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RBSE Solutions for Class 12 Biology Chapter 37 उत्परिवर्तन

June 17, 2019 by Safia Leave a Comment

Rajasthan Board RBSE Class 12 Biology Chapter 37 उत्परिवर्तन

RBSE Class 12 Biology Chapter 37 पाठ्य पुस्तक के प्रश्न एवं उत्तर

RBSE Class 12 Biology Chapter 37 बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
जीनोम है-
(अ) अगुणित गुणसूत्र समुच्चय पर कुल जीनों की संख्या
(ब) अगुणित गुणसूत्र समुच्चय पर कुल गुणसूत्र की संख्या
(स) द्विगुणित गुणसूत्र समुच्चय पर कुल गुणसूत्र की संख्या
(द) युग्मनज के गुणसूत्रों पर पाये जाने वाले कुल जीन।
उत्तर:
(अ) अगुणित गुणसूत्र समुच्चय पर कुल जीनों की संख्या

प्रश्न 2.
मनुष्य में पाये जाने वाले न्यूक्लीयोटाइड युग्मों की संख्या लगभग है।
(अ) तीन लाख
(ब) तीस लाख
(स) तीन करोड़
(द) तीन बिलियन
उत्तर:
(द) तीन बिलियन

RBSE Solutions for Class 12 Biology Chapter 37 उत्परिवर्तन

प्रश्न 3.
DNA फिंगर प्रिंटिंग का आधार क्या है?
(अ) DNA द्वारा हूबहू प्रतिकृति निर्माण से
(ब) DNA की सहायता से अंगुलियों की छाप लेने से
(स) किन्हीं भी दो व्यक्तियों के DNA अनुक्रम चित्र समान नहीं होते हैं।
(द) उपरोक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(स) किन्हीं भी दो व्यक्तियों के DNA अनुक्रम चित्र समान नहीं होते हैं।

प्रश्न 4.
‘डोली’ भेड़ किस विधि से प्राप्त की गयी थी।
(अ) सामान्य संकरण से
(ब) सामान्य जनन विधि से
(स) क्लोनिंग से
(द) ऊतक संवर्धन से।
उत्तर:
(स) क्लोनिंग से

प्रश्न 5.
उत्परिवर्तन कहते हैं-
(अ) कोशिका के आनुवंशिक पदार्थ में अस्थाई परिवर्तन को
(ब) कोशिका के आनुवंशिक पदार्थ के स्थाई एवं वंशागत परिवर्तन को
(स) कोशिका के जीवद्रव्य में किसी भी परिवर्तन को
(द) किसी भी प्रकार की विविधता को
उत्तर:
(ब) कोशिका के आनुवंशिक पदार्थ के स्थाई एवं वंशागत परिवर्तन को

प्रश्न 6.
उत्परिवर्तन की क्रिया में जब एडीनिन का प्रतिस्थापन ग्वानिन द्वारा होता है, तब यह कहलाता है-
(अ) फ्रेम शिफ्ट उत्परिवर्तन
(ब) अनुलेखन
(स) ट्रांजीशन
(द) ट्रांसवर्जन ।
उत्तर:
(स) ट्रांजीशन

प्रश्न 7.
आनुवंशिक कूट में पाये जाते हैं-
(अ) तीन क्षारक 64 कोडोन
(ब) तीन क्षारक 18 कोडोन
(स) दो क्षारक 32 कोडोन
(द) दो क्षारक 64 कोडोन
उत्तर:
(अ) तीन क्षारक 64 कोडोन

RBSE Solutions for Class 12 Biology Chapter 37 उत्परिवर्तन

प्रश्न 8.
बहुगुणिता कृत्रिम रूप से पैदा की जा सकती है-
(अ) कोल्चीसिन द्वारा
(ब) X-किरणों द्वारा
(स) गामा किरणों द्वारा
(द) उपरोक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(अ) कोल्चीसिन द्वारा

RBSE Class 12 Biology Chapter 37 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
ह्यूमन जीनोम प्रोजेक्ट किन अन्तर्राष्ट्रीय एजेंसियों ने शुरू करवाया?
उत्तर:
मानव जीनोम परियोजना (Human Genome Project) सन् 1988 में संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रारम्भ हुई, इसका औपचारिक शुभारम्भ 1990 में हुआ, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ तथा डिपार्टमेन्ट ऑफ एनर्जी की भागीदारी से यह योजना आरम्भ हुई।

प्रश्न 2.
VNTRs क्या होती है?
उत्तर:
DNA में लघु न्यूक्लियोटाइड पुनरावर्तन पाए जाते हैं। इनकी संख्या प्रत्येक व्यक्ति में अलग होती है, किन्तु ये वंशागत होते हैं। इन्हें अनुक्रम पुनरावर्तन या VNTRs (Variable Number Tandem Repeats) कहते हैं। दो व्यक्तियों के VNTRs समान लम्बाई के हो सकते हैं।

प्रश्न 3.
ऐसी अवस्था जिसके द्वारा गुणसूत्रों के समूह की संख्या में परिवर्तन होता है, उसे क्या कहते हैं?
उत्तर:
इसमें एक प्रजाति के गुणसूत्रों की संख्या हमेशा निश्चित होती है। इस प्रकार के उत्परिवर्तन में जीन में स्वयं में परिवर्तन नहीं होता है, बल्कि पूरे गुणसूत्र की संख्या दोगुनी, तिगुनी अथवा अनेक गुनी हो जाती है तब उसे गुणसूत्र उत्परिवर्तन या पोलीप्लॉइडी कहते हैं।

प्रश्न 4.
अवियोजन किसे कहते हैं?
उत्तर:
यदि कोशिका विभाजन में होने वाले गुणसूत्री पृथक्करण के समय गुणसूत्रों में अवियोजन (Non disjunction) हो जाता है। जिसके परिणामस्वरूप नवनिर्मित कोशिकाओं में एक या अधिक गुणसूत्रों की संख्या में कमी या अधिकता हो जाती है तो इसे असुगुणिता या अवियोजन कहते हैं।

