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RBSE Solutions for Class 12 History Chapter 4 मुगल आक्रमण: प्रकार और प्रभाव

RBSE Solutions for Class 12 History Chapter 4 मुगल आक्रमण: प्रकार और प्रभाव

July 6, 2019 by Prasanna Leave a Comment

Rajasthan Board RBSE Class 12 History Chapter 4 मुगल आक्रमण: प्रकार और प्रभाव

RBSE Class 12 History Chapter 4 अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

RBSE Class 12 History Chapter 4 बहुचयनात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
हजरत मुहम्मद की मृत्यु कब हुई?
(अ) 622 ई.
(ब) 712 ई.
(स) 711 ई.
(द) 632 ई.।

प्रश्न 2.
भारत पर अरब आक्रमण हुआ?
(अ) 711 ई.
(ब) 712 ई.
(स) 713 ई.
(द) 636 ई.।

प्रश्न 3.
अरब आक्रमण के समय सिन्ध का शासक कौन था?
(अ) दाहिर सेन
(ब) अब्दुला
(स) वत्सराज
(द) हज्जाज।

प्रश्न 4.
किस विजय के उपरान्त कासिम ने उस नगर का नाम ‘स्वर्णनगर’ रखा?
(अ) अरोर विजय
(ब) सिन्ध विजय
(स) नीरुन विजये
(द) मुल्तान विजय।

प्रश्न 5.
नागभट्ट ने जिस वंश की स्थापना थी?
(अ) पाल वंश
(ब) गुर्जर – प्रतीहार वंश
(स) चन्देन वंश
(द) चाहमान वंश।

प्रश्न 6.
नागभट्ट द्वितीय गद्दी पर कब बैठा?
(अ) 30 ई.
(ब) 785 ई.
(स) 790 ई.
(द) 795 ई.।

प्रश्न 7.
गुर्जर – प्रतीहार वंश के किस शासक ने गंगा में कूद कर आत्महत्या की?
(अ) मिहिरभोज
(ब) वत्सराज
(स) नागभट्ट द्वितीय
(द) नागभट्ट प्रथम।

प्रश्न 8.
भीनमाल के प्रतिहार वंश का राज्य स्थापित करने वाले शासक का नाम था।
(अ) नागभट्ट प्रथम
(ब) वत्सराज
(स) देवराज
(द) धर्मपाल।

प्रश्न 9.
प्रतिहारों के जिस शासक ने अनेक अरब आक्रमणों को विफल किया, वह था?
(अ) नागभट्ट प्रथम
(ब) वत्सराज
(स) नागभट्ट द्वितीय
(द) मिहिर भोज प्रथम।

प्रश्न 10.
‘एकलिंग महात्म्य’ ग्रन्थ में बप्पा रावल को बताया गया है?
(अ) सूर्यवंशी
(ब) चन्द्रवंशी
(स) यदुवंशी
(द) ब्राह्मण।

प्रश्न 11.
नागभट्ट द्वितीय को परास्त होना पड़ा था?
(अ) कन्नौज के राज चक्रायुद्ध से
(ब) बंगाल के धर्मपाल से
(स) गोविन्द तृतीय से।
(द) मिहिर भोज प्रथम से।

प्रश्न 12.
गुर्जर – प्रतिहार नरेशों की सैनिक दृष्टि से प्रमुख उपलब्धिमानी जाती है?
(अ) हर्ष के उपरान्त उन्होंने उत्तरी भारत में राजनीतिक एकता स्थापित की।
(ब) उन्होंने एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की।
(स) उन्होंने सिन्ध के मुसलमानों की सिन्ध के आगे नहीं बढ़ने दिया।
(द) त्रिकोणात्मक संघर्ष में उन्होंने अनेक सैनिक सफलताएँ प्राप्त की।

प्रश्न 13.
चित्तौड़ विजय के उपरान्त बप्पा ने कौन – सी उपाधि धामण की?
(अ) हिन्दू सूर्य
(ब) राजगुरु
(स) चक्कवै
(द) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 14.
जिस इतिहासकार ने बप्पा रावल की तुलना चार्ल्स मोर्टल सभी है?
(अ) गोपीनाथ शर्मा
(ब) सी. वी. वैद्य
(स) जी. एस. ओस
(द) वी. एस. भार्गव।

प्रश्न 15.
महमूद गजनवी ने सोमनाथ पर कब आक्रमण किया?
(अ) 1020 ई.
(ब) 1018 ई.
(स) 1022 ई.
(द) 1025 ई.।

प्रश्न 16.
‘राम पिथौरा’ उपाधि से जिस शासक को प्रसिद्धि मिली-
(अ) सोमेश्वर
(ब) अर्णोराज
(स) पृथ्वीराज तृतीय
(द) विग्रहराज चतुर्थ।

प्रश्न 17.
पृथ्वीराज चौहान की विजय – नीति के उद्देश्य थे?
(अ) स्वजनों के विरोध से मुक्ति पाना
(ब) पड़ोसी राज्यों का दमन
(स) विदेशी शत्रुओं का मुकाबला
(द) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 18.
पृथ्वीराज ने महोबा पर विजय भी?
(अ) 1180 ई.
(ब) 1182 ई.
(स) 1183 ई.
(द) 1190 ई.।

प्रश्न 19.
हम्मीर महाकाव्य में चाहमानों को बताया गया है?
(अ) सूर्यवंशी
(ब) यदुवंशी
(स) चन्द्रवंशी
(द) राजवंशी।

प्रश्न 20.
तराइन का द्वितीय युद्ध कब हुआ?
(अ) 1190 ई.
(ब) 1191 ई.
(स) 1192 ई.
(द) 1194 ई.।

प्रश्न 21.
पृथ्वीराज तृतीय के दरबारी विद्वान थे?
(अ) विद्यापति गौड़
(ब) वागीश्वर
(स) जनार्दन
(द) जयानक।

प्रश्न 22.
‘पृथ्वीराजरासो’ की रचना की?
(अ) आशाधर
(ब) जयानक
(स) विश्वरूप
(द) चन्दबरदाई।

प्रश्न 23.
पृथ्वीराज और मुहम्मद गोरी के मध्य संघर्ष का प्रमुख कारण था?
(अ) धन प्राप्ति की लालसा
(ब) गौर राजनीति
(स) साम्राज्य की स्थापना
(द) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 24.
अलाउद्दीन खिलजी का चित्तौड़ आक्रमण का प्रमुख कारण था?
(अ) अलाउद्दीन का अत्यधिक महत्वाकांक्षी व साम्राज्यवादी होना।
(ब) रत्नसिंह की सुन्दर रानी पद्मिनी को प्राप्त करने की लालसा।
(स) दिल्ली से मालवा, गुजरात और दक्षिण भारत जाने वाले मुख्य मार्ग में चित्तौड़ होने के कारण।
(द) सम्पूर्ण भारत पर अपना स्थायी अधिकार बनाए रखने के लिए।

प्रश्न 25.
अलाउद्दीन के चित्तौड़ आक्रमण के समय मेवाड़ का शासक कौन था?
(अ) हम्मीर
(ब) जैयसिंह
(स) रतनसिंह
(द) कुम्भा।

प्रश्न 26.
हम्मीर के विषय में विस्तृत विजय एवं उपलब्धियों की जानकारी प्राप्त होती है?
(अ) हम्मीर महाकाव्य से
(ब) वीर-विनोद से
(स) नैणसी री ख्यात से
(द) कााण्हण दे प्रबन्ध से।

प्रश्न 27.
‘पद्मावत’ का लेखक कौन था?
(अ) रसखान
(ब) अब्दुर्रहीम
(स) अबुल फजल
(द) मलिक मुहम्मद जयासी।

प्रश्न 28.
हम्मीर की शूरवीरता तथा विजयों के विस्तृत विवरण के सम्बन्ध में न्यायचन्द सूरी द्वारा रचित काव्य है?
(अ) हम्मीर महाकाव्य
(ब) सुर्जन चरित्र
(स) हम्मीर हठ
(द) हम्मीर रासो।

प्रश्न 29.
“हम्मीर महाकाव्य के अनुसार युद्ध में सफलता की आशा न रहने पर हम्मीर ने अपना शीश काटकर अर्पित किया?
(अ) भगवान शंकर को
(ब) भगवान राम को
(स) भगवान विष्णु को
(द) भगवान गणेश को।

प्रश्न 30.
एकलिंग महात्म्य का लेखक था?
(अ) मण्डन
(ब) कवि आत्रि और महेश
(स) कान्ह व्यास
(द) मण्डन का पुत्र गोविन्द।

प्रश्न 31.
राजस्थान के किस शासक का अभिनव भरताचार्य के नाम से पुकारा जाता है?
(अ) पृथ्वीराज चौहान
(ब) महाराणा कुम्भा
(स) सवाई जय सिंह
(द) महाराजा मानसिंह।

प्रश्न 32.
चित्तौड़ के कीर्तिस्तम्भ या निर्माण किसके द्वारा करवाया गया।
(अ) हम्मीर
(ब) राणा कुम्भा
(स) पृथ्वीराज चौहान
(द) राणा सांगा।

प्रश्न 33.
महाराणा कुम्भा की सांस्कृतिक उपलब्धियों की जानकारी मिलती है?
(अ) फारसी तवारीख से
(ब) एकलिंग महात्म्य से
(स) कुम्भलगढ़ प्रशास्ति (1460 ई.) से
(द) कीर्ति स्तम्भ से।

प्रश्न 34.
‘खींची वाड़ा’ के नाम से जो क्षेत्र प्रसिद्ध था?
(अ) गागरोण
(ब) अजमेर
(स) मण्डल गढ़
(द) मालवा।

प्रश्न 35.
कविराज श्यामलदास के अनुसार कुम्भा ने मेवाड़ में दुर्गों का निर्माण करवाया, उनकी संख्या है?
(अ) 84 दुर्ग
(ब) 32 दुर्ग
(स) 60 दुर्ग
(द) 40 दुर्ग।

प्रश्न 36.
कुम्भा कालीन सर्वाधिक विशाल मन्दिर है?
(अ) रणकपुर
(ब) कुम्भश्याम का मन्दिर
(स) एक लिंग जी का मन्दिर
(द) देलवाड़ा का जैन मन्दिर।

प्रश्न 37.
‘गीत – गोविन्द’ का रचयिता है?
(अ) महाराणा कुम्भा
(ब) जयदेव
(स) कल्हण
(द) जयानक।

प्रश्न 38.
खानवा के युद्ध में राणा सांगा की पराजय का प्रमुख कारण था?
(अ) बावर की सैन्य – व्यवस्था में उसकी तुलुगमा पद्धति
(ब) सांगा की सैनिक कमजोरी
(स) सांगा में रणकुशता का अभाव
(द) सांगा के सिर में अचानक तीर लगना।

प्रश्न 39.
वह राजपूत शासक जिसे हिन्दू सुरताण’ या ‘हिन्दूपति’ के नाम से जाना जाता है, उसका नाम है?
(अ) महाराणा उदय सिंह
(ब) महाराणा सांगा
(स) महाराणा कुम्भा
(द) महाराणा प्रताप

प्रश्न 40.
महाराणा सांगा और इब्राहिम लोदी के बीच लड़ा जाने वाला युद्ध था?
(अ) पानीपत का युद्ध
(ब) खानवा का युद्ध
(स) खातोली का युद्ध
(द) चन्देरी का युद्ध।

प्रश्न 41.
अकबर द्वारा चन्द्रसेन के राज्य जोधपुर पर आक्रमण का प्रमुख कारण था?
(अ) राव चन्द्रसेन ने अकबर को चुनौती दी थी।
(ब) राव चन्द्रसेन ने मुगले प्रदेशों को अधिकृत कर लिया था
(स) अकबर चन्द्रसेन के भाई राम को जोधपुर राज्य देना चाहता था
(द) जोधपुर दुर्ग जीतकर अकबर मारवाड़ की विजय पूर्ण करना चाहता था।

प्रश्न 42.
राव चन्द्रसेन का नागौर दरबार में जाने का प्रमुख उद्देश्य था?
(अ) अकबर की अधीनता स्वीकार करना
(ब) अपना राज्य पुनः प्राप्त आने के लिए।
(स) अपने पुत्र को शाही सेवा में सौंपने के लिए
(द) मुगलों की कमजोरियों का पता लगाने के लिए।

प्रश्न 43.
‘मारवाड़ का भूला – बिसरा नायक’ किसे कहा जाता है?
(अ) अजीत सिंह
(ब) दुर्गादास
(स) चन्द्रसेन
(द) उदय सिंह।

प्रश्न 44.
हल्दीघाटी के युद्ध में प्रताप भी सेना का अग्रभाग या सेना नायक कौन था?
(अ) प्रताप
(ख) अमरसिंह
(स) हकीम खाँ
(द) झाला मान सिंह।

प्रश्न 45.
हल्दीघाटी का युद्ध लड़ा गया?
(अ) 1707 ई.
(ब) 1576 ई.
(स) 1556 ई.
(द) 1530 ई.।

प्रश्न 46.
हल्दीघाटी के युद्ध में राणा प्रताप की पराजय का प्रमुख कारण था?
(अ) प्रताप की परम्परागत युद्ध शैली
(ब) राणा प्रताप की सैन्य कमजोरी
(स) राणा प्रताप का युद्ध क्षेत्र त्यागना
(द) अकबर को राजपूत शासकों का सहयोग देना।

प्रश्न 47.
हल्दीघाटी के युद्ध को कर्नल टॉड ने जिस नाम से सम्बोधित किया वह है?
(अ) खमनोर का युद्ध
(ब) मेवाड़ की थर्मोपल्ली
(स) गोगुन्दा का युद्ध
(द) पानीपत का युद्ध।

