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RBSE Solutions for Class 9 Sanskrit सरसा Chapter 12 नीतिपीयूषम्

June 7, 2019 by Safia Leave a Comment

Rajasthan Board RBSE Class 9 Sanskrit सरसा Chapter 12 नीतिपीयूषम्

RBSE Class 9 Sanskrit सरसा Chapter 12 पाठ्य-पुस्तकस्य अभ्यास प्रश्नोत्तराणि

RBSE Class 9 Sanskrit सरसा Chapter 12 वस्तुनिष्ठप्रश्नाः

प्रश्न 1.
कुत्र कलहो नास्ति?
(क) मौने
(ख) उद्योगे
(ग) जागरिते
(घ) शयने।
उत्तराणि:
(क) मौने

प्रश्न 2.
चतुर्भिः कम् परीक्ष्यते?
(क) धनम् ।
(ख) रूप्यकम्
(ग) कनकम्।
(घ) पुस्तकम्।
उत्तराणि:
(ग) कनकम्।

प्रश्न 3.
सत्येन कः रक्ष्यते?
(क) विद्या
(ख) रूपम्
(ग) कुलम्
(घ) धर्मः।
उत्तराणि:
(घ) धर्मः।

RBSE Class 9 Sanskrit सरसा Chapter 12 लघूत्तरात्मकप्रश्नाः

(क) कस्मिन् भयं नास्ति?
(ख) कुलं केन रक्ष्यते?
उत्तरम्:
(क) जागरिते भयं नास्ति।
(ख) वृत्तेन कुल रक्ष्यते।

3. निबन्धात्मकप्रश्नाः अधोलिखितश्लोकयोः हिन्दी भाषया अनुवादः करणीयः।
(क) इन्द्रियाणि च संयम्य बकवत् पण्डितो नरः देशकालबलं ज्ञात्वा सर्वकार्याणि साधयेत्॥
(ख) सत्येन रक्ष्यते धर्मो विद्या योगेन रक्ष्यते। मृजया रक्ष्यते रूपं कुलं वृत्तेन रक्ष्यते।
उत्तरम्:
(क) विद्वान् पुरुष को इन्द्रियों को संयमित करके बगुले की तरह देशए काले और बले (अर्थात् दबाव) के जानकर सभी कार्यों को साधना चाहिये।
(ख) सत्य से धर्म की रक्षा होती है, विद्या की रक्षा योग के द्वारा होती है, स्नान से (स्वच्छता से) रूप की रक्षा होती है। सदाचरण से कुल की रक्षा होती है।

4. सन्धिविच्छेदं कुरुत
उत्तरम्:
(क) बहुभिर्रणः = बहुभिः + रणः।
(ख) बहुलाश्च = बहुलाः + च।
(ग) साभिर्मनुष्यैः = सद्भिः + मनुष्यैः।
(घ) वृत्तिरभीतवासः = वृत्तिः + अभीतवासः।
(ङ) श्रीजुषते = श्रीः + जुषते।।

5. अधोलिखितपदेषु धातु-लकार-पुरुष-वचनानां निर्देश कुरुत।
उत्तरम्:
RBSE Solutions for Class 9 Sanskrit सरसा Chapter 12 नीतिपीयूषम् 1

RBSE Class 9 Sanskrit सरसा Chapter 12 अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तराणि

अधोलिखितान् प्रश्नान् संस्कृतभाषया पूर्णवाक्येन लिखत।

प्रश्न 1.
उद्योगे किम् नास्ति?
उत्तरम्:
उद्योगे दारिद्रयं नास्ति।

प्रश्न 2.
पातकं कदा न भवति?
उत्तरम्:
जपत: पातकम् नास्ति।

प्रश्न 3.
मौने किं न भवति?
उत्तरम्:
मौने कलहो न भवति।

प्रश्न 4.
तपः कथं तपेत्?
उत्तरम्:
तपः एकाकिना तपेत्।

प्रश्न 5.
कैः सहगमनं कुर्यात्?
उत्तरम्:
चतुर्भिः सह गमनं कुर्यात्।

प्रश्न 6.
कनकं कथं परीक्ष्यते।
उत्तरम्:
कनकं निघर्षणः छेदन-ताप-ताडनैः चतुर्भिः परीक्ष्यते।