RBSE Solutions for Class 12 Biology Chapter 37 उत्परिवर्तन

प्रश्न 5.
उत्परिवर्तन किसे कहते हैं?
उत्तर:
समस्त प्रकार के जीवों की कोशिका के आनुवंशिकी पदार्थ में अचानक हुए स्थायी एवं वंशागत परिवर्तन को उत्परिवर्तन (Mutation) कहते हैं। प्रकृति में उत्परिवर्तन लगातार होते रहते हैं।

प्रश्न 6.
प्रोब क्या होता है?
उत्तर:
प्रोब DNA के ज्ञात अनुक्रम के रेडियोएक्टिव संश्लिष्ट खंड होते हैं। प्रोब में विशिष्ट न्यूक्लीयोटाइड अनुक्रम होते हैं जो कि VNTR अनुक्रमों के पूरक होते हैं। ये प्रोब पूरक अनुक्रम पाए जाने पर उनके साथ संकरण करते हैं।

प्रश्न 7.
होनोलुलु तकनीक की किस वैज्ञानिक ने एवं कहाँ खोज की थी?
उत्तर:
इस तकनीकी को हवाई विश्वविद्यालय में रूजो यानागिमाची के नेतृत्व में तेरूहिको वाकायामा ने 1998 में विकसित किया।

RBSE Class 12 Biology Chapter 37 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
जीन उत्परिवर्तन को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
अर्धसूत्री विभाजन के दौरान DNA का प्रतिकृतिकरण होता है। सामान्यतः यह क्रिया बिलकुल सही या त्रुटिरहित संपन्न होती है। किन्तु कभी-कभी DNA का निर्माण त्रुटिपूर्ण हो जाता है। इसमें एक या एक से अधिक नाइट्रोजन क्षारक युग्मों में परिवर्तन हो जाता है। क्षारक युग्मों का क्रम ही जीन की विशिष्टता होती है। अतः जब परिवर्तन स्वयं जीन में होता है तब उसे जीन उत्परिवर्तन कहते हैं। यह परिवर्तन जीन की रचना अथवा उसके रासायनिक संगठन से होता है। यह परिवर्तन क्रोमोसोम के किसी एक जगह या लोकस पर स्थित जीन में होता है।

प्रश्न 2.
द्विगुणन से क्या आशय है?
उत्तर:
कभी-कभी किसी गुणसूत्र के किसी क्षेत्र की दो बार पुनरावृत्ति हो जाती है तब उन जीनों का द्विगुणन (Duplication) माना जाता है। गुणसूत्र के ये अतिरिक्त टुकड़े द्विगुणित गुणसूत्र के किसी मध्य हिस्से में अथवा सिरों पर अथवा किसी अन्य क्रोमोसोम से भी जुड़ सकते हैं।

प्रश्न 3.
बिन्दु उत्परिवर्तन क्या होते हैं?
उत्तर:
यह परिवर्तन जीन की रचना अथवा उसके रासायनिक संगठन से होता है। यह परिवर्तन क्रोमोसोम के किसी एक जगह या लोकस पर स्थित जीन में होता है। अत: इन्हें बिन्दु उत्परिवर्तन (Point mutation) भी कहते हैं। चूंकि न्यूक्लियोटाइड नाइट्रोजन क्षारकों के बने होते हैं। अतः उनके भिन्न प्रकार से स्थापन के कारण इन्हें क्षार-युग्म प्रतिस्थापन उत्परिवर्तन भी कह सकते हैं। इस परिवर्तन में परिवर्तित जीन का व्यवहार मूल जीन से भिन्न होगा, इस प्रकार के स्वच्छन्द उत्परिवर्तन प्रकृति में होते रहते हैं।

RBSE Solutions for Class 12 Biology Chapter 37 उत्परिवर्तन

प्रश्न 4.
जीनोम से आप क्या समझते हो?
उत्तर:
जीनोम परियोजना वह वैज्ञानिक परियोजना है, जिसका लक्ष्य किसी प्राणी के संपूर्ण जीनोम अनुक्रम का पता करना है। जीन हमारे जीवन की कुंजी है।

हम कैसे देखते हैं, कार्य करते हैं, यह काफी अंश तक हमारे देह में छिपे सूक्ष्म जीन तय करते हैं। यही नहीं, दो अलग-अगल व्यक्तियों में मिलने वाला DNA कुछ जगहों पर भिन्न-भिन्न होता है। मानव जीनोम में मिलने वाले पूर्ण DNA अनुक्रम को पता लगाने के लिये यह तथ्य विवश करते हैं। जीन वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि एक बार मानव जाति के समस्त जीनों की संरचना का पता चल गया तो मनुष्य की जीन-कुण्डली के आधार पर समस्त जैविक, दैहिक लक्षणों की भविष्यवाणी करना संम्भव हो जायेगा यह आसान नहीं है, क्योंकि मानव शरीर में हजारों-लाखों जीवित कोशिकाएँ होती हैं। किसी कोशिका में उपस्थित जीनों के इस विशाल समूह को जीनोम कहते हैं।

प्रश्न 5.
सुगुणिता से आप क्या समझते हैं।
उत्तर:
किसी जीन या कोशिका में उपस्थित आधारभूत गुणसूत्रों के समुच्चय को एकगुणिता कहते हैं। यदि किसी जीव में आधारभूत गुणसूत्रों के दो से अधिक समुच्चय पाए जाते हैं तो इसे सुगुणिता कहते हैं। यह दो प्रकार की होती है।