प्रश्न 48.
अकबर ने महाराणा प्रताप से मैत्री भाव स्थपित करने के लिए चार शिष्ट मण्डल भेजे। दूसरे शिष्ट – मण्डल का नेतृत्व किसने किया था?
(अ) जलाल खों
(ब) मानसिंह
(स) भगवन्तदास
(द) टोडरमल।

प्रश्न 49.
महाराणा प्रताप ने इस संसार से विदा ली?
(अ) 1576 ई. में
(ब) 1580 ई. में
(स) 1585 ई. में
(द) 1597 ई. में।

प्रश्न 50.
महाराणा प्रताप का राजतिलक हुआ?
(अ) 1572 ई.
(ब) 1575 ई.
(स) 1676 ई.
(द) 1580 ई.।

प्रश्न 51.
महाराणा प्रताप के हाथी का क्या नाम था?
(अ) लूना
(ब) राम प्रसाद
(स) गजमुक्ता
(द) महावत।

प्रश्न 52.
चक्रपाणि मिश्र द्वारा लिखे गए ग्रन्थ हैं?
(अ) राज्याभिषेक पद्धति
(ब) मुहूर्तमाला
(स) विश्व वल्लभ
(द) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 53.
दुर्गादास को बाल्यकाल जिस गाँव में व्यतीत हुआ, वह था?
(अ) सालवा
(ब) भीमरलाई
(स) लूनवा
(द) सचिमीच।

प्रश्न 54.
दुर्गादास ने शिशु राजकुमार अजीत सिंह को सिरोही में किसके पास रखा?
(अ) मुकुन्ददास र्वीची
(ब) राठौड़ मोहकम सिंह
(स) वीर सोनम चांपावत
(द) पुष्करणा ब्राह्मण जयदेव।

प्रश्न 55.
दुर्गादास की शाहजादा अकबर के साथ दक्षिण यात्रा के समय महाराष्ट्र का छत्रपति (शासक) कौन था?
(अ) शिवाजी
(ब) शम्भाजी
(स) शाहू
(द) राजाराम।

प्रश्न 56.
दुर्गादास की वीरता का वर्णन जिस ग्रन्थ में हैं?
(अ) पृथ्वीराज रासो
(ब) विग्रह रासो
(स) रतनरासो
(द) पद्मचरित।

प्रश्न 57.
‘राठौड़ों का यूलीसैस’ किसे कहा जाता है?
(अ) अजीत सिंह
(ब) दुर्गादास
(स) जसवन्त सिंह
(द) जयसिंह।

प्रश्न 58.
शिवाजी का जन्म कब हुआ था?
(अ) 1625 ई.
(ब) 1626 ई.
(स) 1627 ई.
(द) 1628 ई.।

प्रश्न 59.
शिवाजी मुगल दरबार में उपस्थित हुए।
(अ) 1665 ई.
(ब) 1666 ई.
(स) 1667 ई.
(द) 1668 ई.।

प्रश्न 60.
शिवाजी ने निम्न में से जो उपाधि धारण की?
(अ) छत्रपति
(ब) हिन्दू धर्मोद्वारक
(स) ब्राह्मण प्रतिपालक
(द) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 61.
बाल गंगाधर तिलक द्वारा जो उत्सव प्रारम्भ किया गया?
(अ) दीपोत्सव
(ब) जलाभिषेक उत्सव
(स) शिवाजी उत्सव
(द) उपर्युक्त में से कोई नहीं।

प्रश्न 62.
पेशवाओं के शासन का प्रारम्भ माना जाता है?
(अ) बालाजी विश्वनाथ से
(ब) जलाभिषेक उत्सव
(स) बाजीराव द्वितीय से
(द) बहादुर प्रथम से।

प्रश्न 63.
मुंगी शिवगॉव की सन्धि हुई?
(अ) मार्च, 1728 ई.
(ब) मई 1628 ई.
(स) अप्रैल, 1774 ई.
(द) मार्च, 1740 ई.।

उत्तरमाला:
1. (द), 2. (ब), 3. (अ), 4. (द), 5. (ब), 6. (द), 7. (स), 8. (अ), 9. (द), 10. (द), 11. (स), 12. (स), 13. (द), 14. (ब), 15. (द), 16. (स), 17. (द), 18. (ब), 19. (अ), 20. (स), 21. (द), 22. (द), 23. (द), 24. (ब), 25. (स), 26. (अ), 27. (द), 28. (अ), 29. (अ), 30. (स), 31. (ब), 32. (ब), 33. (द), 34. (अ), 35. (ब), 36. (अ), 37. (ब), 38. (अ), 39. (ब), 40. (स), 41. (द), 42. (ब), 43. (स), 44. (स), 45. (ब), 46. (अ), 47. (ब), 48. (ब), 49. (द), 50. (अ), 51. (ब), 52. (द), 53. (अ), 54. (द), 55. (ब), 56. (स), 57. (ब), 58. (स), 59. (ब), 60. (द), 61. (स), 62. (अ), 63. (अ)।

RBSE Class 12 History Chapter 4 अति लघुत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
अरबों ने सर्वप्रथम कब और कहाँ आक्रमण किया?
उत्तर:
अरबों ने सर्वप्रथम 635 – 36 ई. में सीरिया पर आक्रमण किया।

प्रश्न 2.
भारत पर अरब आक्रमण का सिलसिला कब प्रारम्भ हुआ?
उत्तर:
हजरत मुहम्मद साहब की मृत्यु (632 ई.) के बाद भारत पर अरब आक्रमण का सिलसिला प्रारम्भ हुआ।

प्रश्न 3.
भारत पर प्रथम अरब आक्रमणकारी कौन था? उसने भारत पर कब आक्रमण किया?
उत्तर:
भारत पर प्रथम आक्रमणकारी मीर कासिमया उसने 712 ई. में सिंन्ध पर आक्रमण किया।

प्रश्न 4.
अरब आक्रमण का भारत पर सांस्कृतिक प्रभाव किस प्रकार पड़ा?
उत्तर:
सांस्कृतिक दृष्टि से भारत ने अरबों पर विजय प्राप्त की। भारतीय दर्शन, विज्ञान, गणित, चिकित्सा और ज्योतिष ने अरबों को बहुत प्रभावित किया।

प्रश्न 5.
अरबों ने भारतीयों से क्या – क्या सीखा?
उत्तर:
अरब लोगों ने अंक, दशमलव पद्धति, चिकित्सा व खगोलशास्त्र के कई मौलिक सिद्धान्त भारतीयों से सीखे प्रथम कला और साहित्य के क्षेत्र में भी भारतीय पद्धतियों को अपनाया।

प्रश्न 6.
किन – किन भारतीय ग्रन्थों का संस्कृत से अरबी में अनुवाद कराया गया?
उत्तर:
ब्रह्मगुप्त का ‘ब्रह्म सिद्धान्त’ तथा ‘खण्ड खांड्यक’ का संस्कृत से अरबी में अनुवाद कराया गया।

प्रश्न 7.
भारत में अरबों की सफलता में कोई दो कारण बताइए।
उत्तर:
भारत में अरबों की सफलता के कारण थे-

  1. दाहिर के शासन में सामान्य वर्ग असन्तुष्ट था।
  2. दाहिर स्वयं जनता में अप्रिय था क्योंकि उसका पिता राज्य का वास्तविक उत्तराधिकारी नहीं था।

प्रश्न 8.
अरब आक्रमणकारी ने किस नगर को विजित कर उसका नाम ‘स्वर्ण नगर’ रख दिया?
उत्तर:
मुल्तान विजय में अरबों को इतना धन हाथ लगा कि उन्होंने मुल्तान का नाम बदलकर ‘स्वर्ण नगर’ रख दिया।

प्रश्न 9.
गुर्जर – प्रतिहार वंश का संस्थापक कौन था?
उत्तर:
नागभट्ट प्रथम जालौर, अवन्ति और कन्नौज के गुर्जर प्रतिहार वंश का संस्थापक था।

प्रश्न 10.
नागभट्ट प्रथम ने ‘नारायण’ की उपाधि क्यों धारण की?
उत्तर:
नागभट्ट ने मलेच्छों का दमन और दीनों का उद्धार करने के कारण ‘नारायण’ की उपाधि धारण की।

प्रश्न 11.
नागभट्ट द्वितीय ने कौन – सी उपाधि धारण की?
उत्तर:
उत्तर भारत की विजय के उपलक्ष्य में नागभट्ट द्वितीय ने ‘परमभद्वारक महाराजाधिराज परमेश्वर की उपाधि धारण की।

प्रश्न 12.
प्रतिहार वंश का वह कौन-सा शासक था जिसने गंगा में डूबकर आत्महत्या कर ली?
उत्तर:
‘प्रभावक चरित’ के अनुसार नागभट्ट द्वितीय ने 833 ई. में गंगा में डूबकर आत्महत्या कर ली।

प्रश्न 13.
गुहिल वंश का वास्तविक संस्थापक कौन था?
उत्तर:
मेवाड़ के गुहिल वंश का वास्तविक संस्थापक बप्पा रावल को माना जाता है।

प्रश्न 14.
किस विजय के उपरान्त बप्पा रावल ने अपने को विभिन्न उपाधियों से विभूषित किया?
उत्तर:
बप्पा रावल ने 734 ई. मेवाड़ पर आक्रमण कर तथा उस पर अधिकार कर तीन उपाधियाँ- ‘हिन्दू सूर्य’, ‘राजगुरु’ और ‘चक्कवे’ धारण की।

प्रश्न 15.
बप्पा रावल ने किस प्रकार के सिक्के प्रचलित किए तथा उन पर कौन – कौन से चिह्नों का अंकन है?
उत्तर:
बप्पा रावल ने अपने पूर्वजों की भाँति सोने के सिक्के का प्रचलने किया। उसके सिक्के पर दोनों तरफ कामधेनु, बछड़ा, शिवलिंग, नन्दी, दण्डवत करता हुआ पुरुष, नदी, मछली, त्रिशूल आदि का अंकन है।

प्रश्न 16.
किस इतिहासकार ने बप्पा रावल को चार्ल्स मार्टेल’ की तुलना की है?
उत्तर:
श्री सी वी. बैद्य ने बप्पा रावल की ‘चार्ल्स मार्टेन’ से तुलना भी है।

प्रश्न 17.
महमूद गजनवीने सोमनाथ पर कब आक्रमण किया?
उत्तर:
महमूद गजनवी ने 1025 ई. में सोमनाथ पर आक्रमण किया। यह उसका सोलहवाँ और सर्वाधिक कुख्यात आक्रमण था।

प्रश्न 18.
महमूद गजनवी के भारत पर आक्रमण का क्या उद्देश्य था?
उत्तर:
महमूद गजनवी के भारत पर आक्रमण का उद्देश्य था-धन सम्पदा प्राप्त करना, साम्राज्य विस्तार की महत्वकांक्षा, इस्माइलिया वंश की सत्ता को नष्ट करना तथा इस्लाम धर्म का प्रचार करना।

प्रश्न 19.
पृथ्वीराज चौहान का जन्म कब हुआ था और किस शासक के बाद वह गद्दी पर बैठा?
उत्तर:
पृथ्वीराज चौहान का जन्म 1166 ई. में हुआ। वह सोमेश्वर की मृत्यु के बाद मात्र ग्यारह वर्ष की आयु में गद्दी पर बैठा।

प्रश्न 20.
पृथ्वीराज चौहान की विजय नीति का क्या उद्देश्य था?
उत्तर:
पृथ्वीराज चौहान की विजय नीति के उद्देश्य थे-स्वजनों के विरोध से मुक्ति पाना, पड़ोसी राज्यों का दमन तथा विदेशी शत्रुओं का मुकाबला।

प्रश्न 21.
पृथ्वीराज तृतीय ने भण्डानको पर कब और क्यों आक्रमण किया?
उत्तर:
पृथ्वीराज तृतीय ने 1182 ई. में गुड़गाँव व हिसार के आस-पास बसी हुई भण्डानक नामक उपद्रवी जाति को पराजित किया तथा अपने राज्य की उत्तरी सीमा को सुरक्षित किया।

प्रश्न 22.
पृथ्वीराज ने महोबा पर कब और क्यों आक्रमण किया?
उत्तर:
अपने कुछ सैनिकों की हत्या का बदला लेने के लिए पृथ्वीराज ने 1182 ई. में महोबा राज्य पर आक्रमण कर चन्देल शासक पर मर्दिदेव को पराजित किया। परमर्दिदेव के दो सेनापति आल्हा और ऊदल भी मारे गए।

प्रश्न 23.
पृथ्वीराज और जयचन्द के मध्य संघर्ष का मुख्य कारण क्या था?
उत्तर:
पृथ्वीराज और जयचन्द के मध्य संघर्ष का कारण दोनों की विस्तारवादी नीति का परिणाम था।

प्रश्न 24.
पृथ्वीराज और जयचन्द के मध्य संघर्ष का कारण चरमोत्कर्ष पर कब पहुँच गया?
उत्तर:
पृथ्वीराज द्वारा जयचन्द की पुत्री संयोगिता का बलपूर्वक अपहरण कर विवाह किया जाना दोनों शासकों के बीच संघर्ष का चरमोत्कर्ष था।

प्रश्न 25.
तराइन का प्रथम युद्ध कब और किसके मध्य हुआ?
उत्तर:
तराइन का प्रथम युद्ध 1191 ई. में पृथ्वीराज और मुहम्मद गोरी के मध्य हुआ।

प्रश्न 26.
तराइन का द्वितीय युद्ध कब और किसके मध्य हुआ?
उत्तर:
तराइन का द्वितीय युद्ध 1192 ई. में पृथ्वीराज और मुहम्मद गोरी के मध्य हुआ।

प्रश्न 27.
पृथ्वीराज चौहान की पराजय का प्रमुख कारण क्या था?
उत्तर:
पृथ्वीराज की पराजय का प्रमुख कारण उसमें दूरदर्शिता व कूटनीति का अभाव तथा पड़ोसी राज्यों के साथ मैत्री-सम्बन्धों का न होना था।

