• Skip to main content
  • Skip to secondary menu
  • Skip to primary sidebar
  • Skip to footer
  • RBSE Model Papers
    • RBSE Class 12th Board Model Papers 2022
    • RBSE Class 10th Board Model Papers 2022
    • RBSE Class 8th Board Model Papers 2022
    • RBSE Class 5th Board Model Papers 2022
  • RBSE Books
  • RBSE Solutions for Class 10
    • RBSE Solutions for Class 10 Maths
    • RBSE Solutions for Class 10 Science
    • RBSE Solutions for Class 10 Social Science
    • RBSE Solutions for Class 10 English First Flight & Footprints without Feet
    • RBSE Solutions for Class 10 Hindi
    • RBSE Solutions for Class 10 Sanskrit
    • RBSE Solutions for Class 10 Rajasthan Adhyayan
    • RBSE Solutions for Class 10 Physical Education
  • RBSE Solutions for Class 9
    • RBSE Solutions for Class 9 Maths
    • RBSE Solutions for Class 9 Science
    • RBSE Solutions for Class 9 Social Science
    • RBSE Solutions for Class 9 English
    • RBSE Solutions for Class 9 Hindi
    • RBSE Solutions for Class 9 Sanskrit
    • RBSE Solutions for Class 9 Rajasthan Adhyayan
    • RBSE Solutions for Class 9 Physical Education
    • RBSE Solutions for Class 9 Information Technology
  • RBSE Solutions for Class 8
    • RBSE Solutions for Class 8 Maths
    • RBSE Solutions for Class 8 Science
    • RBSE Solutions for Class 8 Social Science
    • RBSE Solutions for Class 8 English
    • RBSE Solutions for Class 8 Hindi
    • RBSE Solutions for Class 8 Sanskrit
    • RBSE Solutions

RBSE Solutions

Rajasthan Board Textbook Solutions for Class 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11 and 12

  • RBSE Solutions Class 7
    • RBSE Solutions for Class 7 Maths
    • RBSE Solutions for Class 7 Science
    • RBSE Solutions for Class 7 Social Science
    • RBSE Solutions for Class 7 English
    • RBSE Solutions for Class 7 Hindi
    • RBSE Solutions for Class 7 Sanskrit
  • RBSE Solutions Class 6
    • RBSE Solutions for Class 6 Maths
    • RBSE Solutions for Class 6 Science
    • RBSE Solutions for Class 6 Social Science
    • RBSE Solutions for Class 6 English
    • RBSE Solutions for Class 6 Hindi
    • RBSE Solutions for Class 6 Sanskrit
  • RBSE Solutions Class 5
    • RBSE Solutions for Class 5 Maths
    • RBSE Solutions for Class 5 Environmental Studies
    • RBSE Solutions for Class 5 English
    • RBSE Solutions for Class 5 Hindi
  • RBSE Class 4
    • RBSE Class 3
  • RBSE Class 12
    • RBSE Solutions for Class 12 Maths
    • RBSE Solutions for Class 12 Physics
    • RBSE Solutions for Class 12 Chemistry
    • RBSE Solutions for Class 12 Biology
    • RBSE Solutions for Class 12 English
    • RBSE Solutions for Class 12 Hindi
    • RBSE Solutions for Class 12 Sanskrit
  • RBSE Class 11

RBSE Solutions for Class 12 History Chapter 2 भारतीय इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठ

July 4, 2019 by Prasanna Leave a Comment

Rajasthan Board RBSE Class 12 History Chapter 2 भारतीय इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठ

RBSE Class 12 History Chapter 2 पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर

RBSE Class 12 History Chapter 2 बहुचयनात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
चन्द्रगुप्त मौर्य ने किसकी सहायता से मौर्य साम्राज्य की स्थापना की?
(अ) चाणक्य
(ब) घनानंद
(स) मेगस्थनीज
(द) सेल्यूकस।

प्रश्न 2.
अशोक के धम्म की परिभाषा किस स्तंभ लेख में मिलती है?
(अ) प्रथम
(ब) द्वितीय
(स) चतुर्थ
(द) अष्ठम्।

प्रश्न 3.
प्रयाग प्रशस्ति में किस गुप्त शासक की विजयों का उल्लेख है?
(अ) चन्द्रगुप्त प्रथम
(ब) स्कंदगुप्त
(स) समुद्रगुप्त
(द) कुमारगुप्त।

प्रश्न 4.
किस भारतीय गणितज्ञ ने दशमलव प्रणाली का सर्वप्रथम विवेचन किया?
(अ) वराहमिहिर
(ब) ब्रह्मगुप्त
(स) धनवन्तरि
(द) आर्यभट्ट।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित रचनाओं में से किसकी रचना हर्षवर्धन ने नहीं की थी?
(अ) हर्षचरित
(ब) नागानंद
(स) प्रियदर्शिका
(द) रत्नावली।

प्रश्न 6.
किस चोल शासक ने गंगैकोण्ड चोल की उपाधि धारण की?
(अ) राजराज प्रथम
(ब) राजेन्द्र प्रथम
(स) राजाधिराज प्रथम
(द) आदित्य प्रथम।

प्रश्न 7.
विजयनगर के किस शासक के दरबार में आठ सर्वश्रेष्ठ कवि रहते थे?
(अ) कृष्णदेव राय
(ब) अच्युत देव राय
(स) देवराय प्रथम
(द) देवराय द्वितीय।

प्रश्न 8.
चोल प्रशासन की प्रमुख विशेषता क्या थी?
(अ) केन्द्रीय प्रशासन
(ब) स्थानीय स्वायत्त शासन
(स) प्रान्तीय शासन
(द) सैन्य प्रशासन।

उत्तरमाला:
1. (अ)
2. (ब)
3. (स)
4. (द)
5. (अ)
6. (ब)
7. (अ)
8. (ब)।

RBSE Class 12 History Chapter 2 अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
अर्थशास्त्र नामक पुस्तक की रचना किसने की?
उत्तर:
अर्थशास्त्र नामक पुस्तक की रचना कौटिल्य (चाणक्य) ने की।

प्रश्न 2.
‘धम्म’ का सिद्धान्त किसने प्रतिपादित किया?
उत्तर:
धम्म का सिद्धान्त महान सम्राट अशोक ने प्रतिपादित किया।

प्रश्न 3.
सुदर्शन झील का निर्माण किसने कराया?
उत्तर:
सुदर्शन झील का निर्माण चन्द्रगुप्त मौर्य के सौराष्ट्र प्रान्त के गवर्नर पुष्यगुप्त द्वारा कराया गया।

प्रश्न 4.
गुप्त संवत् कब और किसने प्रचलित किया?
उत्तर:
गुप्त संवत् 319 – 320 ई. में चन्द्रगुप्त प्रथम ने प्रचलित किया।

प्रश्न 5.
चीनी यात्री फाह्यान किस गुप्त शासक के समय भारत आया?
उत्तर:
चीनी यात्री फाह्यान चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के शासन काल में भारत आया।

प्रश्न 6.
किस गुप्त शासक ने उज्जैन को अपनी दूसरी राजधानी बनाया?
उत्तर:
समुद्रगुप्त के पुत्र चन्द्रगुप्त द्वितीय ने उज्जैन को अपनी दूसरी राजधानी बनाया।

प्रश्न 7.
किस गुप्त शासक ने सुदर्शन झील का पुनः निर्माण कराया?
उत्तर:
सुदर्शन झील का पुनः निर्माण स्कन्दगुप्त के काल में सौराष्ट्र प्रान्त के राज्यपाल पर्णदन्त के पुत्र व गिरनार के प्रशासक चक्रपालित ने कराया।

प्रश्न 8.
भारत के मन्दिर वास्तुकला किस काल में विकसित हुई?
उत्तर:
भारत में मन्दिर वास्तुकला गुप्त काल में विकसित हुई।

प्रश्न 9.
हिन्दू विधियों का संकलन किस युग में हुआ?
उत्तर:
हिन्दू विधियों का संकलन गुप्तकाल में हुआ।

प्रश्न 10.
हर्ष के समय में कौन – सा चीनी यात्री भारत आया था?
उत्तर:
हर्ष के समय में चीनी यात्री ह्वेनसांग भारत आया था।

प्रश्न 11.
हर्ष अपने राज्य की आय को कितने भागों में बाँटता था?
उत्तर:
हर्ष अपने राज्य की आय को चार भागों में बाँटता था।

प्रश्न 12.
बाणभट्ट की दो रचनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:
कादम्बरी, हर्षचरित।

प्रश्न 13.
करिकाल ने कहाँ वे किस नगर की स्थापना की?
उत्तर:
करिकाल ने कावेरी नदी के मुहाने पर ‘पुहार’ पत्तम (कावेरीपट्टनम) की स्थापना की।

प्रश्न 14.
किस चोल शासक की नौसेना अत्यन्त विकसित थी?
उत्तर:
चोल शासक राजेन्द्र प्रथम की नौसेना अत्यन्त विकसित थी।

प्रश्न 15.
हरिहर व बुक्का ने किस महात्मा के आशीर्वाद से विजयनगर साम्राज्य की स्थापना की?
उत्तर:
हरिहर व बुक्का ने संत विद्यारण्य के आशीर्वाद से विजयनगर साम्राज्य की स्थापना की।

RBSE Class 12 History Chapter 2 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
मौर्यकालीन प्रान्तीय प्रशासन को बताइए।
उत्तर:
मौर्यकालीन साम्राज्य चार प्रान्तों में विभाजित था। चार प्रमुख प्रान्त थे-उत्तरापथ, दक्षिणापथ, अवन्तिपथ एवं मध्य प्रान्त। प्रत्येक प्रान्त का प्रशासक राजकुमार होता था जो मंत्रिपरिषद एवं अमात्यों के माध्यम से शासन संचालित करता था। धर्म महामात्र तथा अमात्य प्रान्तीय अधिकारी थे जो धम्म एवं अन्य कार्य देखते थे। प्रान्तों को आहार या विषय में बाँटा गया था जो विषयपति के अधीन होते थे।

प्रश्न 2.
अशोक के प्रशासनिक सुधारों पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
अशोक ने अपनी नीतियों एवं उद्देश्यों के क्रियान्वयन की दृष्टि से महत्वपूर्ण प्रशासनिक सुधार किये। ये सुधार निम्नलिखित थे

  1. अशोक ने न्याय, भूमि व लेखा सम्बन्धी अधिकारियों; जैसे-राजुक, युक्त एवं प्रादेशिक अधिकारी की नियुक्ति की।
  2. 13 वें वर्ष में अशोक ने धम्म महामात्र पद का सृजन किया जिनका कार्य विभिन्न सम्प्रदायों में सामंजस्य तथा अकारण दण्डितों के परिवारों को सहायता प्रदान करना था।
  3. अशोक ने प्रतिवेदकों की नियुक्ति की जो राजा को जनता के सुख-दु:ख व समस्याओं की जानकारी देते थे।
  4. अशोक ने राजुकों को न्याय सम्बन्धी मामलों में स्वतन्त्र अधिकार प्रदान किए।
  5. अशोक ने दण्ड विधान को उदार बनाया एवं अमानवीय यातनाओं को बंद किया।
  6. अशोक ने युद्ध नीति को त्याग दिया तथा जहाँ तक सम्भव हो सके जीव हिंसा न करने की आज्ञा दी।
  7. अशोक ने प्राणिमात्र के कल्याण के लिए चिकित्सा, सड़क, कुएँ व वृक्षारोपण आदि कार्यों पर बल दिया। साथ ही साथ ग्रामीण विकास को प्राथमिकता दी।
  8. अशोक ने स्त्रीध्यक्ष, ब्रजभूमिक महामात्र, नगर व्यावहारिक, अन्तमहामात्र आदि की नियुक्ति की जो क्रमशः स्त्री, पशु संरक्षण, न्याय व सीमावर्ती क्षेत्रों से सम्बन्धित थे।
  9. अशोक ने धम्म का आविष्कार करके राजा, प्रजा एवं नौकरशाही के लिए एक संविदा तैयार की जिससे अन्त:सम्बन्धों में प्रगाढ़ता आई।
  10. अशोक ने वैदेशिक नीति को समसामयिक बनाया।

प्रश्न 3.
समुद्रगुप्त की विजयों पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
समुद्रगुप्त के दरबारी कवि हरषेण ने प्रयाग प्रशस्ति लेख में उसके विजय अभियानों का उल्लेख किया है। समुद्रगुप्त ने सर्वप्रथम आर्यवर्त अर्थात् गंगा, यमुना दोआब पर सैनिक अभियान किया। उसने आर्यावर्त के नौ राजाओं रुद्रवेद, मतिल, नागदत्त, चन्द्रवर्मन, गणपति, नाग, नागसेन, अच्युत नंदी एवं बलवर्मा को पराजित किया तथा इन्हें अपने साम्राज्य का अंग बना लिया।

इसके अतिरिक्त समुद्रगुप्त ने दक्षिण में 12 राज्यों कौशल, महाकान्तर, कोरल, कोटूर, पिष्टपुर, एरनपल्ली, कांची, अवमुक्त, बैंगी, पल्लक, देवराष्ट्र, कुस्थलपुर आदि को पराजित किया। समुद्रगुप्त ने मध्य भारत के आटविकों को भी परास्त किया। सीमान्त प्रदेशों के राजतंत्रात्मक एवं गणतन्त्रात्मक राज्यों ने भी भयभीत होकर उसकी अधीनता स्वीकार कर ली। देवपुत्र शाहिशाहानुशाही, शक, मुरूण्ड तथा सिंहल आदि विदेशी शासकों ने समुद्रगुप्त के साथ मैत्री की। इस प्रकार समुद्रगुप्त ने भारत के बहुत बड़े भाग को अपने अधीन कर एकता के सूत्र में बाँधा।

प्रश्न 4.
गुप्तकाल में विज्ञान के विकास पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
गुप्तकाल में विज्ञान की अग्रांकित विभिन्न शाखाओं एवं सिद्धान्तों का प्रतिपादन हुआ-

  1. आर्यभट्ट ने दशगितिक सूत्र, आर्याष्ट शतक ग्रन्थों की रचना की। उन्होंने पृथ्वी गोल होने एवं उसके द्वारा धुरी पर घूर्णन का सिद्धान्त प्रतिपादित किया।
  2. प्रसिद्ध खगोलशास्त्री भास्कर प्रथम ने भाष्य नामक ग्रन्थ व आर्यभट्ट के ग्रन्थों दशगितिक सूत्र एवं आर्याष्ट शतक पर टीका लिखी।
  3. वराहमिहिर ने भारतीय एवं यूनानी ज्योतिष का समन्वय कर रोमक तथा पौलिश का सिद्धान्त प्रतिपादित किया। इन्होंने पंच सिद्धान्तिका, वृहत्संहिता व वृहत्जातक आदि ग्रन्थों की रचना भी की तथा वर्गमूल व घनमूल निकालने की पद्धति व खगोल विज्ञान की विस्तृत विवेचना की।
  4. ब्रह्मगुप्त ने गणित, ज्योतिष, खगोलशास्त्र पर ब्रह्मफुट सिद्धान्त खण्ड खाद्यक आदि ग्रन्थ लिखे एवं गुरुत्वाकर्षण के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया।
  5. कणाद ऋषि ने गुप्त काल में वैशेषिक दर्शन एवं अणु सिद्धान्त का प्रतिपादन किया।
  6. नागार्जुन रसायन तथा धातु विज्ञान के विद्वान थे। उन्होंने चाँदी, सोना आदि खनिज पदार्थों के रासायनिक प्रयोगों से रोगों के निवारण को प्रमाणित किया एवं पारद का आविष्कार किया।

प्रश्न 5.
प्रयाग प्रशस्ति पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
प्रयाग प्रशस्ति अभिलेख इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश में विद्यमान है। इसकी रचना समुद्रगुप्त के दरबारी कवि हरिषेण ने की थी। यह गुप्तकाल का महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्रोत है। इस अभिलेख में समुद्रगुप्त के राज्याभिषेक, दिग्विजय एवं व्यक्तित्व पर विशद प्रकाश डाला गया है तथा कई अधिकारियों के पदों व नामों के उल्लेख से गुप्तकालीन शासन व्यवस्था की जानकारी मिलती है। आलंकारिक संस्कृत भाषा, ब्राह्मी लिपि व चम्पू शैली तात्कालिक समृद्ध साहित्य के प्रगति के प्रतीक हैं। प्रयाग प्रशस्ति में समुद्रगुप्त को कविराज गायन व संगीत में दक्षता में गुरु, तुम्बरु व नारद लज्जित करने वाला, लाख गायों का दानी, उच्चकोटि का विद्वान, विद्या का संरक्षक एवं धर्म का प्राचीर कहा गया है।

प्रश्न 6.
हर्ष के समय कन्नौज धर्म सभा के बारे में बताइए।
उत्तर:
हर्ष के समय में कन्नौज धर्म सभा का आयोजन 643 ई. में किया गया। इस सभा का उद्देश्य देश में बौद्ध धर्म को विकसित करने के लिए ह्वेनसांग की उपस्थिति का लाभ उठाना था। बहुत से शासक इस सभा में सम्मिलित हुए। उसमें 3000 महायान व हीनयान बौद्ध भिक्षु, 3000 ब्राह्मण व नालन्दा विश्वविद्यालय के लगभग 1000 बौद्ध विद्वान भाग लेने के लिए आए। यह सभा 23 दिन तक चली और इसमें महायान का प्रचार किया गया। गंगा के तट पर स्थित विशाल विहार को इसी अवसर के लिए बनवाया गया था।

राजा के बराबर बुद्ध की एक सोने की मूर्ति एक सौ फुट ऊँचे स्तंभ पर रख दी गई। उसी प्रकार की, किन्तु उससे छोटी तीन फुट ऊँची मूर्ति को प्रतिदिन जुलूस में उठाया जाता था जिसमें 20 राजा और 300 हाथी होते थे। छत्र को स्वयं हर्ष उठाता था। हर्ष स्वयं अपने हाथों से बुद्ध की मूर्ति को धोकर कन्धों पर उठाकर पश्चिमी स्तंभ तक ले जाता था तथा हीरों से जड़े हजारों रेशमी वस्त्र उसे अर्पित करता था। हर्ष के संरक्षण तथा प्रयासों से महायान बौद्ध धर्म देश-विदेश में फैला उसने बौद्ध विहारों एवं स्तूपों का निर्माण कराया तथा दान दिया।

प्रश्न 7.
हर्ष के समय में आयोजित प्रयाग सभा पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
643 ई. में हर्ष ने प्रयाग सभा (मोक्ष-परिषद) का आयोजन किया। यह सभा रेत पर की गई थी जहाँ गंगा और यमुना मिलती हैं। सभा में हर्ष और ह्वेनसांग के अट्ठारह राजसी मित्रों ने भाग लिया। इस अवसर पर 5,00,000 से भी अधिक व्यक्ति उपस्थित हुए। प्रयाग में किए गए कार्य के सम्बन्ध में पहले दिन एक बुद्ध मूर्ति रखी गई और लोगों में असंख्य वस्त्र तथा बहुमूल्य वस्तुएँ बाँटी गईं। दूसरे और तीसरे दिन क्रमशः सूर्य और शिव की मूर्तियों का सम्मान किया गया। चौथे दिन बौद्ध भिक्षुओं को दान दिया गया।

उसके अगले दिन ब्राह्मणों को दान दिया गया। जैन धर्म तथा अन्य धर्मों के मतावलम्बियों को दस दिन दान दिया गया। सुदूर देशों के तपस्वियों को कई दिनों तक दान दिया गया। अगले एक महीने में निर्धन, अनाथ और दिव्यांग लोगों को सहायता दी गई। यह सब 75 दिन में सम्पन्न हुआ। इस प्रकार हर्ष ने धार्मिक सहिष्णुता व सद्भाव को प्रोत्साहन दिया तथा मानवतावाद का संदेश फैलाया था।

प्रश्न 8.
ह्वेनसांग ने भारत के बारे में क्या लिखा है ?
उत्तर:
ह्वेनसांग चीनी बौद्ध यात्री था जो हर्ष के समय भारत आया। वह बौद्ध स्थलों के दर्शन एवं बौद्ध ग्रन्थों के अध्ययन करने के उद्देश्य से भारत आया था। उसने भारत के सम्बन्ध में अग्रलिखित विवरण दिया है-

