनुसार प्राकृतिक चयन जैव विकास की प्रक्रिया में किस प्रकार से कार्य करता है?
उत्तर-
डार्विनवाद (जैव विकास) का आधुनिक दृष्टिकोण (Modern views of organic evolutation) चाल्स डार्विन ने जैव विकास के लिए 1858-59 में प्रथम तर्कसंगत एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया था किन्तु डार्विन के समय आनुवंशिकी का ज्ञान न होने से उनके सिद्धान्त में अनेक कमियां रह गई थी। बाद के वर्षों में वैज्ञानिकों ने आनुवंशिकी के ज्ञान की सहायता से विभिन्नताएं (variations), उत्परिवर्तन (mutation), पुनर्योजन (Recombination), अभिगमन (Migration), प्राकृतिक वरण इत्यादि तथ्यों को सम्मिलित करते हुए डार्विनवाद का आधुनिक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया।

प्रश्न 15.
जैव विकास में आनुवंशिक पुर्नयोजन का क्या महत्व है?
उत्तर-
पुनर्योजन (Recombination)
पुनर्योजन जैव विकास में महत्वपूर्ण कारक की भांति कार्य करता है। इस प्रक्रिया में नये जीनों का संयोजन होता है जिसमें मातृ व पितृ गुणसूत्रों का योगदान होता है। युग्मक निर्माण के समय अर्धसूत्री विभाजन होता है एवं इस दौरान जीन-विनिमय की प्रक्रिया होती है। जिससे पुनर्योजन होता है। जीवों में संयोगिक (Random) प्रजनने के फलस्वरूप भी नये गुणसूत्रों का समावेश होता है। संकरण की प्रक्रिया भी पुनर्योजन को बढ़ाती है जिससे संकर ओज बनते हैं। इस प्रकार उपरोक्त क्रियाओं द्वारा आनुवंशिक पुनर्योजन होता है और यह जातीय विकास को बढ़ावा देता है।

प्रश्न 16.
हाड़-वीनबर्ग साम्यता नियम की व्याख्या कीजिये।
उत्तर-
इसके अनुसार किसी समुदाय में यदि प्रजनन बेतरतीब (Random) होता है, यदि उत्परिवर्तन नहीं होते हैं तथा यदि समुदाय में सदस्यों की संख्या विशाल होती है तब इस समुदाय की जीन की जीन आवृत्ति (Gen frequency) एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी में स्थिर रहेगी अर्थात् वह समुदाय आनुवांशिक संतुलन (Genetic Equilibrium) स्थिति में होगा।

इसे हार्डी-वेनबर्ग ने निम्न समीकरण द्वारा समझाया-
सभी अलील आवृत्तियों का योग 1 (एक) होता है तथा व्यष्टिगत आवृत्तियों को pq कहा गया। द्विगुणित में p तथा q अलील A तथा अलील a की आवृत्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं। एक जीव संख्या में AA की आवृत्ति साधारणतया p² होती है। ठीक इस प्रकार से aa की आवृत्ति q² होती है और Aa की 2pq होती है। अतः P²+2pq+q² = 1 हुआ। यह (p+q)² की द्विपदी अभिव्यक्ति है।

इस प्रकार हार्डी-वेनबर्ग सिद्धान्त यह स्पष्ट करता है कि यदि जीन आवृत्तियां परिवर्तित नहीं होती हैं अर्थात् वह समुदाय आनुवंशिक संतुलन की दशा में होता है तब इसमें विकास की दर भी शून्य होती। है। इस सिद्धान्त को दिए गए उदाहरण से समझाया जा सकता है। मान लीजिये किसी विशाल समुदाय में दी गई आवृत्ति में दो अलील (Allel) A व a उपस्थित हैं। मेन्डल के वंशागति नियमानुसार इस समुदाय में तीन प्रकार के सदस्य उपस्थित होंगे जिनका अनुपात निम्न होगा
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RBSE Solutions for Class 11 Biology Chapter 28 जीवन की उत्पत्ति एवं जैव विकास

RBSE Class 11 Biology Chapter 28 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
जैव विकास क्या है? इसकी पुष्टि में कोई चार प्रमाणों का उल्लेख कीजिये।
उत्तर-
जैव विकास के प्रमाण (Evidence of organic evolution)-
जैव विकास की प्रक्रिया इतनी धीमी होती है कि मनुष्य के जीवन काल में इसे देखा नहीं जा सकता है। सरल से जटिल जीवों का विकास कैसे हुआ, इसके बारे में वैज्ञानिकों ने विभिन्न प्रमाण प्रस्तुत किए हैं

  • जैव भौगोलिक प्रमाण (Biogeographical Evidence)-
    जीव जन्तुओं के भौगोलिक वितरण से जैव विकास के प्रमाण मिलते हैं। विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में विशेष प्रकार के जीव-जन्तु तथा पेड़-पौधे पाये जाते हैं। कुछ देश भौगोलिक दृष्टि से भिन्न होते हुए भी वहां समान प्रकार के जीव पाये जाते हैं जबकि समान जलवायु वाले कुछ देशों में विभिन्न प्रकार के प्राणी व पौधे मिलते हैं। उदाहरण के लिए हाथी तथा सिंह अफ्रीका में पाये जाते हैं किन्तु अमेरिका एवं ऑस्ट्रेलिया में नहीं। बाघ भारत में पाये जाते हैं, किन्तु अमेरिका एवं ऑस्ट्रेलिया में नहीं। इसी प्रकार आस्ट्रेलिया में मारसूपियेलिया गण के जन्तुओं जैसे कंगारू, तस्मानियन भेड़िया, अफ्रीका में दरियाई घोड़ा, जिराफ, गोरिल्ला आदि पाये जाते हैं, अन्यत्र नहीं मिलते। शुतुरमुर्ग पक्षी अफ्रीका व अरब में पाया जाता है।
    डार्विन ने दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट पर प्रशान्त महासागर में स्थित गेलेपगॉस द्वीप पर पाई जाने वाली फिन्चेज के अध्ययन में पाया कि ये पक्षी अमेरिका में पाये जाने वाले पक्षियों के समान हैं परन्तु इनकी चोंच के आकार एवं संरचना में भिन्नता है। अन्य द्वीपों पर पाई जाने वाली ये फिन्च में भी इसी प्रकार का अन्तर देखा गया। उन्होंने स्पष्ट किया कि इन पक्षियों की चोंच में भिन्नता स्थानीय वातावरण एवं उसमें उपलब्ध भोजन से अनुकूलनता का परिणाम है। इस तरह मूल रूप से एक जाति के पक्षी में जो भिन्न-भिन्न वातावरण में अभिगमन कर गए उनसे अनेक जातियों एवं उपजातियों का विकास हुआ। इस तरह जन्तुओं का भौगोलिक वितरण जैव-विकास में सहायक रहा है।
  • तुलनात्मक शारीरिकी से प्रमाण (Evidence of Comparative anatomy)-
    जन्तुओं में शारीरिक संरचनाएं दो प्रकार की होती हैं