प्रश्न 28.
पृथ्वीराज चौहान के राजदरबार में रहने वाले प्रमुख विद्वान कौन – कौन से थे?
उत्तर:
पृथ्वीराज चौहान के राजदरबार में अनेक विद्वान रहते थे जिनमें विद्यापति गौड़, वागीश्वर, जनार्दन, जयानक, विश्वरूप, आशाधर आदि प्रमुख थे।

प्रश्न 29.
पृथ्वीराज चौहान का राजकवि कौन था? उसने कौन – से ग्रन्थ की रचना की?
उत्तर:
पृथ्वीराज चौहान का राजकवि चन्दबरदाई था। उसने पृथ्वीराजरासो की रचना की।

प्रश्न 30.
हिन्दी साहित्य का प्रथम महाकाव्य किसे कहा जाता है?
उत्तर:
चन्दबरदाई कृत ‘पृथ्वीराजरासो’ हिन्दी साहित्य का प्रथम महाकाव्य माना जाता है।

प्रश्न 31.
‘मिफ्ता-उल-फुतूह’ नामक ग्रन्थ की रचना किसने की?
उत्तर:
‘मिफ्ता-उल-फुतूह’ भी रचना अमीर खुसरो ने की।

प्रश्न 32.
अलाउद्दीन खिलजी के रणथम्भौर पर आक्रमण करने के क्या कारण थे?
उत्तर:

  1. रणथम्भौर सामारिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण था
  2. यह दिल्ली के बहुत निकट था
  3. जलालुद्दीन खिलजी ने दो बार विजित करने का प्रयास किया था तथा
  4. अलाउद्दीन खिलजी का एक महत्वाकांक्षी और साम्राज्यवादी शासक होना था।

प्रश्न 33.
‘हम्मीर महाकाव्य’ की रचना किसने थी?
उत्तर:
‘हम्मीर महाकाव्य’ की रचना नयन चंद्र सूरी ने की।

प्रश्न 34.
रणथम्भौर पर आक्रमण करने के लिए अलाउद्दीन खिलजी ने किन सेनापतियों को भेजा था?
उत्तर:
रणथम्भौर पर आक्रमण करने के लिए अलाउद्दीन खिलजी ने अपने दो सेनापतियों उलूग खाँ व नुसरत खाँ को भेजा।

प्रश्न 35.
‘हम्मीर हठ’ नामक काव्य की रचना किसने की?
उत्तर:
‘हम्मीर हठ’ नामक काव्य की रचना चन्द्रशेखर ने की।

प्रश्न 36.
जलालुद्दीन खिलजी अपने युद्ध अभियान में किस दुर्ग पर अधिकार नहीं कर सका?
उत्तर:
जलालुद्दीन खिलजी अपने जीवन में 17 युद्ध लड़े और 16 में विजयी रहा। बार – बार में प्रयासों के बाद भी वह रणथम्भौर पर अधिकार न कर सका।

प्रश्न 37.
हम्मीर देव का सम्मानित दरबारी कवि तथा गुरु कौन था?
उत्तर:
हम्मीर देव का सम्मानित दरबारी कवि विजया दित्य था तथा राघवदेव उसका गुरु था।

प्रश्न 38.
किस यज्ञ के सम्पादन से हम्मीर की धर्मनिष्ठा का परिचय मिलता है?
उत्तर:
कोटि यज्ञ के सम्पादन द्वारा हम्मीर ने अपनी धर्मनिष्ठा का परिचय दिया।

प्रश्न 39.
अलाउद्दीन खिलजी के चित्तौड़ पर आक्रमण के क्या कारण थे?
उत्तर:
अलाउद्दीन खिलजी के चित्तौड़ पर आक्रमण के कारण थे-

  1. अलाउद्दीन की साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा
  2. मेवाड़ की बढ़ती हुई शक्ति
  3. चित्तौड़ का भौगोलिक एवं सामारिक महत्व तथा
  4. पद्मिनी को प्राप्त करने की लालसा।

प्रश्न 40.
अलाउद्दीन ने चित्तौड़ पर कब आक्रमण किया?
उत्तर:
अलाउद्दीन खिजली ने 28 जनवरी, 1303 ई. में चित्तौड़ पर आक्रमण किया तथा 26 अगस्त, 1303 ई. में चित्तौड़ पर अलाउद्दीन खिलजी का अधिकार हो गया।

प्रश्न 41.
अलाउद्दीन ने किस नगर का नाम बदल का खिज्राबाद कर दिया?
उत्तर:
अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ का नाम बदलकर ‘खिज्राबाद’ कर दिया।

प्रश्न 42.
पद्मिनी की ऐतिहासिकता की पुष्टि किन – किन ग्रन्थों से होती है?
उत्तर:
पद्मिनी की ऐतिहासिकता का उल्लेख जायसी कृत ‘पद्मावत’ के साथ – साथ अबुलफजल (अकबरनामा), फरिश्ता (गुलशन-ए-इब्राहिमी), हाजी उद्दवीर (जफरुलवली) में है।

प्रश्न 43.
कुम्भा ने मेरों का दमन कैसे किया?
उत्तर:
बदनोर के आस – पास मेरों की बस्ती थी। ये लोग सदैव विद्रोह करते रहते थे। कुम्भा ने इनके विद्रोह कर दमन का विद्रोही नेताओं को कड़ा दण्ड दिया।

प्रश्न 44.
सारंगपुर का युद्ध कब और किसके मध्य हुआ?
उत्तर:
सारंगपुर का युद्ध 1437 ई. में महाराणा कुम्भा और सुल्तान महमूद खिलजी के मध्य हुआ।

प्रश्न 45.
गुजरात और मालवा की संयुक्त सेना द्वारा मेवाड़ आक्रमण हेतु समझौता किस स्थान पर हुआ?
उत्तर:
गुजरात और मालवा की संयुक्त सेना द्वारा मेवाड़ आक्रमण हेतु समझौता चम्पानेर स्थान पर हुआ।

प्रश्न 46.
महाराणा कुम्भा ने चाचा और मेरा का दमन किसके सहयोग से किया?
उत्तर:
कुम्भा ने चाचा और मेरा का दमन रणमल के सहयोग से किया।

प्रश्न 47.
सिसोदिया और राठौड़ संघर्ष का मूल कारण क्या था?
उत्तर:
इस संघर्ष का मूल कारण रणमल की हत्या करना था।

प्रश्न 48.
राजस्थान के किस शासक को ‘अभिनव भरताचार्य’ के नाम से पुकारा जाता है।
उत्तर:
महाराणा कुम्भा को ‘अभिनव भरताचार्य’ के नाम से पुकारा जाता है।

प्रश्न 49.
युद्ध में स्थिर बुद्धि’ किसे कहा गया है?
उत्तर:
महाराणा कुम्भा को स्थिर बुद्धि’ कहा गया है।

प्रश्न 50.
कुम्भा के संगीतज्ञ लेने के प्रमाण में कौन – कौन से ग्रन्थ हैं?
उत्तर:
कुम्भा बीणा वादन में प्रवीण था। संगीतराज, संगीत मीमांसा, संगीत क्रम दीपिका नामक ग्रन्थ उसके संगीतज्ञ होने के प्रमाण हैं।

प्रश्न 51.
‘गीत गोविन्द’ की रचना किसने की?
उत्तर:
गीत गोविन्द की रचना जयदेव ने की।

प्रश्न 52.
कुम्भा के राजदरबार में रहने वाले दो प्रसिद्ध विद्वानों के नाम लिखिए।
उत्तर:
कुम्भा के दरबार में एकलिंग महात्म्य का लेखक ‘कान्ह व्यास’ तथा प्रसिद्ध वास्तुशास्त्री मण्डल मिश्र रहते है।

प्रश्न 53.
आयुर्वेद के किस ग्रन्थ में विभिन्न व्याधियों तथा उपचारों का वर्णन है?
उत्तर:
आयुर्वेदज्ञ के रूप में गोविन्द की रचना ‘सार समुच्चय’ में विभिन्न व्याधियों के निदान और उपचार की विधियों का वर्णन है।

प्रश्न 54.
कवि ‘मेहा’ क्यों प्रसिद्ध है?
उत्तर:
कवि मेहा महाराणा कुम्भा के समय का प्रसिद्ध रचनाकार था। उसकी रचनाओं में तीर्थमाला के कारण वह प्रसिद्ध है।

प्रश्न 55.
कुम्भा ने कौन – कौन से ग्रन्थों की रचना की?
उत्तर:
कुम्भा ने संगीत के क्षेत्र में तीन ग्रन्थों की रचना की-

  1. संगीतराज
  2. संगीत मीमांसा तथा
  3. रसिक प्रिया।

प्रश्न 56.
कुम्भाकालीन मन्दिर निर्माण के केन्द्र कौन – कौन से थे?
उत्तर:
कुम्भाकालीन मन्दिर निर्माण के तीन प्रमुख केन्द्र थेकुम्भलगढ़, चित्तौड़गढ़ तथा अचलगढ़।

प्रश्न 57.
कीर्ति स्तम्भ की प्रशास्ति की रचना किन कवियों ने की?
उत्तर:
कीर्ति स्तम्भ की प्रशास्ति की रचना (i) कवि अत्रि और (2) उसके पुत्र महेश ने की।

प्रश्न 58.
कुम्भा ने किसे ‘कविराज’ भी उपाधि से विभूषित किया?
उत्तर:
हीरानन्द मुनि को कुम्भा ने अपना गुरु और ‘कविराज’ की उपाधि से विभूषित किया।

प्रश्न 59.
कुम्भाकालीन प्रमुख मंन्दिरों के नाम लिखिए।
उत्तर:
ऐसे मन्दिरों में चित्तौड़ का कुम्भस्वामी व शृंगार गौरी का मन्दिर एक लिंग जी में मीरा मन्दिर और रणकपुर के मन्दिर प्रसिद्ध हैं।

प्रश्न 60.
किस स्तम्भ ने क्रान्तिकारियों के लिए प्रेरणा स्रोत का कार्य किया?
उत्तर:
भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान ‘विजय स्तम्भ’ के क्रान्तिकारियों के लिए प्रेरणा स्रोत का कार्य किया।

प्रश्न 61.
मुगल साम्राज्य की स्थापना किसने और कब की?
उत्तर:
मुगल साम्राज्य की स्थापना 1526 ई. में बाबर ने की।

प्रश्न 62.
बाबर के आक्रमण के समय भारत का सबसे शक्तिशाली शासक कौन था?
उत्तर:
बाबर के आक्रमण के समय भारत का सबसे शक्तिशाली शासक मेवाड़ का महाराणा सांगाया, जो इतिहास में महाराणा संग्राम सिंह प्रथम के नाम से प्रसिद्ध है।

प्रश्न 63.
महाराणा सांगा ने ईडर राज्य में हस्तक्षेप क्यों किया?
उत्तर:
राणा ने ईडर राज्य में हस्तक्षेप इसलिए किया क्योंकि वहाँ उत्तराधिकारी के लिए संघर्ष हो रहे थे।

प्रश्न 64.
महाराणा सांगा के गुजरात संघर्ष का तात्कालिक कारण क्या था?
उत्तर:
ईडार में उत्तराधिकार के लिए संघर्ष का प्रश्न महाराणा सांगा के गुजरात – संघर्ष को तात्कालिक कारण था।

प्रश्न 65.
खानवा का युद्ध कब और किसके मध्य में हुआ और उसमें कौन – सी नई रणनीति अपनाई गयी?
उत्तर:
खानवा का युद्ध 16 मार्च, 1525 ई. को महाराणा सांगा व बाबर के मध्य में हुआ और उसमें बाबर ने अपनी तुलुगमा पद्धति का प्रयोग किया।

प्रश्न 66.
खानवा के युद्ध में राणासांगा की पराजय के कोई दो कारण बताइए।
उत्तर:

  1. राजपूत सैनिक परम्परागत हथियारों से युद्ध लड़ रहे थे।
  2. राजपूत सेना में एकता और तालमेल का अभाव था।

प्रश्न 67.
खानवा युद्ध के मुख्य दो परिणाम क्या थे?
उत्तर:

  1. भारत में राजपूतों की सर्वोच्चता का अन्त हो गया अब उनका सूर्य अस्तांचल की ओर खिसने लगा तथा
  2. भारतवर्ष में मुगल साम्राज्य स्थापित हो गया और बाबर स्थिर रूप से भारत का बादशाह बन गया।

प्रश्न 68.
राव चन्द्रसेन, मालदेव का ज्येष्ठ पुत्र न होते हुए भी उसका उत्तराधिकारी कैसे बना?
उत्तर:
मालदेव ने अपने ज्येष्ठ पुत्र राम तथा दूसरे पुत्र उदयसिंह को राज्य से निर्वासित कर दिया था। इसलिए चन्द्रसेन, मालदेव का ज्येष्ठ पुत्र ने होते हुए भी उसका उत्तराधिकारी बना।

प्रश्न 69.
राव चन्द्रसेन ने अकबर की अधीनता क्यों नहीं स्वीकार की?
उत्तर:
अकबर जोधपुर का दुर्ग अपने पास रखना चाहता था तथा उसके भाई उदय सिंह का प्रभाव भी मुगल दरबार में बढ़ता जा रहा था। इसलिए चन्द्रसेन ने अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की।

प्रश्न 70.
अकबर नागौर कब और क्यों पहुँचा?
उत्तर:
1570 ई. में अपनी अजमेर यात्रा के समय अकबर मारवाड़ क्षेत्र में दुष्काल की खबरें सुनकर नागौर पहुँचा।