(a) स्व-बहुगुणिता (Autopolyploidy)—वे बहुगुणित, जिनमें गुणसूत्रों के समान प्रारम्भिक समुच्चय पाए जाते हैं स्व-बहुगुणित कहलाते हैं जैसे–त्रिगुणित, चतुर्गुणित, पंचगुणित आदि। कोल्चिसिन रसायन से इसका प्रेरण किया जाता है, कोल्चिसिन रसायन को कोल्चिकम आटमनेल पौधे के घनकंद से निकाला जाता है। यह रसायन कोशिका विभाजन में बनने वाले तर्क को शिथिल करके उसे तोड़ देता है। जिससे गुणसूत्रों का ध्रुवों पर गमन नहीं हो पाता है। जिससे उनकी संख्या दुगनी हो जाती है।

(b) परबहुगुणिता (Allopolyploidy)—इसमें दो भिन्न जातियों के दो से अधिक गुणसूत्रों के समुच्चय किसी जीव में उपस्थित होते हैं, जिनका अलग-अलग जातियों से संकरण से होता है। जैसे- रैफेनोबेसिका (2n = 36) इसे रूसी वैज्ञानिक G.D. कॉर्पोचेकों ने 1927 में रैफेनस सैटाइवस या मूली (2n = 18) ब्रेसिकाओलेक्टेरसिया या गोभी (2n = 18) के बीच संकरण द्वारा प्राप्त किया था। यह पूर्णतया बंध्य था। गेहूँ एवं राई से निर्मित ट्रिटिकेल मानव द्वारा निर्मित सबसे पहली परगुणित फसल

प्रश्न 6.
सुप्त उत्परिवर्तन किसे कहते हैं?
उत्तर:
वैज्ञानिकों ने प्रयोगों के दौरान पाया कि लगभग एक करोड़ फलमक्खियों (ड्रॉसोफिला) में दो-तीन सौ मक्खियों में उत्परिवर्तन हो चुका था। इन उत्परिवर्तित मक्खियों की संतानों में कुछ लक्षण जैसे आँख का रंग, पंखों के प्रकार आदि स्थायी रूप से वंशागत होने लगते हैं। उत्परिवर्तन बैक्टीरिया जैसे सूक्ष्मजीवों से लेकर मनुष्य तक सभी जीवधारियों में होते हैं। कुछ उत्परिवर्तन का प्रभाव इतना सूक्ष्म (सुप्त) होता है कि उनके द्वारा उत्पन्न परिवर्तन हम देख ही नहीं पाते। कुछ घातक उत्परिवर्तन अप्रभावी प्रकार के होते हैं। अतः जब तक वे समयुग्मजी अवस्था में नहीं होते, उनके द्वारा होने वाले परिवर्तन प्रदर्शित नहीं हो पाते हैं।

RBSE Solutions for Class 12 Biology Chapter 37 उत्परिवर्तन

प्रश्न 7.
भ्रूण क्लोनिंग अथवा ट्विनिंग तकनीक क्या होती है?
उत्तर:
नर युग्मक (शुक्राणु) तथा मादा युग्मक (अंडाणु) के संयुग्मन से एक युग्मनज का निर्माण होता है। इस युग्मनज से विदलन द्वारा प्रारंभिक भ्रूण की कोशिकाएँ ब्लास्टोमियर का निर्माण होता है। यदि ब्लास्टोमियर की कोशिकाओं को पृथक कर दिया जाये तथा उन्हें परिवर्धन होने दिया जाये तो प्रत्येक पृथक कोशिका से एक सम्पूर्ण भ्रूण का निर्माण हो सकता है। चूंकि इससे परिवर्धन होने वाले भ्रूण व इनसे बने वयस्क का आनुवंशिक पदार्थ समान होता है।

अतः इससे बनने वाले भ्रूण एक-दूसरे के क्लोन होते हैं। इस प्रकार के क्लोनिंग को यमलने या ट्विनिंग (Twining) कहते हैं। इस विधि को भ्रूण क्लोनिंग (Embryo Cloning) भी कहते हैं।

प्रश्न 8.
वोबल परिकल्पना क्या होती है?
उत्तर:
आनुवंशिक कोड कासित (Degenerate) होता है। सजीवों के विभिन्न प्रोटीनों का निर्माण केवल 20 Amino Acids से होता है। लेकिन यदि 4 न्यूक्लियोटाइडों में उपस्थित 4 बेसों में से 3 बेसों से एक बेस कोडॉन बनता है तो कुल 43 = 64 कोडॉन हो सकते हैं। अतः एक से अधिक कोडॉन एक विशेष अमीनो अम्ल के लिए कोड करते हैं। वास्तव में एक ही अमीनो अम्ल के लिए कोडोनों के पहले दो बेस उभयनिष्ठ हैं और तीसरा बदलता रहता है, इसे वोबल (Wobble) परिकल्पना कहते हैं।

RBSE Class 12 Biology Chapter 37 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
उत्परिवर्तन किसे कहते हैं? इनके अभिलक्षण लिखिए।
उत्तर:
समस्त प्रकार के जीवों की कोशिका के आनुवंशिकी पदार्थ में अचानक हुए स्थायी एवं वंशागत परिवर्तन को उत्परिवर्तन कहते हैं। प्रकृति में उत्परिवर्तन लगातार होते रहते हैं।

गुणसूत्रों का निर्माण न्यूक्लियोप्रोटीन्स से होता है। न्यूक्लियोप्रोटीन्स न्यूक्लिक अम्ल (DNA एवं RNA) तथा प्रोटीन्स से बने होते हैं। डी. एन. ए. अणुओं के रासायनिक संयोजन में होने वाले परिवर्तनों को उत्परिवर्तन (mutation) कहते हैं। उत्परिवर्तन के फलस्वरूप डी.एन.ए. अणुओं में न्यूक्लियोटाइड्स क्षारक जोड़ियों के अनुक्रम बदल जाते हैं। डी.एन.ए. अणुओं की संरचना में भिन्नता के कारण विभिन्नताएँ (Variations) उत्पन्न होती हैं। उत्परिवर्तन सिद्धान्त ह्यूगो डी ब्रीज (Hugo de Vries, 1901) ने प्रतिपादित किया था।
जीन उत्परिवर्तन के अभिलक्षण-