  1. ह्वेनसांग ने लिखा है कि तत्कालीन समाज ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र वर्षों में विभाजित था। प्रथम तीन वर्ण समृद्ध थे तथा स्वच्छता, रहन – सहन पर अधिक ध्यान देते थे। शूद्र खेती आदि का कार्य करते थे। समाज में शुद्ध भोजन तथा नैतिक चरित्र पर बल दिया जाता था। अन्तर्जातीय विवाह प्रतिबन्धित थे।
  2. भूमि उर्वरा थी तथा लोग समृद्धशाली थे। सोने – चाँदी के सिक्कों एवं सामान्यतः कौड़ियों का मुद्रा के रूप में प्रचलन था। समाज में श्रेणी व्यवस्था प्रचलित थी। चीन मध्य एशिया पश्चिम से भारत के व्यापारिक सम्बन्ध थे। कृषि कर उपजे का 1/6 भाग होता था।
  3. भारत में ब्राह्मण धर्म का प्रभाव था। जैन एवं बौद्ध धर्म भी प्रचलित थे। राजा, प्रजा धर्म सहिष्णु थे। बौद्धों में महायान प्रभावी थी। सभी धर्मों में मूर्ति पूजा प्रचलित थी।
  4. ह्वेनसांग के अनुसार भारत की शासन पद्धति हितकारी सिद्धान्तों पर आधारित थी। राज्य की आय राजकार्य चलाने, वेतन, पुरस्कार तथा दान आदि में खर्च होती थी। दण्डनीति उदार थी, अपराध कम होते थे।
  5. शिक्षा विहारों तथा गुरुकुल के माध्यम से दी जाती थी। वेदों का पाठ मौखिक होता था। ब्राह्मी लिपि प्रचलित थी। नालन्दा एवं वल्लभी विश्वविद्यालय शिक्षा के प्रमुख केन्द्र थे।

प्रश्न 9.
नालन्दा विश्वविद्यालय पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
नालन्दा भारत का प्रमुख शिक्षा केन्द्र था। संभवत: गुप्त सम्राट कुमारगुप्त प्रथम ने इसका निर्माण कराया। गुप्त एवं पूर्व मध्यकाल में इसकी ख्याति पराकाष्ठा पर थी। देश-विदेश से छात्र शिक्षा ग्रहण करने यहाँ आते थे, जिनका प्रवेश परीक्षा के माध्यम से होता था। शिक्षकों एवं छात्रों की संख्या 10,000 से अधिक थी। यहाँ धर्म, विज्ञान, उद्योग, तर्क आदि की शिक्षा दी जाती थी। यहाँ विशाल पुस्तकालय भी था। गणमति, स्थिरमति, शीलभद्र यहाँ के प्रसिद्ध कुलपति थे।

प्रश्न 10.
चोलकालीन स्थानीय स्वायत्तता पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
चोल प्रशासन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता ग्रामीण एवं नगरीय स्तर पर स्थानीय स्वायत्तता की व्यवस्था थी जो प्रतिनिधि संस्थाओं, उर, सभा, महासभा एवं नगरम् के द्वारा संचालित होता था। इनके सदस्यों के लिए शैक्षणिक, आर्थिक और नैतिक योग्यताएँ अनिवार्य थीं। इन निर्वाचित सदस्यों को पेरु मक्कल कहा जाता था।

सदस्य समितियाँ जिन्हें वारियम कहा जाता था, के माध्यमसे सिंचाई व्यवस्था, भूमि विवरण, लगान एवं करों की वसूली, मंदिरों की देखरेख, न्याय आदि प्रशासनिक कार्यों की देखभाल होती थी। उर सामान्य वयस्क पुरुष करदाताओं की सभा थी, जबकि सभा महासभा में सिर्फ ब्राह्मण सदस्य होते थे। इनको आन्तरिक स्वायत्तता प्राप्त थी। केन्द्रीय हस्तक्षेप न के बराबर था। वस्तुतः ग्राम लघु गणतंत्र ही थे। इस प्रकार चोल प्रशासन सुसंगठित एवं कार्यकुशल शासन था।

प्रश्न 11.
चोलों के केन्द्रीय प्रशासन पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
चोल शासन का स्वरूप राजतन्त्रात्मक तथा वंशानुगत था। राजा प्रशासन का प्रधान था व उसकी सहायता हेतु अनेक अधिकारीगण थे। राजा के निजी सहायकों को उम्रकुटुम कहा जाता था। उच्चस्तरीय अधिकारी पेरून्दनम् व निम्न स्तरीय अधिकारी सीरुतरम कहलाते थे। ओलेनायकम् प्रधान सचिव होता था। चोल सेना के पदाति, अश्वारोही, गजारोही तीन प्रमुख अंग थे। सेना गुल्मों व छावनियों (कडगम) में रहती थी। चोलों के पास शक्तिशाली नौसेना भी थी। राजा सर्वोच्च न्यायाधीश होता था। चोलों की दण्ड व्यवस्था में आर्थिक दण्ड एवं सामाजिक अपमान के दण्ड का विधान था। आर्थिक दण्ड काशु (सोने का सिक्का) के रूप में देना पड़ता था। राज्य की आय का मुख्य साधन भू-राजस्व था। चोल काल में भूमि कर उपज का एक तिहाई हिस्सा हुआ करता था। व्यापार, वाणिज्य, आयात-निर्यात, सिंचाई कर आदि आय के अन्य साधन थे।

प्रश्न 12.
विजयनगर साम्राज्य कला के विकास पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
विजयनगर के शासकों ने स्थापत्य कला के विकास में सराहनीय योगदान दिया। इस शैली के सर्वोत्कृष्ट उदाहरणों में देवराय द्वितीय द्वारा निर्मित हजारा मंदिर और कृष्णदेव राय द्वारा निर्मित विठ्ठल स्वामी के मंदिर प्रसिद्ध हैं। इन मंदिरों में मण्डप के अतिरिक्त एक कल्याण मण्डप को निर्माण किया गया है। यह आमतौर पर मंदिर के आँगन के बायीं ओर बनाया जाता था।

इसमें अलंकृत स्तम्भों का प्रयोग होता था। दूसरी विशेषता ‘अम्मान मंदिर’ के रूप में देखी जा सकती है। इसमें देवता की पत्नी की विशेष रूप से आराधना की जाती थी। इनके अतिरिक्त मंदिर में प्रवेश द्वार बने थे। गोपुरम् और मंदिर के स्तम्भों के अलंकार पर विशेष रूप से ध्यान दिया जाता था। कांचीपुरम् का एकाग्रनाथ नामक मंदिर तथा ताड़पत्री स्थित रामेश्वरम् मंदिर अपने सुन्दर गोपुरों के कारण अत्यन्त प्रसिद्ध हैं, जबकि श्रीरंग स्थित शेषगिरी मण्डप में प्रस्तुत घोड़ों की मूर्तियाँ अपनी सुन्दरता के लिए प्रसिद्ध हैं।

विजयनगर के शासकों द्वारा अनेक महलों एवं राजप्रासादों का भी निर्माण कराया गया। इन भवनों की दीवारों पर चित्रण के सुन्दर उदाहरण मिलते हैं। चित्रकला के अतिरिक्त मूर्तियों का निर्माण भी इस काल में प्रचुर मात्रा में हुआ। कृष्णदेवराय और उसकी पत्नियों, वेंकट प्रथम और कुछ अन्य शासकों की कांस्य की बनी विशाल मूर्तियाँ धातुकला में विजयनगर के कारीगरों की प्रवीणता को दर्शाती हैं।

प्रश्न 13.
विजयनगर साम्राज्य के साहित्य के विकास पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
विजयनगर की साहित्यिक कृतियों में धार्मिक, ऐतिहासिक, जीवन वृत्तान्त एवं काव्य सम्बन्धी रचनाएँ उपलब्ध हैं। सायण के नेतृत्व में विद्वानों के एक मण्डल ने चारों वेदों की संहिताओं सहित अनेक ब्राह्मण ग्रन्थ और आरण्यकों पर भाष्य लिखे। कृष्णदेव राय के संरक्षण में ईश्वर दीक्षित ने हेमकूट नामक महाकाव्य पर दो टीकाएँ लिखीं। विजयनगर का महानतम् शासक कृष्णदेव राय एक उत्कृष्ट कोटि का कवि और लेखक था जिसे संस्कृत व तेलगू भाषा में प्रवीणता प्राप्त थी। उसकी तेलगू रचना आमुक्त मालयदम्’ थी जो तेलगू भाषा के पाँच महाकाव्यों में से एक है।

साहित्यिक रचनाओं में राजनाथ का ‘सालूवाभियुदय’ और भार्गवत चंपू विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। शासकों की जीवनी से सम्बन्धित रचनाओं में बुक्का प्रथम के पुत्र कुमार कम्पन की पत्नी की काव्य रचना ‘मदुरा विजयम’ है तथा दूसरी रचना तिरूवलाम्बा की वरदाम्बिकापरिणय है। कृष्णदेव राय के दरबार में संस्कृत व कन्नड़ भाषाओं में विभिन्न पुस्तकों की रचना हुई जिनमें भाव चिंतारण तथा वीर शैवामृत प्रमुख हैं।

प्रश्न 14.
हर्ष के प्रशासन पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
हर्ष की केन्द्रीय शासन व्यवस्था का सर्वोच्च अधिकारी स्वयं सम्राट होता था। शासन की समस्त शक्ति शासक के हाथों में केन्द्रित थी। राज्य का प्रधान होने के कारण अधिकारियों की नियुक्ति, आय-व्यय की देख-रेख, युद्ध के समय सैन्य संचालन, आंतरिक शान्ति की व्यवस्था, निचले न्यायालयों के निर्णय को सुनना इत्यादि राजा के कार्य थे। सम्राट को परामर्श देने तथा शासन में सहायता देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होती थी। राजधानी में एक सुव्यवस्थित सचिवालय था। उच्च प्रशासकीय सेवा में कुमारमात्य नियुक्त किये गये थे।

उन्हीं में से मंत्री, सचिवालय के अधिकारी और जिला अधिकारी चुने। जाते थे। सर्वतः गुप्तचर विभाग का सदस्य था। हर्षवर्धन की सेना में 60,000 हाथी, 100000 घुड़सवार सैनिक थे। प्रमुख सैन्य अधिकारी को महासेनापति कहा जाता था। हर्ष का साम्राज्य भुक्तियों, विषयों आदि में विभक्त था। प्रान्तों को भुक्तियों एवं भुक्तियों को विषयों में बाँटा गया था। हर्ष के काल में तीन प्रकार के करों का उल्लेख मिलता है; जैसे- भाग, हिरण्य और बलि। कृषि उत्पादन का छठा भाग कर के रूप में लिया जाता था। दण्ड व्यवस्था लचीली थी। कानून तोड़ने वाले को शारीरिक दण्ड नहीं दिये जाते थे बल्कि नगर से निकाल दिया जाता था। परीक्षा द्वारा अपराध की जाँच करने का ढंग भी प्रचलित था।

प्रश्न 15.
मौर्यकालीन केन्द्रीय प्रशासन पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
मौर्य प्रशासन में राजा शासन प्रणाली का केन्द्र बिन्दु था। व्यवस्थापिका, न्यायपालिका के कार्यपालिका की समस्त शक्तियाँ राजा में निहित र्थी। राजा को परामर्श देने के लिए मंत्रिपरिषद थी। महत्वपूर्ण विषयों पर राजा मंत्रियों से परामर्श करता था। शीर्षस्थ राज्याधिकारी जो संख्या में 18 थे, इन्हें तीर्थ कहा जाता था। इसके अतिरिक्त ‘अर्थशास्त्र में 27 अध्यक्षों का उल्लेख मिलता है जो राज्य की आर्थिक गतिविधियों का नियमन करते थे। नागरक नगर प्रशासन को अध्यक्ष होता था। गोप तथा स्थानिक उसके सहायतार्थ कर्मचारी थे।

सेना की छः शाखाएँ थीं जो क्रमशः पैदल, अश्व, हाथी, रथ, यातायात एवं नौसेना में विभक्त थीं। सैन्य विभाग का सबसे बड़ा अधिकारी सेनापति होता था। न्याय करने में राजा सर्वोच्च न्यायाधीश था। राजुक व्यावहारिक आदि न्यायिक अधिकारी थे। दण्ड व्यवस्था अत्यन्त कठोर थी। समाहर्ता राजस्व विभाग को प्रमुख अधिकारी था। दुर्ग, राष्ट्र, ब्रज, सेतु, वन, खाने, आयात, निर्यात आदि राजस्व प्राप्ति के मुख्य स्रोत थे। सन्निधाता राजकीय कोष का मुख्य अधिकारी होता था। मौर्य साम्राज्य में जनोपयोगी सेवाओं में सिंचाई, सड़क, सराय, चिकित्सा आदि को महत्व दिया गया जिसकी व्यवस्था प्रशासनिक अधिकारी करते थे।

RBSE Class 12 History Chapter 2 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
अशोक के ‘धम्म’ पर लेख लिखिए।
उत्तर:
विभिन्न वर्गों, जातियों और संस्कृतियों को एक सूत्र में बाँधने तथा अपनी प्रजा के नैतिक उत्थान के लिए अशोक ने जिन आचारों की संहिता प्रस्तुत की उसे अभिलेखों में धम्म कहा गया है।

धम्म के प्रमुख सिद्धान्त:

  1. सहिष्णुता – धम्म के बुनियादी सिद्धान्तों में अशोक ने सर्वाधिक बल सहिष्णुता पर दिया। प्रथम स्वयं व्यक्तियों की सहिष्णुता, द्वितीय विभिन्न विचारों, विश्वासों, धर्मों एवं भाषाओं में सहिष्णुता। इसे अशोक ने 7, 11 व 12वें शिलालेख व दूसरे लघु शिलालेख में उल्लिखित किया।
  2. अहिंसा – धम्म का दूसरा बुनियादी सिद्धान्त अहिंसा था जिसका तात्पर्य युद्ध व हिंसी द्वारा विजय प्राप्ति को त्याग और जीव हत्या का विरोध था जो प्रथम व 11वें शिलालेख व पाँचवें स्तम्भ लेख में मिलते हैं।
  3. आडम्बरहीनता – अशोक ने नवें शिलालेख में अंधविश्वासों के फलस्वरूप जो निरर्थक अनुष्ठान और यज्ञ होते थे। ऐसे बाह्याडम्बरों की निन्दा की। प्रथम स्तम्भ लेख में धम्म की प्राप्ति के लिए धर्म यात्रा, धर्म मंगल, धर्म दान, शुश्रूषा आदि की व्यवस्था थी।
  4. लोक कल्याण – धम्म नीति में ऐसे कार्य भी शामिल थे, जो आम नागरिकों के कल्याण से सम्बन्धित थे, लोक कल्याण से सम्बद्ध नियम सातवें स्तम्भ लेख व दूसरे शिलालेख में लिखित हैं जिसमें वृक्षारोपण, सराय, सड़कें, सिंचाई, कुँओं के निर्माण आदि प्रमुख थे।
  5. श्रेष्ठ पवित्र नैतिकता – अशोक दूसरे स्तम्भ लेख में धम्म की परिभाषा बताते हुए कहता है, “अपासिनवे बहुकयाने दया दाने सचे सोचये माधवे साधवे च” अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति पापों से दूर रहे, कल्याणकारी कार्य करे, दया, दान, सत्य, पवित्रता व मृदुता का अवलम्बन करे। तीसरे स्तम्भ लेख में वह प्रचंडता, निष्ठुरता, क्रोध, घमण्ड एवं ईर्ष्या आदि को निषेध कहता है। इनके लिए व्यक्ति आत्मनिरीक्षण अर्थात् निज्झति करे एवं सबके साथ श्रेष्ठ व्यवहार करे।

धम्म की नीति का मूल्यांकन:
यद्यपि धम्म के मूल सिद्धान्त सहिष्णुता, अहिंसा एवं सदाचार थे जो कि भारतीय संस्कृति के मूल तत्व रहे हैं तथापि समग्र रूप से यह नीति अशोक के पश्चात् फलीभूत नहीं हो सकी। धम्म की नीतियों को अशोक के उत्तराधिकारी उसी रूप में क्रियान्वित नहीं कर सके इसका प्रमुख कारण राजनीतिक अनिश्चितता व सीमाओं की असुरक्षा के कारण लगातार युद्धों का होना था। यद्यपि धम्म की नीति फलीभूत नहीं हो सकी तथापि सम्राट अशोक इस बात के लिए सराहना का पात्र है कि उसने एक पथ प्रदर्शक सिद्धान्त की आवश्यकता को महसूस करते हुए धम्म की नीति का प्रतिपादन किया जो वर्तमान में भी प्रासंगिक है।

प्रश्न 2.
गुप्तकालीन कला व साहित्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
कला और साहित्य के विकास की दृष्टि से गुप्तकाल को स्वर्ण युग की संज्ञा दी जाती है। इस युग की कला में भारतीयकरण, सौन्दर्याभिव्यक्ति, भावचित्रण एवं आध्यात्मिकता का अंकन उल्लेखनीय है।

1. वास्तुकला:
गुप्तकालीन मंदिर नागर शैली के उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। आधार पीठिका, गर्भगृह, सभा मण्डप, शिखर, अन्तराल प्रदक्षिणा पथ तथा द्वार पर गंगा, यमुना की मूर्तियाँ आदि इनकी सामान्य विशेषताएँ हैं। तिगवां कां विष्णु मन्दिर, भूमरा का शिव मन्दिर, नाचना कुठार का पार्वती मन्दिर, भितरीगाँव का लक्ष्मण मन्दिर व देवगढ़ का दशावतार मन्दिर आदि प्रमुख मन्दिर इस शैली के प्रमुख उदाहरण हैं। इनके अतिरिक्त विहार स्तूप, गुहा, चैत्य आदि निर्मित हुए जिनमें अजन्ता, बाघ, ऐलोरा, उदयगिरी गुहा के मन्दिर धमेख स्तूप व महाबोधि विहार (बोधगया) मुख्य हैं।

2. मूर्तिकला:
मथुरा, सारनाथ वे पाटलिपुत्र मूर्तिकला के प्रमुख केन्द्र थे। मूर्तियाँ, धातु, पत्थर व मिट्टी की बनाई जाती थीं। परिधानों की महत्ता, अलंकृत प्रभा मण्डल, विशेष केश सज्जा, मुद्रा आसन, आध्यात्मिकता, सरलता व भारतीयकरण मूर्तिकला की प्रमुख विशेषता है जिनके प्रमुख उदाहरण हैं-सुल्तानगंज की बुद्ध, मथुरा से महावीर, देवगढ़ व मथुरा की विष्णु, ऐरण व उदयगिरी की वराह की मूर्तियाँ तथा शिव की अर्द्धनारीश्वर रूप की मूर्ति।

3. चित्रकला:
गुप्त चित्रकला के सर्वोत्कृष्ट उदाहरण अजन्ता व ग्वालियर की बाघ गुफाओं से प्राप्त हुए हैं। अजन्ता के चित्रों में प्राकृतिक सौन्दर्य बुद्ध व बोधिसत्व तथा जातक ग्रन्थों के वर्णात्मक दृश्यों का अंकन हुआ है। इनमें गुफा सं. 16 एवं 17 में उत्कीर्ण चित्र अत्यन्त प्रसिद्ध हैं।

4. संगीत कला:
गुप्तकाल में संगीत, नाटक, अभिनय कला और नृत्यकला के क्षेत्र में भी अद्वितीय उन्नति हुई। समुद्रगुप्त का वीणा लिए हुए सिक्कों पर अंकित किया जाना उसके संगीत प्रेम को दर्शाता है।

साहित्य का विकास:
गुप्तकाल में साहित्य के क्षेत्र में भी सराहनीय प्रगति हुई। इस काल में प्रयाग एवं महरौली आदि प्रशस्तियों की रचना हुई। भास ने स्वप्नवासवदत्ता, शूद्रक ने मृच्छकटिकम्, विशाखदत्त ने मुद्राराक्षस, कालिदास ने अभिज्ञान शाकुन्तलम् आदि सुखान्त नाटकों एवं रघुवंश जैसे महाकाव्यों की रचना की। अमरसिंह ने अमरकोश, चन्द्रगोमिन ने चन्द्रव्याकरण आदि व्याकरण ग्रन्थ रचे। विष्णु शर्मा ने पंचतंत्र नामक जैसे नीति ग्रन्थ, ईश्वर कृष्ण ने सांख्यकारिका एवं दिङ्गनाग ने प्रमाण समुच्चय आदि दार्शनिक ग्रन्थों की रचना की। वाक्पतिराज का गोहडवो, प्रवरसेन का सेतुबन्ध आदि प्राकृत ग्रन्थों तथा मनु स्मृति के आधार पर नारद, बृहस्पति, कात्यायन, याज्ञवलक्य आदि स्मृतियों में कानूनों का संकलन भी गुप्तकाल में हुआ।

