The latest Class 7 Hindi Notes Malhar Chapter 3 फूल और काँटा Summary in Hindi is designed to make revision simple and effective.
फूल और काँटा कविता Class 7 Summary in Hindi
फूल और काँटा कविता हिंदी भावार्थ सप्रसंग व्याख्या Class 7
कविता-परिचय – प्रस्तुत कविता ‘फूल और काँटा’ अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ की प्रेरणादायी रचना है। इसमें कवि ने बताया है कि एक ही पेड़ से फूल और काँटे दोनों उत्पन्न होते हैं। फूल खुशी एवं सौन्दर्य का प्रतीक है
तथा काँटे सुरक्षा एवं विनाश का प्रतीक हैं। उन्हीं के समान मानव जीवन में सुख और दुःख आते हैं। यह कविता हमें सिखाती है कि जीवन में कठिनाइयों का सामना करना और उनसे भी सीखना महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि कठिनाइयाँ हमें मजबूत और बेहतर बनाती हैं।

सप्रसंग व्याख्याएँ-
1. हैं जनम लेते जगह में एक ही,
एक ही पौधा उन्हें है पालता।
रात में उन पर चमकता चाँद भी,
एक ही सी चाँदनी है डालता।
मेह उन पर है बरसता एक सा,
एक सी उन पर हवायें हैं बही।
पर सदा ही यह दिखाता है हमें,
ढंग उनके एक से होते नहीं।
कठिन शब्दार्थ – पालता = पोषण करता। मेह = वर्षा, बरसात, झड़ी।
प्रसंग – कवि अयोध्यासिंह उपाध्याय अपनी कविता ‘फूल और काँटा’ के माध्यम से बता रहे हैं कि इस संसार में फूल और काँटे दोनों का महत्त्व होता है।
व्याख्या – फूल और काँटे एक ही पौधे पर एक साथ एक ही स्थान पर जन्म लेते हैं, उनका पोषण भी एक ही साथ होता है। रात को चन्द्रमा एक साथ उन पर समान रूप से अपनी चाँदनी बिखेरता है, वर्षा का जल और हवाएँ भी उन्हें एक समान ही मिलती हैं। इन सब के बाद भी हमें फूल और काँटे के रंग-ढंग अर्थात् रूपस्वरूप व व्यवहार एक जैसे दिखाई नहीं देते हैं क्योंकि उनमें यह अंतर होता है कि फूल कोमल, सुगंधित और आनन्द देने वाले होते हैं जबकि काँटे कठोर, नुकीले और सबको कष्ट देने वाले होते हैं।
2. छेद कर काँटा किसी की उँगलियाँ,
फाड़ देता है किसी का वर बसन।
प्यार-डूबी तितलियों का पर कतर,
भौंर का है बेध देता श्याम तन।
फूल लेकर तितलियों को गोद में,
भौंर को अपना अनूठा रस पिला।
कठिन शब्दार्थ – छेद = गड्ढा, चुभना। वर = श्रेष्ठ, सुन्दर। बसन = वस्त्र, आवरण, ढकने की वस्तु, निवास। पर = पंख। कतर = काटना। श्याम = काला।
प्रसंग – फूल और काँटा पाठ के इस काव्यांश के माध्यम से कवि अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ ने फूल और काँटे के प्रभाव को स्पष्ट किया है।
व्याख्या – फूल और काँटे को एक समान सुख-सुविधाएँ मिलने के बावजूद दोनों के स्वभाव में बहुत अंतर होता है क्योंकि काँटा अपने साथ उगने वाले फूल से आकर्षित किसी भी व्यक्ति की उँगलियों में चुभकर छेद कर देता है और उनके सुन्दर कपड़ों को फाड़ देता है। यहाँ तक कि फूलों से प्यार करने वाली तितलियों के पंखों को काट देता है और भौंरे के काले शरीर में चुभकर छेद कर देता है। वहीं दूसरी ओर फूल तितलियों और भौंरों को प्यार से अपनी गोद में लेकर अनोखा रस पिलाता है।
3. निज सुगंधों औ निराले रंग से,
है सदा देता कली जी की खिला।
है खटकता एक सब की आँख में,
दूसरा है सोहता सुर शीश पर।
किस तरह कुल की बड़ाई काम दे,
जो किसी में हो बड़प्पन की कसर।
कठिन शब्दार्थ – निज = अपना, अपनी। जी = हृदय, मन, जान, चित्त, जीव। खटकता = चुभता। सोहता = सुशोभित होता। सुर = देवता। शीश = सिर। कुल = वंश, घराना, गोत्र, समुदाय, श्रेणी, घर, आवास, जनपद। बड़प्पन = बड़ा होने का भाव, श्रेष्ठत्व। कसर = कमी, न्यूनता, घाटा, वैर, विकार।
व्याख्या – कवि कहता है कि फूल अपनी सुगंध तथा अनोखे रंग से सदैव हृदय की कली को खिला देता है। इस तरह एक अर्थात् काँटा सबकी आँखों में चुभता है और दूसरा अर्थात् फूल देवों के सिर पर सुशोभित होता है। फूल और काँय दोनों एक ही कुल के हैं किन्तु दोनों के ढंग में अन्तर है। फूल में कोमलता है और काँटे में कठोरता है। एक ही कुल का होने के बाद भी यदि किसी में बड़प्पन की कमी हो तो कुल की श्रेष्ठता कैसे काम दे सकती है अर्थात् बड़प्पन की कमी होने पर कुल की श्रेष्ठता काम नहीं आती।
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