प्रश्न 7.
पुरुषः कथं परीक्ष्यते?
उत्तरम्:
पुरुषः त्यागेन, शीलेन, गुणेन, कर्मणा च परीक्ष्यते।

प्रश्न 8.
कीदृशोऽधिकारी न स्यात्?
उत्तरम्:
निस्पृहोऽधिकारी न स्यात्।

प्रश्न 9.
कः वञ्चकः न भवति?
उत्तरम्:
स्पष्ट वक्ता वञ्चको न भवति।

प्रश्न 10.
नीतिपीयूषं पाठः कस्मात् ग्रन्थात् सङ्कलितः?
उत्तरम्:
नीतिपीयूषं पाठः चाणक्यनीति ग्रन्थात् सङ्कलितः।

स्थूलवर्णपदानि आधृत्य प्रश्न निर्माणं कुरुत-

प्रश्न 1.
कुलं च वृत्तेन रक्ष्यते।
उत्तरम्:
वृत्तेन च किं रक्ष्यते।

प्रश्न 2.
जीवलोकस्य षट् सुखानि।
उत्तरम्:
जीवलोकस्य कति सुखानि?

प्रश्न 3.
पण्डितः देशकालबलं च ज्ञात्वा सर्वाणि कार्याणि साधयेत्।
उत्तरम्:
पण्डित: किं ज्ञात्वा सर्वाणि कार्याणि साधयेत्?

प्रश्न 4.
बहुभिः सह रणं भवति।
उत्तरम्:
कतिभिः सह रणं भवति?

प्रश्न 5.
उद्योगे दारिद्रयं नास्ति।
उत्तरम्:
उद्योगे किं नास्ति?

पाठ परिचय

इस पाठ में प्रस्तुते श्लोक चाणक्य द्वारा रचित चाणक्यनीतिग्रन्थ से और विदुर द्वारा रचित विदुरनीति ग्रन्थ से संकलित किये गये हैं। प्रस्तुत पाठ में कुछ श्लोक संकलित किये गये हैं। ये सरल, बोधगम्य, अनुकरणीय और ग्रहण करने योग्य हैं। ये श्लोक हमारे लिये प्रत्येक कदम पर मार्गदर्शक हैं। अत: (ये) जीवन के लिये उपयोगी भी हैं। मूलपाठ, अन्वय, शब्दार्थ, हिन्दी-अनुवाद एवं

सप्रसङ्ग संस्कृत व्याख्या

1. उद्योगे नास्ति दारिद्रयं जपतो नास्ति पातकम्।
मौने च कलहो नास्ति, नास्ति जागरिते भयम्॥

अन्वयः-उद्योगे दारिद्रयं नास्ति; जपतः पातकं न अस्ति, मौने कलहः च न अस्ति, जागरिते भयं न अस्ति।

शब्दार्थाः–उद्योग = परिश्रमः (जीविकोपार्जन का प्रयास)। दारिद्र्यं = निर्धनता (गरीबी)। जपतः = स्मरणत: (याद करने से)। पातकम् = पापम् (पाप)। कलहः = विवादः (तकरार)। जागरिते = जागृतावस्थायाम् (जागृत अवस्था में)।

हिन्दी अनुवाद-उद्योग (अर्थात् परिश्रम) में धन का अभाव नहीं होता है; जाप से (अर्थात् ईश्वर चिन्तन) से पाप नहीं होता है और मौन (अर्थात् चुप रहने से) कलह नहीं होती है; (और) जागते रहने पर भय नहीं रहता है। सप्रसङ्ग संस्कृत व्याख्या-(प्रस्तुतः श्लोकः अस्माकम् ‘सरसा’ इति पाठ्यपुस्तकस्य नीतिपीयूषम्’ इति शीर्षकात् उद्धृतः अस्ति। नीतिकारः कथयति यत् परिश्रमेण दरिद्रतायाः निवारणम् भवति, ईश्वरस्य आराधनात् दुष्कर्माणि विनश्यन्ते; वाद-विवादे मौनव्रतेन कलहाः न जायन्ते; एवम् सदैव जागरणम् भयमुक्तवातावरणं जनयति।

♦ व्याकरणिक-बिन्दवः-

1. नास्ति = न + अस्ति = दीर्घ-स्वर-सन्धिः।
2. उद्योगे = उत् + योगः, तस्मिन् इति सप्तमी विभक्ति एकवचन।