प्रश्न 3.
ज्ञान व विद्या के संरक्षक के रूप में हर्ष का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर:
हर्षवर्धन एक महान सेनापति, कला, साहित्य एवं धर्म का संरक्षक था। हर्ष विद्वानों का उदार आश्रयदाता था। हर्ष के राजस्व का चौथाई हिस्सा बौद्धिक उपलब्धियों जैसे विद्या के प्रसार एवं विद्वानों को पुरस्कृत करने पर व्यय होता था। हर्ष ने मयूराष्टक तथा सूर्यशतक के रचयिता मयूर, हर्ष चरित्र एवं कादम्बरी के रचयिता बाणभट्ट सहित भृर्तहरि, मातंग, दिवाकर एवं जयसेन आदि अनेक विद्वानों को संरक्षण दिया। स्वयं हर्ष ने नागानंद, प्रियदर्शिका व रत्नावली आदि रचनाएँ रच।

हर्ष ने शिक्षा के प्रसार-प्रचार के लिए धन एवं ग्रामों को दान में दिया। नालन्दा विश्वविद्यालय शिक्षा का एक प्रमुख केन्द्र था। इसके अतिरिक्त वल्लभी, अनेक गुरुकुल, आश्रम एवं विहार आदि शिक्षा के केन्द्र थे। इस प्रकार हर्ष ने प्रजा के बौद्धिक स्तर को ऊँचा उठाने का प्रयत्न किया। हर्ष ने बौद्ध धर्म के साथ-साथ अन्य धर्मों की सहिष्णुता पर बल दिया एवं उनका संरक्षण किया। हर्ष ने अनेक विद्वानों को संरक्षण दिया तथा शिक्षा के प्रसार-प्रचार के लिए वित्त का पोषण भी किया।

विभिन्न ऐतिहासिक साक्ष्यों से यह ज्ञात होता है कि हर्ष राजस्व का आधा भाग धर्म, शिक्षा – साहित्य के संरक्षण हेतु व्यय करता था। हर्ष प्रारम्भ में शैव था, तत्पश्चात् वह महायान बौद्ध धर्म की ओर प्रवृत्त हुआ। इन सिद्धान्तों के प्रचार – प्रसार के लिए हर्ष ने कन्नौज में 643 ई. में एक विशाल सम्मेलन का आयोजन किया। इसमें बौद्ध, ब्राह्मण, जैन व नालंदा के विद्वानों ने भाग लिया।

हर्ष राजस्व का चौथाई हिस्सा धर्म के लिए व्यय करता था। उसके प्रश्रय से महायान बौद्ध धर्म देश-विदेश में फैला। प्रयाग व कन्नौज आदि सभाओं के माध्यम से विभिन्न धर्मावलम्बियों को एक जगह लागकर धार्मिक सहिष्णुता एवं सामाजिक एकता का सूत्रपात किया। उपर्युक्त समस्त विवरण से यह बात पूर्णतया स्पष्ट हो जाती है कि ज्ञान व विद्या का महान संरक्षक था।

प्रश्न 4.
चोलकालीन कला व साहित्य की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
चोल कला प्रेमी एवं महान निर्माता थे। उन्होंने विशाल राजप्रासाद, कृत्रिम झीलें, विस्तीर्ण बाँध, सुन्दर नगर, धातु एवं पाषाण की मूर्तियाँ तथा भव्य मन्दिरों का निर्माण कराया।

1. स्थापत्य कला:
चोल स्थापत्य की मुख्य देन मंदिर निर्माण है। इन मन्दिरों का निर्माण द्रविड़ शैली में हुआ। उनके द्वारा निर्मित मन्दिरों की मुख्य विशेषताएँ विशाल व वर्गाकार विमान, मध्य में विस्तृत आँगन, अलंकृत गोपुरम्, मण्डप, अन्तराल, सजावट के लिए पारम्परिक सिंह ब्रेकेट तथा संयुक्त स्तम्भों का प्रयोग आदि हैं। चोलकालीन प्रारम्भिक मंदिरों में तिरुकट्टलाई को सुन्दरेश्वर मन्दिर, नरतमलाई का विजयालय चोलेश्वर मन्दिर प्रसिद्ध है। राजराज का वृहदेश्वर, राजेन्द्र प्रथम का गंगैकोण्डचोलपुरम्, कोरंग नाथ, ऐरातेश्वर, त्रिभुवनेश्वर आदि अन्य प्रमुख मंदिर हैं। चोल कला का प्रभाव इण्डो – चीन तथा सुदूर पूर्व के देशों पर पड़ा जिसका प्रमुख उदाहरण कम्बोडिया में अंकोरवाट का महान मंदिर है।

2. मूर्तिकला:
इस काल में उत्कृष्ट मूर्तिकला के उदाहरण ब्रह्मा, विष्णु, नटराज, राजा, रानियों आदि की पाषाण, कांस्य व अष्टधातु की मूर्तियाँ हैं। इस काल में धातु मूर्तियों में नटराज शिव की कांस्य मूर्ति विशेष उल्लेखनीय है। मूर्तिकला भवन निर्माण कला की सहायक कला के रूप में भी विकसित हुई। मन्दिरों की दीवारों एवं छतों पर इनका प्रचुर मात्रा में प्रयोग हुआ।

3. चित्रकला:
भित्ति चित्रकला के अन्तर्गत बृहदेश्वर मन्दिर की दीवारों पर अजन्ता की चित्रकला से प्रभावित धार्मिक चित्रकारी की गई है। शिव, कैलाश, नन्दी आदि चित्रों को उकेरा गया है। तंजावुर में उत्कृष्ट चित्रकला के उदाहरण मिलते हैं। इनके अतिरिक्त राजराज प्रथम ने अपने शासन के दौरान चोल अभिलेखों का प्रारम्भ ऐतिहासिक प्रशस्ति के साथ करवाने की प्रथा की शुरूआत की।

चोल साहित्य:
चोल शासक शिक्षा एवं साहित्य के संरक्षक. थे। मन्दिर तथा ग्राम महासभाएँ शिक्षा के केन्द्र थे। तमिल एवं संस्कृत भाषा का प्रचलन था। तमिल को राजाश्रय प्राप्त था। चोलो के शासन काल में कम्बन ने रामावतार नामक ग्रन्थ की रचना की। जयन्गोन्दार ने कलितुंग पर्णी नामक ग्रन्थ की रचना की। शेक्किल्लार का परियापुराणम तथा पुलगेन्दी का नलबेम्ब इस काल की महत्वपूर्ण रचनाएँ हैं।

इसके अतिरिक्त अन्य महत्वपूर्ण रचनाओं में प्रिय पूर्णम या शेखर की तिरुट्टोन्डपूर्णम्, नंदी का तिरुविलाईयादल पूर्णम्, अमुदनार का रामानुज नुरंदादि, तिरुकदेवर का शिवकोशीन्दमणि आदि धार्मिक ग्रन्थ तथा बुद्धमित्र का विरासोलियम्, पबन्दी का नन्नौर आदि व्याकरण ग्रन्थ प्रमुख हैं। जैन ग्रन्थों में तिक्करदेवर का जीवक चिन्तामणि, बौद्ध ग्रन्थों में कुण्डल केशी महत्वपूर्ण है। रामानुज, यमुनाचार्य एवं ऋग्वेद पर भाष्यकार बैकट माधव आदि ने संस्कृत ग्रन्थों की रचना की।

प्रश्न 5.
कृष्णदेव राय की उपलब्धियों को बताइए।
उत्तर:
राजा कृष्णदेव राय तुलुववंश के सबसे प्रसिद्ध और प्रभावशाली राजा थे। इन्होंने 1509 ई. से 1529 ई. तक विजयनगर पर शासन किया। इनके शासन काल में विजयनगर ऐश्वर्य एवं शक्ति की दृष्टि से अपने चरमोत्कर्ष पर था। कृष्णदेव राय ने तुंगभद्रा और कृष्णा नदियों के बीच स्थित उपजाऊ भू-क्षेत्र रायचूर दोआब पर अधिकार कर अपने राज्य का विस्तार और आर्थिक सुदृढ़ीकरण किया तथा उड़ीसा के शासकों और बीजापुर के सुल्तान को पराजित किया।

कृष्णदेव राय की नीति सामरिक रूप से युद्ध के लिए हमेशा तैयार रहने की थी परन्तु इससे राज्य के आंतरिक शान्ति और समृद्धि की परिस्थितियों में कोई व्यवधान नहीं था। कृष्णदेव राय ने नागलपुर नामक नये नगर की स्थापना की तथा हजारों एवं विठ्ठलस्वामी नामक मंदिर का निर्माण कराया। भव्य गोपुरमों के निर्माण का श्रेय भी कृष्णदेव राय को ही जाता है। कृष्णदेव राय ने कृषि के विस्तार तथा जल आपूर्ति के लिए विशाल हौजों, जलाशयों तथा नहरों का भी निर्माण कराया। कृष्णदेव राय एक उच्च कोटि के कवि तथा लेखक भी थे, जिन्हें संस्कृत एवं तेलुगू भाषाओं में प्रवीणता प्राप्त थी।

उनकी तेलुगू रचना ‘आमुक्त मालयदम’ था जो तेलुगू भाषा के पाँच महाकाव्यों में से एक है। उन्होंने संस्कृत में एक नाटक जाम्बवती कल्याणम् की रचना की। कृष्णदेव राय के दरबार में तेलुगू साहित्य के 8 सर्वश्रेष्ठ कवि रहते थे। उनके दरबार में तेनालीराम एक प्रसिद्ध कवि था जिसने पाण्डुरंग महात्म्य की रचना की। तेनालीराम की तुलना अकबर के प्रसिद्ध दरबारी बीरबल से की जाती है। कृष्णदेव राय के दरबार में संस्कृत एवं कन्नड़ भाषाओं में विभिन्न पुस्तकों की रचना हुई जिनमें ‘भाव चिन्तारण’ तथा ‘वीर शैवामृत’ प्रमुख हैं। कृष्णदेव राय और अच्युत राय ने वैष्णवों लिंगायतों तथा जैनों को भी संरक्षण प्रदान किया।

RBSE Class 12 History Chapter 2 अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

RBSE Class 12 History Chapter 2 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
कौटिल्य कौन था?
(क) राजदूत
(ख) सेनापति
(ग) मुख्यमंत्री
(घ) अमात्य।

प्रश्न 2.
चन्द्रगुप्त मौर्य ने मौर्य साम्राज्य की स्थापना कब की?
(क) 327 ई. पू.
(ख) 319 ई. पू.
(ग) 322 ई. पू.
(घ) 312 ई. पू.।

प्रश्न 3.
चन्द्रगुप्त मौर्य और सेल्यूकस के मध्य युद्ध कब हुआ?
(क) 305 ई. पू.
(ख) 307 ई. पू.
(ग) 302 ई. पू.
(घ) 300 ई. पू.।

प्रश्न 4.
इण्डिका नामक पुस्तक को लेखक कौन था?
(क) सेल्यूकस
(ख) चन्द्रगुप्त मौर्य
(ग) कौटिल्य
(घ) मेगस्थनीज।

प्रश्न 5.
सेल्यूकस कहाँ का शासक था?
(क) मेसीडोनिया का
(ख) पाटलिपुत्र का
(ग) मगध का
(घ) इनमें से कोई नहीं।

प्रश्न 6.
चन्द्रगुप्त मौर्य का उत्तराधिकारी कौन बना?
(क) बिन्दुसार
(ख) सेल्यूकस
(ग) अशोक
(घ) इनमें से कोई नहीं।

प्रश्न 7.
अशोक किस वर्ष मौर्य साम्राज्य की गद्दी पर बैठा?
(क) 261 ई. पू.
(ख) 250 ई. पू.
(ग) 273 ई. पू.
(घ) 278 ई. पू।

प्रश्न 8.
कलिंग विजय किसने की थी?
(के) चन्द्रगुप्त मौर्य
(ख) बिन्दुसार
(ग) अशोक
(घ) सेल्यूकस।

प्रश्न 9.
कलिंग पर अशोक ने किस वर्ष विजय प्राप्त की?
(क) 273 ई. पू.
(ख) 258 ई. पू.
(ग) 261 ई. पू.
(घ) 230 ई. पू।

प्रश्न 10.
निम्नलिखित सिद्धान्तों में से कौन-सा धम्म से सम्बद्ध नहीं है।
(क) अहिंसा
(ख) आडम्बरहीनता
(ग) ब्रहमचर्य
(घ) सहिष्णुता

प्रश्न 11.
मौर्य साम्राज्य कितने प्रान्तों में विभक्त था?
(क) तीन
(ख) पाँच
(ग) सात
(घ) चारे।

प्रश्न 12.
गुप्त वंश की स्थापना किसने की?
(क) समुद्रगुप्त
(ख) श्रीगुप्त
(ग) कुमारगुप्त
(घ) स्कन्दगुप्त।

प्रश्न 13.
गुप्त संवत का प्रारम्भ किसने किया?
(क) चन्द्रगुप्त प्रथम
(ख) चन्द्रगुप्त मौर्य
(ग) चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य
(घ) समुद्रगुप्त।

प्रश्न 14.
किस गुप्त शासक को अपने शासनकाल में हूणों का सामना करना पड़ा?
(क) कुमारगुप्त
(ख) श्रीगुप्त
(ग) चन्द्रगुप्त प्रथम
(घ) स्कन्दगुप्त।

प्रश्न 15.
सुदर्शन झील का पुनर्निर्माण किसने कराया?
(क) समुद्रगुप्त
(ख) कुमारगुप्त
(ग) स्कन्दगुप्त
(घ) बुद्धगुप्त।

प्रश्न 16.
हरिषेण द्वारा निर्मित प्रयाग प्रशस्ति से किस शासक के बारे में विवरण प्राप्त होता है?
(क) स्कन्दगुप्त
(ख) समुद्रगुप्त
(ग) कुमारगुप्त
(घ) चन्द्रगुप्त प्रथम।

प्रश्न 17.
फाह्यान किस गुप्त शासक के समय में भारत आया था?
(क) चन्द्रगुप्त प्रथम
(ख) समुद्रगुप्त
(ग) चन्द्रगुप्त द्वितीय
(घ) स्कन्दगुप्त।

प्रश्न 18.
मुद्राराक्षस के रचयिता थे।
(क) विशाखदत्त
(ख) शूद्रक
(ग) कालिदास
(घ) कौटिल्य।

प्रश्न 19.
भारत का नेपोलियन किस सम्राट को कहा जाता है?
(क) समुद्रगुप्त को
(ख) चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य को
(ग) कुमारगुप्त को
(घ) स्कन्दगुप्त को।

प्रश्न 20.
हर्ष किस वंश का शासक था?
(क) मौर्य वंश
(ख) गुप्त वंश
(ग) कुषाण वंश
(घ) पुष्यभूति वंश।

प्रश्न 21.
हर्ष व पुल्केशिन द्वितीय के मध्य हुए युद्ध का उल्लेख किस अभिलेख में मिलता है?
(क) ऐहोल प्रशस्ति
(ख) प्रयाग प्रशस्ति
(ग) जूनागढ़ अभिलेख
(घ) इनमें से कोई नहीं।

प्रश्न 22.
ह्वेनसांग कहाँ से भारत आया था?
(क) तिब्बत
(ख) चीन
(ग) जापान
(घ) इनमें से कोई नहीं।

प्रश्न 23.
हर्षचरित के रचयिता कौन थे?
(क) हर्ष
(ख) बाणभट्ट
(ग) भवभूति
(घ) मातंग।

प्रश्न 24.
हर्ष का दरबारी कवि कौन था?
(क) बाणभट्ट
(ख) कालिदास
(ग) शूद्रक
(घ) अश्वघोष।

प्रश्न 25.
संगम वंश का अंतिम शासक कौन था?
(क) विरुपाक्ष द्वितीय
(ख) देवराय द्वितीय
(ग) देवराय प्रथम
(घ) इनमें से कोई नहीं।

प्रश्न 26.
1279 ई. में किसने चोल राज्य पर अधिकार कर इसे समाप्त कर दिया?
(क) चेरो ने
(ख) पाण्ड्यों ने
(ग) प्रतिहारों ने
(घ) हूणों ने।

प्रश्न 27.
चोल प्रशासन में नाडु किसे कहा जाता था?
(क) ग्राम
(ख) नगर
(ग) जिला
(घ) ग्राम समूह।

प्रश्न 28.
राजतरंगिणी की रचना कितनी तरंगों में की गयी है?
(क) सात
(ख) पाँच
(ग) चार
(घ) आठ

प्रश्न 29.
राजतरंगिणी की रचना किस भाषा में हुई?
(क) पाली
(ख) प्राकृत
(ग) संस्कृत
(घ) हिन्दी।

प्रश्न 30.
तालीकोटा का युद्ध किस वर्ष लड़ा गया?
(क) 1662 ई.
(ख) 1550 ई.
(ग) 1665 ई.
(घ) 1560 ई.।

उत्तरमाला:
1. (ग), 2. (ग), 3. (क), 4. (घ), 5. (क), 6. (क), 7. (ग), 8. (ग), 9. (ग), 10, (ग), 11. (घ), 12. (ख), 13. (के), 14. (घ), 15. (ग), 16. (ब), 17. (ग), 18. (क), 19. (घ), 20, (घ), 21. (घ), 22. (ख), 23. (ख), 24. (क), 25. (क), 26. (ख), 27. (ग), 28. (घ), 29. (ग), 30. (ग)।

सुमेलित कीजिए
(i)
RBSE Solutions for Class 12 History Chapter 2 image 1
उत्तरमाला:
1. (च), 2. (छ), 3. (ज), 4. (झ), 5. (अ), 6. (ट), 7. (ठ), 8. (क), 9, (ख), 10. (ग), 11. (घ), 12. (ङ) ।

(ii)
RBSE Solutions for Class 12 History Chapter 2 image 2
उत्तरमाला:
1. (ङ), 2. (च), 3. (छ), 4. (ज), 5. (झ), 6. (क), 7. (ग), 8. (ख), 9. (घ)।

RBSE Class 12 History Chapter 2 अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
चन्द्रगुप्त मौर्य ने कब और किस वंश की स्थापना की?
उत्तर:
चन्द्रगुप्त मौर्य ने 322 ई. पू. में मौर्य वंश की स्थापना की।

प्रश्न 2.
यूनानी लेखकों ने अमित्रोचेडूस की संज्ञा किस मौर्य सम्राट को दी?
उत्तर:
यूनानी लेखकों ने मौर्य सम्राट बिन्दुसार को अमित्रोचेडुस की संज्ञा दी।

प्रश्न 3.
नंदवंश का अंतिम शासक कौन था?
उत्तर:
नंदवंश का अन्तिम शासक घनानन्द था।

प्रश्न 4.
अभिलेखों में सम्राट अशोक को किन नामों से सम्बोधित किया गया है?
उत्तर:
अभिलेखों में सम्राट अशोक को देवानामप्रिय, देवानाप्रियदर्शी एवं राजा के नाम से सम्बोधित किया गया है।

प्रश्न 5.
अशोक का साम्राज्य विस्तार कहाँ से कहाँ तक था?
उत्तर:
अशोक का साम्राज्य उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रान्त (अफगानिस्तान), दक्षिण में कर्नाटक, पश्चिम में काठियावाड़ एवं पूर्व में बंगाल की खाड़ी तक था।

प्रश्न 6.
अशोक ने अपने शासन काल में किन दो नगरों की स्थापना की?
उत्तर:
अशोक ने कश्मीर में वितस्ता नदी के किनारे श्रीनगर तथा नेपाल में ललितपत्तन नगर की स्थापना की।

प्रश्न 7.
अशोक ने कलिंग पर विजय कब प्राप्त की?
उत्तर:
अशोक ने लगभग 261 ई. पू. कलिंग पर विजय प्राप्त की।

प्रश्न 8.
मौर्य वंश का अंतिम शासक कौन था?
उत्तर:
मौर्य वंश का अंतिम शासक वृहद्रथ था।

प्रश्न 9.
शुंग वंश की स्थापना कब और किसने की?
उत्तर:
शुंग वंश की स्थापना 184 ई. पू. में पुष्यमित्र शुंग ने की।

प्रश्न 10.
धम्म क्या है?
उत्तर:
विभिन्न वर्गों, जातियों और संस्कृतियों को एक सूत्र में बाँधने तथा अपनी प्रजा के नैतिक उत्थान के लिए अशोक ने जिन आचारों की संहिता प्रस्तुत की उसे अभिलेखों में धम्म कहा गया।

प्रश्न 11.
अशोक ने किस धर्म को राजाश्रय प्रदान किया था?
उत्तर:
अशोक ने बौद्ध धर्म को राजाश्रय प्रदान किया था।

प्रश्न 12.
अर्थशास्त्र किसकी रचना है?
उत्तर:
अर्थशास्त्र कौटिल्य की रचना है।
प्रश्न 13.
उपधा परिक्षण क्या था?
उत्तर:
मौर्य प्रशासन में प्रशासनिक अधिकारियों की नियुक्तियों से पूर्व उनकी योग्यता एवं चरित्र को परखा जाता था जिसे उपधा परिक्षण कहते थे।

