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RBSE Class 10 Social Science Model Paper 1

February 23, 2019 by Fazal Leave a Comment

RBSE Class 10 Social Science Model Paper 1 are part of RBSE Class 10 Social Science Board Model Papers. Here we have given Rajasthan RBSE Class 10 Social Science Sample Paper 1.

Board RBSE
Textbook SIERT, Rajasthan
Class Class 10
Subject Social Science
Paper Set Model Paper 1
Category RBSE Model Papers

RBSE Class 10 Social Science Sample Paper 1

समय : 3.15 घंटे
पूर्णांक : 80

परीक्षार्थियों के लिए सामान्य निर्देश :

  1. परीक्षार्थी सर्वप्रथम अपने प्रश्न-पत्र पर नामांक अनिवार्यतः लिखें।
  2. सभी प्रश्न हल करने अनिवार्य हैं।
  3. प्रत्येक प्रश्न का उत्तर दी गई उत्तर-पुस्तिका में ही लिखें।
  4. जिन प्रश्नों में आन्तरिक खण्ड हैं, उन सभी के उत्तर एक साथ ही लिखें।
  5. प्रश्न-पत्र के हिन्दी व अंग्रेजी रूपान्तरण में किसी प्रकार की त्रुटि/अन्तरविरोधाभास होने पर हिन्दी भाषा के प्रश्न को सही मानें
  6. RBSE Class 10 Social Science Model Paper 1 image 1
  7. प्रश्न संख्या 30 मानचित्र कार्य से सम्बन्धित है और 05 अंक का है।
  8. प्रश्न संख्या 24, 27, 28 तथा 29 में आन्तरिक विकल्प हैं।

प्रश्न 1.
पल्लवकालीन महाबलीपुरम् नगर क्यों प्रसिद्ध है ? [1]

प्रश्न 2.
वर्तमान में अस्तित्व रखने वाली शेरशाह द्वारा निर्मित सर्वाधिक लम्बी सड़क का नाम लिखिए। [1]

प्रश्न 3.
”लोकतंत्र जनता को, जनता के लिए तथा जनता के द्वारा शासन है।” यह कथन किस विद्वान् का है? [1]

प्रश्न 4.
राजस्थान से उत्पाद निर्यात हेतु आप किस निकटतम बन्दरगाह का चयन करेंगे? [1]

प्रश्न 5.
भारत में राष्ट्रीय आय की गणना कौनसी संस्था करती है? [1]

प्रश्न 6.
”प्लान्ड इकॉनॉमी ऑफ इंडिया” पुस्तक के लेखक कौन हैं? [1]

प्रश्न 7
नीति आयोग के वर्तमान अध्यक्ष का नाम लिखिए। [1]

प्रश्न 8.
मुद्रास्फीति किसे कहते हैं? [1]

प्रश्न 9.
गरीबी के दुष्चक्र की परिकल्पना किसने प्रस्तुत की? [1]

प्रश्न 10.
छिपी हुई बेरोजगारी किसे कहते हैं? [1]

प्रश्न 11.
राज्य विधानसभा की दो वित्तीय शक्तियों को समझाइये। [2]

प्रश्न 12.
राज्य में जल संरक्षण की चार विधियों के नाम लिखिए। [2]

प्रश्न 13.
भारतीय कृषि को ऋतुओं के आधार पर कितने भागों में बाँटा गया है? उदाहरण सहित नाम लिखिए। [2]

प्रश्न 14.
ऊर्जा खनिज किसे कहते हैं? भारत में पेट्रोलियम पदार्थ के भण्डार क्षेत्रों के नाम लिखिए। [2]

प्रश्न 15.
सूती वस्त्र उद्योग की स्थापना हेतु आप भारत के किन-किन राज्यों का चयन करेंगे? [2]

प्रश्न 16.
जनसंख्या वृद्धि किसे कहते हैं ? इसके कोई दो कारण लिखिए। [2]

प्रश्न 17.
जल परिवहन किसी भी देश को सबसे सस्ता यातायात प्रदान करता है, क्यों? [2]

प्रश्न 18.
सड़क दुर्घटना की रोकथाम हेतु चार उपाय सुझाइए। [2]

प्रश्न 19.
नगरपालिका अध्यक्ष के रूप में आपके द्वारा ठोस कचरा निस्तारण हेतु अपनाये जाने वाले किन्हीं चार उपायों का उल्लेख कीजिए। [2]

प्रश्न 20.
अशोक के ‘धम्म’ की अवधारणा लिखिए। [4]

प्रश्न 21.
महाराणा प्रताप द्वारा मुगलों के प्रतिरोध का संक्षेप में वर्णन कीजिए। [4]

प्रश्न 22.
औद्योगिक क्रान्ति का प्रारम्भ सर्वप्रथम इंग्लैण्ड में ही क्यों हुआ? कोई चार कारण लिखिए। [4]

प्रश्न 23.
लोकतंत्र की सफलता के लिए आवश्यक परिस्थितियाँ कौन-कौनसी हैं? [4]
(कोई चार) 

प्रश्न 24.
“भारतीय अर्थव्यवस्था एक विकासशील अर्थव्यवस्था है।” कथन के पक्ष में चार तर्क दीजिए।[4]
अथवा
”भारतीय अर्थव्यवस्था एक अविकसित अर्थव्यवस्था है।” कथन के पक्ष में चार तर्क दीजिए। [4]

प्रश्न 25.
मुद्रा के किन्हीं चार प्रमुख कार्यों का उल्लेख कीजिए। [4]

प्रश्न 26.
विधिक जागरूकता लाने हेतु चार उपाय सुझाइए। [4]

प्रश्न 27.
भारतीय राष्ट्रवादी आन्दोलन के दौरान 1919 से 1947 के मध्य की प्रमुख घटनाओं की विवेचना कीजिए। [6]
अथवा
20वीं सदी में राजस्थान के जनजातीय तथा किसान आन्दोलनों पर प्रकाश डालिए।

प्रश्न 28.
संसद के सदन कौन-कौनसे हैं ? संसद की शक्तियों का वर्णन कीजिए। [7]
अथवा
लोकसभा का संगठन बताते हुए, इसके अध्यक्ष की शक्तियों का वर्णन कीजिए।

प्रश्न 29.
राज्यपाल के रूप में आप किन किन शक्तियों का उपयोग करेंगे ? [6]
अथवा
मुख्यमंत्री के रूप में आप किन-किन शक्तियों का उपयोग करेंगे?