2. एकाकिनी तपो द्वाभ्याम् पठनं गायनं त्रिभिः।
चतुर्भिगमनं. क्षेत्रं पञ्चभिर्बहुभिर्रणः॥

अन्वयः–एकाकिना तपः, द्वाभ्याम् पठनम्, त्रिभिः गायनं, चतुर्भिः गमनं, पञ्चभिः क्षेत्रम् बहुभिः रणः (भवति) शब्दार्थाः-एकाकिना = एकेनैव (अकेले)। पठनम् = अध्ययनं (अध्ययन)। गायनं = गानम् (गीत गाने का कार्य)। बहुभिः = अधिकाधिकैः (बहुत-से लोगों के साथ)। रणः = युद्धः (लड़ाई)। क्षेत्रम् = तीर्थस्थानम् (पुण्यस्थान)। गमनं = प्रयाणं (प्रस्थान)। हिन्दी

अनुवाद-तपस्या अकेले (एकान्त में); अध्ययन कार्य दो के साथ; गायन (गीत कार्यक्रम) तीन के साथ; गमन (अर्थात् अभियान चलाना) चार के साथ; तीर्थाटन (कम से कम) पाँच के साथ (और) संघर्ष (युद्ध) बहुत सारे लोगों के साथ होता है।

सप्रसंग संस्कृत व्याख्या-प्रस्तुत श्लोकः अस्माकम्। ‘सरसा’ इति पाठ्यपुस्तकस्य नीतिपीयूषम्’ इति पाठात् अवतरित। अस्मिन् श्लोके नीतिकारेण कथितं यत् तपस्या एकान्ते भवति। पठन-पाठने-कार्यम् द्वयोः मध्ये प्रचलति संगीत-कार्यक्रमं त्रीभिः सह संचालितः भवति। किमपि अभियानम् चतुर्भिः सह प्रारभ्यते। तीर्थाटन-विषये पञ्चानाम् पुरुषाणाम् योगदानम् भवेत्। रणे क्षेत्रे विजयप्राप्त्यर्थम् बहूनाम् योद्धानाम् आवश्यकता भवति।

♦ व्याकरणिक-बिन्दवः-

1. चतुर्भिर्गमनम् = चतुर्भिः + गमनम् = विसर्ग सन्धि रुत्व।
2. पञ्चभिर्बहुभिर्रणः = पञ्चभिः + बहुभिः + रणः = विसर्ग रुत्व सन्धि।

3. यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते, निघर्षणच्छेदन-तापताडनैः।
तथा चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते, त्यागेन शीलेन गुणेन कर्मणा॥

अन्वयः-यथा निघर्षणच्छेदन तापताडनैः चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते तथा त्यागेन शीलेन गुणेन कर्मणा (च) पुरुषः परीक्ष्यते।

शब्दार्था:-यथा = येन प्रकारेण (जिस प्रकार से)। निधर्षणं = घर्षणं (घिसना, संघर्ष)। छेदनं = कर्तनम्। (काटना)। ताडनं = प्रहारं (पीटना)। कनकं = स्वर्णम् (सोना)। परीक्ष्यते = परीक्षा क्रियते (परीक्षा की जाती है)। त्यागेन = परित्यागेन (त्यागपूर्वक)। गुणेन = अर्थपूर्णकायेंण (सार्थक कार्य से)। कर्मणा = क्रियमाणक्रियाभिः (किये जाने वाले कर्मों के द्वारा।) पुरुषः = नरः (मनुष्य)।

हिन्दी अनुवाद-जिस प्रकार घर्षण, छेदन, ताप और ताड़ना-इन चार तरीकों से सोने की परीक्षा की जाती है, उसी प्रकार त्याग, शील, गुण (विशेष) और कर्म के द्वारा पुरुष की परीक्षा की जाती है।

सप्रसंग-संस्कृत-व्याख्या–प्रस्तुत श्लोकः अस्माकम् ‘सरसा’ इति पाठ्यपुस्तकात्, ‘नीतिपीयूषम्’ शीर्षकात् उद्धृतः अस्ति। अयम् श्लोकः एकः नीतिगतः श्लोकः अस्ति। अत्र नीतिकार कवि कथयति यत् स्वर्णम् एकम् मूल्यवान् पदार्थम् भवति। तस्य परीक्षा चतुर्भिः विधिभिः क्रियते। घर्षणेन, कर्तनेन, तापेन ताडनेन च। तेनैव प्रकारेण मनुष्यः अपि परीक्ष्यते। मनुष्यः शीलेन, त्यागेन, सत्यकायेंण, परोपकारी गुणेन परीक्ष्यते।