प्रश्न 14.
मौर्य साम्राज्य कितने प्रान्तों में विभाजित था? ये प्रान्त कौन से थे?
उत्तर:
मौर्य साम्राज्य चार प्रान्तों में विभाजित था। ये प्रान्त थे-उत्तरापथ, दक्षिणापथ, अवन्तिपथ एवं मध्य प्रान्त।

प्रश्न 15.
गुप्तकाल के दो महान सम्राटों के नाम लिखिए।
उत्तर:
गुप्त काल के दो महान सम्राट – समुद्रगुप्त तथा चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य थे।

प्रश्न 16.
गुप्त वंश की स्थापना किसने और कब की?
उत्तर:
गुप्त वंश की स्थापना श्रीगुप्त ने 240 ई. में की।

प्रश्न 17.
गुप्त संवत् का प्रारम्भ किसने और कब किया?
उत्तर:
गुप्त संवत् का प्रारम्भ चन्द्रगुप्त प्रथम ने 319 ई. में किया।

प्रश्न 18.
समुदगुप्त द्वारा विजित आर्यावर्त के राजाओं में से किन्हीं दो राजाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:
समुद्रगुप्त द्वारा विजित आर्यावर्त के दो राजा – रुद्रवेद तथा मतिल थे।

प्रश्न 19.
समुद्रगुप्त ने दक्षिणापथ के कितने राजाओं को परास्त किया?
उत्तर:
समुद्रगुप्त ने दक्षिणापथ के 12 राजाओं को परास्त किया था।

प्रश्न 20.
चन्द्रगुप्त द्वितीय की कोई दो उपलब्धियाँ लिखिए।
उत्तर:

  1. चन्द्रगुप्त द्वितीय ने गुप्त साम्राज्य को अरब सागर तक बढ़ाया और सौराष्ट्र प्रायद्वीप को विजित किया।
  2. उसने उज्जैन को दूसरी राजधानी बनाया इससे राज्य के समुद्री व्यापार एवं गुजरात प्रान्त के संसाधनों में वृद्धि हुई।

प्रश्न 21.
नालन्दा विश्वविद्यालय का संस्थापक कौन था?
उत्तर:
नालन्दा विश्वविद्यालय का संस्थापक कुमारगुप्त था।

प्रश्न 22.
स्कन्दगुप्त ने किस झील का पुनर्निर्माण कराया था?
उत्तर:
स्कन्दगुप्त ने सुदर्शन झील को पुनर्निर्माण कराया था।

प्रश्न 23.
हूणों का आक्रमण किस गुप्त सम्राट के समय में हुआ?
उत्तर:
हूणों का आक्रमण गुप्त सम्राट स्कन्दगुप्त के समय में हुआ।

प्रश्न 24.
देवगढ़ का दशावतार मन्दिर तथा भितरीगाँव का लक्ष्मण मन्दिर किस काल की स्थापत्य कला के उदाहरण हैं?
उत्तर:
देवगढ़ का दशावतार मन्दिर तथा भितरीगाँव का लक्ष्मण मन्दिर गुप्त काल की स्थापत्य कला के उदाहरण हैं।

प्रश्न 25.
कालिदास के दो ग्रन्थों के नाम लिखिए।
उत्तर:
कालिदास के दो ग्रन्थ – अभिज्ञान शाकुन्तलम् तथा रघुवंश हैं।

प्रश्न 26.
ब्रह्मफुट सिद्धान्त एवं गुरुत्वाकर्षण के सिद्धान्त का प्रतिपादन किसने किया?
उत्तर:
ब्रह्मफुट सिद्धान्त एवं गुरुत्वाकर्षण के सिद्धान्त का प्रतिपादने ब्रह्मगुप्त ने किया।

प्रश्न 27.
गुप्तकाल में वैशेषिक दर्शन व अणु सिद्धान्त का प्रतिपादन किसने किया?
उत्तर:
कणाद ऋषि ने गुप्त काल में वैशेषिक दर्शन एवं अणु सिद्धान्त का प्रतिपादन किया।

प्रश्न 28.
गुप्त सम्राटों में सिक्कों का प्रचलन सर्वप्रथम किस गुप्त सम्राट ने आरम्भ किया?
उत्तर:
चन्द्रगुप्त प्रथम ने।

प्रश्न 29.
गुप्तकाल के प्रमुख व्यापारिक नगरों के नाम लिखिए।
उत्तर:
गुप्तकाल के प्रमुख व्यापारिक नगर – उज्जैन, भड़ौंच, प्रतिष्ठान, विदिशा, प्रयाग, पाटलिपुत्र, वैशाली, ताम्रलिप्ति, मथुरा, अहिच्छत्रे, कौशाम्बी आदि थे।

प्रश्न 30.
गुप्तकाल में भारत के किन देशों के साथ व्यापारिक सम्बन्ध थे?
उत्तर:
गुप्तकाल में भारत के चीन, श्रीलंका, फारस, अरब, इथोपिया, बैजन्टाइन (रोमन) तथा हिन्द महासागर के द्वीप देशों के साथ व्यापारिक सम्बन्ध थे।

प्रश्न 31.
फाह्यान कौन था तथा वह कब भारत आया?
उत्तर:
फाह्यान एक चीनी यात्री था जो 399 ई. में चन्द्रगुप्त द्वितीय के शासन काल में भारत आया था।

प्रश्न 32.
हर्ष सिंहासन पर कब बैठा?
उत्तर:
हर्ष 606 ई. में सिंहासन पर बैठा।

प्रश्न 33.
सम्राट हर्षवर्धन ने कौन – कौन सी उपाधियाँ धारण कीं?
उत्तर:
सम्राट हर्षवर्धन ने परम भट्टारक, महाराजाधिराज, सकलोत्तरायेश्वर एकाधिकार, चक्रवर्ती, सार्वभौम, परमेश्वर आदि उपाधियाँ धारण।

प्रश्न 34.
हर्ष के अधीनस्थ राजाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:
हर्ष के अधीनस्थ शासक थे-वल्लभी का ध्रुवसेन द्वितीय, कामरूप का भास्कर वर्मन, मगध का पूर्व वर्मन, जालन्धर का उदित और उत्तर गुप्त शासक माधव गुप्त।

प्रश्न 35.
हर्ष ने कन्नौज महासभा का आयोजन किस वर्ष किया?
उत्तर:
हर्ष ने कन्नौज महासभा का आयोजन 643 ई. में किया।

प्रश्न 36.
हर्ष द्वारा लिखित दो नाटकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
नागानन्द, रत्नावली।

प्रश्न 37.
बाणभट्ट द्वारा लिखित दो ग्रन्थों के नाम लिखिए।
उत्तर:
कादम्बरी, हर्षचरित।

प्रश्न 38.
हर्घकालीन दो उच्च शिक्षा केन्द्रों के नाम लिखिए।
उत्तर:
नालन्दा विश्वविद्यालय, वल्लभी विश्वविद्यालय।

प्रश्न 39.
हर्षकालीन दो विद्वानों के नाम लिखिए।
उत्तर:
बाणभट्ट, जयसेन।

प्रश्न 40.
ह्वेनसांग कौन था? वह भारत क्यों आया था?
उत्तर:
ह्वेनसांग चीनी बौद्ध यात्री था। वह बौद्ध स्थलों के दर्शन एवं बौद्ध ग्रन्थों का अध्ययन करने के उद्देश्य से भारत आया था।

प्रश्न 41.
हर्ष के काल में कृषि कर कितना होता था?
उत्तर:
हर्ष के काल में कृषि कर उपज का 1/6 भाग होता था।

प्रश्न 42.
अष्टाध्यायी के लेखक कौन हैं?
उत्तर:
अष्टाध्यायी के लेखक पाणिनी हैं।

प्रश्न 43.
चोलों का शासकीय चिह्न क्या था?
उत्तर:
चोलों का शासकीय चिह्न बाघ था।

प्रश्न 44.
चोल साम्राज्य का द्वितीय संस्थापक किसे माना जाता है?
उत्तर:
विजयालय को।

प्रश्न 45.
लौह एवं रक्त की नीति किस चोल शासक ने अपनायी?
उत्तर:
लौह एवं रक्त की नीति चोल शासक राजराज प्रथम ने अपनायी।

प्रश्न 46.
किस चोल शासक ने सिंहल राज्य के शासक महेन्द्र को हराकर कब अपनी सत्ता स्थापित की?
उत्तर:
राजेन्द्र प्रथम ने 1017 ई. में सिंहले राज्य के शासक महेन्द्र को हराकर अपनी सत्ता स्थापित की।

प्रश्न 47.
चोल वंश का अंतिम शासक कौन था?
उत्तर:
चोल वंश का अंतिम शासक राजेन्द्र तृतीय था।

प्रश्न 48.
चोल प्रशासन में सेना के कितने अंग थे?
उत्तर:
चोल प्रशासन में सेना के तीन अंग थे-पदाति, अश्वारोही, गजारोही। इसके अतिरिक्त उनके पास शक्तिशाली नौ सेना भी होती थी।

प्रश्न 49.
प्रमुख चोल बन्दरगाह कौन से थे?
उत्तर:
प्रमुख चोल बन्दरगाह महाबलिपुरम् तथा कावेरी पट्टनम थे।

प्रश्न 50.
चोल काल में भूमि कर कितना था?
उत्तर:
चोल काल में भूमि कर उपज का एक तिहाई हिस्सा हुआ करता था।

प्रश्न 51.
चोल प्रशासन में प्रान्तों को क्या कहा जाता था?
उत्तर:
चोल प्रशासन में प्रान्तों को मण्डलम् कहा जाता था।

प्रश्न 52.
गंगैकोण्डचोलपुरम् मंदिर का निर्माण किस चोल शासक ने कराया?
उत्तर:
राजेन्द्र प्रथम ने।

प्रश्न 53.
अंकोरवाट का मन्दिर किस काल की स्थापत्य कला के प्रभाव का उदाहरण है?
उत्तर:
अंकोरवाट का मंदिर चोल काल की स्थापत्य कला के प्रभाव का उदाहरण है।

प्रश्न 54.
चोल वंश की मुख्य उपलब्धियाँ क्या हैं?
उत्तर:
चोल वंश की मुख्य उपलब्धियाँ उसका स्थानीय स्वशासन, नौसेना, तमिल ग्रन्थ, विशालकाय मन्दिर और मूर्तियाँ हैं।

प्रश्न 55.
राजतरंगिणी के लेखक कौन हैं?
उत्तर:
राजतरंगिणी के लेखक कल्हण हैं।

प्रश्न 56.
राजतरंगिणी को शाब्दिक अर्थ क्या है?
उत्तर:
राजतरंगिणी का शाब्दिक अर्थ है-राजाओं की नदी जिसका भावार्थ है-राजाओं का इतिहास या समय प्रवाह।

प्रश्न 57.
विजयनगर साम्राज्य किस नदी के किनारे पर स्थित था?
उत्तर:
विजयनगर साम्राज्य तुंगभद्रा नदी के किनारे पर स्थित था।

प्रश्न 58.
विजयनगर साम्राज्य की स्थापना कब और किसने की?
उत्तर:
विजयनगर साम्राज्य की स्थापना 1336 ई. में हरिहर तथा बुक्का नामक दो भाइयों ने की।

प्रश्न 59.
संगम वंश का अंतिम शासक कौन था?
उत्तर:
संगम वंश का अंतिम शासक विरुपाक्ष द्वितीय था।

प्रश्न 60.
कृष्णदेव राय का सम्बन्ध किस वंश से है?
उत्तर:
कृष्णदेव राय का सम्बन्ध तुलुव वंश से है।

RBSE Class 12 History Chapter 2 लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मौर्य साम्राज्य के इतिहास के प्रमुख स्रोतों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मौर्य साम्राज्य के इतिहास की जानकारी हमें विभिन्न स्रोतों के माध्यम से मिलती है। इनमें कौटिल्य का अर्थशास्त्र, विशाखदत्त का मुद्राराक्षस, सोमदेव का कथा सरितसागर, क्षेमेन्द्र की वृहत्कथामंजरी, दीपवंश, महावंश टीका, भद्रबाहु के कल्पसूत्र, स्ट्रेबो, प्लूटार्क, जस्टिन आदि यूनानी यात्रियों तथा फाह्यान, ह्वेनसांग, इत्सिंग आदि चीनी यात्रियों के विवरण रुद्रदामन का जूनागढ़ अभिलेख एवं अशोक के अभिलेख प्रमुख स्रोत हैं।

प्रश्न 2.
मौर्य साम्राज्य की स्थापना किसने की? भारत में मौर्य साम्राज्य की स्थापना का महत्व लिखिए।
उत्तर:
मौर्य सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य ने 322 ई. पू. में मगध के शासक घनानंद को हराकर मगध को अपने अधिकार में कर लिया। मगध प्रदेश भारत में मौर्य साम्राज्य की स्थापना का आधार बना। मौर्य साम्राज्य की स्थापना के साथ ही भारत में छोटे – छोटे राज्य समाप्त हो गए और उनके स्थान पर एक विशाल साम्राज्य की स्थापना हुई।

मौर्य साम्राज्य की स्थापना के पूर्व छोटे – छोटे राज्यों का कोई क्रमबद्ध इतिहास नहीं था। मौर्य साम्राज्य की स्थापना के उपरान्त भारतीय इतिहास का एक क्रमबद्ध आधार बना। मौर्य साम्राज्य में विदेश व्यापार ने खूब उन्नति की। भारत का विदेशों से व्यापक सम्पर्क स्थापित हुआ। इसके साथ – साथ भारत से विदेशी सत्ता का अंत हुआ।

प्रश्न 3.
चन्द्रगुप्त ने किस प्रकार मौर्य वंश की स्थापना की? इसकी सीमाएँ कहाँ तक थीं?
उत्तर:
चन्द्रगुप्त मौर्य ने पश्चिम भारत को सिकन्दर के उत्तराधिकारियों से मुक्त कराकर, अपने मुख्यमंत्री चाणक्य की सहायता से नंद वंश के अन्तिम शासक घनानंद को हराकर 322 ई. पू. में मौर्य साम्राज्य की स्थापना की। इसकी सीमाएँ उत्तर पश्चिम में ईरान की सीमा से लेकर दक्षिण में वर्तमान उत्तरी कर्नाटक एवं पूर्व में मगध से लेकर पश्चिम में सौराष्ट्र तक फैली हुई।

प्रश्न 4.
चन्द्रगुप्त और सेल्यूकस के मध्य हुए युद्ध के पश्चात् संधि की क्या शर्ते रखी गईं?
उत्तर:
सिकन्दर के सेनापति सेल्यूकस की सिकन्दर के समान बनने की महत्वाकांक्षा थी। अत: उसने 305 ई. पू. सिन्धु नदी को पार कर चन्द्रगुप्त मौर्य के साथ युद्ध किया जिसमें वह पराजित हुआ। दोनों के मध्य एक संधि सम्पन्न हुई जिसकी प्रमुख शर्ते निम्न प्रकार-

  1. दोनों पक्षों के मध्य वैवाहिक सम्बन्ध हुआ। सेल्यूकस ने चन्द्रगुप्त के साथ अपनी पुत्री का विवाह किया।
  2. सेल्यूकस ने दहेज के रूप में अपने चार प्रांत ऐरिया, अराकोसिया, जेड़ोसिया एवं पेरीपेमिसडाई के क्षेत्र चन्द्रगुप्त को दिये।
  3. चन्द्रगुप्त ने सेल्यूकस को 500 हाथी उपहारस्वरूप दिये।
  4. इसके अतिरिक्त सेल्यूकस ने अपने एक राजदूत मेगस्थनीज को चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में भेजा। उसने इण्डिका नामक पुस्तक लिखी जिसमें तत्कालीन भारत की राजनीतिक, सामाजिक तथा धार्मिक व्यवस्था का वर्णन किया गया है।

प्रश्न 5.
चन्द्रगुप्त मौर्य का संक्षिप्त जीवन परिचय दीजिए।
उत्तर:
चन्द्रगुप्त मौर्य एक कुशल योद्धा सेनानायक तथा महान विजेता ही नहीं वरन् एक योग्य शासक भी था। उसने अपने मुख्यमंत्री कौटिल्य की सहायता से ऐसी शासन व्यवस्था का निर्माण किया जो उस समय के अनुकूल थी। उसने सिकन्दर के सेनापतियों से उत्तरी-पश्चिमी भारत को मुक्त कर, नंदवंश का उन्मूलन कर सेल्यूकस को पराजित कर संधि के लिए विवश किया। उसने 322 ई. पू. में विशाल मौर्य साम्राज्य की स्थापना की जिसकी सीमाएँ उत्तर-पश्चिम में ईरान की सीमा से लेकर दक्षिण में वर्तमान उत्तरी कर्नाटक एवं पूर्व में मगध से लेकर पश्चिम में सौराष्ट्र तक फैली थीं। अपने जीवन के अन्तिम चरण में चन्द्रगुप्त मौर्य ने जैन मुनि भद्रबाहु से जैन धर्म की दीक्षा लेकर श्रवणबेलगोला में स्थित चन्द्रगिरी पहाड़ी पर लगभग 298 ई. पू. में उपवास के द्वारा शरीर त्याग दिया।

प्रश्न 6.
बिन्दुसार के बारे में आप क्या जानते हैं? संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
बिन्दुसार – चन्द्रगुप्त मौर्य का पुत्र बिन्दुसार 298 ई. पू. में साम्राज्य का उत्तराधिकारी बना, इसे यूनानी लेखक ‘अभित्रोचेडूस’ कहते थे। स्टूबों ने बिन्दुसार को अलिट्रोकेड्स कहा है। फ्लीट ने बिन्दुसार को अमित्रद्यात अर्थात् शत्रुओं का वध करने वाला बताया। बिन्दुसार ने अपने पिता द्वारा जीते गए क्षेत्रों को पूर्ण रूप से अक्षुण्ण बनाये रखा। ‘दिव्यावदान’ में बिन्दुसार के समय में तक्षशिला में हुए दो विद्रोहों का वर्णन है। इन विद्रोहों को दबाने के लिए बिन्दुसार ने पहले अपने पुत्र अशोक, फिर सुसीम को भेजा। स्ट्रेबो के अनुसार यूनानी शासक ऐण्टियोकस प्रथम ने बिन्दुसार के दरबार में डाइमेकस नाम के राजदूत को भेजा। बिन्दुसार ने ऐण्टियोकस प्रथम से मदिरा, सूखे अंजीर एवं एक दार्शनिक भेजने की प्रार्थना की थी। ब्रिन्दुसार के समय में ही मिस्र के राजा फिलाडेल्फस (टालमी द्वितीय) ने पाटलिपुत्र में ‘डायोनिसस’ नाम के एक राजदूत को भेजा था।

प्रश्न 7.
अशोक का राज्याभिषेक कब हुआ? अभिलेखों में इसे किन अन्य नामों से सम्बोधित किया गया है?
उत्तर:
अपने पिता बिन्दुसार की मृत्यु के पश्चात् अशोक विशाल मौर्य साम्राज्य की गद्दी पर बैठा। करीब चार वर्ष के सत्ता संघर्ष के पश्चात् अशोक का विधिवत राज्याभिषेक 269 ई. पू. में हुआ वैसे तो अशोक 273 ई. पू. में ही मगध के सिंहासन पर बैठ चुका था। अशोक के अभिलेखों में अशोक को देवानामप्रिय, पियदस्सी, देवनाप्रियदर्शी एवं राजा के सम्बोधन से सम्बोधित किया गया है। मास्की तथा गुर्जरा लेख में इसका नाम ‘अशोक’ ही मिलता है।

प्रश्न 8.
अशोक ने कलिंग पर कब और क्यों आक्रमण किया?
उत्तर:
अशोक ने अपने अभिषेक के आठवें वर्ष लगभग 261 ई. पू. में कलिंग पर आक्रमण किया। हाथीगुम्फा अभिलेख से पता चलता है कि सम्भवतः कलिंग पर नंदराज नामक राजा शासन करता था। उस समय कलिंग की राजधानी तोशली थी। अशोक सम्पूर्ण भारत को एक सूत्र में बाँधना चाहता था। कलिंग हाथियों के लिए प्रसिद्ध होने के साथ-साथ व्यापार एवं व्यवसाय की दृष्टि से महत्वपूर्ण था। समुद्र के किनारे होने के कारण विदेशी व्यापार की दृष्टि से इसका अत्यन्त महत्व था। अतः कलिंग को जीतने के उद्देश्य से अशोक ने कलिंग पर आक्रमण किया।

