The latest Class 7 Hindi Notes Malhar Chapter 6 गिरिधर कविराय की कुंडलिया Summary in Hindi is designed to make revision simple and effective.
गिरिधर कविराय की कुंडलिया Class 7 Summary in Hindi
गिरिधर कविराय की कुंडलिया हिंदी भावार्थ सप्रसंग व्याख्या Class 7
कविता परिचय – यहाँ गिरिधर कविराय की दो कुण्डलियाँ संकलित हैं। पहली कुंडलिया हमें किंसी काम को बिना सोचे-समझे करने के परिणामों से सचेत करती है कि बिना सोच-विचार के किया गया काम बिगड़ता है और उपहास का कारण बनता है, मन की शांति को नष्ट करता है और पीड़ा देता है। दूसरी कुंडलिया हमें जो बीत चुका है, उसे भूल कर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है कि हमें पिछली बातों को भूलकर आगे बढ़ जाना चाहिए और आगे हमें वही कार्य करना चाहिए जो सहज हो, क्योंकि ऐसे कार्य में ही सफलता मिलती है और सब ठीक रहता है।

सप्रसंग व्याख्याएँ-
1. बिना विचारे जो करै सो पाछे पछिताय।
काम बिगारे आपनो जग में होत हैंसाय।।
जग में होत हँसाय चित्त में चैन न पावै।
खान पान सन्मान राग रंग मनहिं न भावै॥
कह गिरिधर कविराय दुःख कछु टरत न टारे।
खटकत है जिय माहिं कियो जो बिना बिचारे॥
कठिन शब्दार्थ-पाछे = बाद में, पीछे। पछताय = पश्चाताप करना। बिगारे = खराब करना। आपनो = अपना। हँसाय = हैँसी, उपहास। चित्त = मन, हृदय, जी। चैन = मानसिक शान्ति। सन्मान = प्रशंसा, आदर। राग रंग = मौज-मस्ती, आनन्द-उल्लास। भावै = अच्छा लगना। टरत न टरे = दूर करने से भी दूर न होना। खटकत = चुभना। जिय = हृदय, जी, मन, जान, चित्त, जीव। माहिं = अन्दर, में।
प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश कविराय गिरिधर द्वारा रचित कुंडलियाँ से लिया गया है। इसमें कवि ने सोच समझकर कार्य करने के महत्त्व को समझाया है।
व्याख्या-कवि ने इस कुंडलिया के माध्यम से यह संदेश दिया है कि हर काम करने से पहले परिणाम के विषय में अच्छी तरह सोच-विचार कर लेना चाहिए। यदि बिना सोचे-समझे काम किया जाता है, तो बाद में पश्चाताप करना पड़ सकता है। सोचे-विचारे बिना किया गया काम बिगड़ भी सकता है और सर्वत्र उपहास का कारण बन सकता है। उपहास होने से मानसिक शांति भंग होती है। खाना-पीना, प्रशंसा, मौज-मस्ती, मन को कुछ भी अच्छा नहीं लगता। गिरिधर कविराय कहते हैं कि बिना विचारे किये हुए काम के परिणामस्वरूप उत्पन्न दुःख दूर करने से भी दूर नहीं होते और हृदय में चुभते रहते हैं। इसलिए किसी भी काम को करने से पहले उसके परिणामों के बारे में अच्छी तरह से सोच-विचार कर लेना चाहिए।
2.बीती ताहि बिसारि दे आगे की सुधि लेइ।
जो बनि आवै सहज में ताही में चित देइ ॥
ताही में चित देइ बात जोई बनि आवै।
दुर्जन हैंसै न कोइ चित्त में खता न पावै॥
कह गिरिधर कविराय यहै करु मन परतीती।
आगे को सुख होइ समुझि बीती सो बीती।।
कठिन शब्दार्थ – बीती = गुजर चुकी। ताहि = उसे, उसको। बिसारि दे = भुला दे। सुधि = स्मरण, याद, होश खबर। खता = अपराध, कसूर, भूल, क्षत, घाव। परतीती = प्रतीति, ज्ञान, बोध, हर्ष, विश्वास, दृढ़ निश्चय, आस्था।
प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश कविराय गिरिधर द्वारा रचित कुंडलियाँ से लिया गया है। इसमें कवि ने बीती हुई बातों को भुलाकर भविष्य के बारे में सोचने के लिए कहा है ।
व्याख्या – कवि कहता है कि जो बीत गया है उसे भुलाकर आगे का स्मरण करना चाहिए। अर्थात् अतीत में हुई गलतियों या असफलताओं को याद करके दु:खी नहीं होना चाहिए, उन्हें भूलकर भविष्य की योजना बनानी चाहिए और जिस कार्य में सहज ही सफलता मिलने की सम्भावना हो, उस कार्य को मन लगाकर करना चाहिए। ऐसे कार्य करने में कोई भूल नहीं होती जिससे दुष्ट मनुष्य को उपहास करने का अवसर नहीं मिलता और मन में कोई अफसोस नहीं रहता। गिरिधर कविराय कहते हैं कि जो बीत चुका, वह बीत चुका है, उसे भुलाकर मन में दृढ़ निश्चय करके कुछ ऐसा करना चाहिए जिससे आगे सुख मिले।
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