♦ व्याकरणिक-बिन्दवः-

1. यथा = अव्यय पदं।
2. परीक्ष्यते = परि + ईक्ष् धातु आत्मनेपदी।

4. निस्पृहो नाऽधिकारी स्यान्नाकामी मण्डनप्रियः।
नाऽविदग्धः प्रियम् बूयात् स्पष्टवक्ता ने वञ्चकः॥

अन्वयः–निस्पृहः अधिकारी न, मण्डनप्रियः अकामी न, अविदग्धः प्रियं ने ब्रूयात् स्पष्टवक्ता वञ्चकः न भवति।

शब्दार्थाः- निस्पृहः = अनिच्छुकः (इच्छारहित)। मण्डनप्रियः = श्रृंगारप्रियः (श्रृंगार का प्रेमी)। अविदग्धः = मूर्खः (मूर्ख)। वञ्चकः = वञ्चकः (दगाबाज)। स्पष्टवक्ता = वास्तविक वक्ता (स्पष्ट बोलने वाला)। बूयात् = वदेत् (बोलना चाहिये)। प्रियम् = मधुरम् (अच्छा लगने वाला)।

हिन्दी-अनुवाद–(मनुष्य) कामनारहित हो, विशेषाधिकार को प्रगट करने वाला न हो, वासनायुक्त न हो, श्रृंगार-प्रिय हो, प्रियभाषी हो, मूर्ख न हो, स्पष्ट बोलने वाला हो, ठग न हो।

सप्रसंग संस्कृत व्याख्या-प्रस्तुतः श्लोकः अस्माकम् ‘सरसा’ इति पाठ्य-पुस्तकात् नीतिपीयूषं’ इति शीर्षकात्। उद्धृतः अस्ति। अयम् श्लोकः नीति-ग्रन्थेभ्यः सम्बन्धितः अस्ति। नीतिकारः वर्णयति यत् मानव: कामनारहितः भवेत्। सः स्वप्राप्तस्य अधिकारस्य दुरुपयोगं न कुर्यात्। नर: कामवासनया आबद्धः न भवेत्। श्रृंगारम् प्रति अनुरक्ति: अन्यथा न भवति। पुरुषः मूर्खः न भवेत्। सः मृदुभाषी भवेत्। नर: वास्तविकतया (स्पष्टं) वदेत्। सः वञ्चकः न भवेत्। अस्मिन् श्लोके रचनाकारः कथयति यत् मनुष्यः निर्विकारः, निर्लोलुपः, सौन्दर्य-प्रेमी भूयात्। सः संदिग्धं आचरणं न कुर्यात्।

♦ व्याकरणिक-बिन्दव-

1. निस्पृहः = नि + स्पृह।
2. वञ्चकः = वञ्च् + णिच् + ण्वुल्।

5. इन्द्रियाणि चे संयम्य बकवत् पण्डितो नरः।
देशकालबलं ज्ञात्वा सर्वकार्याणि साधयेत्॥

अन्वयः-पण्डितः नरः बकवत् इन्द्रियाणि संयम्य देशकालबलं च ज्ञात्वा सर्वकार्याणि साधयेत्।

शब्दार्थाः–संयम्य = नियन्त्रणं कृत्वा, वशे कृत्वा (वश में करके)। पण्डितः = विद्वान् (बुद्धिमान व्यक्ति)। साधयेत् = कुर्यात् (करें)। ज्ञात्वा = ज्ञानम् प्राप्य (जानकर)। सर्वकार्याणि = सम्पूर्णानि-क्रियाणि (सम्पूर्ण कार्य)। इन्द्रियाणि = अवयवानि (अंग-प्रत्यंग)। देशकालबलं = स्थानस्य समयस्य च बलम् (स्थान और समय का बल)। नरः। = मनुष्यः (मानव)। बकवत् = मीन घाती पक्षी इव (बगुले की तरह)।