प्रश्न 9.
अशोक की कलिंग विजय को क्या परिणाम रहा?
उत्तर:
कलिंग युद्ध में एक लाख लोग मारे गये व 1:5 लाख लोग बंदी बना लिए गए तथा कई हजार घायल हुए। कलिंग प्रदेश को जीतने के लिए ही इतनी हत्याएँ हुईं और जनसंख्या की इतनी अधिक क्षति हुई। यह सोचकर सम्राट को अपने किये पर बड़ा पश्चाताप हुआ। इस नरसंहार के दृश्य ने अशोक के हृदय पर जो चिरस्थायी प्रभाव डाला उससे उसकी पैतृक सामरिक प्रवृत्ति का अन्त हो गया एवं उसके स्थान पर वह धर्म एवं नैतिकता के प्रसार में लग गया। वह उस नरसंहार के पश्चाताप के वशीभूत होकर करुणा एवं दया के वशीभूत हो गया अशोक आजीवन शक्ति एवं नैतिकता की दिशा में सक्रिय रूप से कार्यरत रहा और अपनी सफलता के कारण उसने भारत के इतिहास में अपना अद्वितीय स्थान बना लिया।

प्रश्न 10.
अशोक की धम्म नीति के क्या सिद्धान्त थे? इसके क्रियान्वयन के लिए अशोक ने कौन – कौन से कार्य किये?
उत्तर:
विभिन्न वर्गों, जातियों और संस्कृतियों को एक सूत्र में बाँधने के लिए अशोक ने जिन आचारों की संहिता प्रस्तुत की उसे धम्म कहा गया। इसके प्रमुख सिद्धान्त सहिष्णुता, अहिंसा, आडम्बरहीनता, लोककल्याण तथा श्रेष्ठ पवित्र नैतिकता हैं। धम्म की नीति के क्रियान्वयन के लिए अशोक ने निम्नलिखित कार्य किये

  1. अशोक ने युद्ध की नीति का परित्याग किया।
  2. नौकरशाहों को तत्काल न्याय देने तथा लोकहित के कार्य करने के लिए तैनात किया।
  3. अशोक ने सार्वजनिक हित के कार्य किए जैसे- परिवहन, सिंचाई, कुँओं, सरायों आदि का निर्माण कराया। इन कार्यों का उद्देश्य धम्म को स्वीकार कराना था।
  4. अशोक ने धम्म के उपदेशों को पत्थरों, शिलालेखों पर उत्कीर्ण कराया तथा ऐसी जगहों पर लगाया ताकि आम जनता उनको पढ़ सके।
  5. अशोक ने हिंसा पर प्रतिबन्ध लगाया तथा पशुबलि को प्रतिबन्धित किया।
  6. उसने समान नागरिक आचार संहिता, दण्ड संहिता के सिद्धान्त को जन्म दिया तथा क्रियान्वित किया।
  7. उसने जगह – जगह धम्म आयोग भेजे एवं विदेशों में भी धम्म का प्रचार – प्रसार किया।
  8. अशोक ने धम्म महामात्रों की नियुक्ति की एवं उनके दायित्वों को सुनिश्चित किया।

प्रश्न 11.
अशोक का धम्म फलीभूत क्यों न हो सका?
उत्तर:
यद्यपि धम्म के मूल सिद्धान्त सहिष्णुता, अहिंसा एवं सदाचार थे जो कि भारतीय संस्कृति के प्रारम्भ से ही मूल तत्व रहे हैं तथापि धम्म पूर्ण रूप से फलीभूत नहीं हो सका। अशोक के बाद के सभी शासकों ने इन सिद्धान्तों को स्वीकार किया परन्तु उसके उत्तराधिकारी धम्म को उसी रूप में क्रियान्वित नहीं कर सके। धम्म दुर्बल शासकों, राजनीतिक अनिश्चितता व सीमाओं की असुरक्षा के कारण फलीभूत नहीं हो सका, क्योंकि धम्म की नीति का क्रियान्वयन शांतिकाल में ही संभव था जबकि राष्ट्र आन्तरिक एवं बाहरी रूप से युद्धों से पूर्णतया मुक्त हो। परवर्ती शासक अशोक की दूरदर्शिता को नहीं समझ पाये। धम्म महामात्र अपने असीमित अधिकारों द्वारा जनता के कार्यों में अवांछनीय हस्तक्षेप करने लगे। इन कारणों से धम्म का प्रचार-प्रसार बाधित हुआ।

प्रश्न 12.
अशोक से सम्बद्ध अभिलेख पर संक्षिप्त टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
अभिलेखों से इतिहास के अध्ययन में बहुत सहायता प्राप्त होती है। अभिलेखों से हमें तत्कालीन शासक की महानता तथा व्यक्तित्व का बहुआयामी विवरण प्राप्त होता है। एक अभिलेख जो सम्राट अशोक के बारे में हैं, उसमें सम्राट की दो उपाधियों का उल्लेख मिलता है। जैसे- देवानांप्रिय (देवताओं को प्रिय) और पियदस्सी (प्रियदर्शी) अर्थात् देखने में सुन्दर। अभिलेखों द्वारा हम किसी सम्राट के शासनकाल की घटनाओं का उचित कालक्रम निर्धारित कर सकते हैं। इसके पश्चात् सम्राट अशोक ने साम्राज्यवादी नीति का परित्याग कर बौद्ध धर्म को अपनाया तथा बौद्ध धर्म के धम्मपद के सिद्धान्तों के प्रचार प्रसार हेतु बहुत से अभिलेख खुदवाए।

प्रश्न 13.
वर्तमान संदर्भ में अशोक के धम्म की प्रासंगिकता को सिंद्ध कीजिए।
उत्तर:
सम्राट अशोक ने सभी धर्मों का सरल स्वरूप स्थापित किया जो धम्म कहलाया। अशोक ने अपने अधिकारियों व प्रजा को धम्म का संदेश दिया जिसकी वर्तमान संदर्भ में भी प्रासंगिकता है। अशोक के धम्म का स्वरूप मानवतावादी था। अशोक का धम्म नैतिक नियमों के पालन पर जोर देता है। अशोक के धम्म में बड़ों का आदर, सेवक तथा दासों के प्रति उदार व्यवहार तथा दूसरे सम्प्रदायों के प्रति आदर की भावना सम्मिलित है।

वर्तमान युग में हम देखते हैं कि नई युवा पीढ़ी बड़ों (माता – पिता) को बोझ समझती है। उन्हें उपेक्षित एवं अकेला छोड़ देते हैं। धनी तथा शक्तिशाली लोग गरीब एवं उपेक्षित लोगों के अधिकारों को दबाकर उनका शोषण करते हैं। व्यक्ति अपने धर्म को अच्छा बताकर दूसरे धर्मों की बुराई करता है। अशोक के धम्म में जिन आदर्शों का उल्लेख किया गया है, व्यक्ति उन्हें अपने जीवन में उतार कर एक आदर्श एवं सुखी जीवन जी सकता है। अशोक का धम्म एवं उसकी नीतियाँ सार्वजनिक, सार्वभौमिक तथा सार्वयुगीन हैं जो सम्पूर्ण विश्व की धरोहर हैं।

प्रश्न 14.
मौर्यकाल में गुप्तचर व्यवस्था व न्याय व्यवस्था कैसी थी?
उत्तर:
मौर्य प्रशासन में गुप्तचर्या का विस्तृत जाल बिछाया गया था जो मंत्रियों से लेकर आम जनर की गतिविधियों पर नजर रखते थे। गुप्तचरों को संस्था एवं संचार नाम से सम्बोधित किया जाता था। मौर्य प्रशासन में न्याय करने का अधिकार राजा के पास था। न्यायपीठ पद्धति विद्यमान थी। राजुक, व्यावहारिक आदि न्यायिक अधिकारी थे। दीवानी मामले धर्मस्थीय न्यायालय व फौजदारी मामले कंटक शोधक न्यायालय सुलझाते थे। संग्रहण व द्रोणमुख स्थानीय एवं जनपद स्तर के न्यायालय होते थे। दण्ड व्यवस्था अत्यन्त कठोर थी।

प्रश्न 15.
प्रयाग प्रशस्ति के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
प्रयाग प्रशस्ति को इलाहाबाद स्तम्भ अभिलेख के नाम से भी जाना जाता है। इसके रचयिता समुद्रगुप्त के दरबारी कवि हरिषेण थे। संस्कृत में लिखित प्रयाग प्रशस्ति में समुद्रगुप्त के जीवन एवं व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला गया है। इस प्रशक्ति से हमें समुद्रगुप्त के जीवन, विजय, व्यक्तिगत गुणों एवं तत्कालीन राजनीतिक दशा आदि की जानकारी मिलती हैं।

प्रश्न 16.
ऐरण अभिलेख में समुद्रगुप्त के किन गुणों का वर्णन किया गया है?
उत्तर:
ऐरण अभिलेख में समुद्रगुप्त के पराक्रम तथा विजय का वर्णन किया गया है। इस अभिलेख से समुद्रगुप्त के विद्वान, संगीतज्ञ, गायक, दानी, धर्मनिष्ठ, पराक्रमी, विनयशील तथा विजयाकांक्षी आदि वैयक्तिक गुणों का पता चलता है।

प्रश्न 17.
चन्द्रगुप्त द्वितीय की उपलब्धियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
चन्द्रगुप्त द्वितीय गुप्त सम्राटों में सर्वाधिक शौर्य एवं वीरोचित गुणों से सम्पन्न शासक था। उसने 375 ई० – 414 ई० तक गुप्त साम्राज्य पर शासन किया। उसके जीवन की उपलब्धियाँ निम्नलिखित थीं

  1. चन्द्रगुप्त द्वितीय ने वैवाहिक सम्बन्धों द्वारा अपनी स्थिति सुदृढ़ की उसने नागवंश की कुबेर नागा तथा कदम्ब वंश की राजकुमारी से विवाह किया तथा वाकाटक नरेश रुद्रसेन द्वितीय से अपनी पुत्री प्रभावती का विवाह किया। इनसे उसे प्रभावशाली शासकों की मित्रता एवं संरक्षण प्राप्त हो गया।
  2. उसने शकों को पराजित करके उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में नर्मदा नदी तक और पश्चिम में काठियावाड़ से लेकर पूर्व में बंगाल तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया।
  3. उज्जैन को उसने अपनी दूसरी राजधानी बनाया जिससे राज्य के समुद्री व्यापार एवं गुजरात प्रांत के संसाधनों में वृद्धि
  4. उसने कई विद्वानों को संरक्षण दिया जिनमें कालिदास एवं अमर सिंह प्रमुख थे।
  5. शंकों को पराजित करने की स्मृति में चन्द्रगुप्त द्वितीय ने चाँदी के विशेष सिक्के जारी किये।
  6. चन्द्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल में चीनी यात्री फाह्यान भारत आया।

प्रश्न 18.
“स्कन्दगुप्त महान गुप्त सम्राटों में से एक था।” इस कथन की पुष्टि कीजिए।
उत्तर:
स्कन्दगुप्त ने 455 ई० से 467 ई० तक शासन किया। सिंहासन पर बैठते ही उसे हूणों के आक्रमण का सामना करना पड़ा। स्कन्दगुप्त ने बाह्य शत्रुओं, हूणों आदि को परास्त कर गुप्त साम्राज्य को संकट से बचाया तथा बंगाल की खाड़ी से लेकर अरब सागर तक विस्तृत अपने साम्राज्य को अक्षुण बनाए रखा। स्कन्दगुप्त की सफलताओं का आधार उसकी प्रशासनिक व्यवस्था थी। उसने साम्राज्य को प्रांतों में विभक्त किया एवं योग्य प्रांतपतियों की नियुक्ति की जो पूर्ण रूप से प्रजाहित को महत्व देते थे। वह प्रजापालक उदार तथा धर्म सहिष्णु शासक था। उसके साम्राज्य में सभी सम्प्रदायों को धार्मिक स्वतंत्रता प्राप्त थी। उसका बुद्धिमत्तापूर्ण शासन, उसके शौर्यपूर्ण युद्ध, उसकी स्वदेश भक्ति ने इस शासक को महान गुप्त सम्राटों में से एक बना दिया।

प्रश्न 19.
गुप्तकाल में कौन-कौन से उद्योग विकसित हुए?
उत्तर:
गुप्तकाल में धातु शिल्प, वस्त्र निर्माण, आभूषण कला, काष्ठ शिल्प, पाषाण शिल्प तथा हाथी दाँत का काम आदि उद्योगों में विशेष प्रगति हुई। आभूषण हाथी दाँत, धातु कर्म, बर्तन आदि से सम्बन्धित उद्योग विकसित हुए। धातु शिल्प के क्षेत्र में हुई अद्भुत प्रगति का एक भव्य उदाहरण महरौली का लौह स्तम्भ है जो इतनी शताब्दियों बाद भी बिना जंग लगे खड़ा है। गुप्तकालीन ताम्रशिल्प का एक श्रेष्ठ उदाहरण ताँबे की विशालकाय बुद्ध की मूर्ति है जो सुल्तानगंज (भागलपुर बिहार) से प्राप्त हुई थी। गुप्तकाल की सहस्रों स्वर्ण मुद्रायें प्राप्त हुई हैं जो विशुद्ध भी हैं तथा कलात्मक भी।

चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय सोने के अतिरिक्त चाँदी एवं ताँबे का भी मुद्राओं के निर्माण लिए प्रयोग किया गया। वस्त्र निर्माण भी गुप्तकाल का एक प्रमुख उद्योग था। भारत के व्यापार में वस्त्रों का प्रमुख स्थान था तथा विदेशी बाजारों में भी भारतीय वस्त्रों की बहुत माँग थी। गुप्तकाल में आभूषण बना का शिल्प भी उन्नत अवस्था में था। आभूषण बनाने के लिए स्वर्ण एवं रजत के अलावा विभिन्न प्रकार के रत्नों का भी बहुलता से प्रयोग किया जाता था। इसके अतिरिक्त गुप्तकाल में काष्ठ शिल्प एवं हाथी दाँत का काम भी विकसित अवस्था में था। इलाहाबाद के निकट भीत नामक स्थल पर गुप्तकालीन हाथी दाँत की दो मुहरें भी प्राप्त हुई हैं।

प्रश्न 20.
गुप्तकालीन राजस्व के स्रोतों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
गुप्तकाल में राज्य की आय का प्रमुख स्रोत भू राजस्व था। गुप्तकाल में निम्न प्रकार के करों का उल्लेख मिलता है।

  1. भाग – राजा का भूमि के उत्पादन से प्राप्त होने वाला 1/6 भाग।
  2. भोग – राजा को प्रत्येक दिन फल – फूल सब्जियों के रूप में दिया जाने वाला कर।
  3. उपरिकर एवं उद्रंग – ये एक प्रकार के भूमि कर थे।

गुप्तकाल में भूमिकर की अदायगी नकद एवं अन्न दोनों रूपों में की जा सकती थी। इस समय भूमि, रत्न, खाने एवं नमक आदि राजस्व के अन्य महत्वपूर्ण स्रोत थे। भूराजस्व कुल उत्पादन का 1/4 से 1/6 भाग तक होता था।

प्रश्न 21.
फाह्यान ने अपने विवरण में भारतीय समाज के बारे में क्या लिखा है?
उत्तर:
चीनी यात्री फाह्यान गुप्त सम्राट चन्द्रगुप्त द्वितीय के काल में भारत आया। उसने 399 ई० से 414 ई० तक भारत का भ्रमण किया। उसने भारत की आर्थिक, धार्मिक, राजनीतिक व सामाजिक स्थिति का वर्णन किया है। भारतीय समाज के बारे में उसने लिखा है कि तत्कालीन समाज में शाकाहार का प्रचलन था। सामान्यतः जनता लहसुन एवं प्याज का सेवन नहीं करती थी।

अस्पृश्यता विद्यमान थी परन्तु आम जनता का जीवन सादा व अहिंसक था। समाज में धार्मिक समानता थी। सीमावर्ती राज्यों में बौद्ध धर्म विकसित था। ब्राह्मण धर्म भी उन्नत अवस्था में था। प्रजा दान, धर्मपाप, पुण्य, लोक, परलोक व पुनर्जन्म में विश्वास करती थी। प्रजा सुखी थी। करों का बोझ अधिक नहीं था। दण्ड व्यवस्था कठोर नहीं थी अपराध नगण्य थे।

प्रश्न 22.
हर्ष ने किस प्रकार अपने साम्राज्य का विस्तार किया?
उत्तर:
हर्ष 606 ई० में थानेश्वर के सिंहासन पर बैठा। उसने लगभग समस्त उत्तरी भारत पर विजय प्राप्त कर अपने साम्राज्य का विस्तार किया। हर्ष ने कामरूप के शासक भास्कर वर्मा से गठजोड़ कर बंगाल व पूर्वी भारत को विजित किया। हर्ष ने 630 ई० से 633 ई० के बीच वल्लभी नरेश ध्रुवसेन द्वितीय बालादित्य को पराजित किया तथा बाद में वल्लभी से वैवाहिक सम्बन्ध भी स्थापित किया। हर्ष व चालुक्य शासक पुलकेशिन द्वितीय के मध्य 630 से 634 ई० के बीच युद्ध हुआ जिसमें हर्ष की हार हुई।

इसका विवरण ऐहोल प्रशस्ति में मिलता है। 640 ई० के लगभग हर्ष ने ओडू, कांगोद एवं कलिंग पर विजय प्राप्त की। 41 वर्ष के अपने शासन के दौरान हर्ष ने अपने राज्य में दूर – दराज के क्षेत्रों यथा जालंधर, कश्मीर, नेपाल, वल्लभी, मालवा, सिंध, सीमान्त प्रदेश व असम को सम्मिलित किया। संयुक्त प्रदेश, बिहार, बंगाल, उड़ीसा, मध्य भारत तथा राजपूताना हर्ष के प्रशासन के अधीन थे। इस प्रकार हर्ष उत्तरी भारत के बहुत बड़े भाग के स्वामी के रूप में राज्य किया।

प्रश्न 23.
हर्ष ने अपने अधीनस्थ शासकों के प्रति क्या नीति अपनाई?
उत्तर:
हर्ष के अधीनस्थ शासक भूपाल, कुमार, लोकपाल, नृपति, सामंत, महासामंत एवं महाराजा की उपाधि धारण करते थे। वे हर्ष को कर देते थे, सैन्य सहायता करते थे एवं राज दरबार में उपस्थित होते थे। हर्ष इन्हें न केवल सुरक्षा देता था बल्कि प्रशासनिक छूट भी देता था। अधीनस्थ शासकों में ध्रुवसेन द्वितीय, भास्करवर्मन, पूर्ववर्मन, उदित, माधवगुप्त आदि प्रमुख थे।

प्रश्न 24.
ह्वेनसांग के विवरण के परिप्रेक्ष्य में हर्षकालीन आर्थिक व्यवस्था पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
ह्वेनसांग चीनी बौद्ध यात्री था जो हर्ष के समय भारत आया था। ह्वेनसांग ने अपने विवरण में तत्कालीन आर्थिक जीवन के बारे में लिखा है कि भूमि उपजाऊ थी तथा लोग समृद्धशाली थे। सोने-चाँदी के सिक्कों एवं कौड़ियों का मुद्रा के रूप में प्रचलन थी। वस्त्र उद्योग का व्यवसाय उन्नत था। समाज में श्रेणी व्यवस्था प्रचलित थी। ताम्रलिप्ति, भड़ौच, पाटलिपुत्र आदि शहर व्यापारिक केन्द्र थे। चीन, मध्य एशिया तथा पश्चिम से भारत के व्यापारिक सम्बन्ध थे। कपड़ा, मसाले निर्यात की एवं घोड़े, सोना-चाँदी आयात की प्रमुख वस्तुएँ थीं। कृषि कर उपज का 1/6 भाग होता था।

प्रश्न 25.
प्रारम्भिक चोल शासकों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण शासक कौन था? उसकी उपलब्धियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
करिकाल प्रारम्भिक चोल शासकों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण शासक था। इस शासक ने साम्राज्य विस्तारवादी नीति अपनायी तथा अनेक सफलताएँ अर्जित कीं। उसकी उपलब्धियाँ निम्नलिखित थीं

  1. अपने शासन के प्रारम्भिक वर्षों में करिकाल ने ‘वण्णि’ नामक स्थान पर वेल्लरि तथा अन्य ग्यारह शासकों की संयुक्त सेना को पराजित कर प्रसिद्धि प्राप्त की।
  2. उसने वहैप्परन्दलई के 9 छोटे-छोटे शासकों की संयुक्त सेना को पराजित किया।
  3. करिकाल ने कावेरी नदी के मुहाने पर ‘पुहार’ पत्तम (कावेरी पट्टनम) की स्थापना की।
  4. करिकाल ने उरैयुर को अपनी राजधानी बनाया तथा शक्तिशाली नौसेना का निर्माण किया।