(अ) समजात अंग (Homologous Organs)
विभिन्न जातियों के जीवों में कुछ अंग ऐसे होते हैं जिनकी उत्पत्ति (Origin) समान होती है किन्तु इनकी बाह्य रचना एवं कार्य भिन्न-भिन्न होते हैं। ऐसे अंगों को समजात अंग (Homologous Organs) कहते हैं। जैसे कशेरुकियों में मनुष्य के हाथ, घोड़े की अगली टांगे, चमगादड़ के पंख एवं डाल्फिन के फ्लिपर (पंख) आदि। इन सभी प्राणियों के अग्र पाद विभिन्न कार्यों को सुचारू रूप से पूर्ण करने हेतु आकारिकी भिन्नता लिए हैं किन्तु इनके कंकाल की आधारभूत रचना एवं इनका उद्भव एक समान हुआ है। सभी जीवों के उक्त अंगों में एक समान अस्थियां क्रमश: ह्यूमरस, रेडियो अल्ना, कार्पेल्स, मेटा कापेल्स एवं अंगुलास्थियां, पेशियां एवं तंत्रिकाएं पाई जाती हैं। अंगों की रचना तथा उद्भव में समानता को समजातता (Homology) कहते हैं।
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(ब) समवृत्ति अंग (Analogous organs)-
विभिन्न जातियों के जीवों में ऐसे अंग जो समान कार्य के लिए रूपान्तरित हो जाने के कारण समान दिखाई देते हैं किन्तु इनकी भ्रूणीय उत्पत्ति तथा मौलिक रचना भिन्न होती है, समवृत्ति अंग (Analogous organs) कहलाते हैं और इनकी । ऐसी समानता को समवृत्तिता (Analogy) कहते हैं। उदाहरणार्थ- कीटे के पंख, पक्षियों के पंख तथा चमगादड़ के पंख कार्य करने की दृष्टि से समान अर्थात् उड़ने मे सहायक होते हैं परन्तु संरचना तथा उद्भव के आधार पर भिन्न होते हैं। समजात अंगों की भांति समवृत्ति अंग भी जैव विकास की पुष्टि करते हैं।
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(स) अवशेषी अंग (Vestigial organs)-
जन्तुओं में कुछ ऐसे अंग होते हैं जो अपेक्षाकृत छोटे, अर्द्धविकसित और। अनुपयोगी हो जाते हैं। परन्तु वही अंग सम्बन्धियों या पूर्वजों में महत्वपूर्ण कार्य करने के लिए पूर्ण विकसित होते थे। इस प्रकार के निरर्थक एवं अनावश्यक अंगों को अवशेषी अंग कहते हैं।
उदाहरण- मानव की आहारनाल में स्थित कृमि रूपी परिशेषिका (Vermiform appendix), कर्ण पल्लव की पेशियां पुच्छ कशेरुका (Coccyx), निमेषक पटल (Nictitating membrane), तीसरा मोलर दांत (Third Molar tooth) जिसे अकल दाढ़ (Wisdom tooth) कहते हैं।
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मनुष्य के अलावा अन्य प्राणियों जैसे घोड़े के पाद की दूसरी और चौथी ऊंगलियों के अवशेष, शुतुरमुर्ग, कीवी व एमू के पंख, व्हेल व सर्यों में श्रोणी मेखला आदि। ये अंग कभी न कभी इनके पूर्वजों के क्रियाशील थे, बदलते पर्यावरण में इनके उपयोग धीरे-धीरे कम होता गया और ये आकार में छोटे व निष्क्रिय होते गए। इस प्रकार अवशेषी अंग विकास के प्रक्रम को स्थापित एवं प्रमाणित करते हैं।

(द) पूर्वजता या प्रत्यावर्तन (Atavism or Reversion)-
जीवों या जीव समूहों में कुछ लक्षण जो बहुत समय पहले उनके पूर्वजों में पाये जाते थे, अचानक विकसित हो जाते हैं। इसको पूर्वजता या प्रत्यावर्तन (Atavism or Reversion) कहते हैं। सामान्य रूप से आधुनिक जीवों में ये लक्षण विलुप्त हो चुके होते हैं, बहुत समय पहले पूर्वजों में ये लक्षण क्रियाशील अवस्था में थे।
उदाहरण-

  • कुछ मनुष्यों में पूरे शरीर पर लम्बे व घने बाल (कपियों के समान) पाये जाते हैं।
  • कभी-कभी किसी मानव शिशु में छोटी से पूंछ (Tail) पाई जाती है।
  • कभी-कभी मानव शिशु में बड़े व नुकीले कैनाईन दांत पाये जाते हैं जो मांसाहारी पूर्वजों में पाये जाते थे।

प्रश्न 2.
लैमार्कवाद व नव लैमार्कवाद की विवेचना कीजिये।
उत्तर-
लेमार्कवाद (Laimarckism)-
फ्रांस के वैज्ञानिक जीन बेपटिस्ट डी लेमार्क (1744-1829) ने अपनी संकल्पना प्रस्तुत की जिसे लेमार्कवाद कहते हैं। इन्होंने उपार्जित लक्षणों की वंशागति का सिद्धान्त प्रतिपादित किया।

लेमार्कवाद की मुख्य चार अवधारणाएं निम्न हैं-

  • आंतरिक जैव बल (Internal vital force) – लेमार्क के अनुसार सभी जीवों में कुछ आन्तरिक जैव बल उपस्थित होता हैं, इन बलों के कारण ही जीवों में अपने अंगों तथा पूर्ण शरीर के आकार में वृद्धि करने की प्रवृत्ति बनी रहती है।
  • वातावरण को प्रभाव और नई आवश्यकताएं (Effect of environment and new needs) – वातावरण सभी प्रकार के जीवों को प्रभावित करता है। परिवर्तित वातावरण ही जीवों में नई आवश्यकताओं को उत्पन्न करता है। इन नई आवश्यकताओं के कारण जीव नई संरचनाओं को उत्पन्न करते हैं जिससे उनके स्वभाव और संरचनाओं में परिवर्तन आ जाते हैं।
  •  अंगों का उपयोग तथा अनुपयोग (Use and disuse of organs) – यदि अंग लगातार उपयोग में आता है तो यह अधिक विकसित और शक्तिशाली हो जाता है तथा अनुपयोगी अंग धीरे-धीरे अपह्यसित होने लगते हैं।
  • उपार्जित लक्षणों की वंशागति (Inheritance of acquired character) – इस प्रकार जीव के जीवन काल में आंतरिक जैव बलों, वातावरण का प्रत्यक्ष प्रभाव, नई आवश्यकता और अंगों के उपयोग तथा अनुपयोग के द्वारा नए लक्षणों का विकास होता है। इन लक्षणों को उपार्जित लक्षण कहते हैं ।
    ये लक्षण एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में वंशागत होते हैं, कई पीढ़ियों तक इन लक्षणों की वंशागति से एक नई जाति का विकास हो जाता है जो अपने पूर्वज से भिन्न होती है।