प्रश्न 30.
दिये गये भारत के रेखा मानचित्र में निम्नलिखित को अंकित कीजिए [5]
(अ) कोलकाता
(ब) चम्बल घाटी परियोजना
(स) बाड़मेर
(ब) सलेम
(य) दिल्ली।

उत्तर

उत्तर 1.
पल्लवकालीन महाबलीपुरम् नगर इसिलए प्रसिद्ध है, क्योंकि यहाँ पल्लव राजाओं ने पाँच रथ मन्दिरों का निर्माण कराया जिनमें चट्टानों को तराश कर मूर्तियाँ उत्कीर्ण की गयी हैं।

उत्तर 2.
शेरशाह सूरी ने ग्राण्ड ट्रंक रोड़ (जी.टी. रोड़) का निर्माण कराया।

उत्तर 3.
”लोकतंत्र जनता का, जनता के लिए तथा जनता के द्वारा शासन है।” यह कथन अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन का है।

उत्तर 4.
राजस्थान से उत्पाद निर्यात हेतु कांडला बन्दरगाह का चयन करेंगे।

उत्तर 5.
भारत में राष्ट्रीय आय की गणना केन्द्रीय सांख्यिकी संगठन करता है।

उत्तर 6.
”प्लान्ड इकॉनॉमी ऑफ इंडिया” पुस्तक के लेखक सर एम. विश्वेश्वरैया हैं।

उत्तर 7.
भारत का प्रधानमंत्री नीति आयोग का पदेन अध्यक्ष होता हैं।

उत्तर 8.
मुद्रास्फीति-सामान्य कीमत स्तर में सतत् वृद्धि की स्थिति को मुद्रास्फीति कहते हैं। आर्थिक शब्दावली में मूल्य वृद्धि को मुद्रास्फीति कहा जाता है। यह अनेक वस्तुओं अर्थात् वस्तु समूह के लिए कीमत में औसत वृद्धि को बताती है।

उत्तर 9.
गरीबी के दुष्चक्र की परिकल्पना रेग्नार से ने प्रस्तुत की।

उत्तर 10.
जब आधिक्य या अतिरिक्त श्रम को कार्य से हटा भी लिया जाए तो कुल उत्पादन की मात्रा में कमी नहीं आती तो इसे छिपी हुई बेरोजगारी कहा जाता है।

उत्तर 11.
राज्य विधानसभा की वित्तीय शक्तियाँ-राज्य विधानसभा को राज्य के धन पर पूर्ण नियंत्रण प्राप्त होता है। आय व्यय का वार्षिक लेखा (बजट) विधानसभा से स्वीकृत होने पर ही शासन के द्वारा आय-व्यय से संबंधित कार्य किया जा सकता है।

उत्तर 12.
राज्य में जल संरक्षण की चार विधियों के नाम निम्नलिखित
(1) बावड़ी : चतुष्कोणीय, गोल व वर्तुल आकार में निर्मित होती है जिसके प्रवेश मार्ग से मध्य मार्ग तक इंटों तथा कलात्मक पत्थरों का प्रयोग किया जाता है। इनके आगे आँगननुमा भाग होते हैं। इन भागों तक पहुँचने के लिए सीढ़ियाँ बनी रहती हैं।

(2) तालाब : अधिकांश तालाबों का निर्माण ढालू भाग के समीप किया गया है। इस कारण इनका संरक्षण तथा सुरक्षा आसानी से हो जाती हैं।

(3) झीलें : झीलें राज्य में बहते हुए जल का संरक्षण करने में सर्वाधिक प्रचलित स्रोत हैं।

(4) टाँका : पश्चिमी राजस्थान में परम्परागत जल संग्रहण तथा जल संरक्षण स्रोत जो कि प्रत्येक घर तथा खेत में भूमि में 3 से 6 मीटर गहरा गड्ढा खोदकर बनाया जाता है।

उत्तर 13.
भारतीय कृषि को ऋतुओं के आधार पर निम्नलिखित तीन भागों में बाँटा गया हैं।

(1) खरीफ फसल : ये फसलें जून-जुलाई में बोई जाती हैं। तथा अक्टूबर नवम्बर में काटी जाती हैं।
उदाहरण :
चावल, मक्का, बाजरा, मूंगफली, मूंग, उड़द, गन्ना, सोयाबीन आदि।

(2) रबी फसल : ये फसलें अक्टूबर-नवम्बर में बोई जाती हैं तथा मार्च-अप्रेल में काटी जाती हैं।
उदाहरण :
गेहूँ, चना, जौ, तिलहन (अलसी, सरसों), जीरा, धनिया, अफीम, इसबगोल आदि।

(3) जायद फसल : ये फरवरी-अप्रेल में बोई जाती हैं तथा जून जुलाई में काटी जाती हैं।
उदाहरण :
तरबूज, खरबूजा, लौकी, ककड़ी, खीरा आदि।

उत्तर 14.
ऊजां खनिज :
ऐसे प्राकृतिक स्रोत जिन्हें मानव सूर्य, जीवाश्म पदार्थ, परमाणु घटकों से प्राप्त करता हैं।

भारत में पेट्रोलियम पदार्थ के भण्डार क्षेत्र :
भारत में पेट्रोलियम पदार्थ के भाडार आसाम की ब्रह्मपुत्र घाटी व सुरमा घाटी, प. बंगाल में सुन्दर वन डेल्टा, उड़ीसा का पूर्वी तटीय भाग, राजस्थान व सौराष्ट्र क्षेत्र, हिमालय का तराई भाग, उत्तरी व मध्य गुजरात, मुम्बई बेसिन तथा गोदावरी तथा कावेरी डेल्टा क्षेत्र व अरब सागर में बॉम्बे हाई प्रमुख हैं।

उत्तर 15.
पूती वस्त्र उद्योग का स्थानीयकरण कपास उत्पादक क्षेत्रों, रास्ते परिवहन तथा नम जलवायु वाले भागों में हुआ है। इस दृष्टि से भारत के निम्नलिखित राज्यों में सूती वस्त्र उद्योग की स्थापना की जा सकती हैं-

  1. महाराष्ट्र
  2. गुजरात
  3. तमिलनाडु
  4. मध्यप्रदेश
  5. पश्चिमी बंगाल
  6. राजस्थान

उत्तर 16.
जनसंख्या वृद्धि :
जनसंख्या वृद्धि का तात्पर्य किसी विशेष समयान्तराल में किसी देश या राज्य या स्थान के निवासियों की संख्या में परिवर्तन से हैं।

जनसंख्या वृद्धि के कारण : जनसंख्या वृद्धि के दो प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं।

  1. भारत में उच्च जन्मदर जनसंख्या वृद्धि का मुख्य कारण है।
  2. देश में तेजी से घटती मृत्युदर जनसंख्या वृद्धि का दूसरा मुख्य कारण है।

उत्तर 17.
जल परिवहन अन्य परिवहन के साधनों की अपेक्षा सबसे सस्ता पड़ता है, क्योंकि इसके निर्माण में परिवहन मार्गों का निर्माण नहीं करना पड़ता है तथा जल परिवहन के साधनों द्वारा ही यातायात किया जाता है।

उत्तर 18.
सड़क दुर्घटना की रोकथाम हेतु चार उपाय निम्नलिखित

  1. हमें यातायात के नियमों का पालन करना चाहिए।
  2. हमें वाहन निर्धारित गति पर ही चलाना चाहिए।
  3. हमें नशा करके वाहन नहीं चलाना चाहिए।
  4. हमें वाहन गलत तरीके से ओवरटेक नहीं करना चाहिए।

उत्तर 19.
ठोस कचरा निस्तारण के उपाय-ठोस कचरा निस्तारण हेतु अपनाये जाने वाले चार उपाय निम्नलिखित हैं-

(1) कचरा न्यूनीकरण एवं पुनः प्रयोग :
कचरा न्यूनीकरण में उत्पादकों तथा उपभोक्ताओं दोनों को कचरा कम उत्पादित करने के लिए बताया जाता है। जैसे पैकिंग कम करना, कपड़े के पदार्थों के बने थैलों का प्रयोग आदि। पुनः प्रयोग विधि में जनता को पुन: उपयोगी सामान क्रय करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। जैसे, कपड़े, नैपकिन, प्लास्टिक का सामान आदि अवांछित सामान को फाने के बजाय गाढ़ देने, बाँटने तथा दान देने की प्रेरणा दी जाती हैं।