प्रश्न 71.
राव चन्द्रसेन की मृत्यु कब हुई?
उत्तर:
राव चन्द्रसेन की मृत्यु 11 जनवरी, 1581 ई. को हुई।

प्रश्न 72.
महाराणा प्रताप का ‘अग्रगामी’ तथा ‘मारवाड़े का प्रताप’ किसे कहा जाता है?
उत्तर:
राव चन्द्रसेन को महाराणा प्रताप का अग्रगामी तथा मारवाड़ को प्रताप कहा जाता है।

प्रश्न 73.
अकबर ने चित्तौड़ दुर्ग पर कब अधिकार कर लिया?
उत्तर:
मेवाड़ के महाराणा उदय सिंह समय में 23 अक्टूबर, 1567 ई. को अकबर ने चित्तौड़ दुर्ग पर आक्रमण कर दिया।

प्रश्न 74.
अकबर ने चित्तौड़ दुर्ग पर कब अधिकार कर लिया?
उत्तर:
जयमल और पत्ता की मृत्यु के बाद ही 1568 ई. में अकबर ने चित्तौड़ पर अधिकार कर लिया।

प्रश्न 75.
वर्नियर ने कौन -सी पुस्तक की रचना की?
उत्तर:
फ्रांसीसी यात्री वर्नियर ने अपना यात्रा वृत्तान्त ‘ट्रेवल्स इन द मुगल एम्पायर’ नामक पुस्तक लिखी।

प्रश्न 76.
महाराणा प्रताप ने अकबर का विरोध करने का निश्चय क्यों किया?
उत्तर:
महाराणा प्रताप ने अकबर का विरोध इसलिए किया क्योंकि कि प्रताप को मेवाड़ की स्वतन्त्रता प्रिय थी तथा इसकी रक्षा के लिए वह सब कुछ बलिदान करने को तैयार थे।

प्रश्न 77.
अकबर ने महाराणा प्रताप को समझाने के लिए क्या किया?
उत्तर:
अकबर ने महाराणा प्रताप को समझाने के लिए चार शिष्ट मण्डल भेजे।

प्रश्न 78.
हल्दीघाटी के युद्ध में शाही सेना का नेतृत्व किसने किया?
उत्तर:
हल्दीघाटी के युद्ध में शाही सेना का नेतृत्व मान सिंह ने किया गया।

प्रश्न 79.
हल्दीघाटी युद्ध में धनुर्धर भीलों को कहाँ नियुक्त किया गया?
उत्तर:
हल्दीघाटी युद्ध में धनुर्धर भीलों को पृष्ठभाग में नियुक्त किया गया।

प्रश्न 80.
प्रताप से किन राज्यों से सन्धि – समझौता किया?
उत्तर:
प्रताप से कुम्भलगढ़, जावर, चावण्ड, उदयपुर, पिण्डवाडा, माण्डलगढ़ आदि ने सन्धि – समझौता किया।

प्रश्न 81.
हल्दीघाटी का युद्ध कब और किसके मध्य हुआ?
उत्तर:
हल्दीघाटी का युद्ध 1576 ई. में अकबर और महाराणा प्रताप के मध्य हुआ।

प्रश्न. 82.
किस युद्ध को ‘मेवाड़ का मैराथन’ कहा जाता है?
उत्तर:
कर्नल टॉड ने दिवेर के युद्ध को ‘मेवाड़ का मैराथन’ कहा है।

प्रश्न 83.
चावण्ड का प्रसिद्ध चित्रकार कौन था?
उत्तर:
चावण्ड का प्रसिद्ध चित्रकार निसारदी (नासिरूद्दीन) हुआ।

प्रश्न 84.
दुर्गादास ने चरवाहे को क्यों मार डाला?
उत्तर:
1655 ई. में आपसी कहा – सुनी के बाद उसने अपने खेत से होकर सांडनियाँ (मादा ऊँट) ले जाने पर राजकीय चरवाहे को मार डाला।

प्रश्न 85.
जसवन्त सिंह की मृत्यु के समय औरंगजेब ने क्या कहा?
उत्तर:
अजीत सिंह की मृत्यु पर औरंगजेब ने कहा -‘दरबाजा-ए-कुफ्र’ शिकस्त (आज मजहब विरोध का दरवाजा टूट गया)।

प्रश्न 86.
औरंगजेब के किस पुत्र ने अपने को बादशाह घोषित कर दिया?
उत्तर:
औरंगजेब के पुत्र अकबर ने 1 जनवरी, 1681 ई. को नाडोल में स्वयं को बादशाह घोषित कर दिया।

प्रश्न 87.
औरंगजेब की मृत्यु कब हुई?
उत्तर:
औरंगजेब की मृत्यु 1707 ई. में हुई।

प्रश्न 88.
शाहजहाँ के पुत्रों के मध्य उत्तराधिकार युद्ध में किस ने भाग लिया था?
उत्तर:
शाहजहाँ के पुत्रों के मध्य उत्तराधिकार युद्ध में दुर्गादास ने जसवन्त सिंह के साथ ‘धरमत के युद्ध’ में भाग लिया था।

प्रश्न 89.
दुर्गादास की कूटनीतिज्ञता का परिचय दीजिए।
उत्तर:
दुर्गादास ने अपनी कूटनीतिज्ञता के कारण न केवल महाराणा राजसिंह के साथ मिलकर राठौड़-सिसेदिया गठबन्धन’ किया अपितु शाहजादा अकबर को बादशाह के विरुद्ध प्रेरित भी किया।

प्रश्न 90.
शिवाजी का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
उत्तर:
शिवाजी का जन्म 20 अप्रैल, 1627 ई. में को पूना (महाराष्ट्र) के समीप शिवनेर के पहाड़ी के किले में हुआ था।

प्रश्न 91.
सूरत की लूट कब और किसके द्वारा की गई?
उत्तर:
जनवरी, 1664 ई. में शिवाजी द्वारा सूरत की लूट की गई।

प्रश्न 92.
पुरन्दर की सन्धि कब और किस-किसके मध्य हुई?
उत्तर:
पुरन्दर की सन्धि जून, 1665 ई. में शिवाजी और जयसिंह के मध्य हुई।

प्रश्न 93.
मुगल – मराठा सन्धि कब हुई?
उत्तर:
1667 ई. में जसवन्त सिंह की मध्यस्थता में मुगल – मराठा सन्धि हुई।

प्रश्न 94.
शिवाजी का राज्याभिषेक कब और कहाँ हुआ?
उत्तर:
शिवाजी का राज्याभिषेक जून, 1674 ई. को राजधानी रायगढ़ में हुआ।

प्रश्न 95.
शिवाजी के समय प्रचलित दो प्रकार के कर कौन – कौन थे?
उत्तर:
शिवाजी के समय दो प्रकार के कर थे-चौथ, सरदेशमुखी।

RBSE Class 12 History Chapter 4 लघुत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत पर अरब आक्रमण का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
हजरत मुहम्मद साहब की मृत्यु (632 ई) के बाद भारत पर अरबी आक्रमणों का सिलसिला प्रारम्भ हुआ। खलीफा उमर के शासन काल में 636 ई. में भारतीय प्रदेशों को लूटने के लिए मुम्बई के थाना नामक स्थान पर अरबों ने आक्रमण किया किन्तु उन्हें सफलता नहीं मिली। कालान्तर में उम्मैया वंश के शासनकाल के दौरान अब्दुल्ला के नेतृत्व में अरबी सेना ने सिन्ध के उस पार किरमार, सीस्त्रान व मकरान पर अधिकार कर लिया। खलीफा ने अब्दुल्ला को इसके आगे बढ़ने की अनुमति नहीं दी और अरबी आक्रमण यही तक सीमित रह गया।

प्रश्न 2.
711 ई. में सिंध में समुद्री डाकुओं द्वारा अरबी जहाज की घटना की लूट के परिप्रेक्ष्य में राजा दाहिर और अरबों के बीच हुए युद्ध का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
711 ई. में सिंध के समुद्री डाकुओं द्वारा स्थानीय बन्दरगाह देवल पर अरबी जहाज को लूट लिया गया। इस समय सिंध में दाहिर नामक ब्राह्मण राजा का शासन था। दाहिर के राज्य की सीमाएँ उत्तर में कश्मीर और पूर्व में प्रतिहारों के कन्नौज तक फैली हुई थी। पश्चिम में उसकी सीमाओं में मकरान या बलूचिस्तान का प्रदेश सम्मिलित था। दाहिर द्वारा अरबी जहाज लूटने की घटना का उपयुक्त स्पष्टीकरण नहीं दिए जाने को तात्कालिक कारण बनाकर ईराक के गवर्नर हज्जाज ने खलीफा वलीद से अनुमति प्राप्त कर सिंध पर आक्रमण के लिए सेना भेज दी।

प्रारम्भिक दो अभियानों में हज्जाज के सेनापतियों उबैदुल्ला तथा बुदैल को असफलता का सामना करना पड़ा और दोनों मौत के घाट उतार दिए गए। इसके बाद हज्जाज ने अपने चचेरे भाई तथा दामाद मुहम्मद बिन कासिम को युद्ध हेतु भेजा। मुहम्मद बिन कासिम द्वारा काफी मार-काट मचाने के बाद अन्ततोगत्वा 20 जून, 712 को दाहिर सेन व इसके बीच युद्ध हुआ जिसमें दाहिर सेन वीरगति को प्राप्त हुआ।

प्रश्न 3.
मुहम्मद बिन कासिम का अन्त कैसे हुआ? संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
इतिहासकार गौरीशंकर हीराचन्द ओझा ने जो विवरण प्रस्तुत किया है, उसके अनुसार दाहिर की राजकुमारियों का रूप-लावण्य देखकरे खलीफा ने उनके सामने प्रेम की याचना की। वे दोनों अपने पिता की मृत्यु का बदला लेना चाहती थी। इस कारण मौका देखकर उन्होंने खलीफा से शिकायत की कि हम आपकी शैय्या पर पैर रखने योग्य नहीं हैं, यहाँ भेजने के पहले ही कासिम ने हमारा कौमार्य भंग कर दिया।

इतना सुनते ही खलीफा आगबबूला हो गया और उसने तत्काल आज्ञापत्र लिखवाया कि इसे देखते ही मुहम्मद बिन कासिम को बैल के चमड़े में जीवित सिलाई कर हमारे पास भेज दो। हुक्म की उसी समय तामील हुआ। मार्ग में तीसरे दिन कासिम मर गया ओर उसी अवस्था में खलीफा के पास पहुँचाया गया। खलीफा ने उन दोनों राजकुमारियों को बुलवाया और उन्हीं के सामने बैल का चमड़ा खुलवा कर कासिम का शव उन्हें दिखलाया और कहा कि खुदा के खलीफा का अपमान करने वालों को मैं इस प्रकार दण्ड देता हूँ।

कासिम का मृत शरीर देखते ही राजकुमारी के मुख पर अपना मनोरथ सफल होने की प्रसन्नता छा गई, परन्तु साथ ही मंद मुस्कराहट और कटाक्ष के साथ उसने खलीफा को कहा कि ऐ खलीफा ! कासिम ने हमारा सतीत्व नष्ट नहीं किया। उसने कभी आँख उठाकर भी हमें कुदृष्टि से नहीं देखा परन्तु उसने हमारे माता, पिता, भाई और देशबंधुओं को मारा था इसलिए उससे अपना बदला लेने के लिए हमने यह मिथ्या दोष उस पर लगाया था। वीर बालिकाओं के ये वचन सुनते ही खलीफा सन्न हो गया और उन दोनों को जिन्दा जलवा दिया।

प्रश्न 4.
भारत के सम्पर्क में आने पर अरबों पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
अरबों की सिंध विजय का राजनीतिक परिणाम सिर्फ यह निकला कि सिंध का सम्बन्ध कुछ समय के लिए भारत से टूट गया और वह इस्लामी साम्राज्य का हिस्सा बन गया किन्तु सांस्कृतिक दृष्टि से भारत ने अरबों पर विजय प्राप्त की। भारतीय दर्शन, विज्ञान, गणित, चिकित्सा और ज्योतिष ने अरबों को बहुत प्रभावित किया। उन्होंने कई भारतीय संस्कृत ग्रन्थों का अरबी भाषा में अनुवाद करवाया जिनमें ब्रह्मगुप्त का ‘ब्रह्म सिद्धान्त’ तथा ‘खण्ड खांड्यक’ अधिक प्रसिद्ध हैं।

अरब के लोगों ने अंक, दशमलव पद्धति, चिकित्सा व खगोलशास्त्र के कई मौलिक सिद्धान्त भारतीयों से सीखे और केला तथा साहित्य के क्षेत्र में भी भारतीय पद्धतियों को अपनाया। भारतीय दर्शन, साहित्य व कला की अनेक बातें अरबों के माध्यम से यूरोप के लोगों ने सीखी। इस प्रकार अरबों द्वारा भारतीय ज्ञान पश्चिमी देशों में पहुँचने में सफल रहा।

प्रश्न 5.
नागभट्ट प्रथम के बारे में आप क्या जानते हैं? संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
नागभट्ट प्रथम (730 – 756 ई.) जालौर, अवन्ति और कन्नौज के गुर्जर – प्रतिहार वंश का संस्थापक कहा जाता है। उसने चावड़ों से भीनमाल जीतने के बाद आबू, जालौर आदि स्थानों पर भी अपना अधिकार किया। इस राज्य विस्तार के बाद उसने भीनमाल के स्थान पर जालौर को अपनी राजधानी बना लिया। मालवा में राज्य विस्तार कर उसने अवन्ति (उज्जैन) को भी अपनी राजधानी बनाया। नागभट्ट प्रथम के समय सन्धि की दिशा से बिलोचों तथा अरबों ने भारत पर आक्रमण किया।