उदाहरण-

  1. जिराफ, अफ्रीका में पाया जाने वाला जन्तु है। इसके पूर्वजों की आकृति काफी छोटी थी और उस समय उनके निवास स्थान में घास-फूस अधिक था। अतः पूर्वज घास पर निर्वाह करते थे। धीरे-धीरे वातावरण में परिवर्तन हुआ जिसके कारण यह रेगिस्तान बनने लगा। अतः जिराफ को भोजन के लिए ऊंचे पेड़-पौधों की पत्तियों पर निर्भर होना पड़ा। पेड़ों की पत्तियों तक पहुंचने के लिए छोटे जन्तु को अपनी गर्दन लगातार ऊपर करनी पड़ती तथा अग्र टांगों द्वारा कूदकर पत्तियों तक पहुंचना पड़ता। लेमार्क ने बताया कि जिराफ की अगली टांगों तथा गर्दन का अधिक उपयोग होने से यह अंग लम्बे होते गए। इन लक्षणों का एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तान्तरण हुआ। जिराफ के अंगों का लम्बा होना उपार्जित लक्षण तथा इसको हस्तानान्तरण वंशागति कहलाते हैं जिसके फलस्वरूप आधुनिक जिराफ का विकास हुआ।
  2. सर्यों के पैर का न होना- लेमार्क के अनुसार प्रारम्भिक काल में सर्यों के पैर होते थे परन्तु इनका भूमिगत जीवन होने के कारण बिलों में घुसने के लिए पैर बाधक होते थे व न इनका उपयोग होता था। अतः धीरे-धीरे पैर छोटे होकर अन्त में विलुप्त हो गए।
  3. जलीय पक्षियों में जालयुक्त पाद- बत्तखों तथा दूसरे जलीय पक्षियों में पानी में तैरने के लिए इनके पादों की ऊंगलियों के बीच की त्वचा तनी रहती थी जिसके कारण जालंयुक्त पादों (Webbed foot) का निर्माण हुआ।
  4. कर्णपल्लव की पेशियां- खरगोश, गाय, हाथी, कुत्ते आदि में कर्णपल्लव पेशियां अधिक विकसित होती हैं। क्योंकि ये जन्तु इनका अधिक उपयोग करते हैं, किन्तु मनुष्य में ये ह्यसित (Reduced) हो गई क्योंकि इनको उपयगोग नहीं किया जाता है।

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लेमार्कवाद की आलोचना (Critism of Lamarckisin)-
लेमार्कवाद का कई वैज्ञानिकों ने खण्डन किया तथा प्रयोगों व उदाहरणों से यह सिद्ध कर दिया कि उपार्जित लक्षणों की पीढ़ी दर पीढ़ी वंशागति नहीं होती है और न ही उन अंगों का अधिक विकास होता है जिनका अधिक उपयोग होता है।

कुवियर (Cuvier) तथा वीजमान (Weismann) लेमार्कवाद के सबसे बड़े आलोचक थे। लेमार्कवाद की आलोचना में वैज्ञानिकों ने निम्न प्रयोग तथा उदाहरण प्रस्तुत किए

  • जर्मन वैज्ञानिक वीजमान ने 20-22 पीढ़ियों तक नवजात चूहों की पूंछ काटी, फिर भी नई सन्तानों में पूंछ समाप्त नहीं हुई तथा न ही इनकी लम्बाई कम हुई।
  • उन व्यक्तियों ने जो निरन्तर पढ़ने लिखने में अपनी आंखों का उपयोग करते हैं, आंखें जल्दी कमजोर हो जाती हैं। जबकि लेमार्कवाद के अनुसार इनकी आंखें और अधिक बड़ी एवं सुविकसित हो जानी चाहिए थी।
  • सदियों से भारतीय नारियों के नाक व कान छिदवाने की प्रथा चली आ रही है लेकिन यह लक्षण वंशागत नहीं हुआ है।
  • लुहार व पहलवान द्वारा जीवनकाल में अर्जित की गई मजबूत मांसपेशियां उनके पुत्रों में वंशागत नहीं होती हैं।

नव लेमार्कवाद (Neo—Lamarckism)-
समनर (Sumner), टॉवर (Towar), मैक्डूगल (McDougall) इत्यादि वैज्ञानिकों ने लेमार्कवाद का समर्थन किया किन्तु कुछ ने परिवर्तन करके संशोधित सिद्धान्त प्रस्तुत किया जिसे ही नव लेमार्कवाद कहते हैं।

नव लेमार्कवाद (Neo-Lamarekism) के अनुसार अंगों के उपयोग एवं अनुपयोग का प्रभाव वंशागत तो नहीं होता है किन्तु बाह्य वातावरण का प्रभाव हार्मोन्स पर पड़ता है एवं ये हार्मोन्स जनन कोशिकाओं को प्रभावित करते हैं जिसके फलस्वरूप लक्षण वंशागत हो जाते हैं। साथ ही वातावरण में परिवर्तनों के कारण कुछ ऐसे भौतिक व रासायनिक परिवर्तन हो जाते हैं जो जनन द्रव्य (Germ plasm) को प्रभावित करते हैं। ऐसे परिवर्तन निश्चित रूप से वंशागत होकर संतानों में प्रदर्शित होते हैं।

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प्रश्न 3.
डार्विनवाद व नव डार्विनवाद की विवेचना कीजिये।
उत्तर-
डार्विनवाद (Darwinism)-
इंग्लैण्ड के चार्ल्स डार्विन (Charls Darwin, 1809-1882) ने 1831 से 1836 के बीच ‘बीगल’ नामक जहाज पर अनेक द्वीपों की समुद्री यात्रा की । यात्रा के दौरान उन्होंने गैलेपेगोस द्वीप” पर रहने वाले जन्तुओं में विभिन्नताओं का अध्ययन किया तथा माल्थस द्वारा लिखित पुस्तक ‘जनसंख्या का सिद्धान्त’ नामक पुस्तक को पढ़कर अपने प्रेक्षणों व निष्कर्षों को अपनी पुस्तक “प्राकृतिक वरण द्वारा जाति ant gryfa” (Origin of Species by Natural Selection) Ħ प्रकाशित करवाया। इसी पुस्तक में उन्होंने जैव विकास के सम्बन्ध में सिद्धान्त प्रस्तुत किया जिसे डार्विनवाद (Darwinism) या ‘प्राकृतिकवरण का सिद्धान्त’ (Theory of Natural Selection) कहते हैं ।

