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RBSE Class 12 History Notes Chapter 1 भारत का वैभवपूर्ण अतीत

July 18, 2019 by Prasanna Leave a Comment

RBSE Class 12 History Notes Chapter 1 भारत का वैभवपूर्ण अतीत are part of RBSE Solutions for Class 12 History Notes. Here we have given Rajasthan Board RBSE Class 12 History Notes Chapter 1 भारत का वैभवपूर्ण अतीत.

Rajasthan Board RBSE Class 12 History Notes Chapter 1 भारत का वैभवपूर्ण अतीत

भारतीय इतिहास की जानकारी के स्रोत:

  • इतिहास में मानव का सम्पूर्ण अतीत समाहित होता है। विज्ञान, अर्थशास्त्र, समाज, राजनीति, धर्म व दर्शन आदि क्षेत्रों में किये गये क्रियाकलाप इतिहास के अन्तर्गत आते हैं।
  • इतिहास का अध्ययन करने के लिए प्रयुक्त साधनों को साक्ष्य कहा जाता है।
  • कर्नल अल्काट के अनुसार मानव संस्कृति का उद्गम स्थल भारत ही है।
  • विविधता में एकता भारतीय संस्कृति की प्रमुख विशेषता है।
  • भारतीय इतिहास की जानकारी के स्रोतों को मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित किया गया है-
    • साहित्यिक स्रोत,
    • पुरातात्विक स्रोत।
  • साहित्यिक स्रोतों में धार्मिक साहित्य, धर्मेतर साहित्य तथा वंशावलियों का महत्वपूर्ण स्थान है।
  • धार्मिक साहित्य के अन्तर्गत वेद, पुराण, उपनिषद्, वेदांग साहित्य, बौद्ध ग्रंथ, जैन ग्रंथ आदि आते हैं जिनमें तत्कालीन भारतीय संस्कृति की स्पष्ट झलक मिलती है। ली है। धर्मेतर साहित्य में ऐतिहासिक ग्रंथ (अर्थशास्त्र, राजतरंगिणी) तथा विशुद्ध साहित्यिक ग्रंथ (महाभाष्य, अष्टाध्यायी, । गार्गी संहिता, मालविकाग्निमित्र, मुद्राराक्षस, मृच्छकटिकम्,, मिताक्षरा, नीतिसार) प्रमुख हैं।
  • यूनानी लेखकों के प्रमुख ग्रंथ (मेगस्थनीज की इंडिका, टॉलमी का भूगोल, एरिस्टोब्युलस की ‘हिस्ट्री ऑफ दी वार’ प्लिनी दी एल्डर की नेचुरल हिस्ट्री) एवं चीनी यात्रियों (फाह्यान, ह्वेनसांग, इत्सिंग) के विवरणों से भारतीय समाज एवं संस्कृति में विशेष प्रकाश पड़ा है।
  • पुरातात्विक साक्ष्य प्राचीन भारतीय इतिहास की जानकारी के प्रामाणिक साधन हैं।
  • पुरातात्विक स्रोतों में उत्खनन से प्राप्त पुरावशेष, अभिलेख, सिक्के, मुद्राएँ, स्मारक एवं भवन, मूर्तियाँ, शैलचित्र कला अन्य कलाकृतियाँ प्रमुख हैं।

भारतीय संस्कृति का विश्व संचार: 