हिन्दी अनुवाद-विद्वान् मनुष्य को बगुला पक्षी की तरह (अपनी) इन्द्रियों को वश में करके देश (स्थान विशेष), काल (समय विशेष) के बल (अर्थात् दबाव) को जानकर सभी कार्यों को सिद्ध करना (पूर्ण करना) चाहिये। सप्रसंग संस्कृत व्याख्या–प्रस्तुत पद्यांशः अस्माकम् ‘सरसा इति पाठ्यपुस्तकस्य नीतिपीयूषं” इति शीर्षकात् स्वीकृतः अस्ति। अस्मिन् श्लोके नीतिकारेण मनुष्यस्य एकाग्रता निर्दिश्यते। नीतिज्ञः पुरुषः मानवं कथयति यत् सः स्वमनः वशीकर्तुम् प्रयत्नं कुर्यात्। शारीरिकइन्द्रियाणि अन्त:करणं च नियतं कार्यसिद्धिम् कुर्यात्। यथा-बकः पक्षी जले ध्यानेन स्थित्वा स्वाहारम् गृह्णाति। तथा एव मनुष्यः नरोऽपि स्थितिं परिस्थितिं च ज्ञात्वा समयं अवगच्छेत्। तेनानुसारेण एव क्रियाणाम् सम्पादनं कुर्यात्।

♦ व्याकरणिक-बिन्दवः–

1. संयम्य = सम् + यम् + ल्यप्
2. ज्ञात्वा = ज्ञा + क्त्वा।

6. खलानां कण्टकानां द्विविधैव प्रतिक्रिया।
उपानद् मुखभंगो वा दूरतो वा विसर्जनम्॥

अन्वयः–खलानाम् कण्टकानाम् (च) द्विविधैव प्रतिक्रिया (भवति) उपानद् मुखभंगो वा दूरतो विसर्जनं वा।

शब्दार्थाः-खलानाम् = दुष्टानाम् (दुष्टों का)। कण्टकानाम् = शूलानाम् (कॉटों का या शूलों का)। द्विविधैव = द्विप्रकारेण एव (दो प्रकार से ही)। प्रतिक्रिया = क्रियायाः पश्चात् क्रिया (क्रिया के उत्तर में की जाने वाली क्रिया)। मुखभंगः = मुखभजनं (मुँह को तोड़ देना)। विसर्जनम् = परित्यागम् (त्याग देना)। वा = अथवा (या)। दूरतः = दूरतः (दूर से)।

हिन्दी-अनुवाद-(नीतिज्ञ कहते हैं कि) दुष्टों और कण्टकों की (गतिविधियों की) दो प्रकार से ही प्रतिक्रिया (जवाबी कार्यवाही) होती है। या तो जूतों से उनका मुख भंग कर दिया जाय अर्थात् कुचल दिया जाये या दूर से ही उनका विसर्जन (त्याग) कर दिया जाय।

सप्रसंग-संस्कृत-व्याख्या–प्रस्तुतः पद्यांशः अस्माकं सरसा इति पाठ्यपुस्तकस्य ‘नीतिपीयूषम्’ नामकात् शीर्षकात् उद्धृतो अस्ति। अयम् श्लोकः एकः नीतिपरक श्लोकः अस्ति। नैतिक: पुरुषः संकेतयति यत् दुष्टानाम् शूलानाम् (कण्टकानां) एका एव गतिः भवति। द्वयोरेव गतिविधिः समाना भवति। द्वौ एव सज्जनान् दुखम् पीड़ाम् च दत्तः। अतएव तयोः क्रियाकलापानां निवारणम् अपि द्विविधया कर्त्तव्यम्। पादुकया मुखभंगो कर्तव्यः दूरतः परित्यागः वा कर्तव्यः।

♦ व्याकरणिक-बिन्दवः-

1. विसर्जनम् = वि + सृज् + ल्युट्।
2. दूरतः = दूर + तसिल्।

7. अनन्तशास्त्रं बहुलाश्च विद्याः अल्पश्च कालो बहुविघ्नता च।
यत्सारभूतं तदुपासनीयं हंसो यथा क्षीरमिवाम्बुमध्यात्॥

अन्वयः—कालः अल्पः च बहुविघ्नता च, अनन्तशास्त्रं विद्या: बहुला: च (सन्ति), यत्सारभूतं तदुपासनीयं यथा हंसः क्षीरमिवाम्बुमध्यात् (गृह्णति)।