डार्विन ने अपने सिद्धान्त में निम्न तथ्यों का उल्लेख किया

  • जीवों में अत्यधिक सन्तानोत्पत्ति की क्षमता (Enormous capacity of reproduction)- डार्विन के अनुसार प्रत्येक जीवधारी में सन्तान उत्पन्न करने की प्रचुर क्षमता होती है, तथा प्रत्येक जीवधारी अपनी जाति को बनाए रखने के लिए सन्तानोत्पादन करता है। एक मादा ओएस्टर (Oysters) एक मौसम में लगभग 10 लाख अण्डे देती है। एक कवक (Fungus) 7 खरब बीजाणु (Spores) बनाता है तथा एक मादा ऐस्कैरिस 21/2 करोड़ से अधिक अण्डे देती है। यदि सब अण्डों या बीजाणुओं का पूरा विकास हो जाए तो किसी भी जाति के सदस्य रेखागणितिक अनुपात (Geometric ratio) में बढ़कर कुछ ही पीढ़ियों में पूरी पृथ्वी को ढक सकते हैं। फिर भी यह देखा गया है कि पृथ्वी पर इनकी संख्या लगभग स्थाई रहती है। इसका कारण यह है कि सभी अण्डे व बच्चे विकसित नहीं हो पाते हैं, ये प्रजनन योग्य बनने से पूर्व ही नष्ट हो जाते हैं।
  • जीवन संघर्ष (Struggle for existence) अत्यधिक सन्तानोत्पत्ति के होने पर भी सभी जीवों की संख्या करीब-करीब निश्चित रहती है क्योंकि जीवों में स्थान व भोजन प्राप्त करने के लिए स्पर्धा रहती है। इसी स्पर्धा को जीवन संघर्ष कहते हैं। प्रत्येक जीव के लिए यह भ्रूणावस्था से प्रारम्भ होकर जीवनभर चलता रहता है। अतः प्रचुर सन्तानोत्पत्ति जीव इसलिए करते हैं कि कुछ सदस्य जीवन संघर्ष में विजयी होकर जाति को चलाने हेतु बचे रहें।
    जीवन संघर्ष सब जीवों में देखने को मिलता है। यह तीन प्रकार का होता है
    (अ) अन्तःजातीय संघर्ष (Intra specific Struggle)-
    एक ही जाति सदस्यों की आवश्यकताएं लगभग समान होती हैं। अतः इनके बीच मुख्यतः भोजन, उपयुक्त स्थान एवं संगम-साथी (Mating partner) के लिए परस्पर संघर्ष होता रहता है।
    (ब) अन्तर्जातीय संघर्ष (Intera specific Struggle)-
    विभिन्न जातियों में समान आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए संघर्ष अन्तर्जातीय संघर्ष कहलाता है।
    (स) वातावरणीय संघर्ष (Environmental Struggle)-
    सभी जीव गर्मी, सर्दी, वर्षा, बाढ़, सूखा, वायु-वेग आदि अनेक वातावरणीय दशाओं से बचने के लिए संघर्ष करते रहते हैं।
  • विभिन्नताएं व वंशानुगति – कुछ प्राणियों में जीवित रहने के लिए दूसरों की अपेक्षा कम संघर्ष करना पड़ता है। ये वातावरण के साथ अधिक अनुकूलित होते हैं और दूसरों । से इनमें विभिन्नताएं पाई जाती हैं। डार्विन ने स्पष्ट किया कि वे जीव जिनमें ये विभिन्नताएं वातावरण के अनुकूल होती हैं जीवित रहते हैं तथा शेष नष्ट हो जाते हैं। ये । सभी विभिन्नताएं सन्तानों में वंशागत हो जाती हैं तथा यह क्रम पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचरित होती रहती है।
  • समर्थ का जीवत्व या प्राकृतिक वरण – डार्विन के अनुसार जीवन संघर्ष में उन्हीं जीवों को सफलता मिलती है जो वातावरण के अनुसार अधिक अनुकूलित होते हैं या जिनकी रचना उस वातावरण में रहने के लिए अधिक उपयुक्त होती है। इस प्रकार के जन्तु ही बहुमुखी जीवन संघर्ष में सफल और विजयी होते हैं। इसके विपरीत, अनुपयोगी विभिन्नताओं वाले सदस्य सफल जीवन की आवश्यकताओं से वंचित रह जाते हैं और किसी न किसी अवस्था में नष्ट हो जाते हैं। इस जीवन संघर्ष में वातावरण के प्रति अनुकूलित जीव ही जीवित रहते हैं तथा अनुकूलित न होने वाले जीव नष्ट हो जाते हैं जिसे प्राकृतिक वरण” कहते हैं। इसे उपयुक्ततम की जीविता (Survival of the fittest) भी कहा जाता है।
  • वातावरण के प्रति अनूकूलन – सजीव का वातावरण परिवर्तनशील होता है। बदलती हुई दशाओं के अनुसार, अपनी जीवन-रीतियों, रचना, कार्यिकी आदि में आवश्यक परिवर्तन कर लेने, अर्थात् अनुकूलन (Adaptability) की योग्यता जीवन संघर्ष में विजयी होने के लिए बहुत आवश्यक होती है। अतः अनुकूलन में सहायक विभिन्नताएं लाभदायक होती हैं। अनुकूलन की क्षमता की कमी वाले सदस्य असफल रहते हैं।
  • नई जातियों की उत्पत्ति – डार्विन ने बताया कि प्राकृतिक वरण एक सतत प्रक्रिया है। वातावरणीय परिवर्तन की आवश्यतानुसार प्रत्येक जीव-जाति में पीढ़ी-दर-पीढ़ी योग्यतम सदस्यों के ही लक्षणों की अधिकाधिक वंशागति होती रहती है। इस प्रकार अच्छे लक्षणों की वंशागति बढ़ने तथा अनुपयोगी लक्षणों का लोप होने से प्रत्येक पीढ़ी के सदस्य अपने पूर्वजों से कुछ अधिक सुगठित एवं भिन्न हो जाते हैं। पीढ़ी-दर-पीढ़ी वंशागति में इसी विभिन्नता के कारण हजारों-लाखों वर्षों के बाद नई और पुरानी पीढियों के सदस्यों में इतना अन्तर हो जाता है कि नई पीढ़ियां नई जातियां बन जाती हैं।

उदाहरण-

  1. चीता, तेंदुआ तथा शेर आपस में काफी समानताएं रखते हैं। सभी मांसाहारी हैं। इनकी अंगुलियों पर पैने पंजे होते हैं। प्रारम्भ में ये तीनों एक ही जाति के सदस्य थे। वातावरणीय अनुकूलनताओं के फलस्वरूप इनमें विभिन्नताएं हो गई और नई जातियां बन गई। इसी प्रकार कुत्ता, गीदड़ व भेड़िया आदि के भी एक ही पूर्वज रहे होंगे जो बाद। में अलग-अलग वातावरणीय भिन्नताओं एवं अनुकूलनताओं के कारण तीन विभिन्न जातियां बन गई। डार्विन के अनुसार प्राणियों की जितनी जीवित जातियां हैं वे सभी प्राकृतिक वरण के फलस्वरूप उत्पन्न हुई हैं।
  2. डार्विन के अनुसार प्रारम्भिक काल में जिराफ की दो जातियां थी- छोटी गर्दन वाली एवं लम्बी गर्दन वाली। प्राकृतिक आपदा (सूखे) के कारण जब छोटी वनस्पति नष्ट हो गई तो छोटी गर्दन वाले जिराफ नष्ट हो गए किन्तु लम्बी गर्दन वाले जिराफ पेड़ों की पत्तियां खाकर जीवित रहे इस प्रकार प्रकृति ने सक्षम का चयन किया।
  3. डार्विन ने गेलेपैगोस द्वीप समूह पर पक्षियों की 20-22 किस्मों का अध्ययन किया एवं पाया कि यह पक्षी अमेरिका में पाये जाने वाले पक्षियों के समान ही हैं। किन्तु भिन्न वातावरण में भोजन अनुकूलताओं के कारण इनकी चोंच के आकार व संरचना में भिन्नता आ गई। इन पक्षियों को डार्विन की फिंचेस (Darwin finches) कहा जाता हैं।

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डार्विनवाद की आलोचना (Criticism of Darwinism)-
यद्यपि डार्विनवाद को उविकास की व्याख्या के लिए काफी समर्थन प्राप्त है। किन्तु कुछ वैज्ञानिकों ने इसके प्रति अनेक आपत्तियां प्रस्तुत की, जो निम्नलिखित हैं