प्रश्न 26.
राजेन्द्र प्रथम ने कौन – सी उपाधि धारण की और क्यों?
उत्तर:
राजेन्द्र प्रथम लगभग 1014 ई० में चोल सिंहासन पर बैठा। उसने अपने सैनिक अभियानों से उत्तरी भारत में बंगाल के गांगेय क्षेत्र तक विजय अभियान किए। पूर्वी भारत में राजेन्द्र प्रथम ने बंगाल के पाले शासक महीपाल को पराजित किया। गंगा घाटी के अभियान की सफलता पर राजेन्द्र प्रथम ने गंगैकोण्डचोल की उपाधि धारण की तथा इस विजय की स्मृति में कावेरी तट के निकट गंगैकोण्डचोलपुरम् नामक नई राजधानी का निर्माण करवाया।

प्रश्न 27.
चोलों के सैन्य संगठन के बारे में लिखिए।
उत्तर:
चोल नरेशों ने साम्राज्य की सुरक्षा एवं विजयों की दृष्टि से विशाल सेना का गठन किया जिसके प्रमुख तीन अंग थे-पदाति, अश्वारोही तथा गजारोही। चोलों की स्थायी सेना में पैदल, गजारोही, अश्वारोही आदि सैनिक शामिल होते थे। गजारोही दल को कुंजिर – मल्लर, अश्वारोही दल को कुदिरैच्चैवगर, बिल्लिगढ़ धनुर्धारी दल को, भाले से प्रहार करने में निपुण सैनिकों को सैगुन्दर एवं राजा के अंगरक्षकों को वेलैक्कोर कहते थे।

चोल सेना जिन छावनियों में रहती थी उन्हें कड़गम कहते थे। सेना का नेतृत्व करने वाले नायक तथा सेनाध्यक्ष को महादण्डनायक कहा जाता था। इनके अतिरिक्त चोलों के पास एक शक्तिशाली नौसेना भी थी। वे अपने जहाजों को व्यापारिक एवं सैनिक दोनों कार्यों के लिए प्रयुक्त करते थे। महाबलिपुरम् तथा कावेरी पट्टनम् मुख्य चोल बन्दरगाह थे। विशाल नौसेना द्वारा चोल शासकों ने श्रीलंका, मालद्वीव व लक्षद्वीप को विजित कर अपने साम्राज्य का विस्तार किया।

प्रश्न 28.
चोल प्रशासन की न्याय व्यवस्था का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
चोल प्रशासन में राजा सर्वोच्च न्यायाधीश होता था। राजा धर्मासनभट्ट जो स्मृतिशास्त्र ज्ञाता ब्राह्मण विद्वान होता था, की सहायता से न्याय करता था। न्याय के लिए नियमित न्यायालयों का गठन किया गया था। ग्रामों में ग्राम न्यायालय तथा जातीय पंचायत का विधान था। छोटे विवादों का निपटारा स्थानीय निगम के अन्तर्गत किया जाता था। चोलों की दण्ड व्यवस्था में आर्थिक दण्ड एवं सामाजिक अपमान के दण्ड का विधान था। आर्थिक दण्ड काशु (सोने का सिक्का) के रूप में लिया जाता था।

प्रश्न 29.
चोल राज्य की आय के प्रमुख स्रोत क्या थे? इस काल में लिये जाने वाले अन्य करों के नाम लिखिए।
उत्तर:
चोल राज्य की आय का मुख्य स्रोत भू-राजस्व था। इसके लिए भू-राजस्व निर्धारित करने से पूर्व भूमि का सर्वेक्षण, वर्गीकरण एवं नाप-जोख कराया जाता था। भूमिकर भूमि की उर्वरा एवं वार्षिक फसल चक्र देखने के बाद निर्धारित किया जाता था जो उपज का एक तिहाई हिस्सा हुआ करता था। भूमि कर के अतिरिक्त अन्य कर भी लिए जाते थे। जैसे- आयम (राजस्व कर), मनैइरै (गृह कर), कढ़ेइरै (व्यापारिक प्रतिष्ठानों पर लगने वाला कर), मगन्मै (व्यवसाय कर), आजीवकाशु (आजीविका पर लगने वाला कर)। व्यापार, वाणिज्य, आयात-निर्यात एवं सिंचाई कर आदि आय के अन्य साधन थे। यह राजस्व प्रशासनिक एवं जनहितोपयोगी कार्यों आदि पर व्यय होता था।

प्रश्न 30.
“चोल कला प्रेमी एवं महान निर्माता थे।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
चोल शासकों ने अपने शासन काल में स्थापत्य कला को चरमोत्कर्ष पर पहुँचाया। उन्होंने विशाल राज प्रासाद, कृत्रिम झीलें, विस्तीर्ण बाँध, सुन्दर नगर, धातु एवं पाषाण की मूर्तियों तथा भव्य मन्दिरों का निर्माण करवाया। इस काल में मंदिरों का निर्माण द्रविड़ शैली के अन्तर्गत हुआ। उनके द्वारा निर्मित मन्दिरों की मुख्य विशेषताएँ विशाल व वर्गाकार विमान, मध्य में विस्तृत आँगन, अलंकृत गोपुरम्, मण्डप, अन्तराल, सजावट के लिए पारम्परिक सिंह ब्रेकेट तथा संयुक्त स्तम्भों का प्रयोग आदि हैं। चोलकालीन प्रारम्भिक मन्दिरों में तिरुकट्टलाई का सुन्दरेश्वर मंदिर, नरतमलाई का विजयालय चोलेश्वर मंदिर प्रसिद्ध हैं। राजराज का वृहदेश्वर राजेन्द्र प्रथम का गंगैकोण्डचोलपुरम तथा कोरंगनाथ, ऐरातेश्वर, त्रिभुवनेश्वर आदि अन्य प्रमुख मंदिर हैं।

प्रश्न 31.
तंजौर स्थित वृहदेश्वर मंदिर पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
तंजौर स्थित वृहदेश्वर मंदिर का निर्माण चोल शासक राजराज प्रथम द्वारा कराया गया। इस मंदिर को चोल स्थापत्य कला का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है। इस मंदिर के निर्माण में द्रविड़ कला शैली का पूर्ण विकास हुआ है। इस मंदिर का निर्माण (1003 ई० – 1111 ई०) में हुआ। इस मंदिर का आयताकार प्रांगण 160 मीटर लम्बा एवं 80 मीटर चौड़ा है। मंदिर का सर्वाधिक आकर्षण भाग गर्भगृह के ऊपर पश्चिम में बना 60 मीटर ऊँचा विमान, उसके ऊपर 3.50 मीटर ऊँचा पिरामिडाकार का शीर्ष भाग है। मंदिर के आधार तल के वर्गाकार कक्ष में 2.25 मीटर चौड़ा प्रदक्षिणा – पथ निर्मित है। गर्भगृह में एक विशाल शिवलिंग की स्थापना की गयी। पर्सी ब्राउन ने तंजौर के वृहदेश्वर मंदिर के विमान को भारतीय वास्तुकला का निकष माना है।

प्रश्न 32.
चोल साहित्य के विषय में आप क्या जानते हैं? इस काल की प्रमुख रचनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:
चोल शासक शिक्षा एवं साहित्य के संरक्षक थे। शिक्षा के प्रमुख केन्द्र मन्दिर तथा ग्राम महासभाएँ थीं। चोल साहित्य की रचना में तमिल एवं सस्कृत भाषा का प्रचलन था। इस काल को तमिल साहित्य का स्वर्णकाल भी माना जाता है। इसके अतिरिक्त रामानुज, यमुनाचार्य एवं ऋग्वेद पर भाष्यकार वैकट एवं माधव आदि ने संस्कृत ग्रंथों की रचना भी की। इस काल के प्रमुख ग्रंथ थे-कम्बन का रामावतार, जयन्गोन्दार का कलितुंग पर्णी, शेक्किल्लार का परियापुराणम्, पुलगेन्दी का नलबेम्ब, शेखर का तिरुट्टोन्डपूर्णम्, नंदी का तिरुविलाईयादल पूर्णम, अमुदनार का रामानुज नुरंदादि, तिरुकदेवर का शिवकोशीन्दमणि, बुद्धमित्र का विरासोलियम्, पबन्दी का नन्नौर (व्याकरण ग्रंथ), जैन ग्रंथों में तिक्करदेवर का जीवक चिन्तामणि तथा बौद्ध ग्रंथ कुण्डल केशी महत्वपूर्ण हैं।

प्रश्न 33.
कल्हण ने राजतरंगिणी की रचना कब और किस उद्देश्य से की?
उत्तर:
कल्हण की राजतरंगिणी संस्कृत में उपलब्ध उन रचनाओं में पहली महत्वपूर्ण रचना है जिसमें ऐतिहासिक इतिवृत्त की विशेषताएँ पायी जाती हैं। इस ग्रंथ की रचना 1147 ई० से 1149 ई० के मध्य की गयी। कल्हण ने इस ग्रंथ की रचना अनेक उद्देश्यों से की-

  1. कल्हण इस ग्रंथ के माध्यम से कश्मीर के पुराने राजवंशों की जानकारी प्रदान करना चाहते थे।
  2. इस ग्रंथ की रचना पाठकों के मनोरंजन के उद्देश्य से की गई।
  3. इस ग्रंथ के द्वारा अतीत से शिक्षा ली गयी ताकि अतीत की त्रुटियों को दोहराया न जाये।
  4. हर्ष के बाद अनिश्चितता एवं अव्यवस्था के वातावरण ने कल्हण को अपना इतिहास लिखने के लिए प्रेरित किया।
  5. कल्हण इस ग्रंथ के माध्यम से सांसारिक जीवन तथा भौतिक ऐश्वर्य की नश्वरता को प्रकट करना चाहते थे।
  6. इतिहास से सीख लेने के लिए उन्हें स्थितियों व घटनाओं का विश्लेषण करना पड़ा। यह विश्लेषण उनकी कृति की विशिष्ट विशेषता थी।

प्रश्न 34.
विजय नगर साम्राज्य की स्थापना किस प्रकार हुई?
उत्तर:
विजय नगर साम्राज्य की स्थापना हरिहर तथा बुक्का नामक दो भाइयों ने की। मुहम्मद बिन तुगलक के समय में 1334 ई० में काम्पिली प्रान्त में विद्रोह का दमन करने के लिए हरिहर और बुक्का को सेना सहित दक्षिण भारत भेजा गया। ये दोनों पहले काकतीय शासक प्रताप स्वरूप के सेवक थे। काम्पिली पहुँचकर उन्होंने स्वतंत्र सत्ता ग्रहण कर ली। विद्यारण्य नामक संत ने हरिहर और बुक्का को हिन्दू धर्म में दीक्षित किया और उन्हें एक स्वतंत्र हिन्दू राज्य के निर्माण हेतु प्रेरित किया। इस प्रकार अनुकूल परिस्थितियों में विद्यारण्य संत के आशीर्वाद से हरिहर व बुक्का ने 1336 ई० में विजय नगर की स्थापना की।

प्रश्न 35.
संगम वंश के प्रमुख शासक कौन – कौन थे?
उत्तर:
हरिहर प्रथम व बुक्का के द्वारा स्थापित वंश को संगम वंश का नाम दिया जाता है। इस वंश के प्रमुख शासक निम्नलिखित थे

  1. हरिहर प्रथम – यह संगम वंश का प्रथम शासक था। इसका शासनकाल 1336 ई० से 1356 ई० तक रहा।
  2. बुक्का प्रथम – इसका शासनकाल 1356 ई० से 1377 ई० तक रहा इसने ‘वेदमार्ग प्रतिष्ठापक’ की उपाधि धारण की।
  3. हरिहर द्वितीय – बुक्का की मृत्यु के बाद उसका पुत्र हरिहर द्वितीय उत्तराधिकारी बना जिसने 1379 ई० से 1406 ई० तक शासन किया।
  4. देवराय प्रथम – हरिहर द्वितीय के बाद देवराय प्रथम शासक बना। उसने 1406 ई० से 1422 ई० तक शासन किया। इसके शासन काल में इटली की यात्री ‘निकोलो काण्टी’ विजय नगर की यात्रा पर आया था।
  5. देवराय द्वितीय – कालान्तर में विजय नगर का साम्राज्य देवराय द्वितीय के हाथ में आया जिसने 1426 से 1446 ई० तक शासन किया। इसके शासन काल में फारसी राजदूत अब्दुल रज्जाक विजय नगर आया।
  6. विरुपाक्ष द्वितीय – यह संगम वंश का अन्तिम शासक था इसने 1465 ई० से लेकर 1485 ई० तक राज्य किया। विरुपाक्ष की मृत्यु के पश्चात् उत्पन्न हुई अराजकता के कारण संगम वंश का पतन हो गया तथा नरसिंह सालुव ने सालुव वंश की स्थापना की।

RBSE Class 12 History Chapter 2 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
मौर्यकालीन इतिहास की जानकारी के प्रमुख स्रोतों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
लगभग 322 ई० पू० में चन्द्रगुप्त मौर्य ने घनानंद को पराजित कर मगध राज्य पर अधिकार करके मौर्य साम्राज्य की स्थापना की। मौर्य वंश के उदय के साथ ही भारत का इतिहास अधिक रोचक बन जाता है क्योंकि इस काल में इतिहासकारों को तमाम ऐसे ऐतिहासिक साक्ष्य और विवरण प्राप्त होते हैं जो काफी हद तक विश्वसनीय है। मौर्य काल के प्रमुख स्रोतों का वर्णन अग्र हैं।

1. मेगस्थनीज द्वारा रचित इंडिका:
यूनानी शासक सेल्यूकस ने मेगस्थनीज नामक राजदूत को चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में भेजा। उसने अपनी पुस्तक इंडिका में भारत में देखे गए वृतान्त का प्रत्यक्षदर्शी विवरण लिखा है। मेगस्थनीज ने सम्राट चन्द्रगुप्त की शासन व्यवस्था, सैनिक गतिविधियों का संचालन तथा मौर्यकालीन सामाजिक व्यवस्था के बारे में विस्तृत रूप से लिखा है।

2. कौटिल्य का अर्थशास्त्र:
कौटिल्य चन्द्रगुप्त को मुख्यमंत्री था। यह चाणक्य के परिश्रम का प्रतिफल था जिससे चन्द्रगुप्त मौर्य सम्राट के पद तक पहुँचा। कौटिल्य ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक अर्थशास्त्र में मौर्यकालीन सामाजिक, धार्मिक एवं आर्थिक दशाओं का व्यापक वर्णन किया है।

3. जैन बौद्ध पौराणिक ग्रन्थ:
जैन, बौद्ध तथा पौराणिक ग्रंथों से भी मौर्यकालीन इतिहास की जानकारी प्राप्त होती है। जैन विद्वानों ने प्राकृत, संस्कृत, तमिल जैसी भाषाओं में काफी साहित्य का सृजन किया भद्रबाहु के कल्पसूत्र नामक ग्रंथ से मौर्यकालीन इतिहास की जानकारी मिलती है। बौद्ध धर्म जब श्रीलंका जैसे नए क्षेत्रों में पहुँचातो महावंश तथा दीपवंश जैसे क्षेत्र विशेष के बौद्ध इतिहास को लिखा गया। इसमें मौर्यकालीन इतिहास का वर्णन किया गया है। मौर्य शासकों का उल्लेख पौराणिक ग्रंथों तथा संस्कृत वाङ्मय में भी प्राप्त होता है।

4. विशाखदत्त द्वारा रचित मुद्राराक्षस:
पाँचवीं शताब्दी ई. में विशाखदत्त द्वारा रचित नाटक मुद्राराक्षस में चन्द्रगुप्त द्वारा नन्दवंश की पराजय का विवरण दिया गया है। इतिहासकारों द्वारा विशाखदत्त की इस रचना ‘मुद्राराक्षस’ को भी मौर्य वंश के इतिहास का एक प्रामाणिक स्रोत माना गया है।

5. पुरातात्विक प्रमाण:
पुरातात्विक प्रमाण भी मौर्यकालीन इतिहास पर प्रकाश डालते हैं। उत्खनन से प्राप्त मूर्तियों, राजप्रासादों, स्तम्भों, सिक्कों आदि के उस काल से इतिहास को जानने में काफी सहायता प्राप्त होती है।

6. अभिलेख:
सम्राट अशोक ने अपने शासन काल में अनेक अभिलेख उत्कीर्ण करवाए। अभिलेखों से मौर्यकालीन शासन व्यवस्था, नैतिक आदर्शों, धम्म के सिद्धान्तों एवं जनकल्याण के लिए किए गए कार्यों की व्यापक जानकारी प्राप्त होती है। जूनागढ़ के अभिलेख तथा अशोक द्वारा लिखवाये गये अभिलेख इतिहास के महत्वपूर्ण स्रोत हैं। मौर्यकालीन शासकों के सिक्के भी इस काल का इतिहास जानने में काफी सहायता करते हैं।

प्रश्न 2.
समस्त मौर्य सम्राटों में अशोक को महान शासक की संज्ञा क्यों दी जाती है?
उत्तर:
सम्राट अशोक ने एक युग पुरुष के रूप में मौर्य साम्राज्य को अपनी नीतियों के माध्यम से नई दिशा दी। वह अत्यधिक व्यापक दृष्टि से युक्त व्यक्तित्व था। उसने तत्कालीन समस्याओं को समझते हुए उन्हें सुलझाने का प्रयास किया। अशोक की नीतियाँ सार्वजनिक, सार्वभौमिक व सार्वयुगीन हैं जो सम्पूर्ण विश्व की धरोहर हैं। अशोक ने निम्न कार्यों द्वारा मौर्य सम्राटों में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया

1. पितृवत शासन का सिद्धान्त:
अशोक ने पितृवत शासन का सिद्धान्त दिया इसका अर्थ है उसने प्रजा के पालक के रूप में लोककल्याण के आदर्श को आत्मसात् किया। उसने अपनी प्रजा के लिए कुँए, सराय, सड़कें बनवायीं तथा वृक्षारोपण व कृषि आदि की व्यवस्था की। इन गतिविधियों से राज्य की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हुई।

2. धम्म का प्रतिपादन:
सम्राट अशोक ने सभी धर्मों का सरल स्वरूप स्थापित किया जो धम्म कहलाया। अशोक के धम्म में बड़ों का आदर, सेवक तथा दासों के प्रति उदार व्यवहार तथा दूसरे सम्प्रदायों के प्रति आदर की भावना सम्मिलित है। अशोक के धम्म का उद्देश्य प्रजा का आध्यात्मिक तथा नैतिक उत्थान करना था।

3. प्रजा से प्रत्यक्ष सम्पर्क:
अशोक ने धम्म का प्रतिपादन कर राजा प्रजा एवं नौकरशाही हेतु संविदा तैयार की। अशोक ने सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक एकता व विकास को बढ़ावा दिया जिससे अन्तः सम्बन्धों में प्रगाढ़ता आई। अशोक एकमात्र ऐतिहासिक शासक हुआ जिसने प्रजा से प्रत्यक्ष सम्पर्क किया। इस हेतु अशोक ने धम्म यात्राएँ की एवं प्रतिवेदकों आदि की नियुक्ति की। इन सबके पीछे अशोक का प्रमुख उद्देश्य राष्ट्र निर्माण करना था।

4. आर्थिक विकास पर विशेष बल:
भौतिक संस्कृति के प्रचार – प्रसार एवं शांतिपूर्ण सह अस्तित्व के लिए उसने समाज के कमजोर वर्गों को गतिशीलता प्रदान की। कृषि भूमि का विस्तार किया तथा युद्ध बन्दियों आदि को वनों व खानों में लगा दिया। इनसे रोजगार में सुधार हुआ। अशोक ने ग्रामीण विकास को ध्येय बनाया तथा इस पर अधिक ध्यान दिया। अशोक ने राजस्व का पुनर्वितरण सार्वजनिक हित एवं लोकानुरंजन कार्य में किया तथा अर्थव्यवस्था को गति प्रदान की।

5. भारतवर्ष का एकीकरण:
अशोक ने तत्कालिक सम्राटों के साथ कूटनीतिक सम्बन्ध बनाए एवं उच्च स्तरीय धम्म आयोग भेजे जिससे अन्तः सम्बन्धों की स्थापना हुई। अशोक ने सम्पूर्ण विश्व को धार्मिक सहिष्णुता का पाठ पढ़ाया तथा सभी धर्मों को समान महत्व व आदर प्रदान करने पर बल दिया। अशोक ने एक धर्म, एक भाषा, एक लिपि का अनुसरण कर सम्पूर्ण भारतवर्ष का एकीकरण किया।