(2) कचरे को पुनः चक्रण :
इसमें कचरे को उपयोगी कच्चे माल के रूप में प्रयोग किया जाता है। पुनः चक्रण प्रक्रिया के तीन स्तर होते हैं-

  • संग्रहीत कचरे में से पुन: चक्रणीय पदार्थों व धातुओं को छाँटकर अलग एकत्रित करना।
  • एकत्रित पदार्थों या धातुओं से कच्चा माल तैयार करना।
  • कचे माल से नए उत्पाद बनाना।

(3) भस्मीकरण :
यह सामान्य थर्मल प्रक्रिया है जिसमें कचरे का दहन ऑक्सीजन की उपस्थिति में किया जाता है। भरमीकरण के बाद कचरा कार्बन डाइऑक्साइड, पानी की भाप तथा रात में बदल जाता है। इस तरीके से ऊर्जा की रिकवरी भी होती है तथा बिजली बनाने के लिए ऊष्मा प्राप्त की जाती है। इससे परिवहन की लागत कम की जाती है तथा ग्रीन हाउस गैस का उत्पादन भी कम होता है।

(4) गैसीकरण और प्यरोलीसिस :
इन प्रक्रियाओं में कचरे के अवयवों को उच्च ताप पर विखंडित किया जाता है। गैसीकरण में कचरे का दहन कम ऑक्सीजन के क्षेत्रों में किया जाता है और प्यरोलीसिस में कचरे का दहन ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में किया जाता है। इसमें दहनीय और बिना दहनीय गैसों के मिश्रण से प्यरोलीसिस द्रव्य पैदा किया जाता है। प्यरोलीसिस में वायु प्रदूषण के बिना ऊर्जा का पुनः भरण किया जाता हैं।

उत्तर 20.
अशोक के’ धम्म’ की अवधारणा- अशोक ने मनुष्य की नैतिक उन्नति के लिए जिन आदर्शों का प्रतिपादन किया, उन्हें ‘धम्म’ कहा गया है। अशोक के धर्म के प्रमुख सिद्धान्त निम्नलिखित थे

  1. पाप कर्म से निवृत्ति
  2. विश्व कल्याण
  3. दया
  4. दान
  5. सत्य और कर्म शुद्धि
  6. साधु स्वभाव, कल्याणकारी कार्य करना तथा पापरहित होना
  7. व्यवहार में कोमलता, पवित्रता, प्राणियों की हत्या न करना, माता-पिता व अन्य बड़ों की आज्ञा मानना, गुरुजनों के प्रति आदर, मित्रों, परिचितों, सम्न्ध यों, ब्राह्मणों, श्रमणों के प्रति दानशीलता व उचित व्यवहार करना।
  8. धम्म में अल्प संग्रह तथा अल्प व्यय का भी विधान था।

धम्म की क्रियान्विति :
अशोक ने धम्म की क्रियान्विति निम्न प्रकार से की-

  1. अशोक ने कौशाम्बी तथा पाटलिपुत्र के महापात्रों को आदेश दिया कि संघ में फूट डालने वाले भिक्षु-भिक्षुणियों को बहिष्कृत किया जाए।
  2. किसी भी यज्ञ के लिए पशुओं का वध न किया जाए।
  3. अशोक ने धम्म यात्राएँ प्रारम्भ की, जिनमें बौद्ध स्थानों की यात्रा की जाती थी तथा ब्राह्मणों, श्रमणों एवं वृद्धों को स्वर्णदान किया जाता था।
  4. अशोक के काल में राजकर्मचारियों प्रादेशिकों, राज्जुकों तथा युक्तकों को प्रति पाँचवें वर्ष धर्म प्रचार करने के लिए यात्रा पर भेजा जाता था। इन्हें अनुसंधान कहा गया है।
  5. अशोक ने धम्म महामात्रों की नियुक्ति की, जिनका मुख्य कार्य था – जनता में धम्म का प्रचार करना, लोगों को कल्याणकारी तथा दानशीलता के कार्य करने हेतु प्रोत्साहित करना, कैदियों को मुक्त कराना या उनकी सजा कम कराना, उनके परिवारों की आर्थिक सहायता करना।

उत्तर 21.
मेवाड़ के अलावा अधिकतर राजपूतों ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली। अकबर ने प्रताप को अधीनता स्वीकार करवाने के त्चिए चार दल भेजे। ये चारों दल प्रताप को समझाने में असफल रहे तो अकबर ने प्रताप को युद्ध में बंदी बनाने की योजना बनाई। अकबर ने मानसिंह को मुख्य सेनापति और आसफखाँ को उसका सहयोगी नियुक्त किया। मानसिंह 3 अप्रैल, 1576 ई. को शाही सेना लेकर युद्ध के लिए निकला। उसने खमनौर के मोलेला नामक गाँव के पास अपना पड़ाव डाला। महाराणा प्रताप ने गोगुंदा और खमनौर की पहाड़ियों के मध्य स्थित हल्दीघाटी नामक घाटी में अपना पड़ाव डाला।

दोनों सेनाओं का 18 जून, 1576 को आमना-सामना हुआ। राजपूतों ने मुगलों पर इतना आक्रामक वार किया कि मुगल सैनिक चारों ओर जान बचाकर भागे। महाराणा प्रताप की नजर मुगल सेनापति मानसिंह पर पड़ी। महाराणा प्रताप ने मानसिंह पर भाले से वार किया परन्तु मानसिंह हौदे में छिप गया और उसके पीछे बैठा अंगरक्षक मारा गया। इसी समय हाथी की सैंड में बंधे जहरीले खंजर से चेतक की टौंग कट गई। उसी समय मुगलों की शाही सेना ने प्रताप को चारों ओर से घेर लिया तय माना झाला ने प्रताप का मुकुट अपने सिर पर रख लिया। प्रताप सुरक्षित निकल गये।

फरवरी, 1577 ई. में स्वयं अकबर और अक्टूबर, 1577 ई. से लेकर नवम्बर, 1579 ई. तक शाहबाज खान को भेजकर अपना उद्देश्य पूरा करने का प्रयास किया। इसके बाद 1580 में अकबर ने अब्दुल रहीम खानखाना को प्रताप से युद्ध करने भेजा। महाराणा के पुत्र ने रहीम खानखाना को हरा दिया। प्रताप ने दिवेर की सम्पूर्ण पाटी पर अधिकार कर लिया। इसके बाद अकबर ने 1584 में आमेर के भारमल के पुत्र जगन्नाथ को प्रताप के विरुद्ध भेजा। जगन्नाथ कछवाहा को भी सफलता नहीं मिली बल्कि उसकी ही मांडलगढ़ में मृत्यु हो गई। इस विजय के बाद 1585 में मेवाड़ के पश्चिमी-दक्षिणी भाग के लुणा चावण्डियाँ को पराजित कर चावण्ड को अपनी आपातकालीन राजधानी अनाया। 1597 ई. में धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाते हुए महाराणा प्रताप के चोट लगी, जिसके कारण 19 जनवरी, 1997 ई. को चावण्ड में उनकी

उत्तर 22.
औद्योगिक क्रान्ति का प्रारम्भ सर्वप्रथम इंग्लैण्ड में होने के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-