  • डार्विन ने विभिन्नताओं की उत्पत्ति एवं कारणों पर कोई प्रकाश नहीं डाला ।
  • डार्विन के समय आनुवांशिकी का ज्ञान नहीं था। इसलिए वे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में संचारित होने वाली और न होने वाली विभिन्नताओं में भेद नहीं कर सके। डार्विन के अनुसार सभी विभिन्नताएं वंशागत होती हैं जबकि केवल वे ही लक्षण वंशागत हो सकते हैं जो जनन कोशिकाओं के गुण सूत्रों पर उपस्थित जीन से सम्बन्धित होते हैं।
  • डार्विन ने अवशेषी अंगों की उपस्थिति तथा अंगों के प्रयोग में लाने या न लाने के प्रभाव का उल्लेख नहीं किया।
  • प्राकृतिक वरणवाद योजक कड़ियों की उपस्थिति की व्याख्या नहीं करता।
  • प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध हो चुका है कि वातावरण के कारण जीवों में कायिक परिवर्तन संतति में वंशागत नहीं होते।

नव-डार्विनवाद (Neo-Darwinism)-
डार्विन के प्राकृतिक वरण के सिद्धान्त में अनेक खोजों और अनुसंधानों से कई परिवर्तन किए गए जिससे यह मत रूपान्तरित हो गया। डार्विनवाद के इस रूपान्तरित रूप को ही नवडार्विनवाद कहते हैं। इस मत के समर्थक वैज्ञानिक वालेस, अर्नेस्ट, वैल्डेन, डेवेनपोर्ट आदि हैं। इन्होंने प्रयोगों द्वारा प्राकृतिक वरण की पुष्टि की।
प्राकृतिक वरण के पक्ष में उदाहरण

  • डेवनपोर्ट के चूजों पर प्रयोग – डेवनपोर्ट ने विभिन्न रंगों के चूजों जैसे काले, भूरे, सफेद, धारीदार आदि को स्वतंत्र रूप से छोड़ दिया। इनमें से जो सफेद थे तथा जो शत्रुओं (बाज) द्वारा आसानी से दिखे उनको मार डाला गया जबकि शेष वातावरण से रंगों की अनुरूपता के कारण बच गए।
  •  सेसनोला का प्रयोग – इस प्रयोग में सेसनोला ने मेंटिस रिलिजिओसा के विभिन्न रंगों के चयनात्मक मूल्य को जांचा । उन्होंने धब्बेदार मेन्टिस एवं वातावरण की पृष्ठभूमि में दिखने वाले स्पष्ट मेन्टिस को एक ही वातावरण में रखा। कुछ समय बाद प्रेक्षण करने पर पाया कि जिन मेन्टिस के रंग पौधों के अनुरूप थे वे बच गए जबकि भिन्न रंगों के एवं आसानी से पहचाने जाने वाले मेन्टिस शिकारी पक्षियों द्वारा खा लिए गए।
  • औद्योगिक कृष्णता (Industrial Melanism) – इंग्लैण्ड में पाया जाने वाला भूरे पिपर्ड मोर्थ (Bis toll betularit) हल्के रंग का कीट था जो ओक पेड़ की पत्तियों पर पाया जाता था। इसी जाति का एक अन्य कीट जो अपेक्षाकृत गहरे भूरे रंग का काला शलभ था कम एवं दुर्लभ पाया जाता था। औद्योगिक क्रान्ति के साथ ही कोयलों के अत्यधिक उपयोग से वातावरण में कालिख की मात्रा बढ़ती गई और वनस्पतियों के तनों पर कालिख जमने से रंग काला हो गया तथा इसको परिणाम भूरे शलभों पर प्रतिकूल पड़ा। वे शिकारी पक्षियों द्वारा आसानी से पहचाने जाने के कारण नष्ट होने लगे और धीरे-धीरे इनकी संख्या कम होती गई और इसके विपरीत काले शलभ की संख्या बढ़ गई। धीरे-धीरे कोयले को ऊर्जा के रूप में पेट्रोलियम पदार्थों ने प्रतिस्थापित कर दिया । वातावरण में कालिख व धुएं की मात्रा कम होती गई और वनस्पतियों के तने वापस भूरे रंग के हो गए। इसका प्रभाव पुनः शलभों की संख्या पर पड़ा। काले शलभ परभक्षियों द्वारा आसानी से पहचाने जाने के कारण नष्ट होने लगे एवं इनकी संख्या धीरे-धीरे कम होने लगी जकि भूरे शलभ वनस्पतियों के रंग से मिलते-जुलते होने के कारण सुरक्षित होने लगे और पुनः इनकी संख्या में बढ़ोतरी हो गई। इस परिघटना को वैज्ञानिकों ने औद्योगिक कृष्णता कहा।

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प्रश्न 4.
उत्परिवर्तन वाद का वर्णन कीजिये।
उत्तर-
उत्परिवर्तनवाद या डी व्रीज का सिद्धान्त (Theory of Mutation or Theory of De-vries)
डी ब्रीज (1901) ने इवनिंग प्रिमरोज (Oemothera lamarckiana – 4 O’ clock plant) जाति के पौधों पर परीक्षणों के पश्चात् यह मालूम किया कि कुछ पौधे अकस्मात् अपनी जाति से बिल्कुल भिन्न हो जाते हैं। यही नहीं, वे विभिन्न लक्षण वंशागत होकर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जाते रहते हैं और नई जाति का निर्माण करते हैं। जातीय लक्षणों में अकस्मात् वंशागत परिवर्तनों की क्रिया को डी ब्रीज ने उत्परिवर्तन (Mutation) की संज्ञा दी एवं उत्परिवर्तनवाद का सिद्धान्त दिया।

डी व्रीज की खोजों ने यह पहली बार बताया कि किसी जाति के सदस्यों में विभिन्नताएं उनमें निरन्तर होने वाले उत्परिवर्तनों द्वारा होती है।

डी ब्रीज की खोजों को ‘उत्परिवर्तन सिद्धान्त’ कहा जाता है। इस सिद्धान्त के तथ्य निम्नलिखित हैं

  • प्रकृति में उत्परिवर्तन वंशागत होते हैं तथा इनसे नई जातियों का विकास होता है।
  • प्रकृति में नई जीव-जातियों की उत्पत्ति लक्षणों में छोटी छोटी व अस्थिर विभिन्नताओं के प्राकृतिक चयन द्वारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचय (accumulation) एवं क्रमिक विकास के फलस्वरूप नहीं होती, वरन् एक ही बार में स्पष्ट एवं स्थायी (अर्थात् वंशागत) आकस्मिक परिवर्तनों (उत्परिवर्तनों) के फलस्वरूप होती है।
  • जाति का पहला सदस्य जिसमें उत्परिवर्तित लक्षण दिखाई देता है, उत्परिवर्तक (mutant) कहलाता है। यह सदस्य उत्परिवर्तित लक्षण के लिए शुद्ध नस्ली (pure-breeding) होता है।
  • सभी जीव-जातियों में उत्परिवर्तन की प्राकृतिक प्रवृत्ति (inherent tendency) होती है जो कभी बहुत कम, कभी अधिक और कभी बिल्कुल लुप्त होती है।
  • उत्परिवर्तनों पर प्राकृतिक वरण का प्रभाव पड़ता है। लाभप्रद उत्परिवर्तन संचित कर लिए जाते हैं और हानिकारक उत्परिवर्तन वाले जीव प्राकृतिकवरण द्वारा नष्ट हो जाते हैं।
  • उत्परिवर्तन किसी भी दिशा में हो सकता है। अतः ये लाभप्रद भी हो सकते हैं और हानिकारक भी।
  • अंगों के विकास की प्रारम्भिक अवस्था को उत्परिवर्तन सिद्धान्त के द्वारा समझाया जा सकता है।