  • जीन उत्परिवर्तन पूर्णरूपेण अनिश्चित होते हैं।
  • जीन उत्परिवर्तन बिना किसी पूर्वानुमान के हो सकते हैं।
  • कोई भी जीन कितनी भी बार उत्परिवर्तित हो सकता है। उत्परिवर्तित जीन कुछ समय के लिये सामान्य अवस्था में भी रह सकता
  • जीन उत्परिवर्तन एक दिशा में होता है। यह एक स्थिति में पूर्ण होकर पुनः उत्परिवर्तित होते-होते अपनी मूल अथवा सामान्य स्थिति में बदल सकता है।
  • लगभग सभी जीनों के वर्तमान में पाए जाने वाले सभी जीन मूलजीन के उत्परिवर्ती रूप हैं।
  • कुछ उत्परिवर्ती रूप प्रभावी होते हैं जो कि अपने विशेषक की अभिव्यक्ति को निश्चित रूप में बदल देते हैं, जबकि कुछ उत्परिवर्ती रूप अप्रभावी होते हैं, जिनकी अभिव्यक्ति उनके प्रभावी रूप द्वारा दबा दी जाती है।
  • अधिकतर उत्परिवर्तन जीनों के लिए हानिकारक होते हैं क्योंकि कोशिका की संरचना अत्यन्त जटिल होती है। अतः उसके जीन में किसी भी प्रकार का परिवर्तन उसके लिये हानिकारक एवं विनाशक होता है।
  • प्रभावी जीन उत्परिवर्तन के कारण कोशिका की जल्दी ही मृत्यु हो जाती है। अतः ये नष्ट हो जाते हैं, जबकि अप्रभावी जीन उत्परिवर्तन कोशिका में अधिक समय तक बने रहते हैं, क्योंकि इसके कारण कोशिका की मृत्यु नहीं होती है।
  • कुछ सूक्ष्म प्रभावी उत्परिवर्तन जिनका प्रभाव कोशिका की क्रिया के साथ मिल जाता है वे काफी समय तक बने रहते हैं क्योंकि उत्परिवर्तन होने के बाद भी कोशिका की मृत्यु नहीं होती है।

प्रश्न 2.
गुणसूत्रों में संरचनात्मक परिवर्तनों का विस्तृत विवरण कीजिए।
उत्तर:
जब गुणसूत्र की जीन व्यवस्था में कोई अन्तर आ जाये या उनमें कोई अतिरिक्त जीन जुड़ जाये अथवा कुछ जीन लुप्त हो जायें, तब उसे गुणसूत्र उत्परिवर्तन अथवा गुणसूत्रीय विपथन कहते हैं। ये दो प्रकार के होते हैं-

  • गुणसूत्रों में संख्यात्मक परिवर्तन
  • गुणसूत्रों में संरचनात्मक परिवर्तन।

गुणसूत्रों में संरचनात्मक परिवर्तन (Structural changes in chromosomes)-दूसरे प्रकार के उत्परिवर्तन में गुणूसत्र में रचनात्मक परिवर्तन हो जाता है। इससे गुणसूत्र का मूल व्यवहार या प्रकृति बदल जाती है। इसलिए इसे गुणसूत्रीय विपथन कहा जाता है।
गुणसूत्रीय विपथन मुख्यत: चार प्रकार के होते हैं-

(अ) विलोपन (Deletion)-यह सबसे सरल प्रकार का गुणसूत्रीय विपथन माना जाता है। किसी गुणसूत्र के बड़े या छोटे अकेन्द्रकीय खंड की कमी अथवा हानि होना विलोपन कहलाता है। यदि किसी गुणसूत्र के अन्तस्थ भाग की कमी होती है तो इसे अन्तस्थ हीनता (Terminal deletion) कहते हैं। जबकि बीच अथवा अंतर्वेशी खंड को दो भागों से टूटना अन्तराली (Interstitial deletion) कहलाती है। अर्थात् उस गुणसूत्र से खोए हुए हिस्से के जीन विलोपित हो जाते हैं। इस प्रकार के उत्परिवर्तन में यदि दो समजात गुणसूत्रों में से किसी एक का कुछ हिस्सा विलोपित हो जाता है तो इसमें दूसरे गुणसूत्र का अप्रभावी जीन अपनी अभिव्यक्ति करता है। यदि विलोपन दोनों गुणसूत्रों में हो जाए तो परिणाम घातक भी हो सकते हैं।

RBSE Solutions for Class 12 Biology Chapter 37 उत्परिवर्तन

(ब) स्थानांतरण (Translocation)–जब किसी गुणसूत्र का एक सिरे की ओर से टूटा हुआ हिस्सा उसी गुणसूत्र के दूसरे सिरे से जुड़ जाए अथवा किसी अन्य असमजात गुणसूत्र से जुड़ जाए तो उसे ट्रान्सलोकेशन प्रकार का विपथन कहते हैं। एकपाश्विक (Unilateral) स्थानान्तरण में एक गुणसूत्र से गुणसूत्र खंड दूसरे गुणसूत्र में जाता है। परन्तु दोनों दिशाओं में आदान-प्रदान नहीं होता है। इसके विपरीत द्विपाश्विक (Bilateral) स्थानान्तरण में गुणसूत्र खंडों का आदान-प्रदान दोनों तरफ होता है। यदि खंडों का स्थानान्तरण दो असमजात गुणसूत्र के मध्य पारस्परिक हो तो इसे पारस्परिक स्थानान्तरण (Reciprocal translocation) कहते हैं।

इस प्रक्रिया में भी स्थान प्रभाव (Position effect) के कारण संतति के लक्षण रूप में परिवर्तन आ सकता है। कभी-कभी दो असमजात गुणसत्रों के टूटे हुए हिस्से परस्पर एक-दूसरे से जुड़कर अर्थात् स्थानान्तरित होकर दो समजात गुणसूत्र निर्मित कर देते हैं।

