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Sanskrit Class 7 Chapter 8 Hindi Translation हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः Summary
कक्षा 7 संस्कृत पाठ 8 हिंदी अनुवाद
Sanskrit Class 7 Chapter 8 Hindi Anuvad
पाठ – परिचय / सार
यह पाठ सूक्तियों के माध्यम से हमें जीवन में उपयोगी अनेक नैतिक शिक्षाएँ देता है-
पृथ्वी हमारी माता है- हमें उसकी सेवा करनी चाहिए क्योंकि वह हमें पालन-पोषण देती है ।
रत्न स्वयं नहीं आते हैं-जैसे मूल्यवान वस्तुएँ खोजनी पड़ती हैं, वैसे ही अच्छे लोग और ज्ञान भी प्रयास से ही मिलते हैं ।
स्वस्थ शरीर अनिवार्य है- धर्म या कर्तव्य पालन का पहला साधन शरीर है, अतः उसकी रक्षा करनी चाहिए ।
क्षण और कण का महत्व – समय और धन दोनों थोड़े-थोड़े करके ही एकत्र होते हैं, अत: निरंतर प्रयास जरूरी है ।
विद्यार्थी को मित्रता और आलस्य से बचना चाहिए – विद्या पाने के लिए तप और एकाग्रता चाहिए ।
गुण का सम्मान होता है, न कि उम्र या लिंग का – अच्छे गुणों वाले व्यक्ति का आदर होना चाहिए, चाहे वह किसी भी वर्ग का हो ।
स्वाभिमान बनाए रखें – कभी भी दीन (हीन) वचन न बोलें, आत्मसम्मान बनाए रखें।
ज्ञान का प्रयोग जरूरी है जो अपने ज्ञान को कर्म में उतारता है वही सच्चा विद्वान होता है ।
शील (अच्छा आचरण) सबसे बड़ा आभूषण है- सच्चा सौंदर्य चरित्र में होता है ।
हितकारी और मधुर वचन दुर्लभ होते हैं – जो बात हमारे हित में हो और साथ ही मन को भाए, वैसा बोलना कठिन होता है ।
यह पाठ हमें शिक्षा देता है कि जीवन में ज्ञान, समय, गुण, आचरण, प्रयास और स्वाभिमान का विशेष महत्व है । इन्हीं से सच्चा और सम्मानजनक जीवन संभव है।
पाठ के कठिन शब्दार्थ
पृथिव्याः पृथ्वी का । चर = आचरण करो। कुतूहलम् = उत्सुकता । भाण्डागारः = भण्डार | अन्विष्यति = ढूँढ़ता है। मृग्यते = ढूँढ़ा जाता है। आद्यम् = पहला । क्षणशः = प्रत्येक पल में | कणशः = प्रत्येक कण में । अर्थम् = धन को । साधयेत् = अर्जन करना चाहिए। पणस्य = आयु । मा = मत । ब्रूहि = बोलो। दीनम् = दयनीय । विकत्थनम् = मिथ्या आत्म-प्रशंसा । क्रियावान् = सक्रिय । शीलम् = चरित्र । कुतः = कहाँ से / कैसे । परम् = सर्वश्रेष्ठ । भूषणम् = आभूषण / गहना ।
वार्तालाप –
आचार्य ! अद्य मम माता ……………………………………………………………….. ‘जीवने आचरामः च।
हिन्दी अनुवाद – आचार्य ! आज मेरी माता ने मुझे एक शक्तिशाली (महत्त्वपूर्ण ) शिक्षा दी – ‘सत्य बोलो, धर्म का आचरण करो ।’
हे आचार्य ! ‘सूक्ति’ शब्द से क्या तात्पर्य है?
