Students read RBSE Class 7 Social Science Notes in Hindi and Class 7 SST Chapter 8 Notes in Hindi भौगोलिक क्षेत्र कैसे पावन होते हैं before attending weekly tests.
How the Land Becomes Sacred Class 7 Notes in Hindi
भौगोलिक क्षेत्र कैसे पावन होते हैं Class 7 Notes
कक्षा 7 सामाजिक विज्ञान अध्याय 8 नोट्स भौगोलिक क्षेत्र कैसे पावन होते हैं
→ पावनता क्या हैं?
पावनता का तात्पर्य उन समस्त धार्मिक एवं आध्यात्मिक भावों से है, जो पावन और दिव्य हों तथा आदर एवं श्रद्धा के योग्य हों ।
पावनता केवल धर्म या आध्यात्मिकता से जुड़ी हुई नहीं है, अपितु भारत के संदर्भ में निश्चित भू-भाग, विविध परम्पराओं एवं अन्य विषयों से भी जुड़ी हुई है।
→ भारत में पावन स्थल – भारत के सभी धर्मों के अपने-अपने पावन हैं।
भारत में, भारत से बाहर उद्भव होने वाले धर्मों, जैसे-इस्लाम, ईसाई, यहूदी तथा पारसी धर्म के अनुयायियों का भी पावन स्थल स्थित है और वे अनेक स्थलों को श्रद्धेय मानते हैं। जिनमें राजस्थान का अजमेर शरीफ तथा तमिलनाडु का। वेलांकिनी चर्च विशेष रूप से प्रसिद्ध है। विशेष अवसरों पर श्रद्धालु इन पावन स्थलों की तीर्थ यात्रा करते हैं।
बौद्ध, जैन और सिख धर्म में ऐसे पावन स्थल सामान्य रूप से किसी महान व्यक्ति से संबंधित हैं।
- बौद्ध धर्म के संदर्भ में वे स्थल पावन तीर्थ माने जाते हैं जहाँ महात्मा बुद्ध स्वयं गए थे या जहाँ उनके अवशेष रखे गए हैं। ऐसे पावन स्थल हैं-सांची का प्रसिद्ध स्तूप, बोधगया का महाबोधि स्तूप।
- सिख धर्म में ‘तख्त’ अध्यात्म का आधिकारिक केन्द्र है, जैसे—तख्त श्री पटना साहिब, अकाल तख्त, तख्त श्री केशगढ़ साहिब आदि । सिख परम्परा में उन स्थलों को भी पावन माना जाता है जहाँ उनके गुरुओं ने यात्रा की।
- जैन परम्परा में तीर्थं उन पावन स्थलों से संबद्ध हैं, जहाँ तीर्थंकरों ने मोक्ष प्राप्त किया था।
- हिंदू तथा अन्य लोक तथा जनजातीय मान्यताओं में लोग प्रकृति के तत्वों, जैसे- भूमि, पर्वत, नदी, वृक्ष, पौधे, पशुओं और पत्थरों को पावन मानते हैं। उनकी देवी-देवताओं के रूप में पूजा की जाती है। इसका आधार यह मान्यता है कि कण-कण में दैवीय उपस्थिति है।
→ तीर्थयात्रा – किसी पावन स्थल की यात्रा तीर्थयात्रा कहलाती है। अनेक भारतीय अपने जीवनकाल में विविध पावन स्थलों की यात्रा करते हैं।
हिन्दू धर्म में तीर्थ स्थलों का वृहत जाल है, जो सम्पूर्ण भारत को आपस में जोड़ता है। तीर्थयात्रा की परम्परा लोगों के जीवन में गहराई से जुड़ी हुई है। यह न केवल व्यक्तिगत एवं आध्यात्मिक विकास को पोषित करती है, अपितु व्यापार और अखिल भारतीय सांस्कृतिक एकीकरण के सामाजिक-आर्थिक उद्देश्य को भी समर्थन देती है।
→ पावन भू-भाग से अवगत होना – कुछ हिन्दू चार धामों की यात्रा करने की इच्छा रखते हैं और ये चार पावन स्थल भारत के दक्षिण, पूर्व, उत्तर और पश्चिम में स्थापित हैं।
यही आकांक्षा 12 ज्योर्तिलिंगों के लिए भी होती है। 51 शक्तिपीठ भी संपूर्ण भारत (वर्तमान बांग्लादेश तथा पाकिस्तान सहित) में फैले हैं।
→ पावन पारिस्थितिकी – सम्पूर्ण प्राकृतिक परिदृश्य पावन स्थल के रूप में माना जाता है। इस अवधारणा ने हमें प्रकृति को सुरक्षित और संरक्षित रखने में सहायता की।
→ नदियाँ एवं नदियों का संगम – भारत में वैदिक काल से नदियों की पूजा होती है। नदियों के उद्गम स्रोत, सहायक नदियाँ तथा वे स्थान जहाँ से होकर वे बहती हैं, प्रायः पावन माने जाते हैं।
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→ पर्वत और वन – प्राय: सम्पूर्ण विश्व की दंतकथाओं में पर्वतों का सम्बन्ध देवताओं तथा नायकों से रहा है। भारत के अनेक तीर्थस्थल तथा मंदिर पहाड़ियों की चोटी पर स्थित हैं।
→ वृक्ष, वन तथा पावन निकुंज – भारत के अनेक भागों में हल्दी और कुमकुम से वृक्षों को अलंकृत किया जाता है पीपल का वृक्ष अत्यन्त पावन है। कालांतर में भारत के कई ग्रामीण एवं जनजातीय समुदायों ने वनों को देवताओं का निवास स्थान माना है। ऐसे विशिष्ट वनों को पावन निकुंज कहते हैं जो अपने पावन महत्व के कारण वनस्पतियों एवं जीवों की विशाल जैव विविधता को आश्रय प्रदान करते हैं। भारत में हजारों की संख्या में पावन निकुंज हैं।
→ तीर्थयात्रा से व्यापार तक – तीर्थयात्री अपनी यात्रा क्रम में व्यापारियों तथा व्यावसायियों के सम्पर्क में आते हैं। तीर्थयात्रियों को अनेक प्रकार की वस्तुओं की जरूरत होती है जिन्हें व्यापारी उपलब्ध कराते हैं। परिणामस्वरूप तीर्थयात्रा मार्ग और व्यापार मार्ग परस्पर जुड़ जाते हैं।
→ भारत के बाहर पावन भू-भाग – प्राचीन ग्रीस में पर्वतों से लेकर पावन निकुंज के पावन चिह्न पाए जाते हैं। अमेरिका के मूल निवासी प्रकृति को पावन मानते हैं। न्यूजीलैंड के मूल निवासी माओरी तारानकी माउंगा पर्वत को अपना पूर्वज मानते हैं।
→ पावन स्थलों का पुनरुद्धार और संरक्षण – उपेक्षा और देखभाल की कमी के कारण हमारे पावन स्थल प्रदूषित होते जा रहे हैं हमारी राष्ट्रीय धरोहर की रक्षा करना हमारा कर्तव्य है। हमारा संविधान भी हमें इसकी याद दिलाता है।
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