  1. जल यातायात की सुविधा-माल के यातायात के लिए जलीय जहाजों का निर्माण करने के लिए पर्याप्त व्यवस्था थी।
  2. उपनिवेशवाद-एशिया, अफ्रीका आदि महाद्वीपों में इंग्लैण्ड ने अनेक उपनिवेश स्थापित कर लिए थे, जहाँ से उसे उद्योगों के लिए कच्चा माल उपलब्ध हो जाता था तथा तैयार माल के लिए बाजार उपलब्ध था।
  3. लोहे व कोयले की उपलब्धियाँ-इंग्लैण्ड में वेल्स, नार्थायरलैण्ड और स्कॉटलैण्ड में उद्योगों के लिए मशीनों और ईधन के लिए लोहे व कोयले की खाने अवस्थित थीं।
  4. कृषि में सुधार-कृषि सुधारों से लोग जमीन पर कृषि के साथ-साथ कारखानों में नौकरी करते थे। अत: उद्योगों के लिए श्रमिकों की कमी नहीं थी।
  5. राजनैतिक क्रांति-सामन्तवाद का प्रभाव स्थायी सरकार के कारण कम हो गया था जिससे व्यापारिक वर्ग के हाथों में राजनैतिक सत्ता आ गई थी।
  6. पूँजी का संचय-इंग्लैण्ड ने विदेशी व्यापार से अधिक मात्रा में पूँजी कमा ली थी जिससे उद्योगों की स्थापना में सहायता मिली।
  7. साहसी निवासी-इंग्लैण्ड के निवासी साहसी, उत्साही तथा कठोर परिश्रमी थे जिससे उद्योगों की स्थापना और संचालन को प्रोत्साहन मिला।

उत्तर 23.
लोकतंत्र की सफलता के लिए आवश्यक परिस्थितियाँ-लोकतंत्र की सफलता के लिए निम्नलिखित परिस्थितियाँ आवश्यक हैं।

(1) शांति तथा व्यवस्था :
लोकतंत्र की सफलता के लिए यह आवश्यक है कि देश में आंतरिक व्यवस्था सामान्य हो तथा युद्ध या बाहरी आक्रमण का भय नहीं हो। ऐसी अवस्था में सत्ता का विकेन्द्रीकरण बना रहता है तथा व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता का उपभोग करते हैं।

(2) सुदढ़ राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था :
लोकतंत्र की सफलता के लिए राष्ट्र की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ होना आवश्यक है। ऐसी स्थिति में राज्य में औद्योगिक शांति बनी रहती है।

(3) शिक्षित व जागरूक जनता :
लोकतंत्र की सफलता के लिए जनता का शिक्षित एवं जागरूक होना आवश्यक है। इससे स्वस्थ जनमत का निर्माण होता है तथा जनता सरकार की लोकतंत्र विरोधी नीतियों व कार्यों का विरोध करने में समर्थ होती है।

(4) जनमत निर्माण के साधनों की स्वतंत्रता :
लोकतंत्र की सफलता के लिए जनमत निर्माण के साधनों – प्रेस, साहित्य, रेडियो, सिनेमा, दूरदर्शन आदि की स्वतंत्रता भी आवश्यक हैं ताकि वे शांतिपूर्ण ढंग से लोकतंत्र विरोधी नीतियों व कार्यों की आलोचना कर शासन को जनता के प्रति उत्तरदायी बनाते रहें।

(5) आर्थिक समानता की स्थापना :
लोकतंत्र के सफल संचालन हेतु राज्य में यथासंभव आर्थिक समानता का होना भी आवश्यक है ताकि राज्य में वर्ग संघर्ष की स्थिति पैदा न हो।

(6) सामाजिक न्याय की स्थापना :
लोकतंत्र की सफलता के लिए व्यक्तियों के बीच धर्म, भाषा, रंग, जाति, लिंग, जन्म-स्थान आदि के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए तथा सभी व्यक्ति कानून के राग समाग हों तथा उन्हें न्यायालय समान कानूनी संरक्षण दे। इससे लोगों में भावात्मक एकता पैदा होती है तथा सामाजिक लोकतंत्र की स्थापना होती है।

उत्तर 24.
भारतीय अर्थव्यवस्था एक विकासशील अर्थव्यवस्था- भारतीय अर्थव्यवस्था एक विकासशील अर्थव्यवस्था है। इस पद में चार तर्क निम्नलिरिंगत हैं।

(1) अर्थव्यवस्था की संरचना में परिवर्तन :
भारत की राष्ट्रीय आय में प्राथमिक क्षेत्र का योगदान निरंतर कम हो रहा है तथा तृतीयक क्षेत्र का योगदान निरंतर बढ़ता जा रहा है, यह भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास का संकेत है।

(2) विशाल एवं तेजी से बढ़ता सेवा क्षेत्र :
वर्तमान में अकेले सेवा क्षेत्र का भारतीय राष्ट्रीय आय में योगदान लगभग 60 प्रतिशत हो गया है तथा व्यापार में लगातार वृद्धि हो रही है। यह भारतीय अर्थव्य वस्था की विकासशीलता का एक महत्वपूर्ण संकेत है।

(3) व्यावसायिक संरचना में परिवर्तन :
देश में अब रोजगार की दृष्टि से प्राथमिक क्षेत्र पर निर्भरता कम हो रही है तथा आधे से अधिक जनसंख्या वर्तमान में उद्योग एवं सेवा क्षेत्र में कार्यरत है। यह हमारी अर्थव्यवस्था की वृद्धि का संकेत है।

(4) आर्थिक एवं सामाजिक आधार संरचना में सुधार :
भारत में आर्थिक एवं सामाजिक आधार संरचना में तेजी से सुधार हो रहा है। विगत वर्षों में देश में विद्युत उत्पादन क्षमता में वृद्धिं हुई, सड़क परिवहन का विकास हुआ है, बैंकिंग एवं बीमा सेवाओं का व्यापक विस्तार हुआ है, शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार हुआ है। ये सभी भारतीय अर्थव्यवस्था की विकासशीलता के संकेत देते हैं।

अथवा
“भारतीय अर्थव्यवस्था एक अविकसित अर्थव्यवस्था :
भारतीय अर्थव्यवस्था एक अविकसित अर्थव्यवस्था है। इस कथन के पक्ष में चार तर्क निम्नलिखित हैं

(1) निम्न प्रति व्यक्ति आय :
भारत की प्रति व्यक्ति आय काफी नीची है। प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय में भारत का स्थान विश्व में 170वाँ रहा है। यहाँ की प्रति व्यक्ति आय न केवल विकसित देशों से बहुत कम है बल्कि चीन तथा श्रीलंका जैसे पड़ोसी देशों की तुलना में भी कम है जिससे यहाँ के लोगों का जीवन-स्तर मिन बना हुआ है। अत: यह इसके अविकसित अर्थव्यवस्था होने का प्रतीक है।

(2) जीवन स्तर की निम्न गुणवत्ता :
शिक्षा व स्वास्थ्य जीवन की गुणवत्ता के दो प्रमुख निर्धारक कारक हैं। भारत में शिक्षा का स्तर काफी नीचा है, साक्षरता दर नीची है, स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव है। तथा जन्म के समय जीवन प्रत्याशी भी कम है।