सूक्ति का अर्थ है – एक सुंदर, प्रभावशाली वचन । ऐसी वाणी या बात में जीवन के महत्वपूर्ण मूल्य छिपे होते हैं। महोदय ! मैं सोच रहा था कि सूक्तियाँ हमें सन्मार्ग की ओर ले जाती हैं ।
सत्य है। सूक्तियाँ हमारे जीवन में मार्गदर्शन करती हैं। संस्कृत साहित्य तो सूक्तियों का एक भण्डार है । आचार्य ! हमारी जिज्ञासा ( उत्सुकता ) बढ़ रही है। हम इन सूक्तियों (प्रेरणादायक वाक्यों ) को पढ़ रहे हैं । हम न केवल पढ़ते हैं, बल्कि उन्हें स्मरण करते हैं और जीवन में उनका आचरण भी करते हैं ।
पाठ की सूक्तियों का अन्वय, संस्कृत भावार्थ एवं हिन्दी अनुवाद / भावार्थ-
(1)
माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः ॥ १ ॥
अन्वयः – भूमिः माता ( अस्ति) अहं पृथिव्या: पुत्र: (अस्मि) ।
संस्कृत – भावार्थ:- पृथ्वी अस्मान् माता इव लालयति पालयति च । अतः भूमिः अस्माकं सर्वेषां माता अस्ति । वयं सर्वे अस्याः पृथिव्याः सन्तानाः स्मः । एषा सर्वदा पूज्या अस्ति ।
हिन्दी अनुवाद – पृथ्वी मेरी माता है और मैं पृथ्वी का पुत्र हूँ
हिन्दी – भावार्थ- पृथ्वी हमारी माता के समान हमें पालती – पोसती है, हमारी रक्षा करती है और हमें जीवन के लिए आवश्यक सब कुछ प्रदान करती है। इसलिए भूमि हम सभी की माता है। हम सभी इस पृथ्वी की संतान हैं । यह धरती सदैव पूजनीय है, क्योंकि यह हमारे जीवन का आधार है ।
(2)
न रत्नमन्विष्यति, मृग्यते हि तत् ॥ २ ॥
अन्वयः – रत्नं न अन्विष्यति, तत् मृग्यते हि ।
संस्कृत-भावार्थ:- हीरकादीनि रत्नानि ग्राहकस्य अन्वेषणं न कुर्वन्ति अपितु ग्राहकाः एव रत्नानाम् अन्वेषणं कुर्वन्ति। तथैव अस्मासु यदि गुणाः सन्ति तर्हि गुणज्ञाः स्वयमेव अस्मान् अन्विष्य आगच्छन्ति।
हिन्दी अनुवाद – रत्न किसी को नहीं खोजता, बल्कि वही खोजा जाता है
हिन्दी – भावार्थ – हीरा आदि रत्न स्वयं ग्राहक की खोज नहीं करते, बल्कि ग्राहक ही रत्नों को ढूँढ़ते हैं । उसी प्रकार, यदि हमारे अंदर गुण (अच्छे स्वभाव, योग्यता, ज्ञान आदि) होंगे, तो गुणों को पहचानने वाले विद्वान या ज्ञानी व्यक्ति स्वयं हमें खोजते हुए हमारे पास आ जाएंगे।
(3)
शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम् ॥ ३॥
अन्वयः – शरीरं खलु आद्यं धर्मसाधनम्।
संस्कृत – भावार्थ:- यदि अस्माकं शरीरं स्वस्थम् अस्ति तर्हि वयं स्वकर्तव्यस्य पालनं कर्तुं शक्नुमः, अतः अस्माभिः स्वशरीरस्य रक्षा सर्वथा करणीया यतः शरीरम् एव धर्मपालनस्य प्रथमं साधनम् अस्ति ।
हिन्दी अनुवाद – शरीर वास्तव में धर्म (कर्तव्य) का पहला साधन है ।
हिन्दी – भावार्थ – यदि हमारा शरीर स्वस्थ होता है, तभी हम अपने कर्तव्य का पालन ठीक प्रकार से कर सकते हैं। इसलिए हमें अपने शरीर की रक्षा और देखभाल अवश्य करनी चाहिए, क्योंकि शरीर ही धर्म (कर्तव्य पालन) का पहला और मुख्य साधन है ।
(4)
क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत् ॥ ४ ॥
अन्वयः – क्षणशः (एव) विद्यां कणशः एव अर्थं च साधयेत् ।