6. समान दण्ड संहिता:
अशोक ने समाने नागरिक संहिता व दण्ड संहिता का क्रियान्वयन कर सामाजिक न्याय एवं कानून के शासन की स्थापना की। उसने विभिन्न वर्गों व धर्मों के बीच सौहार्दपूर्ण सम्बन्ध स्थापित किए जो राज्य की प्रगति हेतु नितान्त आवश्यक थे।

इस प्रकार अशोक ने एक आदर्श एवं कुशल प्रशासक के रूप में ख्याति प्राप्त की। लोककल्याणकारी नीतियों के प्रवर्तक के रूप में अशोक को समस्त मौर्य सम्राटों में महान शासक की संज्ञा दी जाती है।

प्रश्न 3.
मौर्य प्रशासन पर एक निबन्ध लिखिए।
उत्तर:
मौर्य साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्थाओं की चर्चा हम निम्नलिखित बिन्दुओं के अनुसार कर सकते हैं

1. केन्द्रीय शासन:
मौर्य प्रशासन में सम्राट सर्वोच्च तथा राजकीय सत्ता का प्रमुख केन्द्र होता था। सम्राट के पास असीमित शक्तियाँ होती थीं सम्राट नियमों का निर्माता, सर्वोच्च न्यायाधीश, सेनानायक एवं मुख्य कार्यकारिणी का अध्यक्ष होता था।

2. मंत्रिपरिषद:
राजा ने राज्य के कार्यों में सहायता एवं परामर्श हेतु मंत्रिपरिषद की स्थापना की थी। मंत्रिपरिषद में चरित्रवान तथा बुद्धिमान व्यक्तियों की नियुक्ति की जाती थी परन्तु मंत्रिपरिषद का निर्णय राजा के लिए मानना अनिवार्य नहीं था।

3. अधिकारी:
शीर्षस्थ राज्याधिकारी जो संख्या में 18 थे, तीर्थ कहलाते थे। वे केन्द्रीय विभागों का कार्यभार देखते थे जिनमें कोषाध्यक्ष, कर्मान्तिक, समाहर्ता, पुरोहित एवं सेनापति प्रमुख थे। इसके अतिरिक्त अर्थशास्त्र में 27 अध्यक्षों का उल्लेख मिलता है जो राज्य की आर्थिक गतिविधियों का नियमन करते थे। वे कृषि, व्यापार, वाणिज्य, बाट-माप, कताई-बुनाई, खानों एवं वनों आदि का नियमन एवं नियंत्रण करते थे।

4. प्रान्तीय प्रशासन:
मौर्य साम्राज्य चार प्रान्तों में विभाजित था-उत्तरापथ, दक्षिणापथ, अवन्तिपथ और मध्ये प्रान्त। प्रत्येक प्रान्त का प्रशासक राजकुमार होता था जो मंत्रिपरिषद और अमात्यों के माध्यम से शासन चलाता था। धर्म महामात्र तथा अमात्य प्रान्तीय अधिकारी थे जो धम्म एवं अन्य कार्य देखते थे। प्रान्तों को विषयों में बाँटा गया जो विषयपति के अधीन होते थे।

5. नगर का प्रशासन:
नगरे प्रबन्ध हेतु 5 – 5 सदस्यों की 6 समितियाँ होती थीं जो विभिन्न कार्यों, उद्योग, शिल्प, विदेशी मामलों, जनगणना, वाणिज्य, व्यापार, निर्मित वस्तुओं की देखभाल एवं बिक्रीकर आदि के नियमन विपणन एवं रखरखाव का कार्य करती थीं। ‘नागरक’ नगर प्रशासन का अध्यक्ष तथा गोप व स्थानिक उसके सहायतार्थ कर्मचारी थे।

6. जनपद एवं ग्रामीण प्रशासनिक व्यवस्था:
ग्राम प्रशासन की व्यवस्था ग्राम पंचायतों द्वारा की जाती थी। ग्राम का मुखिया ग्रामिक अथवा ग्रामिणी कहलाता था। ग्राम पंचायतों में कार्य हेतु गोप की नियुक्ति की जाती थी। गोप गाँव के परिवारों की संख्या, घर के सदस्यों की संख्या, खेतों व बागों के स्वामित्व, फसलों, कर, सड़क, पानी आदि का लेखा-जोखा रखते थे। जनपद स्तर पर प्रदेष्ट, राजुक व युक्त नामक अधिकारी थे जो भूमि, न्याय व लेखों से सम्बन्धित दायित्व वहन करते थे।

7. न्याय एवं दण्ड विधान:
धर्म, व्यवहार, चरित्र एवं राजशासन न्याय संहिता के स्रोत थे। राजा सर्वोच्च न्यायाधीश होता था। राजुक, व्यावहारिक आदि न्यायिक अधिकारी थे। संग्रहण व द्रोणमुख स्थानीय एवं जनपद स्तर के न्यायालय थे। दण्ड व्यवस्था अत्यन्त कठोर थी।

8. सेना प्रणाली व गुप्तचर व्यवस्था:
सैन्य विभाग को सबसे बड़ा अधिकारी सेनापति होता था। सेना की छः शाखाएँ र्थी जो क्रमशः पैदल, अश्व, हाथी, रथ एवं नौसेना में विभक्त थीं। प्रशासन तंत्र के साथ-साथ गुप्तचर्या को विस्तृत जाल भी बिछाया गया था जिसके लोग मंत्रियों से लेकर आम जनता की गतिविधियों पर नजर रखते थे।

9. राजस्व प्रशासन:
समाहर्ता राजस्व विभाग का प्रमुख अधिकारी था। दुर्ग, राष्ट्र, ब्रज, सेतु, वन, खाने, आयात-निर्यात प्राप्ति राजस्व आदि के मुख्य स्रोत थे। सन्निधाता राजकीय कोष का मुख्य अधिकारी होता था। इस प्रकार मौर्यकालीन प्रशासन एक केन्द्रीयकृत व्यवस्था थी। चन्द्रगुप्त मौर्य ने अपने मुख्यमंत्री कौटिल्य की सहायता से एक आदर्श शासन प्रणाली की स्थापना की।

प्रश्न 4.
गुप्त काल के प्रमुख शासकों का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
उत्तर:
गुप्तकाले प्राचीन भारतीय इतिहास का स्वर्णकाल था। यह युग शांति एवं सुव्यवस्था का काल था। इस काल के पराक्रमी शासकों ने सम्पूर्ण भारत में राजनीतिक एकता का सूत्रपात किया। इस वंश के सम्बन्ध में हमें सर्वाधिक पुष्ट एवं प्रामाणिक जानकारी प्रयाग प्रशस्ति एवं स्कन्दगुप्त के विभिन्न अभिलेखों एवं रुद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख से प्राप्त होती है। इस काल के प्रमुख शासकों का वर्णन निम्नलिखित है

  1. श्रीगुप्त – अभिलेखों के आधार पर गुप्त वंश का संस्थापक श्रीगुप्त था। इसका शासन काल 240 ई० से 280 ई० तक रहा। श्रीगुप्त ने महाराज की उपाधि धारण की।
  2. घटोत्कच – लगभग 280 ई० में श्रीगुप्त ने अपने पुत्र घटोत्कच को अपना उत्तराधिकारी बनाया। इसने 319 ई० तक गुप्त वंश पर शासन किया।
  3. चन्द्रगुप्त प्रथम – घटोत्कच के पश्चात् उसका पुत्र चन्द्रगुप्त प्रथम 319 ई० में शासक बना। वह गुप्त वंश का प्रथम स्वतंत्र शासक था, जिसने महाराजाधिराज की पदवी धारण की थी। उसने 319 ई० में एक संवत चलाया जिसे गुप्त संवत कहा जाता है। इसके शासनकाल की महत्वपूर्ण घटना यह थी कि इसने लिच्छिवि राजकुमारी कुमार देवी से विवाह किया था। चन्द्रगुप्त प्रथम ने 335 ई० तक शासन किया।

समुद्रगुप्त:
चन्द्रगुप्त प्रथम के पश्चात् उसके प्रतिभा सम्पन्न पुत्र समुद्रगुप्त ने 335 ई० से 375 ई० तक गुप्त वंश की बागडोर को संभाला। समुद्रगुप्त स्वयं एक महान योद्धा एवं कुशल सेनापति था। अपने विजय अभियानों द्वारा उसने सम्पूर्ण उत्तरी एवं दक्षिणी भारत पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया। उसके साम्राज्य विस्तार में कश्मीर, पश्चिमी पंजाब, पश्चिमी राजपूताना, सिंध और गुजरात के अतिरिक्त शेष सारा भारत सम्मिलित था। उसकी दिग्विजय का वर्णन हरिषेण रचित प्रयाग प्रशस्ति में मिलता है।

चन्द्रगुप्त द्वितीय:
समुद्रगुप्त के पश्चात् 375 ई० से 414 ई० तक चन्द्रगुप्त द्वितीय ने गुप्त वंश पर शासन किया। इसने गुप्त साम्राज्य को अरब सागर तक बढ़ाया और सौराष्ट्र प्रायद्वीप को विजित किया। इसके शासनकाल में चीनी यात्री फाहयान भारत आया।

कुमारगुप्त प्रथम:
415 ई० से 455 ई० तक गुप्त वंश पर कुमारगुप्त प्रथम ने शासन किया उसने बड़ी संख्या में मुद्राएँ जारी करवाईं। अह नालन्दा विश्वविद्यालय का संस्थापक भी था।

स्कन्दगुप्त:
कुमारगुप्त के पश्चात् उसको पुत्र स्कन्दगुप्त मगध के राजसिंहासन पर आरूढ़ हुआ। उसने 455 ई० से 467 ई० तक शासन किया। इसने बाह्य शत्रुओं व हूणों आदि को परास्त कर गुप्त साम्राज्य की रक्षा की तथा सौराष्ट्र में जूनागढ़ स्थित सुदर्शन झील का पुनरुद्धार कराया। स्कन्दगुप्त के पश्चात् पुरुगुप्त, नरसिंहगुप्त, कुमारगुप्त द्वितीय, बुद्ध गुप्त, बालादित्य द्वितीय, कुमारगुप्त तृतीय और विष्णुगुप्त ने शासन किया लेकिन धीरे – धीरे उनका राज्य सीमित होता गया और बंगाल के गौड़ों के अधिकार में आ गया।

प्रश्न 5.
“समुद्रगुप्त को भारत का नेपोलियन कहा जाता है।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
समुद्रगुप्त एक महान शासक, सेनापति, कूटनीतिज्ञ, बहुआयामी प्रतिभा का धनी एवं यथार्थवादी व्यक्ति था। उसके दरबारी कवि हरिषेण ने प्रयाग प्रशस्ति में अपने आश्रयदाता समुद्रगुप्त के पराक्रम व दिग्विजय का वर्णन किया है। समुद्रगुप्त ने निम्नलिखित विजय अभियान किये

  1. आर्यावर्त का प्रथम विजय अभियान – समुद्रगुप्त ने इस विजय अभियान में सर्वप्रथम आर्यावर्त अर्थात् गंगा यमुना दोआबे को जीतने के लिए अच्युत, नागसेन, गणपति नाग तथा कोट कुलज को हराया।
  2. आर्यावर्त का द्वितीय विजय अभियान – द्वितीय अभियान में समुद्रगुप्त ने नौ राजाओं-रुद्रवेद, मतिल, नागदत्त, चन्द्रवर्मन, गणपति, नाग, नागसेन, अच्युत, नंदी एवं बलवर्मा को पराजित किया।
  3. दक्षिणापथ विजय अभियान – समुद्रगुप्त ने दक्षिण के 12 राज्यों कोशल, महाकान्तर, कोरल, कोट्टूर, पिष्टपुर, एरनपल्ली, कांची, अवमुक्त, बैंगी, पल्लक, देवराष्ट्र, कुस्थलपुर आदि को पराजित किया परन्तु उन्हें गृहणमोक्षानुग्रह की नीति के तहत फिर से मुक्त कर दिया क्योंकि इन दूरस्थ भागों पर प्रत्यक्ष शासन चलाना असम्भव था।
  4. मध्य भारत तथा सीमान्त प्रदेशों पर विजय अभियान – समुद्रगुप्त ने मध्य भारत के आटविकों को भी परास्त किया व उन्हें अपना भृत्य बना लिया। सीमान्त प्रदेश के राज्यों में पूर्व की तरफ समतट, डवाक, कामरूप, नेपाल तथा कतपुर थे। पश्चिम की ओर सीमान्त प्रदेश में 9 राज्य थे-आभीर, अर्जुनायन, मालव, यौद्धेय, मद्रक, प्रार्जुन, सनकानिक, काक व खरपरिक थे।
  5. विदेशी राज्यों से सम्बन्ध – समुद्रगुप्त ने कुछ विदेशी राज्यों से सम्बन्ध भी बनाये जिनके नाम थे-देवपुत्र शाहिशाहानुशाही, शक-मुरुण्ड, सिंहल द्वीप आदि।।

इस प्रकारे समुद्रगुप्त ने भारत के बहुत बड़े भाग को अपने अधीन कर एकता के सूत्र में बाँधा। अत: उसे भारत के नेपोलियन की संज्ञा दी जाती है।

प्रश्न 6.
गुप्तकाल के आर्थिक जीवन पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
गुप्तकाल में आर्थिक जीवन अत्यन्त समृद्ध था। विस्तृत साम्राज्य एवं सुयोग्य प्रशासन के कारण आर्थिक जीवन के सभी पक्षों कृषि, पशुपालन उद्योग एवं शिल्प तथा व्यापार एवं वाणिज्य में अभूतपूर्व
वृद्धि हुई। इनका विवरण निम्नलिखित है

1. कृषि:
कृषि उन्नत थी। हल में लोहे के फाल तथा धरती की उर्वरा शक्ति बढ़ाने के तरीकों का उल्लेख मिलता है। कृषि अधिकाशंत: वर्षा पर निर्भर थी लेकिन गुप्त सम्राटों द्वारा सिंचाई की सुविधाएँ देने का प्रयास भी किया गया। प्रमुख फसलें-गेहूँ, धान, ज्वार, ईख, बाजरा, मटर, दाल, तिल, सरसों, अलसी, अदरक, काली मिर्च आदि थीं। इस समय 5 प्रकार की भूमि का उल्लेख मिलता है-क्षेत्र भूमि, वास्तु भूमि, चारागाह भूमि, सिल वे अप्रहत भूमि इत्यादि।

2. पशुपालन:
पशुपालन भी जीविका का एक अन्य साधन था। घोड़े, भैंस, ऊँट, बकरी, भेड़, गधा, कुत्ता, बिल्ली प्रमुख रूप से पाले जाते थे। बैल, हल चलाने और सामान ढोने के काम आते थे।

3. उद्योग एवं शिल्प:
गुप्तकाल में धातु शिल्प, वस्त्र निर्माण, आभूषण कला, काष्ठ शिल्प, पाषाण शिल्प तथा हाथी दाँत का काम आदि उद्योगों में विशेष उन्नति हुई। भारत के उत्तर-दक्षिण व्यापार में वस्त्रों का प्रमुख स्थान था तथा विदेशी बाजारों में भी भारतीय वस्त्रों की बड़ी माँग थी।

4. श्रेणी संगठन:
शिल्पी, उद्यमी तथा व्यापारी संगठित थे और उन्होंने अपने-अपने संघ बना रखे थे। इन संघों को श्रेणी, निगम अथवा गण कहा जाता था। ये श्रेणियाँ व्यावसायिक उद्यम व निर्माण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं। अपने व्यवसायों के संचालन के लिए उनके अपने नियम और कोष थे।

5. व्यापार:
गुप्तकाल में व्यापार बहुत उन्नत दशा में था। व्यापार नदियों तथा सड़कों के द्वारा ही होता था। आन्तरिक व्यापार के साथ – साथ विदेशों के साथ भी व्यापार होता था। ताम्रलिप्ति बंगाल का सबसे बड़ा बन्दरगाह था। इस बन्दरगाह द्वारा चीन, लंका, जावा तथा सुमात्रा के साथ व्यापार होता था। दक्षिण में गोदावरी तथा कृष्णा नदियों के मुहाने पर अच्छे बन्दरगाह थे जिनके द्वारा पूर्वी द्वीप समूह तथा चीन के साथ व्यापार होता था। कल्याण, भड़ोच तथा खम्भा आदि बन्दरगाह थे जिनके द्वारा विदेशों के साथ व्यापार होता था।

राजस्व के स्रोत:
गुप्तकाल में राज्य की आय का प्रमुख स्रोत भू-राजस्व था। भाग, भोग, उपरिकरे तथा उदंग आदि कर वसूले जाते थे। गुप्तकाल में भूमिकर की अदायगी नकद तथा अन्न दोनों रूपों में की जा सकती थी।

प्रश्न 7.
गुप्तकाल में आन्तरिक व विदेशी व्यापार की स्थिति को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
गुप्तकाल में आन्तरिक व विदेशी व्यापार को निम्नलिखित विवरणों के आधार पर समझा जा सकता है

1. आन्तरिक व्यापार:
गुप्तकाल में व्यापार एवं वाणिज्य अपने चरम उत्कर्ष पर था। आंतरिक व्यापार सड़कों और नदियों के द्वारा किया जाता था। गुप्तकाल में दीर्घ राजनीतिक स्थिरता एवं शान्ति की स्थिति तथा गुप्तकालीन नरेशों द्वारा प्रभूत मात्रा में प्रचलित स्वर्ण मुद्राओं ने व्यापार के विकास में बहुत सहयोग दिया। आन्तरिक व्यापार की प्रमुख वस्तुओं में दैनिक उपयोग की लगभग सभी वस्तुएँ शामिल थीं जिन्हें नगरों एवं ग्रामों के बाजारों में मुख्यत: बेचा जाता था, जबकि विलासितापूर्ण वस्तुओं में दूरस्थ प्रदेशों से लाई गई वस्तुएँ शामिल र्थी। सार्थ भ्रमणशील व्यापारी थे, जिनका नगरीय जीवन में बहुत महत्वपूर्ण स्थान था।

नारद एवं बृहस्पति की स्मृतियों में क्रेताओं और विक्रेताओं के समान हितों की रक्षा के लिए अनेक नियम – विनियम मिलते हैं। गुप्तकाल में मार्गों से यात्रा सुरक्षित एवं निरापद र्थी। चीनी यात्री फाह्यान ने भारत में अपनी यात्रा के दौरान कहीं असुरक्षा महसूस नहीं की। उज्जैन, भड़ौच, प्रतिष्ठान, विदिशा, प्रयाग, पाटलिपुत्र, वैशाली, ताम्रलिप्ति, मथुरा, अहिच्छत्र, कौशम्बी आदि महत्वपूर्ण व्यापारिक नगर थे। इन सब में उज्जैन सर्वाधिक महत्वपूर्ण व्यापारिक स्थल था क्योंकि देश के हर कोने से मार्ग उज्जैन की ओर आते थे। पेशावर, मथुरा, उज्जैन, पैठान मुख्य व्यापारिक एवं औद्योगिक केन्द्र थे।

2. गुप्तकाल में विदेशी व्यापार:
भारतीय बन्दरगाहों का बाहर के अनेक देशों से स्थायी सामुद्रिक सम्बन्ध बना हुआ था। ये देश थे-चीन, श्रीलंका, फारस, अरब, इथोपिया, बैजन्टाइन (रोमन) साम्राज्य तथा हिन्द महासागर के द्वीप। गुप्तकाल में चीन के साथ भारत के विदेशी व्यापार में अत्यधिक वृद्धि हुई। चीन का रेशम जो ‘चीनांशुक’ के नाम से प्रसिद्ध था, भारत के बाजारों में अत्यधिक लोकप्रिय था। रोमन साम्राज्य के पतन से कमजोर हुआ पश्चिमी विदेशी व्यापार में पुन: वहाँ बैजन्टाइन साम्राज्य की स्थापना के बाद वृद्धि हुई। यहाँ निर्यात की जाने वाली वस्तुओं में रेशम व मसाले प्रमुख थे।

भृगुकच्छ (भड़ौच) पश्चिमी समुद्रतट पर स्थित एक प्रसिद्ध बन्दरगाह था। कैम्बे, सोपार व कल्याण बन्दरगाह थे। पूर्वी तट पर स्थित बन्दरगाहों में घंटशाला, कदूरा तथा गंगा के मुहाने पर ताम्रलिप्ति स्थित था। ताम्रलिप्ति पूर्वी भारत में होने वाले सामुद्रिक व्यापार का यह सबसे बड़ा केन्द्र था। चीन, इण्डोनेशिया तथा श्रीलंका के व्यापारिक जहाज यहाँ आते-जाते थे। रघुवंश एवं दशकुमारचरित में ताम्रलिप्ति से होने वाले समृद्ध सामुद्रिक व्यापार के उल्लेख है।