(3) गरीबी की समस्या :
भारत की लगभग एक-चौथाई जनसंख्या आज भी गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन कर रही है जिसे मूलभूत आवश्यकताएँ भी प्राप्त नहीं हो पा रही हैं। अत: यह अर्थव्यवस्था के अविकसित होने का प्रतीक है।

(4) कृषि पर अत्यधिक निर्भरता :
देश की लगभग आधी जनसंख्या रोजगार की दृष्टि से कृषि पर निर्भर है। अतः कृषि पर |अत्यधिक निर्भरता भी भारतीय अर्थव्यवस्था के अविकसित होने का प्रतीक है।

उत्तर 25.
मुद्रा के प्रमुख कार्य : मुद्रा के चार प्रमुख कार्य निम्नलिखित है।

(1) विनिमय का माध्यम : यह मुद्रा का सबसे प्रमुख कार्य है। इसमें मुद्रा भुगतान के एक साधन के रूप में प्रयोग में ली जाती है। इससे विनिमय का कार्य काफी सुविधाजनक हो गया है।

(2) खाते की इकाई या मूल्य का मापक : मुद्रा मूल्य के सामान्य मापक का कार्य करती है। इसकी सहायता से सभी परतुओं और सेवाओं के विनिमय मूल्य को मुद्रा के रूप में व्यक्त किया जा सकता है। इससे सभी वस्तुओं का मूल्य एकसमान इकाई में मुद्रा में व्यक्त करने से काफी सुविधा होती है।

(3)विलम्बित भुगतानों का मान : मुद्रा वह इकाई है जिसके द्वारा स्थगित या भावी भुगतान सरलता से निपटाए जा सकते हैं । ऋणों को भी मुद्रा के रूप में चुकाया जाना अत्यन्त सरल है।

(4) मूल्य का भण्डार : मुद्रा मूल्य के संचय के रूप में कार्य करती है। मूल्य के भण्डार के रूप में मुद्रा विशिष्ट है क्योंकि यह सर्वाधिक तरल परिसम्पत्ति हैं।

उत्तर 26.
विधिक जागरूकता लाने हेतु उपाय-विधिक जागरूकता लाने हेतु चार उपाय निम्नलिखित हैं।

  1. न्यायिक अधिकारियों एवं विधिक जागरूकता टीम के द्वारा विद्यालयों, महाविद्यालयों एवं सार्वजनिक स्थलों पर विधिक साक्षरता शिविरों का आयोजन किया जाता है तथा लोगों को जागरूक किया जाता है।
  2. विधिक जागरूकता हेतु 8 मोबाइल वैनों के माध्यम से गाँव-गाँव में सचल लोक अदालत एवं विधिक जागरूकता अभियान चलाया जाता है।
  3. दूरदर्शन, आकाशवाणी व कम्युनिटी रेडियों पर नियमित रूप से ‘कानून की बात’ साप्ताहिक कार्यक्रम का प्रसारण किया जा रहा है। राजस्थान दूरदर्शन पर प्रत्येक शनिवार को 7 बजे से 730 बजे तक एवं राजस्थान के सभी आकाशवाणी केन्द्रों पर प्रत्येक रविवार को सायं 5.45 बजे से 6 बजे तक’ कानून की बात’ का प्रसारण जनहित में विधिक जागरूकता हेतु किया जाता है।
  4. जिला विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा लोगों को जागरूक करने के लिए पर्चे व लघु पुस्तिकाएँ छपवाकर वितरित करवाई जाती हैं।

उत्तर 27.
1919 से 1947 के मध्य की प्रमुख घटनाएँ :
भारतीय राष्ट्रवादी आन्दोलन के दौरान 1919 से 1947 के मध्य की प्रमुख घटनाएँ निम्नलिखित हैं

(1) रोलेट एक्ट और जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड :
19 मार्च, 1919 को विधानमंडल ने रोलेट एक्ट पास कर दिया। इस एक्ट के अन्तर्गत किसी भी व्यक्ति को संदेह के आधार पर गिरफ्तार किया जा सकता था। उसे अपील, दलील और वकील का कोई अधिकार नहीं था। इसे ‘काला कानून’ कहा गया। इससे भारतीयों में आक्रोश व्याप्त था। 13 अप्रैल, 1919 को रोलेट एक्ट के विरोध में अमृतसर के जलियाँवाला बाग में एक सभा आयोजित की गई जिसमें 20 हजार व्यक्ति एकत्रित हुए। जनरल डायर ने अपने सैनिकों को गोली चलाने का आदेश दिया। सरकार के अनुसार 379 व्यक्ति मारे गये जबकि कांग्रेस समिति के अनुसार मरने वालों की संख्या 1000 के लगभग थी।

(2) खिलाफत आन्दोलन :
खिलाफत आन्दोलन भारतीय मुसलमानों द्वारा तुर्की के खलीफा के सम्मान में चलाया गया। 19 अक्टूबर, 1919 को सम्पूर्ण देश में खिलाफत दिवस मनाया गया। गाँधीजी ने हिन्दुओं और मुसलमानों की एकता बनाए रखने के लिए खिलाफत आन्दोलन का समर्थन किया।

(3) असहयोग आन्दोलन :
जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड तथा ब्रिटिश सरकार की अत्याचारपूर्ण नीति के कारण 1920 में गाँधीजी ने असहयोग आन्दोलन शुरू कर दिया। इसके अन्तर्गत, सरकारी उपाधियों को छोड़ने, विधानसभाओं, न्यायालयों, सरकारी शिक्षण संस्थाओं, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करने का निश्चय किया गया। 1921 तक इस आन्दोलन में 30 हजार लोग जेल गए। अन्त में 5 फरवरी, 1922 को चौरी-चौरा काण्ड के कारण 12 फरवरी, 1922 को गाँधीजी ने अस्सहयोग आन्दोलन वापस ले लिया।

(4) सविनय अवज्ञा आन्दोलन :
12 मार्च, 1930 को अपने 78 सदस्यों के साथ गाँधीजी ने साबरमती आश्रम से 200 किलोमीटर दूर डांडी के लिए प्रस्थान किया। 6 अप्रैल, 1930 को डांड़ी पहुँचकर गाँधीजी ने नमक बनाकर नमक कानून तोड़ा। गाँधीजी गिरफ्तार कर लिये गये। शीघ्र ही यह आन्दोलन सम्पूर्ण भारत में फैल गया। इस आंदोलन के दौरान 60 हजार लोग जेलों में डाल दिये गये। 5 मार्च, 1931 को गाँधीजी-इरविन समझौते के बाद गाँधीजी ने लंदन में आयोजित दूसरी बार गोलमेज कॉन्फ्रेन्स में हिस्सा लिया, परन्तु वे वहाँ से निराश लौटे और 1932 में सविनय अवज्ञा आन्दोलन पुनः शुरू कर दिया। 1933 में गाँधीजी ने आन्दोलन वापस ले लिया।

(5) व्यक्ति सत्याग्रह :
17 अक्टूबर, 1940 को कांग्रेस ने व्यक्तिगत सत्याग्रह शुरू कर दिया। विनोबा भावे पहले सत्याग्रही थे जिन्हें तीन माह की सजा दी गई। जवाहरलाल नेहरू दूसरे तथा ब्रह्मदत्त तीसरे सत्याग्रहीं थे।