(स) प्रतिलोम व्युत्कमण (Inversion)-प्रतिलोमन में गुणसूत्र का एक भाग उल्टे क्रम में पुन: व्यवस्थित हो जाता है। इसमें गुणसूत्र पहले दो बिन्दुओं पर खंडित हो जाता है तथा यह टूटा हुआ खण्ड 180 डिग्री पर घूम जाता है तथा घूमे हुए भाग पुनः मिल जाते हैं। इस प्रकार जीनक्रम व्युत्क्रमित हो जाता है। इस स्थिति में उस गुणसूत्र का जीनी प्ररूप तो अपरिवर्तित रहता है किन्तु संतति के लक्षण प्ररूप में परिवर्तन आ जाता है। चूंकि इस प्रक्रिया में जीन लोकस में परिवर्तन आता है, इसे स्थान प्रभाव भी कहते हैं। यह दो प्रकार का होता है-

  • पराकेन्द्री (Paracentral)–इस तरह के प्रतिलोमन में सेन्ट्रोमियर प्रतिलोमित खंड के बाहर लगा हुआ रहता है।
  • परिकेन्द्री (Pericentral)—इस प्रकार के प्रतिलोमन में प्रतिलोमित खंड में सेन्ट्रोमियर उपस्थित रहता है।

(द) द्विगुणन (Duplication)-कभी-कभी किसी गुणसूत्र के किसी क्षेत्र की दो बार पुनरावृत्ति हो जाती है तब उन जीनों का द्विगुणन या डुप्लीकेशन माना जाता है। गुणसूत्र के ये अतिरिक्त टुकड़े द्विगुणित गुणसूत्र के किसी मध्य हिस्से में अथवा सिरों पर अथवा अन्य क्रोमोसोम से भी जुड़ सकते हैं।

प्रश्न 3.
मानव जीनोम परियोजना के बारे में विस्तृत लेख लिखिए।
उत्तर:
जीन संरचनाओं को जानने के लिये सन् 1990 में अमेरिका सरकार ने मानव जीनोम परियोजना (Human Genome Project) प्रारम्भ की। इसका उद्देश्य मानव के सम्पूर्ण जीनोम के D.N.A. क्रम को निर्धारित करना था। 1993 में अमेरिका में राष्ट्रीय मानव जीनोम अनुसन्धान संस्थान (National Human Genome Research Institute : NHGRI) की स्थापना हुई। आनुवंशिकता एवं मानव चिकित्सा विज्ञान के इतिहास में 26 जून, 2000 स्वर्ण अक्षरों में अंकित हो गया, क्योंकि इस दिन मानव जीनोम परियोजना के अध्यक्ष डॉ. फ्रान्सिस कॉलिन्स (Dr. Francis Collins) और सेलेरा जीनोमिक्स (Celera genomics), के. जे. क्रेग वेंटर ने संयुक्त रूप से मानव जीनोम की संरचना का मॉडल प्रस्तुत किया।

मानव जीनोम परियोजना के लक्ष्य
(Goals of Human Genome Project)

  • लगभग 30,000 से 35,000 मानव जीन्स की पहचान करना।
  • मानव डी.एन.ए. को बनाने वाले लगभग 3 बिलियन रासायनिक क्षार युग्मों के अनुक्रमों को निर्धारित करना।
  • जीनोम सम्बन्धी आँकड़ों को संगृहीत करना और विश्लेषण हेतु आधुनिकतम तीव्र, अधिक प्रभावी क्रम तकनीक विकसित करना।
  • योजना के फलस्वरूप उठने वाली सामाजिक (Social), नैतिक (Ethical) एवं कानूनी समस्याओं (Legal issues) पर विचार करना।

मानव जीनोम परियोजना की उपलब्धियाँ या विशेषताएँ
(Salient features of Human Genome Project)
मानव जीनोम परियोजना से प्राप्त मुख्य उपलब्धियाँ निम्नवत् हैं-

  • मानव जीनोम में 3164.7 करोड़ क्षार मिलते हैं।
  • प्रत्येक जीन में औसतन 3000 क्षार होते हैं, इनके आकार में विभिन्नताएँ पायी जाती हैं।
  • मनुष्य की ज्ञात सबसे बड़ी जीन डिसट्रॉफिन (Dystrophin) में 2.4 करोड़ क्षार पाए जाते हैं।
  • जीन की संख्या लगभग 30,000 से 31,000 है। लगभग 99.9 प्रतिशत व्यक्तियों के न्यूक्लियोटाइड्स समान होते हैं।
  • ज्ञात जीन्स में से लगभग 50% के कार्यों की जानकारी प्राप्त हो गई हैं।
  • ज्ञात जीन्स में से लगभग 20% प्रोटीन का कूटलेखन करते हैं।
  • पुनरावृत्ति अनुक्रम (नॉनकोडिंग डी.एन.ए.) जीनोम का अधिकांश भाग बनता है। इनकी सौ से हजारों बार तक पुनरावृत्ति होती है।
  • मानव में अनुक्रमित किए जाने वाला प्रथम गुणसूत्र 22वाँ जोड़ा है। यह मानव गुणसूत्रों का सबसे छोटा जोड़ा है। 22वें जोड़े गुणसूत्र पर 272 वास्तविक जीन्स तथा 143 कूट जीन्स उपस्थित हैं।
  • गुणसूत्र X में सर्वाधिक जीन (2968) और Y गुणसूत्र में सबसे कम जीन (231) पाए जाते हैं।
  • वैज्ञानिकों ने मानव में लगभग 1:4 करोड़ स्थानों पर एकल न्यूक्लियोटाइड बहुरूपता का पता लगाया है।
  • रोग आधारित अनुक्रमों के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त हुई है।

RBSE Solutions for Class 12 Biology Chapter 37 उत्परिवर्तन

मानव जीनोम परियोजना का महत्व
(Importance of Human Genome Project)