संस्कृत-भावार्थ:- ज्ञानं प्राप्तुं समयस्य निरन्तरम् उपयोगः करणीयः । एकस्य अपि क्षणस्य नाशः न करणीयः । एवम् एव यदि कोऽपि धनस्य सङ्ग्रहं कर्तुम् इच्छति तर्हि सः निरन्तरं रूप्यकस्य सङ्ग्रहणं कुर्यात् । ‘क्षणत्यागे कुतो विद्या, कणत्यागे कुतो धनम् ।’
हिन्दी अनुवाद – विद्या (ज्ञान) को क्षण-क्षण करके और धन को कण-कण करके प्राप्त करना चाहिए ।
हिन्दी – भावार्थ – ज्ञान प्राप्त करने के लिए निरंतर अभ्यास और समय का उपयोग करना आवश्यक है। एक क्षण का भी अपव्यय नहीं करना चाहिए, क्योंकि समय बहुत मूल्यवान है। उसी प्रकार, यदि कोई व्यक्ति धन (संपत्ति) एकत्र करना चाहता है, तो उसे भी थोड़ा-थोड़ा करके रुपयों का संग्रह करते रहना चाहिए। श्लोक के अंत में कहा गया है-“ क्षणत्यागे कुतो विद्या, कणत्यागे कुतो धनम् ।” अर्थात् यदि हम क्षण को व्यर्थ जाने दें तो विद्या नहीं मिलेगी और यदि कण (छोटे-छोटे अंश) को त्याग दें तो धन नहीं मिलेगा ।
(5)
सुखार्थिनः कुतो विद्या, कुतो विद्यार्थिनः सुखम् ॥ ५ ॥
अन्वयः-सुखार्थिनः विद्या कुत: ( भवेत् ), विद्यार्थिनः सुखं कुत: ( भवेत्) ।
संस्कृत-भावार्थ:- :- यः सदैव सुखम् इच्छति, परिश्रमं न करोति, अलसः अस्ति सः कथं विद्यां प्राप्तुं शक्नोति ? अतः यः ज्ञानं लब्धुम् इच्छति सः आलस्यं सुखं च त्यक्त्वा निरन्तरं विद्यार्जनं कुर्यात् 1
हिन्दी अनुवाद – जो व्यक्ति हमेशा सुख या विलासप्रियता चाहता है, उसे विद्या नहीं मिल सकती और जो व्यक्ति सच्चा विद्यार्थी है, वह हमेशा पढ़ाई में लगा रहता है, इसलिए उसे सुख नहीं मिलता।
हिन्दी- भावार्थ- जो व्यक्ति सदैव सुख चाहता है, परिश्रम नहीं करता और आलसी होता है, वह ज्ञान कैसे. प्राप्त कर सकता है ? इसलिए, जो व्यक्ति वास्तव में ज्ञान प्राप्त करना चाहता है, उसे चाहिए कि वह आलस्य और सुख को त्याग दे और निरंतर अध्ययन करता रहे।
(6)
गुणाः पूजास्थानं गुणिषु न च लिङ्गं न च वयः ॥ ६॥
अन्वयः – गुणिषु गुणा: (एव) पूजास्थानं ( भवन्ति) लिङ्गं च न (भवति) वयः च न (भवति) ।
संस्कृत – भावार्थ:- गुणानां सर्वदा एव आदरः भवति । गुणवान् जनः पुरुषः स्त्री वा भवेत्, बालः वृद्धः वा भवेत्, सः सर्वदा पूजनीयः एव भवति । आदरस्य कृते लिङ्गम् आयुः वा महत्त्वपूर्णं न भवति ।
हिन्दी अनुवाद- गुणवान व्यक्ति ही सम्मान के योग्य होते हैं। किसी का लिंग (स्त्री या पुरुष ) या उम्र (आयु) नहीं, बल्कि उसके गुण ही सम्मान के कारण होते हैं ।
हिन्दी – भावार्थ – गुणवान व्यक्तियों का हमेशा आदर और सम्मान किया जाता है । कोई व्यक्ति स्त्री हो या पुरुष, बालक हो या वृद्ध, यदि उसमें गुण हैं, तो वह सदैव पूजनीय होता है। आदर करने के लिए किसी का लिंग (जैसे- स्त्री या पुरुष ) या आयु (जैसे- बच्चा या बूढ़ा ) महत्वपूर्ण नहीं होता, बल्कि उसके गुण ही सबसे अधिक मूल्यवान होते हैं ।
(7)
मा ब्रूहि दीनं वचः ॥ ७ ॥
अन्वयः – (त्वं) दीनं वचः मा ब्रूहि ।