शब्दार्था:-क्षीरम् = दुग्धम् (दूध)। बहुलाः = प्रचुराः (बहुत-सी)। अम्बुमध्यात् = जलमध्यात् (पानी के बीच से)। अनन्तशास्त्रं = असंख्यग्रन्थाः (अगणितशास्त्र)। विद्याः = कलाः (जानने योग्य विषयभावनाएँ)। अल्पः = न्यूनः (थोड़ा-सा)। बहुलाः = अनेकानि (बहुत-सी)। विघ्नता = कठिनता (कठिनाइयाँ)। यत्सारभूतं = यत्तत्वस्वरूपम् (जो निचोड़ तत्त्व है)। उपासनीयं = पूजनीयं (उपासना करने योग्य)। यथा = येन प्रकारेण (जिस प्रकार से)।

हिन्दी-अनुवाद-(पठनीय) ग्रन्थ (तो) बहत हैं: विद्याएँ भी बहुत-सी हैं, समय (बहुत) कम है और विघ्न-बाधाएँ बहुत-सी हैं। (अत:) जो निचोड़ रूप में तत्त्वस्वरूप (विषयवस्तु) है, उसी की उपासना (साधना, अभ्यास) करनी चाहिये। यथा (जिस प्रकार) हंस दूध और पानी को अलग करके दूध को (ग्रहण) कर लेता है।

सप्रसंग संस्कृत व्याख्या–प्रस्तुत श्लोकः अस्माकम् ‘सरसा’ इति पाठ्यपुस्तकस्य नीतिपीयूषम् पाठात् उद्धृतः अस्ति। अस्मिन् श्लोके विवेकशक्त्याः महत्वं वर्णितम् अस्ति। नीतिकारः कथयति यत् अस्मिन् संसारे अनेके ग्रन्थाः निर्मिताः सन्ति। विभिन्नाः विद्याः वर्तमानाः सन्ति। मानव-जीवन: सीमितः अस्ति। समयः अल्पः अस्ति। अनेन अतिरिच्य विघ्नबाधाः अपि च बहुलाः सन्ति। अतएव एकस्मिन् एव समये समस्त ग्रन्थानाम् विद्यानाम् च अध्ययनं सम्भवम् नास्ति। अतएव ईदृश्याम् स्थित्याम् वयम् सर्वेमानवाः विवेकेन सारभूतानि तत्वानि एव ग्रहणीयाम। यथा हंस नाम्नः पक्षी दुग्धम् नीरात् पृथक् कृत्वा सारं गृह्णाति।

♦ व्याकरणिक-बिन्दवः-

1. उपासनीयम् = उप + आस् + अनीयर्।
2. अम्बुमध्यात् = अम्बोः मध्यात् (षष्ठी तत्पुरुष समास)।

8. आरोग्यमानृण्यमविप्रवासः सद्भिर्मनुष्यैः सह सम्प्रयोगः।
स्वप्रत्ययावृत्तिरभीतवासः षड् जीवलोकस्य सुखानि राजन्।

अन्वयः–(हे) राजन्! आरोग्यम् आनृण्यम्, अविप्रवासः सद्भिः मनुष्यैः सह सम्प्रयोगः स्वप्रत्ययावृत्तिः अभीतवासः षट् जीवलोकस्य सुखानि।

शब्दार्थाः–आरोग्यम् = रुग्णविहीनं (रोगरहित)। आनृण्यम् = ऋणरहितम् (कर्जदार न होना)। सद्भिर्मनुष्यैः = सज्जनैः (अच्छे लोगों के साथ)। स्वप्रत्ययावृत्तिः = यथेच्छं आजीविका (इच्छानुसार जीविका)। अभीतवासः = भयमुक्त निवासः (भयमुक्त स्थान में निवास)। षड् = षट् (छ:)। जीवलोकस्य = संसारस्य (संसार का)।