उसने न केवल मुस्लिम आक्रमण से पश्चिम भारत की रक्षा की अपितु उनके रौंदे हुए प्रदेशों पर पुनः अधिकार कर लिया। ग्वालियर प्रशस्ति में नागभट्ट प्रथम को म्लेच्छों (विदेशी आक्रमणकारी) का दमनकारक और दोनों का उद्धारक होने के कारण ‘नारायण’ उपाधि से विभूषित किया गया है। मुस्लिम लेखक अब बिलादुरी के विवरण से भी ज्ञात होता है कि समकालीन अरब शासक जुनैद को मालवा के विरुद्ध सफलता नहीं मिली। नौसारी अभिलेख में अरबों द्वारा पराजित राजाओं के नाम दिए गए हैं किन्तु इस सूची में नागभट्ट प्रथम का नाम न होनी उपरोक्त तथ्यों को प्रमाणित करता है।

प्रश्न 6.
भारत में अरबों की सफलता के क्या कारण थे?
उत्तर:
सिन्ध पर अरबों की सफलता के कई कारण थे। दाहिर के शासन में सामान्य वर्ग असन्तुष्ट था। राज्य के अधिकांश भागों में असन्तोष और अव्यवस्था व्याप्त थी। इस कारण अरब आक्रमण के समय उसे जन – सहयोग नहीं मिल पाया। दाहिर स्वयं जनता में अप्रिय था क्योंकि उसका पिता राज्य का वास्तविक अधिकारी नहीं था। समकालीन भारतीय शासकों में आपसी तालमेल, सौहाद तथा सहयोग की भावना नहीं थी और व्यक्तिगत स्वार्थ पनप रहे थे। सैनिक शक्ति बढ़ाने और विदेशी आक्रमण की सम्भावना को ध्यान में रखकर किसी भी राज्य ने अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाने की कोशिश नहीं की।

प्रश्न 7.
नागभट्ट द्वितीय कौन था?
उत्तर:
वत्सराज की मृत्यु के बाद सुन्दर देवी से उत्पन्न पुत्र नागभट्ट द्वितीय (795 – 833 ई.) प्रतीहार वंश की गद्दी पर आसीन हुआ। इसने अपने पराक्रम से गुर्जर – प्रतिहार वंश की खोई हुई प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित कर उसे चरम पर पहुँचा दिया। वह प्रारम्भ में दक्षिण के राष्ट्रकूट वंशी शासक गोविन्द तृतीय से पराजित हुआ किन्तु बाद में गोविन्द तृतीय की घरेलू परिस्थितियाँ का लाभ उठाकर चक्रायुद्ध को पराजित कर कन्नौज पर अधिकार कर लिया।

ग्वालियर प्रशास्ति के अनुसार ‘आन्ध्र’, सिन्धु, विदर्भ तथा कालिंग के नरेशों ने उसकी युवाशक्ति के समक्ष इस प्रकार समर्पण किया जिस प्रकार पतंगे अग्नि में करते हैं। उसकी महान् विशेषताओं की ख्याति सभी क्षेत्रों में फैल गई, जबकि उसने आनर्त, मालव, मत्स्य, किरात, तुरुष्क तथा वत्स के पर्वतीय दुर्गों के राजाओं पर बलपूर्वक विजय प्राप्त की। नागभट्ट द्वितीय ने परम भट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर की उपाधि धारण की। उसने 833 ई. में गंगा में डूबकर आत्महत्या कर ली।

प्रश्न 8.
मेवाड़ में गुहिल वंश का वास्तविक संस्थापक कौन कहा जाता है? बताइए।

अथवा

बप्पा रावल के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
बप्पा रावल को मेवाड़ के गुहिल वंश का वास्तविक संस्थापक कहा जाता है। डॉ. ओझा के अनुसार, ‘बप्पा रावल’ किसी व्यक्ति विशेष का नाम न होकर कालभोज नामक शासक की उपाधि थी। मुहणौत नैणसी की ख्यात के अनुसार वह ऋषि हारीत राशि की गायें चराता था। बप्पा की सेवा से प्रसन्न होकर हारीत राशि ने महादेव को प्रसन्न कर उसके लिए मेवाड़ का राज्य माँग लिया। चित्तौड़ में राजा मान और सामंतों के बीच तनाव पैदा होने के बाद कई सामंत दरबार छोड़कर चले गए।

इन विद्रोही सामंतों ने बप्पा को शासक बनने के लिए राजी कर 734 ई. में चित्तौड़ पर आक्रमण कर दिया। बप्पा ने चित्तौड़ पर अधिकार कर तीन उपाधियाँ-‘हिन्दू सूर्य’, ‘राजगुरु’ और ‘चक्कवै’ धारण की। पचास वर्ष की आयु में बप्पा ने खुरासान पर आक्रमण करे अधिकार कर लिया। वहीं पर उसकी मृत्यु हो गई। इतिहासकार ओझा के अनुसार बप्पा का देहान्त नागदा में हुआ और उसका समाधि स्थल ‘बापा रावल’ के नाम से प्रसिद्ध है। इतिहासकार सी. वी. वैद्य ने बप्पा रावल की तुलना चार्ल्स मार्टेल (मुगल सेनाओं को सर्वप्रथम पराजित करने वाला फ्रांसीसी सेनापति) के साथ करते हुए कहा है कि उसकी शौर्य की चट्टान के सामने अरब आक्रमण का ज्वार-भाटा टकराकर चूर – चूर हो गया।

प्रश्न 9.
भारत पर तुर्क आक्रमण की पृष्ठभूमि समझाइए।

अथवा

सुबुक्तगीन और उसके पुत्र महमूद गजनवी की भारत पर आक्रमण की स्थिति स्पष्ट कीजिए।
उत्तरआठवीं शताब्दी में होने वाले अरब आक्रमणों के बाद भारत लगभग दो शताब्दियों तक मुगल आक्रमणों से सुरक्षित रहा। दसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में मुगल आक्रमणों का सिलसिला एक बार फिर प्रारम्भ हुआ किन्तु इस बार आक्रमण अरबों के स्थान पर तुर्को द्वारा किए गये थे। भारत पर आक्रमण करने वाला प्रथम तुर्क आक्रमणकारी गजनी का शासक सुबुक्तगीन था। 977 ई. में शासक बनने के बाद उसने अपने साम्राज्य की सीमाओं का प्रसार करना प्रारम्भ किया।

इस समय भारत के उत्तर-पश्चिमी भाग पर शाही वंश के योग्य राजा जयपाल का शासन था। लम्बे संघर्ष के बाद धोखे व षड्यन्त्र से सुबुक्तगीन विजयी रहा और उसने लमधान से पेशावर तक के भारतीय प्रदेशों पर अपना अधिकार कर लिया। 997 ई. में सुबुक्तगीन की मृत्यु हो गई जिसके बाद उसके पुत्र इस्माइल और महमूद (गजनवी) क्रमशः गजनी के शासक बने। महमूद योग्य व महत्वाकांक्षी शासक था। उसने भारत पर कुल 17 बार आक्रमण किए जिनमें 1025 ई. में सोमनाथ मंदिर (गुजरात) पर किया गया उसका सोलहवाँ आक्रमण सर्वाधिक कुख्यात है।

प्रश्न 10.
महमूद गजनवी के सोमनाथ पर आक्रमण का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
महमूद गजनवी ने 1025 ई. में सोमनाथ मन्दिर पर आक्रमण किया। यह उसका सोलहवाँ आक्रमण था। महमूद के आक्रमण की सूचना सुनकर राजा भीमदेव अपने अनुयायिपों सहित राजधानी छोड़कर भाग गया किन्तु सोमनाथ की साधारण जनता और पुजारी अपने स्थानों पर डटे रहे क्योंकि उनका विश्वास था कि भगवान सोमनाथ भी उपस्थिति के कारण वे लोग पूर्णतया सुरक्षित हैं। सोमनाथ के लोगों ने पहले तो आक्रमणकारियों का विरोध किया परन्तु बाद में आक्रमणकारी मन्दिर में प्रवेश कर गए। महमूद ने बिना किसी प्रतिरोध के नगर पर अधिकार कर लिया। महमूद ने स्वयं सोमनाथ की मूर्ति को तोड़ा तथा पचास हजार से अधिक स्त्री – पुरुषों को मौत के घाट उतार दिया। मूर्तियों के टुकड़ों को गजनी, मक्का व मदीना भिजवाकर वहाँ की प्रमुख मस्जिदों की सीढ़ियों के नीचे डलवा दिया।

प्रश्न 11.
पृथ्वीराज चौहान और जयचन्द्र के बीच शत्रुता पर प्रकाश डालिए।

अथवा

‘यचन्द्र ने अपनी राजधानी में खुशियाँ क्यों मनाईं।’ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
पृथ्वीराज के पूर्व में स्थित कन्नौज के गहड़वाल राज्य का शासक इस समय जयचन्द्र था। दिल्ली पर नियन्त्रण को लेकर चौहानों और गहड़वालों के बीच परम्परागत वैमनस्य चला आ रहा था। पृथ्वीराज दिग्विजय योजना को पूर्णता प्रदान करने के लिए कन्नौज को अपने राज्य में मिलाना चाहता था, वहीं जयचद्र भी उसकी होड़ में विजय योजनाएँ बना रहा था। इस कारण दोनों के बीच संघर्ष होना अवश्यम्भावी था।

पृथ्वीराज द्वारा जयचन्द्र की पुत्री संयोगिता का बलपूर्वक अपहरण कर विवाह किया जाना दोनों शासकों के बीच संघर्ष का चरमोत्कर्ष था। अपनी पुत्री के अपहरण से जयचन्द्र पृथ्वीराज का पक्का शत्रु बन गया और बदला लेने का अवसर ढूँढ़ने लगा। एक प्रचलित मत के अनुसार उसने सहायता का आश्वासन देकर मुहम्मद गौरी को पृथ्वीराज पर आक्रमण करने के लिए आमन्त्रित किया। पुरातन प्रबन्ध संग्रह के अनुसार गौरी के हाथों पृथ्वीराज की पराजय की खबर सुनकर जयचन्द्र ने अपनी राजधानी में खुशियाँ मनार्यां थीं।

प्रश्न 12.
ऐतिहासिक विवरणों के आलोक में ‘संयोगिता प्रकरण’ की समीक्षा कीजिए।
अथवा
‘पृथ्वीराज – संयोगिता प्रेम’ के सम्बन्ध में विद्यमान साक्ष्यों में विरोधाभास है-संक्षिप्त विश्लेषण कीजिए।
उत्तर:
चन्दबरदाई की रचना ‘पृथ्वीराज रासो’ के अनुसार जयचन्द्र और पृथ्वीराज चौहान के बीच संघर्ष को कारण पृथ्वीराज चौहान द्वारा जयचन्द्र की पुत्री संयोगिता का अपहरण कर उसके साथ विवाह करना था। कथानक के अनुसार पृथ्वीराज चौहान और जयचन्द्र की पुत्री संयोगिता के बीच प्रेम था किन्तु जयचन्द्र पृथ्वीराज के साथ शत्रुतापूर्ण सम्बन्धों के चलते अपनी पुत्री संयोगिता का विवाह किसी अन्य राजा के साथ करना चाहता था। इस उद्देश्य से उसने राजसूय यज्ञ के साथ संयोगिता के स्वयंवर का आयोजन किया। इस आयोजन में उसने पृथ्वीराज को छोड़कर सभी प्रमुख राजा – महाराजाओं को आमन्त्रित किया। इतना ही नहीं जयचन्द्र ने पृथ्वीराज को अपमानित करने के लिए उसकी मूर्ति बनवाकर द्वारपाल के स्थान पर लगवा दी।

स्वयंवर के समय जब सभी राजा – महाराजा संयोगिता की वरमाला का इन्तजार कर रहे थे उस समय संयोगिता ने पृथ्वीराज की मूर्ति के गले में वरमाला डाल दी। इसी वक्त पृथ्वीराज अपनी सेना सहित घटनास्थल पर पहुँच गया और संयोगिता को उठाकर ले गया। जयचन्द्र के सैनिकों से पृथ्वीराज को रोकने का प्रयास किया किन्तु वे असफल रहे। डॉ. आर. एस. त्रिपाठी, गौरीशंकर हीराचन्द और विश्वेश्वरनाथ रेऊ जैसे इतिहासकारों ने इसकी ऐतिहासिकता को मात्र प्रेमाख्यान कहकर अस्वीकार कर दिया है, जबकि डॉ. दशरथ शर्मा ने ‘दि अर्ली चौहान डाइनेस्टीज’ में संयोगिता की घटना को ऐतिहासिक तथ्य स्वीकार किया है।

प्रश्न 13.
पृथ्वीराज चौहान तथा मुहम्मद गौरी के बीच प्रारम्भिक संघर्षों का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
‘गजनी का गवर्नर नियुक्त होने के बाद मुहम्मद गौरी ने 1175 ई. में मुल्तान का आक्रमण कर अधिकार कर लिया। इसके बाद उसने गुजरात, सियालकोट और लाहौर के युद्धों में विजय हासिल कर अपनी शक्ति का परिचय दिया। राजस्थानी स्रोतों के अनुसार इस दौरान उसकी पृथ्वीराज चौहान के साथ अनेक बार लड़ाइयाँ हुईं और हर बार उसे पराजय का सामना ही करना पड़ा। पृथ्वीराज रासो में 21 तथा हम्मीर महाकाव्य में सात बार गौरी पर पृथ्वीराज की विजयों का दावा किया गया है।

दोनों के बीच दो निर्णायक युद्ध हुए। 1191 ई. में लाहौर से रवाना होकर मुहम्मद गौरी तबरहिन्द नामक स्थान पर अधिकार करते हुए तराइन तक पहुँच गया। यहाँ दोनों पक्षों के बीच भयंकर युद्ध हुआ जिसमें पृथ्वीराज चौहान के दिल्ली सामंत गोविन्दराज ने अपनी बर्थी के वार से मुहम्मद गौरी को घायल कर दिया। घायल गौरी अपनी सेना सहित गजनी भाग गया। पृथ्वीराज ने तबरहिन्द पर अधिकार कर काजी जियाउद्दीन को बंदी बना लिया जिसे बाद में एक बड़ी धनराशि के बदले रिहा कर दिया गया।