(6) भारत छोड़ो आन्दोलन :
8 अगस्त, 1942 को कांग्रेस समिति की बैठक में गाँधीजी का ‘भारत छोड़ो’ प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया। इस आंदोलन में गाँधीजी ने ‘करो या मरो’ का नारा दिया। परन्तु 9 अगस्त की प्रात:काल को गांधीजी सहित अनेक प्रमुख कांग्रेसी नेता गिरफ्तार कर लिए गए। अब पूरे देश में एक स्वतः स्फूर्त आंदोलन उठ खड़ा हुआ। कारखाने, स्कूलों और कॉलेजों में हड़ताले व कामबंदी हुई। सरकार की दमनकारी नीति से परेशान होकर लोगों ने पुलिस थानों, रेलवे स्टेशनों, डाकखानों आदि पर हमला किया। सरकार द्वारा गोलीबारी करने से 10 हजार से भी अधिक लोग मारे गये। इसके नेताओं ने भूमिगत रहकर आन्दोलन चलाया। इस आन्दोलन ने भार। की आजादी का मार्ग प्रशस्त कर दिया।

अथवा
20वीं सदी में राजस्थान के जनजातीय तथा किसान आन्दोलन : 20वीं सदी में राजस्थान के जनजातीय ता किसान आन्दोलन निम्नलिखित हैं जनजातीय आन्दोलन-राजस्थान के जनजातीय आन्दोलन निम्नलिखित हैं

(1) भगत आन्दोलन :
भीलों के सामाजिक व नैतिक उत्थान के लिए 1883 ई. में गोविन्द गुरु ने सम्प सभा स्थापित की च उन्हें हिन्दू धर्म के दायरे में बनाये रखने के लिए भगत पंथ की स्थापना की। सम्प सभा द्वारा मेवाड़, हूँगरपुर, ईडर, गुजरात, विजयनगर और मालवा के भीलों में सामाजिक जागृति से ब्रिटिश सरकार बड़ी चिन्तित हुई और उसने भीलों को भगत पंथ छोड़ने के लिए दबाव डालना शुरू किया। जब भीलों को बेगार कृषि कार्य के लिए बाध्य किया गया और जंगलों में उनके मूलभूत अधिकार से वंचित किया जाने लगा, तो उन्होंने आन्दोलन आरम्भ कर दिया। अंग्रेजों ने गोविन्द गुरु द्वारा चलाए जा रहे इस सामाजिक सुधार व संगठन के पीछे भील राज्य की स्थापना की सम्भावना व्यक्त की। गोविन्द गुरु को अप्रेल, 1913 में गिरफ्तार कर लिया गया परन्तु बाद में छोड़ दिया गया।

(2) एकी आन्दोलन :
भगत आन्दोलन को कुचलने के बाद भी सरकार ने भीलों के विरुद्ध अपनी दमनकारी नीति जारी रखी। 1917 में भीलों व गरासियों ने मिलकर मेवाड़ के महाराणा को पत्र लिखकर दमनकारी नीति तथा वेगार के विरुद्ध अपना विरोध जताया। परन्तु जब मेवाड़ के महाराणा ने उनकी बातों पर ध्यान नहीं दिया, तो भीलों ने मोतीलाल तेजावत के नेतृत्व में आन्दोलन शुरू कर दिया। यह आन्दोलन एकी आन्दोलन के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

किसान आन्दोलन : राजस्थान के प्रमुख किसान आन्दोलन निम्नलिखित हैं

(1) बिजौलिया किसान आन्दोलन :
बिजौलिया के जागीरदार किशनसिंह ने किसानों पर 84 प्रकार की लाग-बागें लगा दी थीं। 1903 में किसानों पर ‘चंवरी’ कर लगा दिया गया। 1906 में जागीरदार पृथ्वीसिंह ने लोगों पर तलवार बन्थाई कर लगा दिया। अतः बिजौलिया के किसानों ने आन्दोलन शुरू कर दिया। विजयसिंह पथिक के नेतृत्व में किसानों के आन्दोलन में तेजी आ गई। अन्त में 1922 में सरकार ने किसानों की 35 लागतों को माफ कर दिया।

(2) सीकर किसान आन्दोलन :
जब सीकर के राव राजा कल्याणसिंह ने 25 से 50 प्रतिशत तक भू-राजस्व बढ़ा दिया, तो सीकर के किसानों ने आन्दोलन शुरू कर दिया। 1931 में ‘राजस्थान जाट क्षेत्रीय सभा’ की स्थापना हुई और उसके नेतृत्व में ‘ज्ञाट प्रजापति महायज्ञ’ किया गया। महिलाओं के साथ किए गए दुर्व्यवहार के विरोध में एक विशाल महिला सम्मेलन आयोजित किया गया। किसानों ने लगान देने से इंकार कर दिया। पुलिस ने किसानों पर गोलियाँ चलाई जिससे चार किसानों की हत्या हो गई। अन्त में 1935 के अन्त तक सीकर के किसानों की अधिकांश माँगें स्वीकार कर ली गई।

(3) बेगू किसान आन्दोलन :
बिजौलिया किसान आन्दोलन से प्रेरित होकर 1921 में वे के किसानों ने भी आन्दोलन शुरू कर दिया, क्योंकि विभिन्न लागत, लगान की ऊँची दरों व जागीरदार के अत्याचारों के कारण बेगू के किसानों में घोर असंतोष व्याप्त था। दो वर्गों के संघर्ष के बाद बेगूं के जमींदार को झुकना पड़ा और उसने किसानों की मांगों को स्वीकार करते हुए उनसे समझौता कर लिया।

(4) बरड़ किसान आन्दोलन (बूंदी) :
बरड़ के किसानों में भी अनेक प्रकार की लागतों, लगान की ऊँची दरों, बेगार आदि के कारण असंतोष गात था। अतः 1922 में उन्होंने आन्दोलन शुरू कर दिया। 2 अप्रैल, 1923 को डाबी गाँव के किसानों के द्वारा आयोजित सभा पर पुलिस ने गोलियां चलाई जिससे दो किसान मारे गये। अन्त में 1927 के बाद यह आन्दोलन समाप्त हो गया।

(5) नीमूचणा किसान आन्दोलन (अलवर) :
सूअरों के उत्पारा से दु:खी होकर 1921 में नीमूचणा के किसानों ने आन्दोलन शुरू कर दिया। 1923-24 में वहाँ भू-राजस्य की नई दरें लागू कर दी गई जिससे राजपूतों, ब्राह्मणों आदि में आक्रोश व्याप्त था। 14 मई,
1925 को भू-राजस्व के नाम पर होने वाली इस रूट पर चर्चा करने के लिए नीमूचणा नामक स्थान पर किसान एकत्रित हुए, परन्तु राज्य सरकार की सेना ने किसानों पर गोलियाँ चलाना शुरू कर दिया जिससे 56 व्यक्ति मारे गए तथा 600 व्यक्ति घायल हुए। गाँधीजी ने ‘यंग इंडिया’ में इस हत्याकाण्ड को ‘दोहरी डायरशाही’ की संज्ञा दी और इसे जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड से भी अधिक वीभत्स बताया।

उत्तर 28.
संसद के निम्नलिखित दो सदन हैं-

  1. उच्च सदन (राज्यसभा)
  2. निम्न सदन (लोकसभा)