हिन्दी-अनुवाद-(हे) राजन्। निरोगता, कर्जदार न होना, उच्चस्थान पर रहना, सज्जनों के साथ व्यवहार, अपनी इच्छानुसार आजीविको, भयमुक्तस्थान पर निवास। ये छः (इस) जीवलोक के सुख हैं। सप्रसंग संस्कृत व्याख्या–प्रस्तुत श्लोकः अस्माकम ‘सरसा’ इति ‘नीतिपीयूषम्’ इति पाठात् उद्धृतः अस्ति। अस्मिन् श्लोके जीवलोकस्य सुखानाम् वर्णनं अस्ति। नीतिरचनाकारः कथयति यत् अस्मिन् संसारे सुखमय-जीवनः एको महत्त्वपूर्ण जीवनः भवति। राजानम् सम्बोधयन् सः कथयति यत् हे राजन्! जीवलोकस्य षड् सुखानि सन्ति। प्रथमम्-रोगरहितं. अर्थात् स्वास्थ्यपूर्णशरीरम्, द्वितीयम्-ऋणमुक्त जीवनः, तृतीयम्-उच्चस्थानेषु प्रवासः चतुर्थम् सज्जनैः सहवर्तनम्, पञ्चमम्–स्वतन्त्ररूपेण स्वेच्छानुसारेण च आजीविकायाः अर्जनम्,। षड्-भयमुक्तस्थाने, निरापदे स्थाने वासः।

♦ व्याकरणिक-बिन्दवः-

1. प्रवासः = प्र + वस् + घञ्।
2. सम्प्रयोगः = सम् + प्र + युज् + घञ्।

9. जानाति विश्वासयितुं मनुष्यान् विज्ञातदोषेषु दधाति दण्डम्।
जानाति मात्रां च तथा क्षमां च तं तादृशं श्रीर्जुषते समग्रा॥

अन्वयः-(य:) मनुष्यान् विश्वासयितुम् जानाति, विज्ञातदोषेषु दण्डं ददाति, मात्रां च तथा क्षमां च जानाति, तम् तादृशं (सज्जनम्) समग्रा श्री: जुषते।

शब्दार्थाः–मनुष्यान् = नरान् (इन्सानों को)। विश्वासयितुं = आश्वस्तयितुं (आश्वस्त होने के लिये)। जानाति = वेत्ति (जानता है)। तथा च = एवंञ्च (उसी प्रकार)। मात्रां = परिमाणं (गुण या मापदण्ड को)। क्षमां = सहिष्णुतां (माफी को)। श्रीः = लक्ष्मी: (धन-वैभव)। जुषते = उपभोगं कुरुते (उपभोग करता है)।

हिन्दी अनुवाद-(जो) मनुष्यों को विश्वास दिलाना जानता है (अर्थात् परखता है), अपराधों को जानकर (उनको) दण्ड देता है, गुण (मापदण्ड) तथा उसी प्रकार क्षमा (सहिष्णुता) को (भी) जानता है, उस ऐसे (सज्जन) को सम्पूर्ण धन-वैभव की प्राप्ति होती है।

सप्रसंग संस्कृत व्याख्या–प्रस्तुतः श्लोकः अस्माकं ‘सरसा इति पाठ्यपुस्तकस्य नीतिपीयूषम्’ इति पाठात् उद्धृतो अस्ति। रचनानीतिकारः कथयति यत् यः मनुष्य: मानवान् वेत्ति परीक्षते, तान् परीक्ष्य एवं विश्वासयति, तेषाम् दोषम् अपराधं वा अवगम्य तान् दण्डयति तथा च तेषाम्, गुणान् आकल्य क्षमा ददाति, तादृशम् सज्जनम् लक्ष्मी सर्वमुपेति अर्थात् सः सर्वसाधनसम्पन्नः भवति।

♦ व्याकरणिक-बिन्दवः-

1. जानाति = ज्ञा’ धातुलट्लकार प्रथम पुरुष एकवचन।
2. विश्वासयितुम् = वि + श्वस् + णिच् + तुमुन्।

10. यः प्रमाणं न जानाति स्थाने वृद्धौ तथा क्षये।
कोशे जनपदे दण्डे न स राज्येऽवतिष्ठते॥

अन्वयः—य: स्थाने वृद्धौ क्षये, कोषे जनपदे तथा दण्डे प्रमाणं न जानाति, सः राज्ये न अवतिष्ठते।

शब्दार्था:-यः = जो। स्थाने = उचितरीत्यां (उचित रीति में)। क्षये = व्यये (नुकसान में)। वृद्धौ = विकासे (बढ़ोत्तरी में)। कोशे = भण्डारे (कोष के विषय में)। प्रमाणं = साक्ष्यम् (सबूत)। अवतिष्ठते = स्थाप्यते (स्थापित होता है)।