  • जीवन के रसायन (Chemicals of life) की बेहतर समझ विकसित होगी।
  • इसके आधार पर सूक्ष्मजीवों के जीनोम अध्ययन का पर्यावरण प्रदूषण की रोकथाम, ईंधन तकनीकों में उपयोग किया जा सकेगा।
  • रोगों की बेहतर समझ से उनकी रोकथाम व बेहतर उपचार संभव होगा। यह मानव इतिहास, विकास व प्रवासन (Migration) के अनसुलझे रहस्यों को सुलझाने का कार्य करेगा।
  • फोरेन्सिक साइंस से जुड़ी तकनीकों में और सुधार होगा।
  • पौधों के जीनोम अध्ययन से बेहतर रोग नियंत्रण से बेहतर उपज प्राप्त होगी।
  • बायोइन्फोर्मेटिक्स के प्रयोग से रोगों की पहचान, रोकथाम की जीन आधारित तकनीक का विकास।

प्रश्न 4.
D.N.A. फिंगर प्रिंटिंग तकनीक के बारे में विस्तार से समझाइये एवं इसके अनुप्रयोगों को समझाइये।
उत्तर:
D.N.A. फिंगर प्रिंटिंग (D.N.A. Finger Printing)
प्रत्येक मानव के अंगुलियों के निशान भिन्न होते हैं। उनमें उभार भिन्न स्थानों पर होते हैं। इस कारण जो चित्र बनता है, उसे अंगुलि छाप या फिंगर प्रिंट कहते हैं। वस्तुत: यह कानूनी रूप से मानव की पहचान का तरीका है, जो बहुत पहले फ्रांसिस-गॉल्टन ने निकाला था और आज भी प्रचलित है। यह प्रकृति की देन है। ब्रिटिश आनुवंशिक वैज्ञानिक डा. एलेक जेफरेस ने 1984 में D.N.A. फिंगर प्रिंटिंग तकनीक का विकास किया। यह माना जाता है कि यह तकनीक वंशागत रोगों के लिए चिह्न प्रदान करेगी एवं इनके प्रारम्भिक उपचार के लिए सहायक होगी।
फिंगर प्रिंटिंग की तकनीक—D.N.A. फिंगर प्रिंटिग निम्नलिखित चरणों में की जाती है-

  • सर्वप्रथम किसी भी ऊतक जैसे वीर्य, त्वचा कोशिकाएँ या रक्त कोशिकाएँ या बाल की फॉलिकल कोशिकाओं का D.N.A. उच्च गति के रेफ्रीजरेटेड अपकेद्रण यंत्र (High Speed Referigerated Centrifuge) द्वारा निकाला जाता है।
  • यदि D.N.A. की मात्रा बहुत कम प्राप्त हो तो उसे पॉलीमरेज चेन अभिक्रिया (Polymerase chain Reaction) द्वारा प्रवर्धित किया जा सकता है।
  • इसके बाद D.N.A. को रेस्ट्रीकशन खंड लम्बाई बहुरूपता (Restriction Fragment Length Polymorphism. RFLP) ao विश्लेषण हेतु विशिष्ट स्थल पहचानने वाले एंजाइम रेस्ट्रीकशन एंडोन्यूक्लीएस द्वारा खण्डों में काटा जाता है।
  • इन कटे हुए D.N.A. के खण्डों को एगेरोज जेल इलेक्ट्रोफोरेसिस तकनीक द्वारा आण्विक आकार के आधार पर एक-दूसरे से अलग-अलग कर दिया जाता है। इन अलग-अलग हुए D.N.A. के खण्डों को प्रतिदीप्तिशील रंजक (Fluoroscent dye) जैसे-इथीडियम ब्रोमाइड (Ethidium Bromide) द्वारा अभिरंजित किया जाकर पराबैंगनी प्रकाश (Ultra Violet Light) द्वारा देखा जाता है।
  • क्षारक रसायनों में प्रयोग द्वारा D.N.A. को द्विरज्जुकीय (Double Stranded) से एकल रज्जुकीय डी. एन. ए. (Single Stranded DNA) में परिवर्तित किया जाता है। इस विधि को D.N.A. का विकृतिकरण (Denaturation) कहते हैं।
  • इस एकल रज्जुकीय D.N.A. को एगेरोज जेल से नाइट्रोसेलुलोज झिल्ली पर स्थानान्तरित किया जाता है। इस प्रक्रम को सदर्न ब्लाटिंग’ (Southern Blotting) कहा जाता है।
  • इस नाइट्रोसेलुलोज झिल्ली को प्रोब (Probe) के साथ रखा जाता है। प्रोब D.N.A. के ज्ञात अनुक्रम का रेडियोएक्टिव संश्लिष्ट खंड होता है। प्रोब में विशिष्ट न्यूक्लियोटाइड अनुक्रम होते हैं। जो कि VNTR अनुक्रमों के पूरक होते हैं। ये प्रोब पूरक अनुक्रम पाए जाने पर उनके साथ संक्रमण करते हैं।
  • अब इस प्रोब युक्त नाइट्रोसेलुलोज झिल्ली को X-विकिरण से अनावरित (Expose) किया जाता है। वे स्थान जहाँ पर प्रोब नाइट्रोसेलुलोज झिल्ली पर स्थित D.N.A. से पूरक क्षारक बन्ध बनाते हैं या संकरण करते हैं वहाँ पर X-विकिरण फिल्म पर गहरी पट्टिकाएँ बनती हैं।
  • इन पट्टिकाओं को अन्य पट्टिकाओं के साथ जिससे तुलना की जाती है, के साथ तुलना की जाती है।

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डी एन ए फिंगर प्रिंटिंग/प्रोफाइलिंग के उपयोग-