संस्कृत-भावार्थ:-समाजे सर्वविधाः जनाः भवन्ति । केचित् साहाय्यं कुर्वन्ति । केचित् केवलं विकत्थनं क्रुवन्ति, अत: स्वाभिमानी जन: यस्य कस्यापि पुरतः साहाय्यस्य याचनां न कुर्यात् ।
हिन्दी अनुवाद – गिड़गिड़ाकर या आत्मसम्मान खोकर कोई बात मत कहो ।
हिन्दी – भावार्थ- समाज में हर प्रकार के लोग होते हैं- कुछ लोग सच में सहायता करते हैं और कुछ केवल बड़े-बड़े वचन बोलते हैं या दिखावा करते हैं। ऐसे में एक स्वाभिमानी व्यक्ति को चाहिए कि वह किसी भी व्यक्ति से गिड़गिड़ाकर सहायता न मांगे। उसे अपने आत्मसम्मान को बनाए रखते हुए स्वावलंबी बनने का प्रयास करना चाहिए।
(8)
यस्तु क्रियावान् पुरुषः स विद्वान् ॥ ८ ॥
अन्वयः – यः तु क्रियावान् पुरुषः सः विद्वान् (भवति) ।
संस्कृत-भावार्थ:-अर्जितस्य ज्ञानस्य जीवने आचरणेन, व्यवहारे च प्रयोगेण हि मनुष्यः वास्तविकः विद्वान् भवति न तु केवलम् अध्ययनेन । विद्या अनुकूल – कर्मणा विना व्यर्था भवति । ‘ज्ञानं भारः क्रियां विना’ ।
हिन्दी अनुवाद – जो व्यक्ति अपने ज्ञान के अनुसार कार्य करता है, वही सच्चा विद्वान् होता है ।
हिन्दी- भावार्थ – जो ज्ञान अर्जित किया गया है, वह तभी सार्थक होता है जब उसे जीवन में आचरण और व्यवहार में लाया जाए। मनुष्य केवल पढ़ लेने से ही विद्वान् नहीं बनता, बल्कि जब वह उस ज्ञान के अनुसार कर्म करता है, तब ही वह वास्तव में विद्वान् कहलाता है। विद्या यदि अच्छे कर्मों के साथ न जुड़ी हो, तो वह व्यर्थ है । ऐसा ज्ञान जो उपयोग में नहीं लाया गया हो, वह केवल बोझ बनकर रह जाता है। इसलिए कहा गया है- “ज्ञानं भारः क्रियां विना”, अर्थात् कर्म के बिना ज्ञान केवल बोझ है ।
(9)
शीलं परं भूषणम् ॥ ९॥
अन्वयः – शीलं परं भूषणम् (अस्ति ) ।
संस्कृत-भावार्थ:-मनुष्यस्य आचरणम् एव श्रेष्ठम् आभूषणम् अस्ति । सदाचारं विना अन्ये गुणाः निरर्थकाः भवन्ति ।
हिन्दी अनुवाद – अच्छा आचरण मनुष्य का सबसे बड़ा गहना होता है ।
हिन्दी- भावार्थ- – मनुष्य का श्रेष्ठ आचरण ही उसका सबसे बड़ा आभूषण (गहना) होता है ।
यदि किसी व्यक्ति में सज्जनता, नम्रता, सच्चरित्रता जैसे गुण नहीं हैं, तो उसके अन्य गुण (जैसे-रूप, विद्या, धन) भी व्यर्थ हो जाते हैं । सदाचार के बिना अन्य सब विशेषताएँ निरर्थक हैं ।
(10)
हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः ॥ १० ॥
अन्वयः – हितं मनोहारि च वच: दुर्लभं (भवति) ।
संस्कृत-भावार्थ:-केचन हितकारकं वचनं वदन्ति किन्तु तत् कठोरतया वदन्ति । केचन मनोरञ्जकं वाक्यं वदन्ति किन्तु तत् हितकारकं न भवति । तादृशं वचनं दुर्लभं भवति यत् हितकारकम् अपि स्यात्, मनोरमम् अपि स्यात् ।
हिन्दी अनुवाद – जो वचन हितकारी और मन को भाने वाले हों, वे बहुत दुर्लभ होते हैं।
हिन्दी – भावार्थ- कुछ लोग तो हित की बात कहते हैं, लेकिन कठोरता से, जिससे सुनने में अच्छा नहीं लगता। कुछ लोग मीठे और आकर्षक शब्द कहते हैं, पर वे हितकारी नहीं होते। ऐसे वचन जो साथ ही हितकारी भी हों और सुनने में मनोहर भी, अत्यन्त दुर्लभ होते हैं ।
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