इस तथ्य को अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि गुप्त साम्राज्य एशिया का प्रमुख केन्द्र स्थल था एवं विश्व के सामुद्रिक देशों में वह सर्वप्रथम सामुद्रिक शक्ति के रूप में प्रसिद्ध था। भारत में चीन से रेशम, इथोपिया से हांथीदाँत व अरब ईरान तथा बेक्ट्रिया से घोड़ों का आयात होता था। दक्षिण पूर्वी एशिया, चीन व पश्चिम से ताम्रलिप्ति, भड़ौच आदि बन्दरगाहों से व्यापार होता था। मसाले, मोती, वस्त्र, हाथीदांत, नील का निर्यात एवं धातु चिनाशंकु घोड़ों आदि का आयात किया जाता था।

प्रश्न 8.
गुप्तकाल को प्राचीन भारत का स्वर्ण युग क्यों माना जाता है?
उत्तर:
गुप्तकाल प्राचीन भारत के इतिहास का मध्य युग है। पहले का सम्पूर्ण इतिहास इसमें समाप्त होता है तथा भविष्य का समस्त इतिहास इससे निकलता है। यह वह काल है जब देश की प्रतिभा का प्रत्येक दिशा में विकास हुआ है। इसलिए इसे भारतीय इतिहास का स्वर्णकाल कहते हैं। फाह्यान ने गुप्तकाल में धार्मिक सहिष्णुता, सरल दण्ड व्यवस्था, घरों में तालों का अभाव तथा प्याज, लहसुन के सेवन न होने का उल्लेख किया है जो समाज में अपराधवृत्ति की न्यूनता, सम्पत्ति की सुरक्षा, अहिंसक तथा सात्विक प्रवृत्ति को दर्शाते हैं। मौर्यों के पश्चात् पहली बार राजनीतिक एकता एवं सुव्यवस्था इस काल में स्थापित हुई।

इस काल में अर्थव्यवस्था का मुद्रीकरण हुआ। उद्योग तथा व्यापार समुन्नत थे। इस युग की कला में आध्यात्मिकता, शालीनता तथा भारतीयता की स्पष्ट छाप दिखाई देती है। अजन्ता, बाघ के गुहा चित्र, देवगढ़ भितरी गाँव आदि के मन्दिर, विष्णु, बुद्ध, महावीर की मूर्तियाँ आदि इस युग की कला के चरमोत्कर्ष के द्योतक हैं जो सामाजिक समृद्धि एवं सौहार्द का प्रतीक हैं। साहित्य में कालिदास, हरिषेण, विष्णुशर्मा आदि ने उच्च कोटि की रचनाएँ कीं। आर्यभट्ट, वराहमिहिर, नागार्जुन आदि ने विज्ञान की विभिन्न शाखाओं का विकास किया तथा भारतीय संस्कृति का भी विदेशों में प्रचार-प्रसार भी इसी काल में हुआ।

गुप्तकाल कला, वास्तु, मूर्ति, शिल्प चित्रकला, साहित्य, वैज्ञानिक प्रवृत्तियों के अवतरण, पल्लवन और मुद्रा प्रसारण में समग्र रूप से प्रगति का युग था। राजनीतिक एकता, प्रतापी सम्राट, आर्थिक वैभव, धार्मिक सहिष्णुता, विदेशियों को हिन्दू धर्म में सम्मिलित करना, हिन्दू धर्म का पुनरुत्थान, संस्कृत साहित्य की प्रगति, सभी ललित कलाओं की उन्नति, विदेशों में भारतीय संस्कृति का प्रचार करने के कारण प्राचीन भारतीय इतिहास में गुप्तकाल का स्थान श्रेष्ठ है। इन कार्यों के लिए नि:सन्देह गुप्तकाल प्राचीन भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग था।

प्रश्न 9.
सम्राट हर्ष के विजय अभियानों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
हर्ष पुष्यभूति वंश का सबसे प्रतापी शासक हुआ। वह लगभग 606 ई. में थानेश्वर का शासक बना व उसने 647 ई. तक शासन किया। हर्ष ने लगभग समस्त उत्तरी भारत में विजय प्राप्त की एवं साम्राज्य का विस्तार किया। साम्राज्य विस्तार की दृष्टि से उसने अनेक महत्वपूर्ण सैनिक अभियान किये जो निम्नलिखित हैं|

  1. वल्लभी के ध्रुवसेन से युद्ध – हर्ष ने 630 ई. से 633 ई. के बीच वल्लभी नरेश ध्रुवसेन द्वितीय बालादित्य को पराजित किया, जो चालुक्यों से युद्ध का पूर्व चरण था। बाद मे हर्ष ने वल्लभी से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किया।
  2. उत्तरी भारत के अन्य राज्यों की विजय – सौराष्ट्र में वल्लभी के अतिरिक्त हर्ष ने उत्तरी भारत के अन्य राज्यों पर भी अपना आधिपत्य स्थापित करने का प्रयास किया।
  3. बंगाल के शासक शशांक से युद्ध – हर्ष ने बंगाल के गौड़ों के विरुद्ध कार्यवाही की उस समय शशांक वहाँ का शासक था। हर्ष ने कामरूप के शासक भास्कर वर्मा के साथ समझौता किया जिससे गौड़ नरेश शशांक को कदम पीछे खींचना पड़ा।
  4. दक्षिण के पुलकेशिन द्वितीय से युद्ध – हर्ष व पुलकेशिन द्वितीय महत्वाकांक्षी शासक थे जिन्होंने साम्राज्यवादी नीति का अवलम्बन किया। दोनों राज्यों की सीमाएँ निकट होने के कारण उनके बीच युद्ध का उल्लेख ऐहोल प्रशस्ति में मिलता है। इस युद्ध में हर्ष की हार हुई।
  5. उड़ीसा विजय – 640 ई. के आसपास ओडू, कांगोद एवं कलिंग पर विजय प्राप्त कर उड़ीसा पर विजय प्राप्त करने के पश्चात् हर्षवर्धन ने बौद्ध सभा का आयोजन किया।

41 वर्ष के अपने शासन के दौरान हर्ष ने अपने राज्य में दूर-दराज के क्षेत्रों जैसे-जालंधर, कश्मीर, नेपाल, वल्लभी, मालवा, सिंध, सीमान्त प्रदेश व असम को सम्मिलित किया। संयुक्त प्रदेश, बिहार, बंगाल, उड़ीसा, मध्य भारत तथा राजपूताना हर्ष के प्रशासन के अधीन थे।

प्रश्न 10.
एक कुशल प्रशासक के रूप में हर्ष का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर:
हर्ष एक महान् सेनापति, कला एवं साहित्य का संरक्षक, कर्ण जैसा दानी सम्राट था। उसने युग की प्रवृत्तियों के अनुरूप अपनी नीतियों को ढालने का प्रयत्न किया। हर्ष स्वयं व्यक्तिगत रूप से शासन प्रबन्ध देखता था। जनहित उसके राज्य का प्रमुख उद्देश्य था। सामंतशाही शक्तियों के नियंत्रण हेतु उसने भ्रमण किया तथा केन्द्रीय शासन को सुदृढ़ किया। भ्रमण एवं दान के माध्यम से हर्ष ने ग्रामीण विकास को गति प्रदान की तथा जनता से सीधा सम्पर्क स्थापित किया। इस प्रकार प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से हर्ष ने जनकल्याण व उत्पादन की शक्तियों को प्रोत्साहित किया।

हर्ष के समय तिब्बत-चीन तथा अन्य एशियाई देशों में भारतीय संस्कृति का प्रचार-प्रसार हुआ। चीन में हर्ष ने प्रतिनिधि मण्डल भेजा। हर्ष नालंदा विश्वविद्यालय का मुख्य संरक्षक था। इसके अतिरिक्त वल्लभी सहित अनेक गुरुकुल, आश्रम एवं शिक्षा के केन्द्र हर्ष के समय में विद्यमान थे। इस प्रकार हर्ष की उपलब्धियाँ व्यापक एवं बहुआयामी थीं। हर्षवर्धन सातवीं शताब्दी की भारतीय राजनीति का श्रेष्ठतम नायक था। एक श्रेष्ठ येद्धा, साम्राज्य निर्माता, कुशल प्रशासक, लोक कल्याणकारी ओर विद्यानुरागी शासक के रूप में सभी विद्वान उसकी प्रशंसा करते थे।

हर्ष ने युग की धाराओं को बदलने का एवं नई प्रवृत्तियों को जन्म देने का प्रयास किया तथा आजीवन लोककल्याणकारी कार्यों में संलग्न रहा, लेकिन वह पूर्णरूप से सफल नहीं रहा। इसका कारण उसकी अयोग्यता नहीं बल्कि ऐसी प्रवृत्तियों का उदय होना था, जिनके उत्थान व पतन के लिए एकमात्र व्यक्ति या युग विशेष रूप से उत्तरदायी नहीं होता है। इस प्रकार हर्ष को उसके श्रेष्ठ कार्यों के कारण एक कुशल प्रशासक कहा जा सकता है।

प्रश्न 11.
कल्हण की राजतरंगिणी पर एक निबन्ध लिखिए।
उत्तर:
कल्हण की राजतरंगिणी संस्कृत में उपलब्ध उन रचनाओं में पहली महत्वपूर्ण रचना है जिसमें ऐतिहासिक इतिवृत्त की विशेषताएँ पायी जाती हैं। इस ग्रन्थ की रचना 1147 ई. से 1149 ई. के मध्य की गयी। राजतरंगिणी का शाब्दिक अर्थ है- राजाओं की नदी जिसका भावार्थ है-राजाओं का इतिहास या समय प्रवाह। यह कवित्त के रूप में है। इसमें कश्मीर का इतिहास वर्णित है जो महाभारत काल से लेकर स्वयं अपने युग तक के कश्मीर के इतिहास का विवरण देता है। इस ग्रन्थ में आठ तरंग और संस्कृत में कुल 7826 श्लोक हैं। इसकी तरंगों का विवरण निम्न प्रकार है।

  1. पहले की तीन तरंगों में कश्मीर के प्राचीन इतिहास की जानकारी मिलती है जिसमें कश्मीर की पीढ़ी-दर-पीढ़ी से आ रही मौखिक परम्पराओं का वर्णन है।
  2. चौथे से लेकर छठे तरंग में कार्कोट एवं उत्पन्न वंश के इतिहास का वर्णन है। केवल अंतिम दो अध्याय कल्हण की। व्यक्तिगत जानकारी एवं ग्रन्थावलोकन पर आधारित हैं।
  3. अन्तिम सातवें एवं आठवें तरंग में लोहर वंश का इतिहास उल्लिखित है।

राजतरंगिणी एक निष्पक्ष और निर्भय ऐतिहासिक कृति है। कल्हण ने अपने इस ग्रंथ में पक्षपातरहित होकर राजाओं के गुण तथा दोषों का उल्लेख किया है। यह कृति तत्कालीन समाज का भी वर्णन करती है। कल्हण ने इस ग्रन्थ में उन स्रोतों का भी वर्णन किया जिनकी उन्होंने अपना इतिहास लिखने के लिए जाँच पड़ताल की। उन्होंने अपने से पहले के ग्यारह विद्वानों का उल्लेख किया है जिन्होंने राजाओं की कालक्रमानुसार सूची दी और साथ ही उन विद्वानों की विवेचन पद्धति की कमियों को भी बताया है।

उन्होंने अनुश्रुतियों, परम्पराओं और इस क्षेत्र पर लिखी गई प्रमुख रचनाओं; जैसे- नीलमत पुराण का उपयोग किया। उन्होंने मन्दिरों तथा अन्य भवनों में खुदे हुए अभिलेखों को जो युगान्तकारी उपयोग किया वह प्रगति को सूचक है। साथ ही उन्होंने पूर्ववर्ती राजाओं द्वारा किये गये भूमिदान तथा धर्मदाय के बारे में बहुत कुछ लिख है। उन्होंने अभिलेखों से जो सूचनाएँ एकत्र कीं, उनका भी उपयोग किया है। इतिहास के तर्कसंगत स्रोतों के रूप में अभिलेखों का यह उपयोग निश्चय ही एक महान योगदान था।

प्रश्न 12.
विजयनगर साम्राज्य की सांस्कृतिक प्रगति एवं साहित्य के विकास पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
विजयनगर साम्राज्य की सांस्कृतिक प्रगति एवं साहित्य के विकास को निम्नलिखित विवरणों के आधार पर समझा जा सकता है

1. सांस्कृतिक प्रगति:
विजयनगर साम्राज्य में मध्यकालीन दक्षिण भारत के इतिहास में विजयनगर साम्राज्य के सांस्कृतिक योगदान का विशेष महत्व है। दो शताब्दियों से कुछ अधिक समय तक विजयनगर का राज्य दक्षिण की राजनीति में अपना प्रभाव बनाए रखने में सफल रहा। इस राज्य के शासकों ने सांस्कृतिक जीवन के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय योगदान दिया। हिन्दू शासकों की सत्ता के अधीन होने के कारण यह राज्य हिन्दू धर्म और संस्कृति का केन्द्र रहा।

विजयनगर के शासकों ने विशेषकर हिन्दू धर्म और संस्कृति को प्रोत्साहन दिया। मध्यकाल में हिन्दू धर्म के पुनरुत्थान का श्रेय विजयनगर के शासकों को दिया जाता है। विजयनगर के शासकों ने साहित्य, स्थापत्यकला, चित्रकला और संगीत आदि को प्रोत्साहन दिया। विजयनगर साम्राज्य को सांस्कृतिक गतिविधियों का उत्कृष्ट केन्द्र बना दिया। इसकी पुष्टि तत्कालीन साहित्यिक रचनाओं, अभिलेखों और विदेशी यात्रियों के वृत्तान्त से होती है।

2. साहित्य का विकास:
विजय नगर साम्राज्य में विजयनगर की साहित्यिक कृतियों में धार्मिक, ऐतिहासिक, जीवन वृत्तान्त एवं काव्य सम्बन्धी रचनाएँ उपलब्ध हैं। विजयनगर के प्रारम्भिक शासकों में बुक्का प्रथम ने अनेक धार्मिक रचनाओं के लेखन में योगदान दिया। सायण के नेतृत्व में विद्वानों के एक मण्डल ने चारों वेदों की संहिताओं सहित अनेक ब्राह्मण ग्रंथों और आरण्यकों पर भाष्य लिखे। कृष्णदेव राय के संरक्षण में ईश्वर दीक्षित ने हेमकूट नामक महाकाव्य पर दो टीकाएँ लिख । अगस्त्य ने अनेक काव्यों की रचना की, जिनमें कुछ रचनाओं पर कृष्णदेव के मंत्री सोलुआ तिम्मर ने टीका लिखी। विजयनगर का महानतम् शासक कृष्णदेव राय, एक उत्कृष्ट कोटि का कवि और लेखक था, जिसे संस्कृत एवं तेलुगु भाषाओं में प्रवीणता प्राप्त थी।

उसकी तेलुगू रचना ‘आमुक्त मालयदम्’ थी, जो तेलुगू भाषा में पाँच महाकाव्यों में से एक है। कृष्णदेव राय ने संस्कृत में एक नाटक जाम्बवती कल्याणम् की रचना की। कृष्णदेव राय के दरबार में तेलुगू साहित्य के 8 सर्वश्रेष्ठ कवि रहते थे। साथ ही उनके दरबार में अनेक कवियों को प्रश्रय मिला, जिसमें सबसे प्रसिद्ध नाम अलसानी पेद्दन है, उन्हें तेलुगू कविता के पितामह के नाम से जाना जाता है। उसकी प्रमुख रचना ‘स्वारोचितसम्भव’ है। दूसरा कवि नन्दी तिम्मन था, जिसने ‘परिजात हरण’ की रचना की। तीसरे कवि भट्टमूर्ति ने अलंकार शास्त्र से सम्बन्धित पुस्तक ‘नर सभूयालियम’ की रचना की। एक अन्य कवि हरिदास था, जो वैष्णव भक्ति के विचार से प्रभावित था। कृष्णदेव राय के दरबार में तेनालीराम एक प्रसिद्ध कवि था, ने पाण्डुरंग महात्म्य की रचना की। जिसकी तुलना अकबर के प्रसिद्ध दरबारी बीरबल से की जाती है।

साहित्यिक रचनाओं में राजनाथ का ‘सालूवाभियुदय’ और भागवत – चम्पू विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इनका ऐतिहासिक महत्व भी है। शासकों की जीवनी से सम्बन्धित रचनाओं में बुक्का प्रथम के पुत्र कुमार कम्पन की सफलताओं पर आधारित, उसकी पत्नी की काव्य रचना ‘मदुरा विजयम्’ है। एक दूसरी रचना तिरूवलाम्बा की वरदाम्बिकापरिणय है, जिसमें अच्युत राय और वरदाम्बिका के विवाह का वर्णन है। इन रचनाओं के अतिरिक्त दर्शन, यज्ञतंत्र आदि से सम्बन्धित अनेक रचनाएँ भी इस काल में लिखी गई।

संस्कृत और तेलुगू भाषाओं को यद्यपि विजयनगर के शासकों ने प्राथमिकता दी, फिर भी अन्य भाषाओं के कवियों को इन्होंने प्रश्रय दिया। तमिल भाषा पहले ही विकसित अवस्था में थी और विजयनगर काल में इसकी प्रगति में कोई अवरोध उत्पन्न नहीं हुआ। कन्नड़ भाषा में भी अनेक तीर्थंकरों और सन्तों की जीवनियाँ इस काल में लिखी गई। मधुर ने ‘धर्मनाथ पुराण’ की रचना की तथा गोमतेश्वर की स्तुति में कविताओं की रचना की। कृष्णदेव राय के दरबार में संस्कृत एवं कन्नड़ भाषाओं में विभिन्न पुस्तकों की रचना हुई, जिनमें ‘भाव चिंतारण’ तथा ‘वीर शैवामृत’ प्रमुख हैं। कृष्णदेव राय और अच्युत राय ने वैष्णवों, लिंगायतों तथा जैनों को भी संरक्षण दिया।

RBSE Class 12 History Chapter 2 मानचित्र कार्य प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत के मानचित्र में गुप्त साम्राज्य के विस्तार को दशाइये।
उत्तर:
RBSE Solutions for Class 12 History Chapter 2 image 3

प्रश्न 2.
भारत के मानचित्र में अशोक के साम्राज्य को दशाईये
उत्तर:
RBSE Solutions for Class 12 History Chapter 2 image 4

प्रश्न 3.
भारत के मानचित्र में हर्ष के साम्राज्य को इंगित कीजिए।
उत्तर:
RBSE Solutions for Class 12 History Chapter 2 image 5

RBSE Solutions for Class 12 History

Share this:

  • Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp
  • Share on X (Opens in new window) X
  • Share on Facebook (Opens in new window) Facebook

Related

Filed Under: Class 12 Tagged With: RBSE Solutions for Class 12 History Chapter 2, RBSE Solutions for Class 12 History Chapter 2 भारतीय इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठ

Reader Interactions

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Primary Sidebar

Recent Posts

  • My Dear Soldiers Question Answer Summary Class 7 English Poorvi Chapter 14
  • Travel Question Answer Summary Class 7 English Poorvi Chapter 11
  • Paper Boats Question Answer Summary Class 7 English Poorvi Chapter 8
  • A Funny Man Question Answer Summary Class 7 English Poorvi Chapter 5
  • Try Again Question Answer Summary Class 7 English Poorvi Chapter 2
  • Rani Abbakka Question Answer Summary Class 7 English Poorvi Chapter 15
  • A Homage to Our Brave Soldiers Question Answer Summary Class 7 English Poorvi Chapter 13
  • Conquering the Summit Question Answer Summary Class 7 English Poorvi Chapter 12
  • The Tunnel Question Answer Summary Class 7 English Poorvi Chapter 10
  • North South East West Question Answer Summary Class 7 English Poorvi Chapter 9
  • My Brother’s Great Invention Question Answer Summary Class 7 English Poorvi Chapter 7

Footer

RBSE Solutions for Class 12
RBSE Solutions for Class 11
RBSE Solutions for Class 10
RBSE Solutions for Class 9
RBSE Solutions for Class 8
RBSE Solutions for Class 7
RBSE Solutions for Class 6
RBSE Solutions for Class 5
RBSE Solutions for Class 4
RBSE Solutions for Class 3
RBSE Solutions for Class 12 Maths
RBSE Solutions for Class 11 Maths
RBSE Solutions for Class 10 Maths
RBSE Solutions for Class 9 Maths
RBSE Solutions for Class 8 Maths
RBSE Solutions for Class 7 Maths
RBSE Solutions for Class 6 Maths
RBSE Solutions for Class 5 Maths
RBSE Solutions for Class 4 Maths
RBSE Solutions for Class 3 Maths

Copyright © 2026 RBSE Solutions

Loading Comments...