उत्परिवर्तन सिद्धान्त की आलोचना (Criticism of Mutation Theory)-
पादप शास्त्री जोहन्सन ने डी व्रीज की भाँति के प्रयोग करके उत्परिवर्तनवाद का समर्थन किया किन्तु अन्य वैज्ञानिकों ने परिवर्तन सिद्धान्त की आलोचना में तर्क प्रस्तुत किए।

  • डी व्रीज के प्रीमरोज पौधे में मिलने वाले विभिन्न म्युटेशन एवं विचित्र संयोग है जो सभी जीवों में समान रूप से नहीं मिलते।
  • प्रिमरोज में जो विभिन्नताएं डी ब्रीज ने देखी वे जीन्स में आकस्मिक परिवर्तनों के कारण नहीं, वरन् गुणसूत्रों के अनियत पृथक्करण एवं संयोजन के कारण थी।
  • जीवों के बीच पाये जाने वाले अलगाव (discontinuity) की व्याख्या उत्परिवर्तनवाद के आधार पर नहीं की जा सकती है।
  • सामान्यतया प्रत्येक जीव-जाति वातावरण के अनुसार अनुकूलन (adaptability) की क्षमता रखती है। क्योंकि उत्परिवर्तन अकस्मात् एवं अनिश्चित होते हैं, इनसे प्रभावित जीवों की अनुकूलन की क्षमता पर इनका प्रभाव डी ब्रीज ने स्पष्ट नहीं किया।
  • योजक कड़ियों (Connecting links) के माध्यम से जैव विकास में जो एक क्रम दिखाई देता है उसका स्पष्टीकरण भी उत्परिवर्तन सिद्धान्त से नहीं मिलता। अतः केवल उत्परिवर्तन को ही उविकास का आधार नहीं माना जा सकता।
    फिर भी उत्परिवर्तन विकास के लिए एक आधार प्रदान करते हैं। पर केवल उत्परिवर्तनों को ही जैव विकास का आधार नहीं माना जा सकता है।

प्रश्न 5.
विभिन्नताओं से आप क्या समझते हैं? इनके कारणों को वर्णन कीजिये तथा जैव विकास में इनके महत्व पर टिप्पणी लिखिये।
उत्तर-
डार्विनवाद (जैव विकास ) का आधुनिक दृष्टिकोण (Modern views of organic evolution)-
चाल्स डार्विन ने जैव विकास के लिए 1858-59 में प्रथम तर्कसंगत एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया था किन्तु डार्विन के समय आनुवंशिकी का ज्ञान न होने से उनके सिद्धान्त में अनेक कमियां रह गई थी। बाद के वर्षों में वैज्ञानिकों ने आनुवंशिकी के ज्ञान की सहायता से विभिन्नताएं (variations), उत्परिवर्तन (mutation), पुनर्योजन (Recombination), अभिगमन (Migration), प्राकृतिक वरण इत्यादि तथ्यों को सम्मिलित करते हुए डार्विनवाद का आधुनिक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया।

विभिन्नताएं (Variations)-
जीवों में विभिन्नताओं का होना प्रकृति का नियम है और यह जीवों के विकास हेतु आवश्यक कारक है। यह सर्वविदित है कि सभी व्यक्ति एक जैसे नहीं होते और एक व्यक्ति के दोनों समान अंगों में भी पूर्ण रूप से समानता नहीं होती है। इसे संसार के सभी प्राणी एवं पौधों की जातियों में देखी जा सकती है। विभिन्नता विकास के लिए एक प्रगामी (progressive) घटना है। ‘निकट सम्बन्धी जीवों” (सजातीय जीवों) के सदस्यों के लक्षणों में पाये जाने वाले अन्तर या असमानताओं को विभिन्नताएं कहते हैं।

विभिन्नताओं के कारण-
विभिन्नताएं निम्न कारणों से उत्पन्न हो सकती हैं-

  • विभिन्नताएं वातावरणीय परिस्थितियों जैसे ताप, प्रकाश, पोषक पदार्थों, विकिरणों आदि द्वारा जीवधारियों में उत्पन्न हो जाती हैं।
  • हमारे आनुवंशिक पदार्थ जीन एवं गुणसूत्र होते हैं। इनकी संख्या व रचना में परिवर्तन से विभिन्नताएं उत्पन्न होती हैं।
  • नये संतति का जन्म नर व मादा के संयोजन से होता है। अतः इस द्विजनकता (Dual parentage) के कारण दो जीवों के आनुवंशिक पदार्थ मिलते हैं जिसके फलस्वरूप जीवों में जीन अन्र्तक्रिया होती है और विभिन्नताएं उत्पन्न होती हैं।

विभिन्नताओं के प्रकार (Types of variations)
विभिन्नताओं को तीन समूहों में विभाजित किया गया है

  • कायिक तथा जननिक विभिन्नताएं (Somatic or Germinal variations)-कायिक विभिन्नताएं (Somatic variations) अर्जित विभिन्नताएं हैं जो जीव के जीवनकाल में बाह्य प्रभावों के द्वारा उत्पन्न हो जाती हैं या यह जीव उन्हें स्वयं ग्रहण (Acquire) कर लेता है। इसलिए इन्हें अर्जित विभिन्नताएं भी कहते हैं। जैसे अधिक समय तक धूप में रहने
    पर त्वचा का रंग काला पड़ जाता है। पहलवान की विकसित मांसपेशियां आदि कायिक विभिन्नता का उदाहरण है। जननिक विभिन्नताएं वे हैं जिनको उद्भव जनन द्रव्य (gernm plasm) में जीनों के पुनः संयोजन (recombination of genes) या उत्परिवर्तन (mutation) द्वारा होता है। इससे यह स्पष्ट है कि जननिक विभिन्नताओं की उत्पत्ति वातावरण के प्रभाव के कारण नहीं होती। ये विभिन्नताएं जीन पुर्नसंयोजन (genetic recombination), गुणसूत्रों की संरचनाओं में परिवर्तन, जीने के रासायनिक स्वभाव में परिवर्तन, बहुगुणिता एवं विकिरणों आदि द्वारा उत्पन्न हो सकती है। आंखों को नीला, काला, भूरा रंग एवं बालों का सीधा अथवा धुंघराले होना जननिक विभिन्नताओं के उदाहरण हैं।
  • अनिर्धारित तथा निर्धारित विभिन्नताएं (Indeterminate and determinate variations)-अनिर्धारित विभिन्नताएं किसी विशेष नियम के अनुसार उत्पन्न नहीं होती। ये परिवर्तन किसी भी दिशा में हो सकते हैं। ऐसा अनुभव किया जाता है कि डार्विन का प्राकृतिक वरण इन पर अपना प्रभाव डालता है। निर्धारित विभिन्नताएं किसी अप्रत्यक्ष प्रभाव के द्वारा नियंत्रित की जाती हैं तथा किसी निश्चित दिशा में ये परिवर्तन होते हैं। ये विभिन्नताएं प्रायः अनुकूली दिशा की ओर ही अपना प्रभाव उत्पन्न करती है। आयरिश बारहसिंगों में उनके सींग निरन्तर बढ़ते गए हालांकि ये उनकी मृत्यु का कारण बने ।
  • सतत एवं असतत विभिन्नताएं (Continuous and discontinuous variations)-सतत विभिन्नताएं छोटी-छोटी विभिन्नताएं हैं जो जीवों की सामान्य अवस्था से अत्यन्त ही न्यून परिवर्तन उत्पन्न करती है। ये विभिन्नताएं धीरे-धीरे निरन्तर होती रहती है। कभीकभी ये इतनी छोटी होती है कि इनका पता लगना कठिन है। ये सभी प्राणी एवं पौधों में होती रहती है। सतत विभिन्नताएं जीव के त्वचा के रंग, ऊंचाई, वजन, वृद्धि आदि में देखने को मिलती हैं। असतत विभिन्नताएं बड़ी-बड़ी विभिन्नताएं हैं जो एकाएक उत्पन्न हो जाती हैं। इससे यह स्पष्ट है कि इनकी मध्यावस्था नहीं होती। इन विभिन्नताओं को ‘स्पोर्ट्स’ या उत्परिवर्तन (Sports or Mutations) भी कहते हैं। इनके द्वारा उत्पन्न जीव अपने जनकों से बहुत भिन्न होता है और उनसे पूर्ण रूप से पृथक माना जाता है। ये विभिन्नताएं सन्तानों में वंशागत होती हैं। इस प्रकार की विभिन्नता की एकाएक उत्पत्ति के कारण एकदम नये प्रकार के जीव उत्पन्न हो जाते हैं और इन विभिन्नताओं की वंशागति के कारण ये सन्ताने जनकों के सदृश होती है। जैसे मानव में कमीकभी पांच अंगुलियों के बजाय 6-7 अंगुलियों का हो जाना, पसलियों की अतिरिक्त संख्या होना इसके उदाहरण हैं।