हिन्दी अनुवाद-जो स्थान विशेष के विषय में, विकास और नुकसान के विषय में, मुद्रा-भण्डार के विषय में, प्रान्त और दण्डविधि के विषय में प्रमाण (अर्थात् जानकारी) नहीं रखता है, वह राज्य में स्थापित नहीं हो सकता (अर्थात् शासन का कार्य सँभाल नहीं सकता)।

संस्कृत-सप्रसंग-व्याख्या-अयम् श्लोकः अस्माकम् ‘सरसा’ इति पाठ्यपुस्तकस्य नीतिपीयूषम्’ नामकात् पाठात् अवतरितः अस्ति। अस्मिन् श्लोके नीतिकारः प्रदर्शयति शासनस्य कार्यभार सोढुम् सुयोग्य: नीतिज्ञः, राजनीतिज्ञः पुरुषः एव भवेत! यः पुरुषः स्थानविशेषस्य गरिमां उचितरीत्या न अवगच्छति, राज्यस्य उत्थाने पतने च वेत्ति न एकत्रीभवति; राज्यस्य निधिविषये अनुभवं न अर्जति, जनपदस्य व्यवस्थायाम्। सिद्धहस्तः नास्ति, दण्डविधान विषये ‘कूटनीतिं चापि न जानाति सः पुरुषः शासनव्यवस्थायाम् श्रृंखलायाम् च स्थापयितुम् समर्थः न भवति।

♦ व्याकरणिक-बिन्दवः–

1. अवतिष्ठते = अव +स्था धातु आत्मने।
2. प्रमाणं = प्र + मा + ल्युट्।

11. सत्येन रक्ष्यते धर्मों, विद्या योगेन रक्ष्यते।
मृजया रक्ष्यते रूपं कुलं वृत्तेन रक्ष्यते॥

अन्वयः-धर्मः सत्येन रक्ष्यते। विद्या योगेन रक्ष्यते। रूपं मृजया रक्ष्यते। कुलं च वृत्तेने रक्ष्यते।

शब्दार्था:-धर्मः = धार्यते इति (जो धारण किया जाये)। सत्येन = ऋतेन हितम् (सच्चाई से)। रक्ष्यते = परिदृश्यते (देख-रेख की जाती है)। विद्या = ज्ञानम् (जानकारी)। योगेन = ध्यायेन/ साधनेन (साधना से)। रूपम् = सुन्दरतां, स्वरूपं (आकार, स्वरूप, सुन्दरता)। मृजया = स्वच्छतया (सफाई से)। कुलं = परिवारं (परिवार)। वृत्तेन = सद्व्यवहारेण, सदाचारेण (सदाचार से)।

हिन्दी-अनुवाद-सत्य से धर्म की रक्षा होती है। योग से विद्या की रक्षा होती है। स्वच्छता (सफाई से) रूप की रक्षा होती है। सद्व्यवहार (सदाचरण) से कुल (परिवार) की रक्षा होती है।

सप्रसंग संस्कृत-व्याख्या–प्रस्तुतः श्लोकः अस्माकम् ‘सरसा’ इति पाठ्यपुस्तकस्य नीति-पीयूषम्’ इति शीर्षकात् उद्धृतोऽस्ति। अस्मिन् पद्यांशे धर्मस्य विद्यायाः, रूपस्य कुलस्य च रक्षण-विषये चर्चा अस्ति। नीतिमर्मज्ञः रचनाकार: कथयति यत् धर्मस्य रक्षा सत्येन भवति। यदि मनुष्यः सत्यं न आचरति, धर्म: विनश्यति। विद्यायाः प्राप्ति: योगेन भवति। योगः युज् इति धातुना निर्मितः अस्ति। योगे ध्यानम् एकाग्रं भवति। रूपं स्वच्छतया सुरक्षितं भवति। रूपं शारीरिक सौन्दर्यं अपि कथ्यते। कुलस्य रक्षा सदाचारेण भवति। कुलं परिवारं अपि कथ्यते। सुन्दरदृष्ट्या अवलोकनम् एव सदाचरणम् भवति।

♦ व्याकरणिक-बिन्दव-

1. धर्म = धारणात् इति धर्म,
2. सत्येन = ऋतेन हितम् इति।

RBSE Solutions for Class 9 Sanskrit 

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