  • डी.एन.ए. फिंगर प्रिंटिंग का अपराध विज्ञान (Forensic Science) मे व्यापक स्तर का प्रयोग किया जाता है। रक्त कोशिका, हेयर फॉलिकिल (Hair follicle), त्वचा, लार, वीर्य आदि के छोटे से प्रदर्श से प्राप्त डी.एन.ए. को पी.सी.आर. से आवर्धित कर विश्लेषित किया जाता है।
  • पैतृकता विवादों (Paternity disputes) को सुलझाने में इसी तकनीक की मदद ली जाती है।
  • आनुवंशिक विविधता (Genetic diversities) के निर्धारण में इस तकनीक का प्रयोग किया जाता है।
  • जनसंख्या अध्ययन, जैव विकास, मानव इतिहास की खोज आदि में भी इसका प्रयोग किया जाता है।
  • आयुर्विज्ञान एवं स्वास्थ्य-जाँच-गर्भधारण से पूर्व या गर्भधारण के दौरान भी इस विधि द्वारा आनुवंशिक रोगों एवं अंतर्जात जननिक त्रुटियों की जानकारी प्राप्त की जा सकती है और इनकी विकारों की आवृत्ति को एक सीमा तक नियंत्रित करके समस्त मानव जाति की इस समस्या का समाधान किया जा सकता है।
  • प्रवासन के इच्छुक व्यक्ति का DNA उस व्यक्ति के DNA से भी मिलाया जाता है जिसे वह अपना निकट सम्बन्धी या रुधिर सम्बन्धी बताता है एवं उस देश का नागरिक है जिस देश में वह व्यक्ति यात्रा करना चाहता है, इस प्रकार DNA के मिलान से निकट के रुधिर सम्बन्धी का पता लगाया जा सकता है।
  • जैविक विकास को समझाने के लिये विभिन्न समूहों के सम्बन्ध का पता भी इनके DNA का मिलान कर इस तकनीक द्वारा किया जाता है।

प्रश्न 5.
क्लोनिंग से क्या तात्पर्य है ? दुनिया के प्रथम जन्तु क्लोन का निर्माण कैसे हुआ? इसका विवरण दीजिए।
उत्तर:
क्लोन एक ग्रीक शब्द है, जिसका अर्थ (Klon = Twins) टहनी है, जिस प्रकार एक वृक्ष की सभी शाखाएँ आकारिकी एवं आनुवंशिक रूप से एक समान होती हैं। वैसे ही क्लोन भी एक-दूसरे के समान होते हैं।

क्लोनिंग एक ऐसी तकनीकी है जिसके द्वारा एक कोशिका से अनेक कोशिकाएँ या एक जीन से अनेक जीन बना सकते हैं। पौधों में ऊतक संवर्धन की विधि में भी इस तकनीक का उपयोग किया जाता है। इस विधि में वह पौधा जिससे पूरा पौधा बनाया जाना है, उसके किसी भाग से कोशिकाएँ प्राप्त कर उसे विशेष संवर्धन माध्यम से संबर्धित कर पूरा पौधा विकसित कर लिया जाता है। जन्तुओं में क्लोनिंग के लिए प्रायः नाभिकीय स्थानान्तरण तकनीक का प्रयोग किया जाता है। एक कोशिका
से सम्पूर्ण जीव बनाने की क्षमता अण्डे या युग्मनज में भी पायी जाती है। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के जे. बी. गुर्दन ने 1969 में एक प्रयोग में एक मेंढ़क के अनिषेचित अण्डे में टैडेपोल की आंत्रीय उपकला कोशिका के केन्द्रक को प्रविष्ट करा दिया।

इसमें प्रयुक्ते अनेक अण्डों में से कुछ प्रतिरोपित अण्डों से टैडपोलों का परिवर्धन हो गया। ये अपने पूर्वजों के जीन प्ररूप व लक्षण में समान थे। गुर्दन की इस केन्द्रक प्रतिरोपणं तकनीक का आज भी रूपांतरित | तरीके से क्लोनिंग में प्रयोग किया जाता है-

  • जीन क्लोनिंग (Gene Cloning)
  • जीव क्लोनिंग (Animal Cloning)

इस तकनीक को उपयोग में लेते हुए डॉ. ईयान विल्मट (Dr. Ian Wilmut) एवं सहयोगियों ने रोजलिन इंस्टीट्यूट स्कॉटलैण्ड (Roslin Institute Scotland) में 1996 में ‘डोली’ नामक भेड़ को उत्पन्न किया था। डॉ. विल्मट ने छः वर्ष की एक भेड़ के स्तनों से एक कोशिका निकाली इसे डोनर भेड़ कहा गया। इस कोशिका को धीरे-धीरे पोषण में कमी कर उसकी रिप्रोग्रामिंग की गई, अब उस कोशिका का वर्तमान स्वरूप नष्ट कर दिया गया। इसके बाद एक अन्य भेड़ के अण्डाशय से एक अनिषेचित अण्डाणु लेकर उसका केन्द्रक निकाल दिया गया। इस प्रकार केन्द्रक विहीन अण्डाणु प्राप्त कर लिया गया। इस भेड़ को अण्डा डोनर भेड़ कहा गया।

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इसके बाद स्तन कोशिका के केन्द्रक को केन्द्रक विहीन अण्ड कोशिका के साथ विद्युतीय उद्दीपन द्वारा संयोजित कर दिया गया। इस ट्रांसप्लांट कोशिका को सम्वर्धन माध्यम में लगभग एक सप्ताह तक वृद्धि होने के लिए रखा। एक सप्ताह में उक्त ट्रांसप्लांट कोशिका विभाजित होकर ब्लास्टोसिस्ट अवस्था में परिवर्तित हो चुकी थी। इस अवस्था में इस ब्लास्टुला को तीसरी वयस्क भेड़ के गर्भाशय में रोपित कर दिया गया। इस भेड़ को धात्रेय माता (Foster mother) कहा गया। लगभग 5 माह की गर्भावस्था के पश्चात् 5 जुलाई 1996 को मध्याह्न 4 : 00 बजे संसार की सर्वप्रथम क्लोन स्तनधारी ने जन्म लिया, जिसे डोली कहा गया।