सतत व असतत विभिन्नताओं में अन्तर

लक्षण  सतत विभिन्नताएं  असतत विभिन्नताएं
उपस्थिति यह प्राणियों में सामान्य रूप से पाई जाती है। ये प्रायः अचानक उत्पन्न होने वाली विभिन्नताएं हैं।
अन्य नाम उच्चावचन उत्परिवर्तन या स्पोर्ट्स
स्थायित्व व वंशागति स्थाई एवं वंशागत नहीं होती है। स्थाई एवं वंशागत होती है।
कारण प्रायः युग्मक निर्माण के दौरान जीन विनिमय द्वारा उत्पन्न होती है। जीन या जीनोम में परिवर्तन के कारण उत्पन्न होती है।

विभिन्नताएं के महत्व (Significance of variations)-

  • विभिन्नताएं जैव विकास प्रक्रिया की कच्ची सामग्री (Raw material) है।
  • विभिन्नताओं से जन्तुओं वे पादपों में लाभदायक परिवर्तन भी होते हैं।
  • विभिन्नताएं जन्तु को बदले हुए वातावरण के प्रति अनुकूलित करने में सहायता करती है।
  • जन्तु को अस्तित्व के साथ संघर्ष में सुदृढ़ बनाती है।

प्रश्न 6.
जाति उदभवन क्या होता है? जाति निर्माण की प्रक्रिया के प्रमुख कारकों का वर्णन कीजिये।
उत्तर-
जाति की अवधारणा (Concept of Species)-
स्पेशीज (Species) एक लेटिन शब्द है जिसका तात्पर्य प्रकार (kind) से है। परिभाषा के अनुसार जाति जीवों का वह समूह है जिसमें समान आनुवांशिक लक्षण होते हैं वे आपस में प्रजनन योग्य होते हैं। | जिससे सन्तान की उत्पत्ति कर सकते है। जाति वर्गीकरण की सबसे छोटी इकाई है।

जाति अन्र्तप्रजनन करने वाले जीवों का समूह होता है। परन्तु जाति के वे छोटे समूह जिनके बीच आनुवंशिक समानता होते हुए अन्र्तप्रजनन संभव होता है किन्तु ये भौगोलिक रूप से पृथक होती है, इन्हें डीम्स (demes) कहा जाता है। इसी प्रकार असमानता वाले जाति के छोटेछोटे समूह जिनमें भौगोलिक पृथक्कता हो उन्हें प्रजाति (race) कहा जाता है। जब दो जातियां आकारिकी में समान हो पर अन्र्तप्रजनन नहीं कर सके तो उन्हें सिबलिंग (sibling) जातियां कहते हैं, जैसेड्रोसोफिला, स्यूडोप्स्क्योरा एवं ड्रो. परसिमिलिस।

जाति के प्रकार (Type of Species)

  • एकलप्ररुषी या मोनोटिपिक जाति (Monotypic Species)- जब मूल जाति ही रूपान्तरित होकर नई जाति बन जाती है, अर्थात् जाति छोटे-छोटे उपसमूहों में विभाजित नहीं होती है।
  • बहुप्ररुपी या पोलीटिपिक जाति (Polytypic Species) जब एक जाति कई प्रजातियों या उपसमूहों में विभाजित होकर अनेक जातियां बनाती हैं उदाहरणतः अमेरिका में सांग गोरैया की कई उपजातियों को एकीकृत कर एक जाति पारसेला मेलोडियो नाम दिया गया है।

जाति उदभव (Specification)-
पूर्वज जातियों में नई जातियों की उत्पत्ति को जाति उद्भवन कहते हैं। नई जाति का निर्माण कैसे हुआ? वैज्ञानिकों का मानना है कि जीवों की संख्यात्मक वृद्धि से उनका प्रवास (migration) होता है अथवा | आवास की भौगोलिक देशाओं में परिवर्तन होती है। इससे जातियों में छोटे समूह बन जाते हैं। इन समूहों में होने वाले अन्तर्रजनन भी रुक जाता है। ये समूह या तो वातावरणीय संघर्ष में नष्ट हो जाते हैं या इनमें विभिन्नताएं उत्पन्न होने से ये अपने को वातावरण के प्रति अनुकूल बना लेती हैं। धीरे-धीरे लम्बे समय बाद इनका जीनपूल अपने पूर्वज जाति से भिन्न हो जाता है और इस प्रकार नई जाति का निर्माण हो जाता

जाति उद्भवन दो प्रकार का होता है-
( अ ) भिन्नदेशीय जाति उद् भवन (Allopatric Specification)-
जब एक जाति के जीव अपने आवास को छोड़कर दूर-दूर तक अभिगमन कर जाते हैं और नये आवासों में बस जाते हैं, इनके आवासों के बीच भौगोलिक बाधाएं उत्पन्न हो जाती हैं। नये आवास में जीव समूह की आनुवंशिकी से परिवर्तन के कारण ये समूह नई जाति में बदल जाते हैं। उदा. डार्विन की फिन्चेज।।

( ब ) एकदेशीय जाति उद्भवन (Sympatric Specification)-
कभी-कभी भिन्न आवासों के जीव किसी प्राकृतिक कारणों से नष्ट भौगोलिक पृथकता के समाप्ति के कारण आपस में सम्पर्क में आने पर अन्र्तप्रजनन कर लेते हैं और नई जातियों का निर्माण होता है। जन्तुओं में इस प्रकार का जाति उद्भवन कम होता है। पादपों में यह एक सामान्य प्रक्रिया होती है। इस प्रक्रिया में उत्पन्न संतति संकर (hybrid) कहलाती