  • प्राचीनकाल में भारतीय संस्कृति का विश्व में प्रसार था।
  • प्राचीनकाल में भारत आर्थिक रूप से समृद्ध था तथा नैतिक एवं मानवीय आचरण में अग्रणी रहा।
  • पश्चिमी इतिहासकारों और विद्वानों; जैसे-म्यूर, सरवाल्टर रैले, कर्नल अल्काट, फ्रांसीसी दार्शनिक वाल्टेयर, मैक्समूलर, प्लेटो, केंट आदि ने भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठता सम्बन्धी उद्गार प्रकट किये हैं।
  • भारत के विस्तार की दृष्टि से यूरोपीय विद्वान सिलवेनलेवी ने ‘ भारत के लिए भारतीय द्वीप समूह’ शब्द का प्रयोग किया। जिसका विस्तार जावा, सुमात्रा, मलाया, कम्बुज, श्याम, चम्पा, बर्मा, लंका तथा पश्चिम में अफगानिस्तान तक था। भारतीयों ने अपनी संस्कृति का विस्तार चारों दिशा में किया तथा विश्व को भारतीय दर्शन, विज्ञान, ज्योतिष, स्थापत्य, युद्ध शास्त्र, नीतिशास्त्र, संगीत, वैदिक ग्रन्थों आदि से अवगत कराया।
  • राजा भोज द्वारा रचित ‘युक्तिकल्पतरु’ में नौका निर्माण एवं नौकाओं के प्रकार का विवरण मिलता है जिससे भारत की नाविक शक्ति का प्रमाण मिलता है। भारत का वैभवपूर्ण अतीत
  • पाँच-छः हजार वर्ष पूर्व हमारे यहाँ विकसित बन्दरगाह थे। लोथल, ताम्रलिप्ति, मच्छलीपट्टनम, कावेरीपट्टन, मालवण, दंभोल, कोटायम् एवं कोणार्क आदि प्रमुख बन्दरगाह आवागमन तथा आयात-निर्यात के लिए प्रसिद्ध थे।

भारत में प्रागैतिहासिक पाषाण संस्कृति:

  • मानव के विकास का वह भाग जिसका लिखित विवरण उपलब्ध है, ऐतिहासिक काल कहा जाता है परन्तु इस भाग से पूर्व भी मानव इस धरती पर लाखों वर्ष रह चुका था जिसका कोई लिखित विवरण प्राप्त नहीं होता, प्रागैतिहासिक काल कहलाता है।
  • आदि मानव का अध्ययन विद्वानों ने उत्खनन में मिले औजारों, बर्तनों, जानवरों की अस्थियों के आधार पर किया है। ये औजार अधिकांशत: पत्थर के बने हुए हैं। अत: मानव विकास के प्रारम्भिक काल को पाषाण काल कहते हैं।
  • .पाषाणकाल को सामान्यत: तीन प्रमुख उपविभागों में विभाजित किया गया है-
    • पुरापाषाण काल,
    • मध्य पाषाण काल,
    • नवपाषाण काल
  • नवपाषाण काल में मनुष्य पशुपालन तथा कृषि कार्य की ओर अग्रसर हुआ तथा इसी के साथ आर्थिक एवं सांस्कृतिक विकास के नये युग की शुरूआत हुई।

सिन्धु सरस्वती सभ्यता:

  • सिन्धु सभ्यता के प्रमुख स्थल हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो हैं।
  • 1921 ई० में दयाराम साहनी ने हड़प्पा स्थल का उत्खनन किया तथा 1922 ई० में राखालदास बनर्जी ने मोहनजोदड़ो का पता लगाया।
  • इस सभ्यता के अधिकांश स्थल सिन्धु तथा सरस्वती नदी के आस-पास थे। इसी कारण इसे सिन्धु सरस्वती सभ्यता कहा जाता है।
  • सिन्धु सरस्वती सभ्यता का विस्तार भारत सहित वर्तमान पाकिस्तान व अफगानिस्तान में था। इसका विस्तार पश्चिम से पूर्व तक 1600 किमी. व उत्तर से दक्षिण तक 1400 किमी. था।
  • सरस्वती नदी वैदिक काल में लोगों के जीवन का आधार थी इसकी एक शाखा प्रभास पट्टन में जाकर सिन्धु सागर में मिलती थी तथा दूसरी शाखा सिन्धु में प्रविष्ट होकर कच्छ के रण में समा जाती थी।
  • व्यवस्थित नगर नियोजन व उचित जल निकासी प्रबन्ध सिन्धु सरस्वती सभ्यता की प्रमुख विशेषता है।
  • सिन्धु सरस्वती सभ्यता का भवन निर्माण कौशल उत्तम कोटि का था। मोहनजोदड़ो से प्राप्त विशाल स्नानागार, विशाल अन्नागार, विशाल जलाशय व स्टेडियम तथा विशाल गोदीवाड़ा इस सभ्यता की भवन निर्माण कला के उत्कृष्ट नमूने हैं।
  • इस सभ्यता से प्राप्त अवशेषों में पत्थर की मूर्तियाँ, मणके, मृदभाण्ड, मुहरें, कांस्य मूर्तियाँ व पात्र यहाँ की कला के उत्कृष्ट प्रमाण हैं।
  • सिन्धु सभ्यता में मुहरों पर 2500 लेख उपलब्ध हो चुके हैं। इनकी लिपि भाव चित्रात्मक लिपि है।
  • सिन्धु सरस्वती सभ्यता के लोग धातु उद्योग, मनका उद्योग, वस्त्र उद्योग तथा मिट्टी के बर्तन बनाने की कला से भली-भाँति परिचित थे।
  • इस सभ्यता के मेसोपोटामिया के लोगों के साथ व्यापारिक सम्बन्ध थे।
  • सिन्धु सरस्वती सभ्यता के निवासी वृक्ष, जल, पशु, मातृदेवी आदि की पूजा करते थे।
  • सिन्धु सभ्यता के प्रशासनिक केन्द्र-हड़प्पा । मोहनजोदड़ो, लोथल व कालीबंगा थे जिनमें पूर्ण व कुशल राजसत्ता नियंत्रण के प्रमाण मिलते हैं।
  • सिन्धु सभ्यता के लोगों के अन्य संस्कृतियों; जैसे-सुमेरियन सभ्यता, बेबीलोन की सभ्यता तथा मेसोपोटामियो की सभ्यता के साथ सांस्कृतिक सम्बन्धों के प्रमाण भी मिलते हैं।

वैदिक काल से महाजनपद काल तक भारत की उपलब्धियाँ:

  • जिस युग में वैदिक साहित्य की रचना हुई उसे वैदिक काल कहा जाता है।
  • वैदिक साहित्य के अन्तर्गत चारों वेद (ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद एवं अथर्ववेद); संहिताएँ, मंत्र खण्ड, आरण्यक तथा उपनिषद् सम्मिलित हैं।
  • पुराणों में भी हमें विभिन्न घटनाओं का क्रमबद्ध इतिहास देखने को मिलता है। इनकी संख्या 18 है। प्रमुख पुराणों में मत्स्य, वायु, विष्णु, ब्रह्माण्ड, भागवत, अग्नि, मार्कण्डेय आदि उल्लेखनीय हैं।
  • वैदिक काल के राजनीतिक जीवन की सबसे छोटी इकाई कुल थी। राष्ट्र-जन-विश-ग्राम व कुल राजनैतिक संगठन का अवरोही क्रम था।
  • ऋग्वेदिक काल में सभा व समिति नाम की दो महत्वपूर्ण संस्थाएँ शासन संचालन में महत्वपूर्ण योगदान करती थीं।
  • वैदिक युग में राजतन्त्रीय शासन प्रणाली प्रचलित थी। राजा राज्य का सर्वोच्च अधिकारी होता था।
  • महाकाव्य काल में दो प्रमुख महाकाव्यों रामायण तथा महाभारत की रचना हुई । इन महाकाव्यों से भी भारतीय इतिहास व संस्कृति की जानकारी मिलती है।
  • उत्तर वैदिक काल में छोटे जन (कबीलों) ने बड़े राज्यों का रूप ले लिया इसलिए ये जनपद कहलाने लगे। जनपदों में भू-विस्तार के लिए आपसी संघर्ष होने लगा। निर्बल राज्य शक्तिशाली राज्यों में विलीन हो गये और जनपदों का रूप महाजनपदों ने ले लिया।
  • इस समय चार महाशक्तिशाली महाजनपदों का उदय हुआ-कोसल मगध वत्स और अवन्ति ।
  • महाजनपदों की शासन व्यवस्था राजतंत्रात्मक थी। सोलह में से दस राज्यों में गणतंत्रात्मक शासन प्रणाली थी।
  • प्राचीन भारतीय समाज में वर्णाश्रम व्यवस्था थी। इस काल में समाज ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र नामक चार वर्षों में विभाजित था।
  • मानव जीवन में आश्रमों का बड़ा महत्व था। मानव का सम्पूर्ण जीवन ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास आश्रमों में विभक्त था।
  • भारत में व्यक्तिगत जीवन को सुव्यवस्थित कर पूर्णता की ओर ले जाने के लिए जिन धार्मिक व सामाजिक क्रियाओं को अपनाया गया उन्हें संस्कार कहा जाता है। भारतीय संस्कृति में 16 संस्कारों का उल्लेख है।
  • भारत में मानव के लिए अनुसरण करने योग्य मूल्य चार पुरुषार्थ हैं-धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष।
  • ऋण व यज्ञ की अवधारणा भी भारतीय संस्कृति का महत्वपूर्ण भाग है। भारतीय ऋषियों ने तीन ऋणों (देव ऋण, ऋषि ऋण व पितृ ऋण) व पाँच महायज्ञों की व्यवस्था की है।
  • प्राचीन भारतीय समाज ने कला, खगोल विज्ञान, ज्योतिष विज्ञान, भौतिक तथा रसायन विज्ञान के क्षेत्र में अभूतपूर्व उन्नति की।
  • कला के क्षेत्र में जैन धर्म तथा बौद्ध धर्म के अनुयायियों द्वारा निर्मित मंदिर, मठ, चैत्य, विहार, स्तूप, मूर्तियाँ, गुफाएँ आदि प्रसिद्ध हैं।
  • आयुर्वेद के त्रिधातु सिद्धान्त, त्रिदोष सिद्धान्त, पंच भौतिक देह व उसका पुरुष प्रकृति सम्बन्ध, सांख्य दर्शन का सप्तधातु सिद्धान्त चिकित्सा के क्षेत्र में अतुलनीय देन हैं।
  • दशमलव प्रणाली एवं शून्य का आविष्कार भारत में ही हुआ था।
  • प्राचीन ज्योतिषविदों द्वारा प्रतिपादित चन्द्र परिभ्रमण, पृथ्वी का अपने अक्ष पर भ्रमण, बारह राशियाँ, सत्ताईस नक्षत्र, तीस दिन का चन्द्र मास, बारह मास का वर्ष, चन्द्र व सौरवर्ष में समन्वय हेतु तीसरे वर्ष पुरुषोत्तम मास (अधिक मास) द्वारा समायोजन आदि सिद्धान्त आज भी यथावत् अनुसरण किये जाते हैं।
  • कणाद ऋषि जो वैशेषिक दर्शन के रचयिता एवं अणु सिद्धान्त के प्रवर्तक थे। उन्होंने पदार्थ, उसके संघटक तत्व व गुण का सिद्धान्त प्रतिपादित किया।
  • यूरोप में 14वीं शताब्दी में भौतिकी के जो सिद्धान्त प्रस्तुत किये गये वे पाँचवीं शताब्दी के प्रशस्तवाद के ‘पदार्थ धर्म संग्रह’ व व्योम शिवाचार्य के व्योमवती ग्रंथों में उपलब्ध हैं।
  • भारतीयों के रासायनिक मिश्रण के ज्ञान का उत्कृष्ट उदाहरण मेहरौली का लौह स्तम्भ है। जो आज भी बिल्कुल यथावत है।
  • भारतीय संस्कृति अन्य संस्कृतियों की अपेक्षा गतिमान, विस्तृत तथा चिर स्थायी रही है।