नूरी (Noorie) पश्मीना क्लोन बकरी-शेरे कश्मीर एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी फॉर साइंस एण्ड टेक्नोलॉजी तथा नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीट्यूट करनाल के संयुक्त तत्वाधान में चल रही एक शोध परियोजना के अन्तर्गत विश्व की पहली क्लोन परसीना बकरी का जन्म 09 मार्च, 2012 को कश्मीर में हुआ। इस परियोजना को विश्व बैंक द्वारा प्रायोजित किया गया। इस क्लोन बकरी का नाम ‘नूरी’ रखा गया। यह नाम अरबी भाषा से लिया गया है, जिसका अर्थ होता है- प्रकाश पश्मीना भेड़ ठण्डे पहाड़ी इलाकों में पायी जाने वाली एक प्रजाति है, जिसकी ऊन अत्यन्त कीमती होती है।

प्रश्न 6.
गुणसूत्रों में संख्यात्मक परिवर्तनों का विस्तृत वर्णन कीजिए।
उत्तर:
एक प्रजाति के सभी सदस्यों में गुणसूत्रों की संख्या हमेशा निश्चित होती है। इस प्रकार के उत्परिवर्तन में जीन में स्वयं में परिवर्तन नहीं होता है, बल्कि पूरे गुणसूत्र की संख्या दोगुनी-तिगुनी अथवा अनेक गुनी हो जाती है तब उसे गुणसूत्र उत्परिवर्तन या पोलीप्लॉइडी कहते हैं। कोशिका विभाजन में उपसमान्यता या संकरण होने के कारण इन गुणसूत्रों की संख्या में परिवर्तन आ जाता है। ये परिवर्तन दो प्रकार के हो सकते हैं।

(i) सुगुणिता (Euploidy)-किसी जीव या कोशिका में उपस्थित आधारभूत गुणसूत्रों के समुच्चय को एक गुणित (Monoploidy) कहते हैं। यदि किसी जीव में आधारभूत गुणसूत्रों के दो से अधिक समुच्चय पाए जाते हैं तो इसे सुगुणिता कहते हैं। ये भी दो प्रकार की होती है|

(a) स्व-बहुगुणिता (Autopolyploidy)—वे बहुगुणित जिनमें गुणसूत्रों के समान प्रारम्भिक समुच्चय पाए जाते हैं, स्व-बहुगुणित कहलाते हैं। जैसे—त्रिगुणित (Triploid) चतुर्गुणित (Tetraploid) पंचगुणित (Pentaploid) इत्यादि कोल्चसिन रसायन से इसका प्रेरण किया जा सकता है। कोल्चसिन रसायन को कोल्चिकम आटमनेल (colchicum autumnale) के घनकंद (corm) से निकाला जाता है। यह रसायन कोशिका विभाजन में बनने वाले तर्कु (Spindle) को शिथिल बनाकर उसे तोड़ देता है, जिससे गुणसूत्रों का ध्रुवों पर गमन नहीं हो सकता है जिससे उनकी संख्या दुगुनी हो जाती है।

(b) पर बहुगुणिता (Allopolyploidy)-इसमें दो भिन्न जातियों के दो से अधिक गुणसूत्रों के समुच्चय किसी जीव में उपस्थित होते हैं। इन जीवों की उत्पत्ति दो भिन्न जातियों में संकरण से होती है। जैसे रैफैनोबैसिका (2n = 36) इसे रूसी वैज्ञानिक जी.डी. कार्पोचेकों ने 1927 में रैफेनस सैटाईवस (Ruphantis sativus) या मूली (2n = 18) एवं ब्रेसिका ओलेरसिया (Braisica Aleracea) या गोभी (2n = 18) के बीच संकरण द्वारा प्राप्त किया था। यह पूर्णतया बंध्य (Sterile) था। गेहूँ। (Triticum) एवं राई (Secale) से निर्मित ट्रिटिकल (triticale) मानव द्वारा निर्मित सबसे पहली परगुणित फसल है, जिसका भारत एवं अन्य कई देशों में व्यापारिक उत्पादन हो रहा है।

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(ii) असुगुणिता (Aneuploidy)-यदि कोशिका विभाजन में होने वाले गुणसूत्री पृथक्करण के समय गुणसूत्रों में अवियोजन (Nondisjunction) हो जाता है। जिसके परिणामस्वरूप नवनिर्मित कोशिकाओं में एक या अधिक गुणसूत्रों की संख्या में कमी या अधिकता हो जाती है। तो इसको असुगुणिता कहते हैं। यह दो प्रकार की होती है-
(अ) यदि एक अथवा एक से अधिक गुणसूत्र कम हो जाते हैं तो उसे अधोगुणिता (Hypoploidy) कहते हैं।
(ब) यदि एक अथवा एक से अधिक गुणसूत्र बढ़ जाते हैं तो उसे अधिगुणिता (Hyperploidy) कहते हैं।

अधोगुणित (Hypoploidy) में यदि एक गुणसूत्र की कमी होती है। तब इसे एक न्यूनसूत्रता (Monosomy 2n-1) एवं समजात गुणसूत्रों में से एक युग्म या दो गुणसूत्रों की कमी हो जाये तो इसे द्विन्यूनसूत्री (Nullisony) (2n-2) कहते हैं। इसी प्रकार अधिगुणिता में एक गुणसूत्र की अधिकता होती है तो इसे एकाधिसूत्री (Trisomy; 2n+1) कहते हैं। मानव में डाउन संलक्षण (Down’s Syndrome) या मंगोलिज्म (Mongolism) इसी का एक उदाहरण है। यदि एक समजात गुणसूत्रों में से एक युग्म की अधिकता हो जाये तो द्विअधिसूत्री (Tetrasomy ; 2n+2) कहते हैं।

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