संसद की शक्तियाँ : संसद के कार्य एवं शक्तियों का उल्लेख निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत किया गया है।

(1) विधायी शक्तियाँ :
संसद को संघीय सूची और समवर्ती सूची के विषयों पर कानून निर्माण का अधिकार प्राप्त है। यदि समवर्ती सूची के किसी विषय पर संघीय संसद और राज्य विधानमण्डल दोनों के ही द्वारा कानून निर्माण किया गया है और इन दोनों कानूनों में पारस्परिक विरोध होने की स्थिति में संसद द्वारा निर्मित कानून मान्य होगा। संकटकाल की घोषणा के समय संसद राज्यों के लिए भी राज्य| सूची के विषयों पर कानून बना सकती है। सामान्य काल में भी कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में संसद को राज्य सूची के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार प्रदान किया गया। इसके अलावा सभी संधीय धोत्रों के लिए संसद को सभी विषयों पर कानून बनाने की शक्ति प्राप्त है। संसद को अवशिष्ट विषयों पर भी कानून निर्माण की शक्ति प्राप्त हैं।

(2) संविधान में संशोधन की शक्ति :
संविधान के अनुसार संविधान में संशोधन का प्रस्ताव संसद में ही प्रस्तावित किया जा सकता है, किसी राज्य के विधानमण्डल में नहीं। । संविधान के प्रस्ताव के पुष्टिकरण में संविधान में तीन प्रक्रियायें दी गई हैं

  • संविधान के कुछ अनुच्छेदों में संशोधन संसद सामान्य बहुत के द्वारा कर सकती है।
  • संविधान के अधिकांश अनुच्छेदों में संसद पृथक-पृथक् दोनों सदनों के दो-तिहाई बहुमत से संशोधन पारित कर सकती है।
  • संविधान के कुछ अनुच्छेदों में संशोधन के लिए संसद के दोनों सदनों के 2/3 बहुमत के साथ-साथ भारतीय संघ के आधे राज्यों के विधानमण्डलों की स्वीकृति आवश्यक है।

स्पष्ट है कि संविधान के संशोधन के सम्बन्ध में संसद को महत्त्वपूर्ण शक्ति प्राप्त हैं।

(3) वित्तीय शक्तियाँ :
भारतीय संसद को राष्ट्रीय वित्त पर पुर्ण अधिकार प्राप्त है और संसद प्रतिवर्ष राष्ट्रीय आय व्यय का लेखा नारित करती है। जब तक संसद द्वारा इस बजट को स्वीकार न कर लया जाये तब तक आय-व्यय से संबंधित कोई कार्य नहीं किया जा सकेगा।

(4) प्रशासनिक शक्तियाँ :
संविधान के अनुसार संघीय कार्यपालिका संसद, विशेष रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होता हैं। मंत्रिमण्डल केवल उसी समय तक अपने पद पर रह सकता है, जब तक कि उसे लोकसभा का विश्वास प्राप्त हो।

(5) अन्य शक्तियाँ :

  • संसद के सदस्य राष्ट्रपति के निर्वाचन के लिए गठित निर्वाचक मंडल के अंग हैं तथा ये उपराष्ट्रपति का भी निर्वाचन करते हैं।
  • संसद राष्ट्रपति के विरुद्ध या सर्वोच्च व उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश के विरुद्ध महाभियोग का प्रस्ताव पारित कर उन्हें पदच्युत कर सकती है।

अथवा
लोकसभा का संगठन-लोकसभा के संगठन को निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत स्पष्ट किया गया है।

(1) सदस्य संख्या :
वर्तमान में लोकसभा की सदस्य संख्या 545 है। इन सदस्यों में 530 सदस्य 29 राज्यों से और 13 सदस्य संघीय क्षेत्रों से निर्वाचित होते हैं तथा 2 सदस्य आंग्ल भारतीय वर्ग के प्रतिनिधि के रूप में राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत होते हैं।

(2) निर्वाचन :
लोकसभा के सदस्यों का चुनाव जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से और वयस्क मताधिकार के आधार पर होता है। लोकसभा के सभी निर्वाचन क्षेत्र ‘एकल सदस्यीय’ रखे गये हैं। अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों के लिए स्थान सुरक्षित रखे गये हैं।

(3) सदस्यों के लिए योग्यताएँ :
लोकसभा की सदस्यता के लिए संविधान के अनुसार निम्नलिखित योग्यताएँ होनी आवश्यक हैं-

  • वह व्यक्ति भारत का नागरिक हो।
  • उसकी आयु 25 वर्ष या इससे अधिक हो।
  • वह भारत सरकार अथवा किसी राज्य सरकार के अन्तर्गत कोई लाभ का पद धारण न किये हुए हो
  • वह किसी न्यायालय द्वारा पागल न ठहराया गया हो।
  • वह 1951 जनप्रतिनिधित्व कानून के अनुरूप योग्यताएँ रखता हो।

(4) कार्यकाल :
लोकसभा का कार्यकाल 5 वर्ष है। प्रधानमंत्री के परामर्श पर राष्ट्रपति के द्वारा लोकसभा को समय से पूर्व भी भंग किया जा सकता है।

(5) अधिवेशन :
लोकसभा के अधिवेशन राष्ट्रपति द्वारा बुलाये और स्वागत किये जाते हैं। इस संबंध में नियम केवल यह है कि लोकसभा की दो बैठकों में 6 माह से अधिक का अन्तर नहीं होना चाहिए।

(6) लोकसभा के पदाधिकारी :
लोकसभा के दो प्रमुख पदाधिकारी अध्यक्ष और उपाध्यक्ष होते हैं। अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का निर्वाचन लोकसभा स्वयं करती है। अध्यक्ष लोकसभा की बैठकों की अध्यक्षता करता है और अध्यक्ष की अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष लोकसभा की बैठक की अध्यक्षता करता है।

लोकसभा अध्यक्ष की शक्तियाँ : लोकसभा अध्यक्ष के प्रमुख कार्य व शक्तियाँ निम्नलिखित हैं

(1) लोकसभा की बैठक की अध्यक्षता :
लोकसभा अध्यक्ष के द्वारा लोकसभा की सभी बैठकों की अध्यक्षता की जाती है। उसके द्वारा सदन में शान्ति व्यवस्था और अनुशासन बनाये रखने का कार्य किया जाता है।

(2) लोकसभा की कार्यवाही निश्चित करना :
लोकसभा का समस्त कार्यक्रम और कार्यवाही अध्यक्ष के द्वारा ही निश्चित की जाती है। वह सदन के नेता के परामर्श से विभिन्न विषयों के सम्बन्ध में वाद-विवाद का समय निश्चित करता है। वह सदन के सदस्यों को भाषण देने की अनुमति देता है और भाषणों का क्रम भी उसी के द्वारा निश्चित किया जाता हैं। वह विभिन्न विधेयकों, प्रस्तावों आदि पर मतदान कराकर परिणाम घोषित करता है। वह प्रश्नों को स्वीकार अथवा अस्वीकार करता है और कामरोको प्रस्ताव भी उसकी अनुमति से ही पेश हो सकता है। प्रक्रिया सम्बन्धी सभी विवाद पर उसका निर्णय अन्तिम होता है।

(3) कुछ समितियों का पदेन सभापति :
वह लोकसभा की कुछ समितियों का पदेन सभापति होता है। प्रवर समितियों के सभापतियों को वही नियुक्त करता है तथा इन समितियों में उसके निर्देशन में ही कार्य किया जाता है।

