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मीरा के पद Class 7 Summary in Hindi
मीरा के पद हिंदी भावार्थ सप्रसंग व्याख्या Class 7
कविता परिचय – प्रथम पद में मीराबाई ने अपने भक्त-हृदय की भावना को व्यक्त करते हुए कहा है कि सुन्दर स्वरूप और मनोहर मूर्ति वाले भक्त वत्सल श्री कृष्ण! मेरे नयनों में वास कीजिए। दूसरे पद में मीरा ने लोकप्रिय वाक्यांश ” बरसे बदरिया सावन की ” का प्रयोग किया है। इस पद में मीरा को श्रावण मास में होने वाली वर्षा श्रीकृष्ण के आगमन की आहट देती है। पद में वर्षा ऋतु का सुन्दर वर्णन है। बादलों के बरसने से मन में उठने वाली खुशी का वर्णन किया गया है।

सप्रसंग व्याख्याएँ-
1. बसो मेरे नैनन में नंदलाल।
मोहनि मूरति साँवरि सूरति, नैना बने विशाल।।
अधर सुधा रस मुरली राजति, उर वैजंती माल ॥
क्षुद्र घंटिका कटितट सोभित, नूपुर शब्द रसाल ॥
मीरा के प्रभु संतन सुखदाई, भक्त वछल गोपाल॥
कठिन शब्दार्थ – नैनन = आँखों । मोहनि = मोहित करने वाली या लुभाने वाली। मूरति = मूर्ति, शरीर प्रतिमा स्वरूप। साँवरि = साँवली, श्याम वर्ण की। अधर = होंठ, नीचे का होंठ। सुधा रस = अमृत रस, अमृत रूपी आनन्द। उर = सीना, वक्ष। क्षुद्र = छोटे। घंटिका = घुँघरू। कटितट = कमर। सोभित = शोभा देना। रसाल = रस से युक्त, सुरीली। सूरति = शक्त, रूप। नैना = नेत्र, आँख। राजति = शोभित होना। नूपुर = घुंघरू, पैर का गहना। सुखदाई = सुख देने वाला। भक्त वछल = भक्त को प्यार करने वाला, भक्त के प्रति स्नेहयुक्त।
प्रसंग – मीराबाई अपने इस पद के माध्यम से अपने आराध्य श्रीकृष्ण के स्वरूप का वर्णन करते हुए उनसे अपने नयनों में बस जाने का निवेदन कर रही हैं।
व्याख्या – मीरा कहती हैं, हे! नंदलाल, मेरी आँखों में बस जाओ। आपका स्वरूप मन को मोहित करने वाला, आपकी सूरत साँवली अर्थात् श्याम रंग की है और आँखें बड़ी-बड़ी हैं। होंठों पर अमृत-रस जैसे सुरीले स्वरों युक्त बाँसुरी रखी हुई है और सीने पर वैजयंती माला सुशोभित हो रही है। कमर पर छोटी-छोटी घंटियों की करधनी तथा पैरों में बँधे हुए घुँघरू सुरीली आवाज कर रहे हैं। ऐसे मीरा के प्रभु भगवान श्रीकृष्ण संतों को सुख देने वाले, अपने भक्तों से स्नेह करने वाले और गायों का पालन करने वाले मीरा की आँखों में निवास करें।
2. बरसे बदरिया सावन की, सावन की मन भावन की।
सावन में उमग्यो मेरो मनवा, भनक सुनी हरि आवन की।।
उमड़ घुमड़ चहुँ दिश से आया, दामिन दम कै झर लावन की।
नन्हीं नन्हीं बूँदन मेहा बरसे, शीतल पवन सोहावन की।।
मीरा के प्रभु गिरधरनागर, आनंद मंगल गावन की।।
कठिन शब्दार्थ – बदरिया = बदली, छोटा बादल। उमग्यो = उमंग से भर जाना, उत्साहित होना। मनवा = मन। भनक = आहट। चहु = चारों ओर। दामिन = आकाशीय बिजली। दम कै = चमके, ताकत से, लहजे से। झर = झड़ी। मेहा = वर्षा, बरसात। सोहावन = शोभित होना, अच्छी लगने वाली। मंगल = खुशी। भावन = रुचिवर्धन। उमड़ = धावा, घिराव। आवन = आगमन। घुमड़ = बादलों का इधर-उधर से आकर जमा होना। लावन = लावण्य, सुन्दरता। गावन = गाने का ढंग।
प्रसंग-मीराबाई के इस पद में श्रावण के महीने में श्रीकृष्ण के आने की आहट से मन में होने वाली खुशी और उत्साह का वर्णन किया गया है।
व्याख्या – मीराबाई कहती हैं कि मन को अच्छा लगने वाले सावन के महीने में आकाश से जब छोटी-छोटी बदली बरसती है तो मेरा मन उत्साह से भर जाता है, क्योंकि मुझे श्रीकृष्ण के आने की आहट सुनाई देती है। सावन में वर्षा की झड़ी लग जाती है। अतः सावन की उस झड़ी को लाने के लिए चारों दिशाओं से बादल उमड़-घुमड़ कर आते हैं और बिजली चमकती है जिससे नन्हीं-नन्हीं बूँदों से वर्षा होती है और ठण्डी-ठण्डी सुहावनी हवा चलती है। मीराबाई कहती हैं कि मेरे स्वामी श्री गिरधर नागर के आने की आहट से मन आनन्दित होता है और खुशी के गीत गाने की इच्छा जाग जाती है।
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