प्रश्न 14.
तराइन के द्वितीय युद्ध का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
1191 ई. के एक वर्ष बाद मुहम्मद गोरी सेना सहित पुनः तराइन के मैदान में आ धमका। पृथ्वीराज भी मुकाबला करने मैदान में आ गया किन्तु गोरी ने शत्रु को सन्धि-वार्ता के झाँसे में फंसा दिया। चौहान सेना कई दिनों सन्धि वार्ता में व्यस्त रही और पृथ्वीराज आमोद-प्रमोद में डूबा रहा। इसका फायदा उठाकर गोरी ने एक रात्रि अचानक आक्रमण कर दिया।

राजपूत सेना इस अप्रत्याशित आक्रमण को झेल न पाई और पराजित हुई। पराजित पृथ्वीराज चौहान को सिरसा के पास सरस्वती नामक स्थान पर बन्दी बना लिया गया। बन्दी पृथ्वीराज को गोरी अपने साथ गजनी ले गया जहाँ शब्दभेदी बाण के प्रदर्शन के समय पृथ्वीराज ने गोरी को मार डाला। हसन निजामी ने इसके विपरीत पृथ्वीराज के मारे जाने की पुष्टि की है।

प्रश्न 15.
पृथ्वीराज के पराजय के कारणों की समीक्षा कीजिए।
उत्तर:
पृथ्वीराज चौहान की पराजय के कारण – विजेता होने के बावजूद पृथ्वीराज चौहान में दूरदर्शिता व कूटनीति का अभाव था। उसने अपने पड़ोसी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्व सम्बन्ध स्थापित नहीं किये अपितु उनके साथ युद्ध करके शत्रुता मोल ले ली। इसी कारण मुहम्मद गौरी के विरुद्ध संघर्ष में उसे उनकी कोई सहयोग नहीं मिला। 1178 ई. में जब मुहम्मद गौरी ने गुजरात के शासक भीमदेव द्वितीय पर आक्रमण किया था, उस समय पृथ्वीराज ने गुजरात की कोई सहायता न कर एक भूल की।

तराइन के प्रथम युद्ध में पराजित होकर भागती तुर्क सेना पर आक्रमण न करना भी उसकी एक भयंकर भूल सिद्ध हुई। यदि उस समय शत्रु सेना पर प्रबल आक्रमण करता तो मुहम्मद गौरी भारत पर पुनः आक्रमण करने के बारे में कभी नहीं सोचता। संयोगिता के साथ विवाह करने के बाद उसने राजकार्यों की उपेक्षा कर अपना जीवन विलासिता में व्यतीत करना प्रारम्भ कर दिया था।

प्रश्न 16.
पृथ्वीराज चौहान का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर:
पृथ्वीराज एक वीर और साहसी शासक था। अपने शासन काल के प्रारम्भ से ही वह युद्ध करता रहा जो उसके अच्छे सैनिक और सेनाध्यक्ष होने को प्रमाणित करता है। अनेक युद्धों में सफलता प्राप्त कर उसने ‘दलपंगुल’ (विश्वविजेता) की उपाधि धारण की। तराइन के द्वितीय युद्ध में मुहम्मद गोरी द्वारा छल – कपट का सहारा लेने से पूर्व वह किसी भी लड़ाई में नहीं हारा था। एक विजेता के साथ – साथ वह विद्यानुरागी था। उसके दरबार में अनेक विद्वान रहते थे जिनमें विद्यापति गौड़, वागीश्वर, जनार्दन, जयानक, विश्वरूप, आशाधर आदि प्रमुख थे। चन्दबरदाई उसका राजकवि था जिसका ग्रन्थ ‘पृथ्वीराज रासो’ हिन्दी साहित्य का प्रथम महाकाव्य माना जाता है।

प्रश्न 17.
अलाउद्दीन खिलजी के रणथम्भौर पर आक्रमण के क्या कारण थे?
उत्तर:
अलाउद्दीन खिलजी के रणथम्भौर पर आक्रमण के निम्नलिखित चरण थे

  1. रणथम्भौर सामरिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण था अलाउद्दीन इस अभेद्य दुर्ग पर अधिकार करना चाहता था तथा राजपूतों पर ने अपनी धाक जमाना चाहता था।
  2. रणथम्भौर दिल्ली के काफी निकट था। चौहान की बढ़ती हुई शक्ति वह सहन नहीं कर सकता था।
  3. अलाउद्दीन खिलजी अपने चाचा जलालुउद्दीन खिलजी की पराजय का बदला लेना चाहता था।
  4. अलाउद्दीन खिलजी एक महत्वाकांक्षी और साम्राज्यवादी शासक था। रणथम्भौर पर आक्रमण इसी नीति का परिणाम था।

प्रश्न 18.
‘शरणागत की रक्षा’ रणथम्भौर के दुर्ग पर आक्रमण का कारण बना। इस कथन की समीक्षा कीजिए।
उत्तर:
नयनचन्द्र सूरी की रचना ‘हम्मीर महाकाव्य’ के अनुसार रणथम्भौर पर आक्रमण का कारण यहाँ के शासक हम्मीर द्वारा अलाउद्दीन खिलजी के विद्रोही सेनापति मीर मुहम्मद शाह को शरण देना था। मुस्लिम इतिहासकार इसामी ने भी अपने विवरण में इस कारण की पुष्टि की है। उसने लिखा है कि 1299 ई. में अलाउद्दीन खिलजी ने अपने दो सेनापतियों उलूग। खाँ व नुसरत खाँ को गुजरात पर आक्रमण करने के लिए भेजा था। गुजरात विजय के बाद जब यह सेना वापिस लौट रही थी तो जालौर के पास लूट के माल के बँटवारे के प्रश्न पर ‘नव-मुसलमानों’ (जलालुद्दीन फिरोज खिलजी के समय भारत में बस चुके वे मंगोल, जिन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिया था) ने विद्रोह कर दिया।

यद्यपि विद्रोहियों को बर्बरता के साथ दमन कर दिया गया किन्तु उनमें से मुहम्मदशाह व उसका भाई कैहब्रु भाग कर रणथम्भौर के शासक हम्मीर के पास पहुँचने में। सफल हो गए। हम्मीर ने न केवल उन्हें शरण दी अपितु मुहम्मदशाह को जगाना’ की जागीर भी दी। चन्द्रशेखर की रचना ‘हम्मीर हठ’ के अनुसार अलाउद्दीन खिलजी की एक मराठा बेगम से मीर मुहम्मदशाह को प्रेम हो गया था और उन दोनों ने मिलकर अलाउद्दीन खिलजी को समय रहते इस षड्यंत्र की जानकारी मिल जाने के कारण मीर मुहम्मदशाह को बंदी बनाने का प्रयास किया गया किन्तु वह भागकर हम्मीर की शरण में पहुँच गया। अलाउद्दीन खिलजी की तरफ से इन विद्रोहियों को सौंप देने की माँग की गई। इस माँग को जब हम्मीर द्वारा ठुकरा दिया गया तो अलाउद्दीन खिलजी की सेना ने रणथम्भौर पर आक्रमण कर दिया।

प्रश्न 19.
अलाउद्दीन खिलजी द्वारा रणथम्भौर पर किस प्रकार अधिकार किया गया?
उत्तर:
अधिकार – उलूग खाँ की असफलता के बाद अलाउद्दीन खिलजी स्वयं रणथम्भौर पहुँचा। अमीर खुसरो ने अपनी रचना ‘खजाईन-उल-फुतूह’ में इस अभियान का आँखों देखा वर्णन करते हुए लिखा है कि सुल्तान ने इस आक्रमण में पाशेब, मगरबी व अदा की सहायता ली। काफी प्रयासों के बाद भी जब अलाउद्दीन खिलजी दुर्ग को जीतने में असफल रही तो उसने छल और कूटनीति को आश्रय लेते हुए हम्मीर के पास संधि का प्रस्ताव भेजा। हम्मीर द्वारा संधि के लिए अपने सेनापति रतिपाल को भेजा गया।

अलाउद्दीन खिलजी ने रतिपाल व उसकी सहायता से हम्मीर के एक अन्य सेनापति रणमल को रणथम्भौर दुर्ग का प्रलोभन देकर अपनी ओर मिला लिया। चौहान रचनाओं में इस बात का उल्लेख किया गया है कि अलाउद्दीन ने हम्मीर के एक अधिकारी को अपनी तरफ मिलाकर दुर्ग में स्थित खाद्य सामग्री को दूषित करवा दिया। इससे दुर्ग में खाद्यान सामग्री का भयंकर संकट पैदा हो गया। अमीर खुसरो ने इस सम्बन्ध में लिखा है कि “सोने के दो दानों के बदले में चावल का एक दाना भी नसीब नहीं हो पा रहा था।”

खाद्यान्न के अभाव में हम्मीर को दुर्ग के बाहर निकलना पड़ा किन्तु रणमल और रतिपाल के विश्वासघात के कारण उसे पराजय का मुँह देखना पड़ा। युद्ध के दौरान हम्मीर लड़ता हुआ मारा गया और उसकी रानी रंगदेवी के नेतृत्व में राजपूत वीरांगनाओं द्वारा जौहर किया गया। यह रणथम्भौर का प्रथम साका कहा जाता है। जोधराज की रचना ‘हम्मीर रासो’ के अनुसार इस जौहर में मुहम्मदशाह की स्त्रियाँ भी रंगदेवी के साथ चिता में भस्म हो गई। कुछ स्थानों पर उल्लेख है कि रंगदेवी ने किले में स्थित ‘पदमला तालाब में जल जौहर किया था। इस प्रकार 11 जुलाई, 1301 ई. को अलाउद्दीन खिलजी ने रणथम्भौर पर अधिकार कर लिया।

प्रश्न 20.
हम्मीरदेव का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर:
हम्मीर ने अपने जीवन में कुल 17 युद्ध लड़े जिनमें सोलह में वह विजयी रहा। बार-बार के प्रयासों के बाद भी जलालुद्दीन खिलजी का रणथम्भौर पर अधिकार न कर पाना हम्मीर की शूर वीरता व सैनिक योग्यता का स्पष्ट प्रमाण है। वह वीर योद्धा ही नहीं अपितु एक उदार शासक भी था। विद्वानों के प्रति हम्मीर की बड़ी श्रद्धा थी। विजया दित्य उसका सम्मानित दरबारी कवि तथा राघवदेव उसका गुरु था। कोटियज्ञ के सम्पादन के द्वारा उसने अपनी धर्मनिष्ठा का परिचय दिया। हम्मीर अपने वचन व शरणागत की रक्षा के लिए इतिहास में प्रसिद्ध है। उसने अपनी शरण में आए हुए अलाउद्दीन खिलजी के विद्रोहियों को न लौटाने का हठ कर लिया।

प्रश्न 21.
“पद्मिनी को प्राप्त करने की लालसा ही अलाउद्दीन खिलजी के मेवाड़ पर आक्रमण का कारण था” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कुछ इतिहासकारों के अनुसार, अलाउद्दीन खिलजी मेवाड़ के शासक रत्नसिंह की सुन्दर पत्नी को प्राप्त करना चाहता था। उसने रत्नसिंह को सन्देश भिजवाया कि वह सर्वनाश से बचना चाहता है तो अपनी पत्नी पद्मिनी को शाही हरम में भेज दे। रत्न सिंह द्वारा इस प्रस्ताव को अस्वीकार किए जाने पर अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ पर आक्रमण कर दिया। शेरशाह सूरी के समय 1540 ई. में लगभग लिखी गई मलिक मुहम्मद जायसी की रचना ‘पद्मावत’ के अनुसार इस आक्रमण का कारण पद्मिनी को प्राप्त करना था।

प्रश्न 22.
महाराणा कुम्भा के समय मेवाड़ और गुजरात के सम्बन्धों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
कुम्भा के समय गुजरात की व्यवस्था समाप्त हो चुकी थी और वहाँ के शासक अपने प्रभाव क्षेत्र के विस्तार के लिए लालायित थे। मालवा-मेवाड़ के बीच चलने वाले संघर्ष तथा सिरोही व गुजरात की राजनीतिक स्थिति ने मेवाड़ – गुजरात के संघर्ष को आवश्यक बना दिया। 1456 में फिरोज खाँ की मृत्यु के बाद उसका पुत्र शम्स खाँ नागौर का नया स्वामी बना किन्तु फिरोज के छोटे भाई मुजाहिद खाँ ने शम्स खाँ को पराजित कर नागौर पर अपना अधिकार कर लिया। शम्स खाँ ने महाराणा कुम्भा की सहायता से नागौर पर पुनः अधिकार कर लिया किन्तु शीघ्र ही उसने कुम्भा की शर्त के विपरीत नागौर किले की मरम्मत करवानी प्रारम्भ कर दी। नाराज कुम्भा ने नागौर पर आक्रमण कर अपना अधिकार कर लिया।

प्रश्न 23.
चित्तौड़ ‘विजय स्तम्भ’ के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
चित्तौड़ दुर्ग के भीतर स्थित नौ मंजिले और 122 फीट ऊँचे विजय स्तम्भ का निर्माण महाराणा कुम्भा ने मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी पर विजय की स्मृति में करवाया। इसका निर्माण प्रधान शिल्पी जैता व उसके तीन पुत्रों – नापा, पोमा और पूँजा की देखरेख में हुआ। अनेक हिन्दु-देवी – देवताओं की कलात्मक प्रतिमाएँ उत्कीर्ण होने के कारण विजय स्तम्भ को “पौराणिक हिन्दू मूर्तिकला का अनमोल खजाना (भारतीय मूर्ति कला का विश्व कोष) कहा जाता है। डॉ. गोपीनाथ शर्मा ने इसे ‘हिन्दू देवी – देवताओं से सजाया हुआ एक व्यवस्थित संग्रहालय’ तथा डॉ. ओझा ने ‘पौराणिक देवताओं के अमूल्य कोष’ की संज्ञा दी है।