अध्याय में दी गई महत्वपूर्ण तिथियाँ एवं सम्बन्धित घटनाएँ:
कालावधि — घटना/विवरण
399 – 414 ई० — चन्द्रगुप्त द्वितीय का शासन काल ।
629 – 644 ई० — हर्षवर्द्धन का राज्यकाल।
672 – 688 ई० — इत्सिग ने भारत भ्रमण किया।
1150 ई० — कल्हण ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक राजतरंगिणी की रचना की।
1856 ई० — बर्टन बन्धुओं द्वारा हड़प्पा स्थल की सूचना सरकार को दी गई।
1861 ई० — कनिंघम के निर्देशन में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की स्थापना हुई।
1872 ई० — भारतीय साक्ष्य अधिनियम पारित हुआ।
1904 ई० — जॉन मार्शल को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग का निदेशक बनाया गया।
1921 ई० — दयाराम साहनी द्वारा हड़प्पा स्थल का उत्खनन किया गया।
1922 ई० — राखालदास बनर्जी ने मोहनजोदड़ो का पता लगाया।

महत्वपूर्ण पारिभाषिक शब्दावली:

  • साक्ष्य — अतीत की गतिविधियों की जानकारी प्राप्त करने के लिए इतिहासकार जिन साधनों का उपयोग करता है उन्हें साक्ष्य कहा जाता है।
  • ऋग्वेद’ — सबसे प्राचीन वेद है, यह पद्य में लिखित है। इसमें 10 मण्डल व 1028 सूक्त हैं।
  • त्रिपिटिक — तीन बौद्ध ग्रंथ जिन्हें पिटकों की टोकरी कहा जाता है ये निम्न हैं विनयपिटक, सुत्तपिटक, अभिधम्मपिटक।
  • बिहार — बौद्ध भिक्षुओं के रहने का स्थान।
  • चैत्य — शवदाह के पश्चात् बौद्धों के शरीर के कुछ अवशेष टीलों में सुरक्षित रख दिए जाते थे । अंतिम संस्कार से जुड़े इन तरीकों को चैत्य कहा जाता था।
  • उपनिषद — जीवन-मृत्यु एवं पार ब्रह्म से सम्बन्धित गहन विचारों वाले ग्रंथ। इनमें आर्यों की दार्शनिक विचारधारा का भी विवरण मिलता है।
  • मोहनजोदड़ो — हड़प्पा सभ्यता को एक नियोजित नगर, एक प्रसिद्ध पुरास्थल जो वर्तमान में पाकिस्तान में स्थित है।
  •  पुरातत्व — वह विद्या जिसमें प्राचीनकाल के मुख्यतः प्रागैतिहासिक काल की वस्तुओं के आधार पर पुराने अज्ञात इतिहास का पता लगाया जाता है।
  • पेरिप्लस — यह यूनानी भाषा का शब्द है इसका अर्थ समुद्री यात्रा से लगाया जाता है।
  • आहत अथवा — पाँचवीं शताब्दी ई. पू. के चाँदी के बने सिक्कों को आहत या पंचमार्क कहते थे। पंचमार्क
  • धर्म-सूत्र — ब्राह्मणों ने समाज के लिए विस्तृत आचार संहिताएँ तैयार की। 500 ई. पू. मानदण्डों का संकलन जिन संस्कृत ग्रंथों में किया गया वे धर्म सूत्र कहलाए।
  • वर्ण — ब्राह्मणों द्वारा निर्मित सामाजिक वर्ग, जिनका वर्णन धर्मसूत्रों एवं धर्मशास्त्रों में किया गया है, वर्ण चार हैं-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र।
  • महाजनपद — एक बड़ा अथवा शक्तिशाली राज्य।

RBSE Class 12 History Notes

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