(4) अन्य कार्य :

  • अध्यक्ष ही यह निर्णय करता है कि कोई विधेयक धन विधेयक है अथवा नहीं।
  • संसद और राष्ट्रपति के मध्य सारा पत्र-व्यवहार उसके ही द्वारा होता है।
  • कार्यपालिका से सदन के सदस्यों के अधिकारों की रक्षा का कार्य भी अध्यक्ष द्वारा ही किया जाता है।

उत्तर 29.
राज्यपाल की शक्तियाँ-राज्यपाल की शक्तियों को मोटे रूप से दो भागों में बाँटा जा सकता है
(अ) संवैधानिक कार्यपालिका प्रधान के रूप में शक्तियाँ
(ब) स्वविवेकीय शक्तियाँ। यथा

(अ) राज्यपालिका के संवैधानिक प्रधान के रूप में शक्तियाँ :
राज्यपाल की संवैधानिक अध्यक्ष के रूप में प्रमुख शक्तियाँ निम्नलिखित हैं

(1) कार्यपालिका शक्तियाँ :
संविधान द्वारा राज्य की कार्यपालिका शक्तियाँ राज्यपाल को प्रदान की गई हैं, लेकिन वह इन शक्तियों का प्रयोग मंत्रिपरिषद् व मुख्यमंत्री की सलाह से करता हैं। इस सम्बन्ध में वह मुख्यमंत्री की नियुक्ति करता है तथा अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करता है। वह मंत्रियों के बीच कार्यों का विभाजन करता है। मंत्रिपरिषद् के सदस्यों को पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाता है। वह राज्य के उच्च पदों पर सदस्यों की नियुक्ति करता है।

(2) विधायी शक्तियाँ :
वह व्यवस्थापिका का अधिवेशन बुलाता है, स्थगित करता है तथा व्यवस्थापिका के निम्न सदन को भंग कर सकता है। विधानसभा द्वारा पारित विधेयक को स्वीकृत या अरबीफ़त करता है। एक बार विधेयक को अस्वीकृत करने के पश्चात् यदि विधानसभा उसे पुनः पारित कर उसके पास हस्ताक्षर के लिए भेजती है। तो राज्यपाल को उस पर हस्ताक्षर करने ही होंगे। यदि राज्य के विधानमण्डल का अधिवेशन न हो रहा हो तो राज्यपाल अध्यादेश जारी कर सकता है। राज्यपाल विधानपरिषद् के 1/6 सदस्यों को मनोनीत करता है तथा विधानसभा के आंग्ल-भारतीय समुदाय के एक सदस्य को मनोनीत करता है।

(3) वित्तीय शक्तियाँ :
राज्य विधानसभा में राज्यपाल की पूर्व स्वीकृति के बिना कोई भी धन विधेयक प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। वह व्यवस्थापिका के समक्ष प्रति वर्ष बजट प्रस्तुत करवाता है। राज्य की संचित निधि राज्यपाल के अधिकार में रहती है।

(4) न्यायिक शक्तियाँ :
वह किसी विधि के विरुद्ध अपराध करने वाले व्यक्तियों के दण्ड को कम कर सकता है, स्थगित कर सकता है, बदल सकता है तथा उन्हें क्षमा प्रदान कर सकता है।

(5) अन्य शक्तियाँ :
वह राज्य लोक सेवा आयोग का वार्षिक प्रतिवेदन तथा राज्य की आय-व्यय के सम्बन्ध में महालेखा परीक्षक का प्रतिवेदन प्राप्त कर विधानमण्डल के समक्ष रखता है । वह राज्य के विश्वविद्यालय के कुलपतियों की नियुक्ति करता है तथा उन्हें हटा भी सकता है।

(ब) राज्यपाल की स्वविवेकीय शक्तियाँ :
यद्यपि संविधान में राज्यपाल को स्वविवेक की शक्तियाँ प्रदान नहीं की गई हैं, तथापि कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में राज्यपाल अपने विवेक का प्रयोग कर सकता है। ऐसे अवसर निम्नलिखित हो सकते हैं

  1. विशेष परिस्थितियों में मुख्यमंत्री का चयन तथा मंत्रिपरिषद् को अपदस्थ करना, विधानसभा का अधिवेशन बुलाना, विधानसभा का विघटन करना।
  2. मुख्यमंत्री से सूचना प्राप्त करना
  3. राष्ट्रपति को राज्य की संवैधानिक स्थिति के सम्बन्ध में रिपोर्ट भेजना।
  4. राज्य विधानमण्डल द्वारा पारित किसी विधेयक को राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेजना।
  5. किसी विधेयक को पुनर्विचार हेतु लौयना।
  6. किसी अध्यादेश को प्रस्तुत करने से पूर्व राष्ट्रपति से अनुदेश की याचना करना आदि।

अथवा
मुख्यमंत्री की शक्तियाँ-मुख्यमंत्री मंत्रिपरिषद् का प्रधान होता है। उसकी प्रमुख शक्तियाँ निम्नलिखित हैं।

(1) मंत्रिपरिषद् का निर्माण :
मुख्यमंत्री मंत्रियों का चयन कर उनकी सूनी राज्यपाल को देता है जिसे राज्यपाल स्वीकार कर लेता है। मंत्रियों के चयन में मुख्यमंत्री अपने विवेक के अनुसार कार्य करता

(2) मंत्रियों में कार्य का बँटवारा तथा परिवर्तन :
मुख्यमंत्री मंत्रिपरिषद् के सदस्यों के बीच विभागों का बंटवारा करता है। इसके बाद भी वह जब चाहे तब मंत्रियों के विभागों तथा उसकी स्थिति में परिवर्तन कर सकता है।

(3) मंत्रिमण्डल का कार्य संचालन :
मुख्यमंत्री ही मंत्रिमण्डल की बैठकें बुलाता है, उनकी अध्यक्षता करता है तथा बैठक के लिए ‘एजेण्डा’ तैयार करता है। मंत्रिमण्डल की समस्त कार्यवाही मुख्यमंत्री के निर्देशानुसार ही सम्पादित होती है।

(4) शासन के विभिन्न विभागों में समन्वय :
यदि मंत्रिपरिषद् के दो या अधिक सदस्यों में किसी प्रकार के मतभेद उत्पन्न हो जायें, तो उनके द्वारा इन मतभेदों को दूर कर सामंजस्य स्थापित किया जाता है।

(5) मंत्रिमण्डल और राज्यपाल के बीच कड़ी का कार्य :
मुख्यमंत्री मंत्रिमंडल के निर्णयों की सूचना राज्यपाल को देता है और राज्यपाल के विचार मंत्रिमंडल तक पहुँचाता है। इस प्रकार वह दोनों के बीच सम्पर्क सूत्र का कार्य करता है।

(6) विधानसभा का नेता :
मुख्यमंत्री शासन के प्रधान के साथ-साथ विधानसभा का नेता भी है। विधानसभा के नेता के रूप में कानून निर्माण का कार्य वह अपनी इच्छानुसार पूर्ण कराता है। विधानसभा के नेता के रूप में वह राज्यपाल को विधानसभा भंग करने परामर्श भी दे सकता है।

उत्तर 30.
RBSE Class 10 Social Science Model Paper 1 image 2

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