प्रश्न 24.
“बाबर द्वारा सांगा पर आक्रमण करना दो महत्वाकांक्षाओं का टकराव था।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
बाबर भी इब्राहिम लोदी पर विजय के बाद, सांगा ने सोचा था कि वह अपने पूर्वज तैमूर तथा अन्य आक्रमण कारियों की भाँति माल लूटकर वापस चला जायेगा किन्तु यह उसका भ्रम था। बाबर सम्पूर्ण भारत पर अपना आधिपत्य स्थापित करना चाहता था। ‘हिन्दूपत’ (हिन्दू प्रमुख) सांगा को पराजित किए बिना ऐसा सम्भव नहीं था। दोनों का उत्तरी भारत में एक साथ बने रहना ठीक वैसा ही ही था जैसे- एक म्यान में दो तलवार। इस प्रकार दोनों की (बाबर और महाराणा सांगा) महत्वकांक्षाओं का टकराव ही आक्रमण का प्रमुख कारण थे।

प्रश्न 25.
खानवा युद्ध के परिणामों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
खानवा युद्ध के निम्नलिखित परिणाम हुए

  1. भगत में राजपूतों की सर्वोच्चता का अन्त हो गया। राजपूतों का वह प्रताप – सूर्य जो भारत में गगन के उच्च स्थान पर पहुँच कर लोगों में चकाचौंध उत्पन्न कर रहा था, अब अस्ताचल की और खिसकने लगा था।
  2. मेवाड़ की प्रतिष्ठा और शक्ति के कारण निर्मित राजपूत संगठन इस पराजय के साथ ही समाप्त हो गया।
  3. भारतवर्ष में मुगल साम्प्रज्य स्थापित हो गया और बाबर स्थिर रूप से भारत का बादशाह बन गया।

प्रश्न 26.
शासक बनने के बाद राव चन्द्रसेन ने आन्तरिक विद्रोहों का दमन किस प्रकार किया?
उत्तर:
शासक बनने के कुछ समय बाद चन्द्रसेन में आवेश में आकर अपने एक चाकर की हत्या कर दी। इनसे जैतमाल ओर उससे मेल रखने वाले कुछ अन्य सरदार अप्रसन्न हो गए। नाराज सरदारों ने चन्द्रसेन को दण्डित करने के लिए उसके विरोधी भाइयों राम, उदय सिंह और रायमल के साथ गठबन्धन कर उन्हें आक्रमण के लिए आमंत्रित किया। राम ने सोजत और रायमल ने दूनाड़ा प्रान्त में उपद्रव शुरू कर दिया तथा उदय सिंह ने गांगाणी और बावड़ी पर अधिकार कर लिया।

सूचना मिलते ही चन्द्रपेन ने इन उपद्रवों को शान्त करने के लिए अपनी सेना भेजी जिससे राम और रायमल तो अपनी-अपनी जागीरों में लौट गए किन्तु उदय सिंह ने लोहावट नामक स्थान पर संघर्ष किया। इस युद्ध में उदयसिंह ने लोहावट नामक स्थान पर संघर्ष किया। इस युद्ध में उदयसिंह घायल हुआ और चन्द्रसेन विजयी रहा।

प्रश्न 27.
राव चन्द्रसेन को ‘प्रताप का अग्रगामी’ क्यों कहा जाता है? समझाइए।
उत्तर:
राव चन्द्रसेन अकबर कालीन राजस्थान का प्रथम स्वतन्त्र प्रकृति का शासक था। उसके भाई शाही सत्ता का सुख भोगते रहे, वहीं उसे अपने रत्न-आभूषण बेचकर गुजारा चलाना पड़ा। चन्द्रसेन ने जोधपुर राज्य को छोड़कर रात – दिन पहाड़ में घुमना और मुगल सेना से लड़ता रहना अंगीकार कर लिया किन्तु अधीनता स्वीकार नहीं। संघर्ष की जो शुरुआत ‘चन्द्रसेन ने की थी उसी राह पर आगे चलकर महाराणा प्रताप ने बड़ा नाम कमाया। इस कारण चंद्रसेन को ‘प्रताप का अग्रगामी’ तथा ‘मारवाड़ का प्रताप’ भी कहा जाता है।

प्रश्न 28.
महाराणा प्रताप का चरित्र – चित्रण कीजिए।
उत्तर:
महाराणा की चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित थी

  1. निहत्थे पर वार नहीं करना – उन्होंने कभी भी निहत्थे पर वार नहीं करने का प्रण ले रखा था। वे सदैव दो तलवार रखते थे। एक तलवार दुश्मन को देने के लिए भी रखते थे।
  2. मेवाड़ का राजचिह्न सामाजिक समरसता का प्रतीक है। एक तरफ क्षत्रिय व एक तरफ भील योद्धा, सर्व समाज समभाव का सूचक है। महाराणा प्रताप सभी के लिए प्रिय थे, सब लोग उनके लिए प्राण देने के लिए तैयार रहते थे।
  3. धर्मरक्षक व राजचिह्न की सदैव रक्षा की उनकी मान्यता थी कि “जो दृढ़ राखे धर्म को तिहि राखे करतार।”

प्रश्न 29.
दुर्गादास राठौड़ का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर:
शाहजहाँ के पुत्रों के बीच उत्तराधिकार युद्ध के दौरान दुर्गादास ने महाराजा जसवन्त सिंह के साथ धरमत के युद्ध में भाग लिया था। वे एक वीर योद्धा थे। कहा जाता है कि “दुर्गादास राठौड़ ने एक के बाद एक चार घोड़ों की सवारी की और जब चारों एक-एक कर मारे गए तो अन्त में वह पाँचवें घोड़े पर सवार हुआ, लेकिन पाँचवाँ घोड़ा भी मारा गया। तब तक न केवल उसके सारे हथियार टूट चुके थे बल्कि उसका शरीर भी बुरी तरह घायल हो चुका था। अन्ततः वह रण भूमि में गिर पड़ा। ऐसा लगता था कि जैसे एक और भीष्म शर शैय्या पर लेटा हुआ हो। उसकी वीरता और गुणों के आधार पर उसे कर्नल टॉड ने ‘राठौड़ों का यूलीसैस’ कहा है।

प्रश्न 30.
शिवाजी हिन्दू स्वराज्य के समर्थक थे। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
शिवाजी का उद्देश्य सम्पूर्ण भारत में हिन्दुओं को धार्मिक स्वतन्त्रता दिलाना था। विचारशील व क्रियाशील मराठों ने उनके विचारों को इसी सन्दर्भ में समझा। शिवाजी द्वारा चौथ व सर देशमुखी करों की वसूली सम्पूर्ण भारत में राज्य – विस्तार का ही साधन थे। शिवाजी के आगरा जाने का उद्देश्य अपनी आँखों से उत्तर भारत की दशा देखकर यह जानना था कि क्या उत्तर भारत मुगल साम्राज्य के पंजे से मुक्त होने के लिए तैयार है। मुगलों से युद्ध करते समय शिवाजी ने राजपूत राजाओं से संघर्ष के स्थान पर मेल – जोल की नीति अपनाई। इस प्रकार शिवाजी हिन्दू स्वराज्य के समर्थक थे।

प्रश्न 31.
मीरबक्शी हुसैन अली और शाहू के मध्य हुई सन्धि की प्रमुख बातें क्या थीं?
उत्तर:
सन्धि की शर्ते-

  1. मुगलों द्वारा शाहू को वे सब प्रदेश लौटा दिए जाएँगे जो शिवाजी के ‘स्वराज’ नाम से प्रसिद्ध थे।
  2. खानदेश, बरार, गोंडवाना, हैदराबाद और कर्नाटक में मराठों द्वारा हाल ही में जीते गए प्रदेशों पर उनका अधिकार स्वीकार कर लिया जाएगा।
  3. मराठों को दक्खन के छ: प्रान्तों में चौथ और सरदेशमुखी नामक कर वसूल करने की अनुमति दे दी जाएगी। चौथ के बदले पन्द्रह हजार मराठा सैनिक मुगल सम्राट की सेवा में रहेंगे।
  4. दिल्ली में नजरबन्द शाहू की माता यसूबाई व पत्नी सहित मराठा राज परिवार के सदस्यों को मुक्त कर वापिस भेज दिया जाएगा।

प्रश्न 32.
मुंगी शिव गाँव की क्या शर्ते थीं?
उत्तर:
मार्च, 1728 ई. को औरंगाबाद के पास पालखेड़ नामक स्थान पर पेशवा ने निजाम की सेनाओं को पराजित कर उसे मुंगी शिवगाँव की सन्धि पर हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य किया।  इस सन्धि के अनुसार-

  1. निजाम ने शम्भा जी की सुरक्षा की जिम्मेदारी छोड़कर उसे पन्हाला भेजना स्वीकार कर लिया।
  2. छीने गए मरीठा प्रदेश तथा मराठा कैदियों को छोड़ देने का निर्णय लिया गया।
  3. 1719 ई. की सन्धि के अनुसार शाहू के चौथ तथा सरदेशमुखी कर भी वसूली के अधिकार को मान लिया।

RBSE Class 12 History Chapter 4 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत पर अरब आक्रमण के क्या कारण थे? अरबों के भारत पर हुए आक्रमण का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
अरब आक्रमण:
हजरत मुहम्मद की 632 ई. में मृत्यु के बाद भारत पर अरबी आक्रमणों का सिलसिला प्रारम्भ हुआ। खलीफा उमर के शासन काल में 636 ई. में भारतीय प्रदेशों को लूटने के लिए मुम्बई के थाना नामक स्थान पर अरबों ने आक्रमण किया, किन्तु उन्हें सफलता नहीं मिली। कालान्तर में उम्मैया वंश के शासन काल के दौरान अब्दुल्ला के नेतृत्व में अरबी सेना ने सिन्ध के उस पार किरमार, सीस्तान व मकराने पर अधिकार कर लिया। खलीफा ने अब्दुल्ला को इससे आगे बढ़ने की अनुमति नहीं दी और अरबी आक्रमण यहीं तक सीमित रह गया।

भारत पर अरब आक्रमणों के कारण – भारत पर आक्रमण के निम्नलिखित कारण थे

  1. इस्लाम ने अरबवासियों को संगठित कर उनमें मजहबी प्रचार की तीव्र अभिलाषा उत्पन्न कर दी थी। अन्य देशों की तरह भारत में भी इस्लाम के प्रसार के उद्देश्य ने उन्हें आक्रमण करने के लिए प्रेरित किया।
  2. खलीफा इस्लामी जगत का मजहबी प्रमुख ही नहीं अपितु राजनैतिक अधिकारी भी होता था। ऐसे में साम्राज्य विस्तार की भावना होना भी स्वाभाविक था।
  3. अरबवासी भारत की आर्थिक समृद्धि से परिचित थे। वे यहाँ आक्रमण कर धन प्राप्त करना चाहते थे।

अरब और दाहिरसेन

1. तात्कालिक कारण:
711 ई. में सिन्ध के समुद्री डाकुओं द्वारा स्थानीय बन्दरगाह देवल पर अरबी जहाज को लूट लिया गया। इस समय सिन्ध में दाहिर नामक ब्राह्मण राजा का शासन था। दाहिर के राज्य की सीमाएँ उत्तर में कश्मीर और पूर्व में प्रतिहारों के कन्नौज तक फैली हुई थी। पश्चिम में उसकी सीमाओं में मकरान या बलूचिस्तान का प्रदेश सम्मिलित था। दाहिर द्वारा अरबी जहाज लूटने की घटना का उपयुक्त स्पष्टीकरण नहीं दिए जाने को तात्कालिक कारण बनाकर ईराक के गवर्नर हज्जाज ने खलीफा वलीद से अनुमति प्राप्त कर सिन्ध पर आक्रमण के लिए सेना भेज दी। प्रारम्भिक दो अभियानों में हज्जाज के सेनापतियों उबैदुल्ला तथा बुदैल को असफलता का सामना करना पड़ा और दोनों मौत के घाट उतार दिए गये। इसके बाद हज्जाज ने अपने चचेरे भाई व दामाद सत्रह वर्षीय नवयुवक मुहम्मद बिन कासिम को भेजा।

2. देवल पर विजय:
देवल पहुँचते ही उसने नगर का घेरा डालने की तैयारी की परन्तु बीच में पत्थर की दीवार से घिरा हुआ। 120 फुट ऊँचा एक विशाल मन्दिर आ गया। मन्दिर का एक देशद्रोही पुरोहित अरबों से जा मिला और उसने सूचना दी  कि जब तक ताबीज बँधा वह लाल झण्डा मन्दिर पर लहराता रहेगा, तब तक नगर को जीता नहीं जा सकता। शीघ्र ही मुहम्मद कासिम ने ‘मंजनीक’ द्वारा इस ध्वज को गिरा डाला। ध्वज गिरने से नगर की रक्षा करने वाले सैनिक हतोत्साहित तथा अरब सेना उत्साहित हुई। कासिम ने नगर पर अधिकार करने के बाद सत्रह वर्ष से अधिक अवस्था वाले तमाम लोगों को मार डाला तथा छोटे बालक व स्त्रियों को कैद कर लिया। मन्दिर की लूट में काफी सामान हाथ लगा जिसका पाँचवाँ हिस्सा हज्जाज के पास भेज दिया गया और शेष सेना में बाँट दिया।