जाति उद्भवन के कारण –
जाति उद्भवन के मुख्य कारण। अभिगमन (migration), आनुवंशिक विचलन (genetic drift), उत्परिवर्तन (mutation), लैंगिक पुनर्मिलन (sexual recombination), संकरण (hybridization), प्राकृतिक वैरण (natural selection), पृथक्करण है।

प्रश्न 7.
पृथक्करण (Isolation) किस प्रकार उविकास में सहायक होता है? समझाइये।
उत्तर-
पृथक्करण (Isolation)-
किसी जाति के जीवों का छोटे-छोटे समूहों या उपजातियों में विभक्त होने की क्रिया को पृथक्करण कहते हैं। अन्य परिभाषानुसार सजीवों के समुदायों या जातियों के बीच जीन प्रवाह को रोकने वाले विकल्प को ही पृथक्करण कहते हैं। पृथक्करण की जैव विकास में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसके कारण जातियां उपजातियों में बंट जाती है व अपनी मूल पैतृक जाति के साथ अन्र्तप्रजनन न होने से नई जाति विकसित हो जाती है। समुदायों के बीच भौतिक, भौगोलिक या अन्य प्रकार के अवरोध (barriers) के कारण पृथक्करण होता है। सर्वप्रथम वेगनर (Wagner) ने जीवों में पृथक्करण का महत्व बताया था। मैटकॉफ (Met calf) के अनुसार कोई भी कारक जो एक ही जाति के सदस्यों को आपस में स्वतंत्रतापूर्वक प्रजनन से रोकता है तथा उन्हें समूहों में विभक्त करता है, पृथक्करण कहलाता है।

वैज्ञानिक केलाग का मानना है कि यह एक ऐसा जैविक उत्प्रेरक (Biological catalyst) है जिससे ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न होती हैं। कि जीवों में परिवर्तन उत्पन्न होते हैं और प्रकृति स्वयं उनका चयन कर लेती है। वैलस ने भी पृथक्करण को प्राकृतिक वरण में सहायक माना है। पृथक्करण का कारण समुदायों के बीच किसी भौतिक, भौगोलिक या अन्य प्रकार के अवरोध (barriers) होते हैं।

पृथक्करण के प्रकार-
पृथक्करण के प्रमुख प्रकार निम्नलिखित होते हैं-

  • भौगोलिक पृथक्करण-विकासविद् मोरिज वेग्नर के अनुसार पृथ्वी पर उत्पन्न समस्त जातियों के निर्माण में भौगोलिक पृथक्करण एक महत्वपूर्ण कारक था। इसके लिए अनेक अवरोध जैसे पहाड़ियां, पृथ्वी पर जलीय स्थल, मरुस्थल, वन पर्वत आदि पाये जाते हैं। इनके कारण से जीवों के बीच की दूरी बढ़ जाती हैं और जीव परस्पर पृथक्क हो जाते हैं। अब इनमें आपसी जनन सम्भव नहीं होता और जीव स्थान विशेष में सीमित होने के कारण अनुकूलित हो जाते हैं। गेलेपेगोस द्वीप पर पाई जाने वाली विभिन्न प्रकार की डार्विन फिन्चेज भौगोलिक पृथक्करण का उदाहरण है।
  • स्थानिक पृथक्करण- इस प्रकार के पृथक्करण में जातियां अत्यधिक दूरी में फैली होती हैं। यह दूरी ही इतनी अधिक हो जाती है कि जीवों में पृथक्करण हो जाती है। जैसे उत्तरी गोलर्द्ध में पाई जाने वाली एलीफैन्टसील मिरोन्गा एन्गासटीरोस्ट्रिस दक्षिणी गोलार्द्ध में पाई। जाने वाली मिरोन्गा लिओनिना से भिन्न होती हैं। दोनों के आवास के बीच 3000 मील लम्बा समुद्र इन्हें पृथक्क रखता है।
  • जननिक पृथक्करण- (Reproductive Isolation)जीवों में अनेक जैविक अपूर्णताएं पाई जाती हैं, जिनके कारण ये आपस में जनन नहीं कर पाते हैं। इसे जननिक पृथक्करण कहते हैं। इसे दो समूहों में बांटा जा सकता है

( अ ) पूर्वसंगमी या युग्मनजपूर्ण पृथक्करण (Prezygotic Isolation)-
वे समस्त परिस्थितियां और कारक हैं जिनसे जीव आपस में जनन नहीं कर पाते हैं। यह निम्न प्रकार का होता है

  • आवासीय पृथक्करण – जब जीव आवास में भिन्नता के कारण आपस में प्रजनन नहीं कर पाते हैं तो इसे आवासीय या पारिस्थितिकी पृथक्करण (Ecological Isolation) कहते हैं।
  • ऋत्विक पृथक्करण (Seasonal Isolation) – जीवों में प्रजनन ऋतु की भिन्नता के कारण एक ही आवास में रहते हुए भी आपस में जनन नहीं कर पाते हैं।
  • आकारि की पृथक्करण ( Morphological Isolation) – प्राणियों के शरीर के आकार में भिन्नता के कारण भी परस्पर प्रजनन नहीं हो पाता है।
  • कार्यिकी पृथक्करण (Physiological Isolation) – जीवों में जननांगों की संरचना एवं कार्यिकी विशिष्ट होती। हे इसलिए साथ-साथ रहते हुए भी एक प्रजाति के नर । दूसरी प्रजाति की मादा से जनन नहीं कर पाते हैं जैसे ड्रॉसोफिला नामक फलमक्खी में ।

( ब ) पश्च-संगमी पृथक्करण-
यदि पूर्व संगमी पृथक्करण विधियां असफल हो जाये तो पश्च-संगमी पृथक्करण विधियां प्रकृति में पाई जाती हैं। युग्मकों के आपसी मिलन को प्रतिजन-प्रतिरक्षी क्रिया द्वारा नष्ट किया जाता है। इसे युग्मकी मर्त्यता (gametic mortality) कहते हैं। यदि युग्मकों के मिलने से युग्मनज (Zygote) निर्मित भी। हो जाये तो इसकी मृत्यु मादा शरीर में हो जाती है और इसका आगे। विकास नहीं होता। इसे युग्मनज मर्त्यता (Zygotic mortality) कहते हैं। कभी-कभी भिन्न जातियों में प्रजनन हो जाता है और युग्मनज के विकास से संकर जीव का परिवर्धन होने लगता है। लेकिन बनने वाला संकर जीव जनन से पूर्व किसी भी अवस्था में मर जाता है इसे संकर अजीविता (hybrid in viability) कहते हैं। कुछ जीवों में संकर विकसित हो जाता है किन्तु ये संकर जननक्षम नहीं होते। इसे संकर बंध्यता (hybrid sterility) कहते हैं। जैसे- गधे और घोड़े से उत्पन्न खच्चर बंध्य होता है।

पृथक्करण का महत्व –
पृथक्करण जाति उद्भव के लिए महत्वूर्ण । होता है। यह जीवों में अन्तरजनन को रोक देता है और उन्हें नये आवास में रहने के लिए अनुकूलित कर देता है। इससे जीवों में नये लक्षण उत्पन्न होते हैं। फलस्वरूप प्राकृतिक वरण प्रभावित हो जाता है जिससे नई जातियों के निर्माण में सहायता मिलती है।

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