इसके बाद उसने आगे बढ़कर निरुन, सेहवान और सीसम पर भी अपना अधिकार कर लिया। अन्त में 20 जून, 712 ई. को रावर के युद्ध में भारतीय और अरबी सेनाओं के बीच भयंकर संघर्ष हुआ। दाहिर शत्रुओं का काटता हुआ अपने साथियों सहित अरब सेना के मध्य भाग तक पहुँच गया। हाथी पर सवार दाहिर अपनी सेना के साथ डटकर युद्ध कर रहा था कि अनायास ही एक तीर उसके शरीर में आ घुसा और वह वीरगति को प्राप्त हुआ। इसके बाद दाहिर की पत्नी रानीबाई ने किले की रक्षा का प्रयत्न किया किन्तु इसमें असफल रहने पर उसने जौहर करे अपने सम्मान की रक्षा की।

रावर की विजय के बाद कासिम ने ब्राह्मणवाद पर अधिकार कर लिया। यहाँ कासिम के हाथ दाहिर की दूसरी रानी लाडी और दो पुत्रियाँ सूर्यदेवी व परमल देवी लगी। ब्राह्मणवाद के बाद कासिम ने सिन्ध की राजधानी आरोर (आलोर) और मुल्तान पर भी अधिकार कर लिया। ‘मुल्तान विजय भारत में अरबों की अन्तिम विजय थी। यहाँ उनको इतना धन हाथ लगा कि उन्होंने मुल्तान का नाम बदलकर ‘स्वर्ण नगर’ रख दिया।

3. मुहम्मद बिन कासिम का अन्त:
इतिहासकार गौरीशंकर हीराचन्द ओझा के अनुसार दाहिर की राजकुमारियों का रूप-लावण्य देखकर खलीफा ने उनके सामने प्रेम की याचना भी। वे दोनों अपने पिता की मृत्यु का बदला लेना चाहती थी। इस कारण मौका देखकर उन्होंने खलीफा से शिकायत भी कि हम आपकी शैय्या पर पैर रखने योग्य नहीं हैं, यहाँ भेजने के पहले ही कासिम ने हमारा कौमार्य भंग कर दिया।

इतना सुनते ही खलीफा आग बबूला हो गया और उसने तत्काल आज्ञापत्र लिखवाया कि इसे देखते ही मुहम्मद बिन कासिम को बैल के चमड़े में जीवित सिलाई कर हमारे पास भेज दो। हुक्म की उसी समय तामील हुई। मार्ग में तीसरे दिन कासिम मर गया और उसी अवस्था में खलीफा के पास पहुँचाया गया। खलीफा ने उन दोनों राजकुमारियों को बुलवाया और उन्हीं के सामने बैल का चमड़ा खुलवाकर कासिम का शव उन्हें दिखलाया और कहा कि खुदा के खलीफा का अपमान करने वालों को मैं इस प्रकार दण्ड देता हूँ।

कासिम का मृत शरीर देखते ही राजकुमारी के मुख पर अपना मनोरथ सफल होने की प्रसन्नता छा गई, परन्तु साथ ही मन्द मुस्कराहट और कटाक्ष के साथ उसने खलीफा को कहा ‘ऐ खलीफा! कासिम ने हमारा सतीत्व नष्ट नहीं किया। उसने कभी आँख उठाकर भी हमें कुदृष्टि से नहीं देखा परन्तु उसने हमारे माता, पिता, भाई और देशबन्धुओं को मारा था, इसलिए उससे अपना बदला लेने के लिए हमने यह मिथ्या दोष उस पर लगाया था। वीर बालिकाओं के ये वचन सुनते ही खीफा सन्न हो गया और उन दोनों को जिन्दा जलवा दिया।

भारत पर अरब आक्रमण का प्रभाव

अरबों की सिन्ध विजय का राजनीतिक परिणाम सिर्फ यह निकला कि सिन्ध का सम्बन्ध कुछ समय के लिए भारत से टूट गया और वह इस्लामी साम्राज्य का हिस्सा बन गया किन्तु सांस्कृतिक दृष्टि से भारत ने अरबों पर विजय प्राप्त की। भारतीय दर्शन, विज्ञान, गणित, चिकित्सा और ज्योतिष ने अरबों को बहुत प्रभावित किया। उन्होंने कई भारतीय संस्कृत ग्रन्थों का अरबी भाषा में अनुवाद करवाया जिनमें ब्रह्मगुप्त का ‘ब्रह्म सिद्धान्त’ तथा ‘खण्ड खांड्यक’ अधिक प्रसिद्ध है।

अरब के लोगों ने अंक, दशमलव पद्धति, चिकित्सा व खगोल शास्त्र के कई मौलिक सिद्धान्त भारतीयों से सीखें और कला तथा साहित्य के क्षेत्र में भी भारतीय पद्धतियों को अपनाया। भारतीय दर्शन, साहित्य व कला की अनेक बातें अरबों के माध्यम से यूरोप के लोगों ने सीखी। इस प्रकार अरबों द्वारा भारतीय ज्ञान पश्चिमी देशों में पहुँचने में सफल रहा।

भारत पर अरबों की सफलता के कारण

सिन्ध पर अरबों की सफलता के कई कारण थे। दाहिर के शासन में सामान्य वर्ग असन्तुष्ट था। राज्य के अधिकांश भागों में असन्तोष और अव्यवस्था व्याप्त थी। इस कारण अरब आक्रमण के समय उसे जनसहयोग नहीं मिल पाया। दाहिर स्वयं जनता में अप्रिय था क्योंकि उसका पिता राज्य का वास्तविक अधिकारी नहीं था। समकालीन भारतीय शासकों में आपसी तालमेल, सौहार्द्र तथा सहयोग की भावना नहीं थी और व्यक्तिगत स्वार्थ पनप रहे थे।

सैनिक शक्ति बढ़ाने और विदेशी आक्रमण की सम्भावना को ध्यान में रखकर किसी भी राज्य ने अपनी सैन्य शक्ति को बढ़ाने की कोशिश नहीं की थी। सैनिक गतिविधियों का उत्तरदायित्व मात्र राजपूतों के कन्धों तक सिमट गया था जो पारस्परिक द्वेष और ईर्ष्या के कारण आपस में लड़ने में लगे थे। मुहम्मद बिन कासिम की योग्यता, साहस तथा नेतृत्व शक्ति के साथ अरबों में मजहबी प्रचार के जोश, धन प्राप्ति की प्रबल इच्छा और खलीफा से मिलने वाले सैनिक सहयोग ने भी उनकी सफलता में अपना योगदान दिया।

प्रश्न 2.
पृथ्वीराज चौहान और मुहम्मद गौरी के बीच हुए संघर्ष का उल्लेख कीजिए। पृथ्वीराज चौहान की पराजय के क्या कारण थे?

अथवा

पृथ्वीराज और मुहम्मद गौरी के मध्य संघर्ष का उल्लेख करते हुए उसकी पराजय के कारणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मुहम्मद गौरी के आक्रमण के समय भारत में दिल्ली व अजमेर पर पृथ्वीराज चौहान (तृतीय) का शासन था। जो इतिहास में ‘रायपिथौरा’ के नाम से प्रसिद्ध है। पृथ्वीराज का जन्म 1166 ई. में हुआ था। वह अपने पिता सोमेश्वर की मृत्यु के बाद ग्यारह वर्ष की आयु में चौहान साम्राज्य का उत्तराधिकारी बना। एक वर्ष तक माता के संरक्षण में रहने के बाद 1178 . ई. में पृथ्वीराज ने शासन की बागडोर अपने हाथों में ले ली।

1. पृथ्वीराज चौहान और मुहम्मद गौरी के बीच संघर्ष:
गजनी का गवर्नर नियुक्त होने के बाद मुहम्मद गौरी ने 1175 ई. में मुल्तान पर आक्रमण का अधिकार कर लिया। इसके बाद उसने गुजरात, सियालकोट और लाहौर के युद्धों में विजय हासिल कर अपनी शक्ति का परिचय दिया। राजस्थानी स्रोतों के अनुसार इस दौरान उसकी पृथ्वीराज चौहान के साथ अनेक बार लड़ाईयाँ हुई और हर बार उसे पराजय का सामना ही करना पड़ा। पृथ्वीराज रासो में इक्कीस तथा हम्मीर महाकाव्य में सात बार गौरी पर पृथ्वीराज की विजयों की दावा किया गया है। दोनों के मध्य दो निर्णायक युद्ध हुए।

2. तराइन का प्रथम युद्ध (1191 ई.):
1191 ई. में लाहौर से रवाना होकर मुहम्मद गौरी तबर हिन्द नामक स्थान पर अधिकार करते हुए तराइन (हरियाणा) तक पहुँच गया। यहाँ दोनों पक्षों के बीच भयंकर युद्ध हुआ जिसमें पृथ्वीराज चौहान के दिल्ली सामन्त गोविन्दराज ने अपनी बरछी के वार से मुहम्मद गौरी को घायल कर दिया। घायल गौरी अपनी सेना सहित गजनी भाग गया। पृथ्वीराज ने तबर हिन्द पर अधिकार कर काजी जियाउद्दीन को बन्दी बना बना लिया जिसे बाद में एक बड़ी धनराशि के बदले रिहा कर दिया गया।

3. तराइन का द्वितीय युद्ध (1192 ई.):
एक वर्ष बाद मुहम्मद गौरी अपनी सेना के साथ तराइन के मैदान में पुन: आ धमका। पृथ्वीराज उसका मुकाबला करने पहुँच गया किन्तु गौरी ने इस बार अपने शत्रु को सन्धि-वार्ता के झाँसे में फंसा लिया। कई दिन तक सन्धि – वार्ता चलने के कारण चौहान सेना निश्चित होकर आमोद – प्रमोद में डूब गई। इसका फायदा उठाकर गौरी ने एक रात्रि अचानक आक्रमण कर दिया। राजपूत सेना इस अप्रत्याशित आक्रमण को झेल नहीं पाई और पराजित हुई।

पराजित पृथ्वीराज चौहान को सिरसा के पास सरस्वती नामक स्थान पर बन्दी बना लिया गया। पृथ्वीराज रासो के अनुसार, “बन्दी पृथ्वीराज को गौरी अपने साथ गजनी ले गया। जहाँ शब्द भेदी बाण के प्रदर्शन के समय पृथ्वीराज ने गौरी को मार डाला।” जबकि समकालीन इतिहासकार हसन निजामी के अनुसार, तराइन के द्वितीय युद्ध के बाद पृथ्वीराज चौहान ने मुहम्मद गौरी के अधीनस्थ शासक के रूप में अजमेर पर शासन किया था। निजामी के कथन के पक्ष में एक सिक्के का भी सन्दर्भ दिया जाता है जिसके एक तरफ मुहम्मद बिन साम और दूसरी तरफ पृथ्वीराज नाम अंकित है।

पृथ्वीराज चौहान की पराजय के कारण

विजेता होने के बावजूद पृथ्वीराज चौहान में दूरदर्शिता व कूटनीति का अभाव था। उसने अपने पड़ोसी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित नहीं किए अपितु उनके साथ युद्ध करके शत्रुता मोल ले ली। इसी कारण मुहम्मद गौरी के संघर्ष में उसे उनका कोई सहयोग नहीं मिला। 1178 ई. में जब मुहम्मद गौरी ने गुजरात के शासक भीमदेव द्वितीय पर आक्रमण किया था, उस समय पृथ्वीराज ने गुजरात की कोई सहायता न कर एक भूल की।

तराइन के प्रथम युद्ध में पराजित होकर भागती तुर्क सेना पर आक्रमण न करना भी उसकी एक भयंकर भूल सिद्ध हुई। यदि उस समय शत्रु सेना पर प्रबल आक्रमण करतो तो मुहम्मद गौरी भारत पर पुनः आक्रमण करने के बारे में कभी नहीं सोचता। संयोगिता के साथ विवाह करने के बाद उसने राजकार्यों की उपेक्षा कर अपना जीवन विलासिता में व्यतीत करना प्रारम्भ कर दिया।

पृथ्वीराज चौहान का मूल्यांकन

पृथ्वीराज एक वीर और साहसी शासक था। अपने शासनकाल के प्रारम्भ से ही वह युद्ध करता रहा जो उसके अच्छे सैनिक और सेनाध्यक्ष होने को प्रमाणित करता है। अनेक युद्धों में सफलता प्राप्त कर उसने ‘दलपंगुल’ (विश्वविजेता) की उपाधि धारण की। तराइन के द्वितीय युद्ध में मुहम्मद गौरी द्वारा छल-कपट का सहारा लेने से पूर्व वह किसी भी लड़ाई में नहीं हारा था। एक विजेता के साथ-साथ वह विद्यानुरागी था। उसके दरबार में अनेक विद्वान रहते थे जिनमें – विद्यापति गौड़, वागीश्वर, जनार्दन, जयानक, विश्वरूप, आशीधर आदि प्रमुख थे। चन्दबरदाई उसका राजकवि था जिसका ग्रन्थ ‘पृथ्वीराज रासो’ हिन्दी साहित्य का प्रथम महाकाव्य माना जाता है।

प्रश्न 3.
अलाउद्दीन खिलजी की रणथम्भौर और विजय का वर्णन कीजिए।

अथवा

अलाउद्दीन खिलजी के रणथम्भौर के शासक हम्मीर चौहान के साथ सम्बन्धों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
भूमिका:
हम्मीर अपने पिता जैमा सिंह का तीसरा पुत्र था। सभी पुत्रों में योग्य होने के कारण उसका राज्यारोहण उत्सव जैम सिंह ने अपने जीवनकाल में ही 1282 ई. में सम्पन्न करवा दिया था। शासनभार सम्भालने के बाद 1288 ई. तक हम्मीर ने दिग्विजय नीति का अवलम्बन कर अपने राज्य की सीमाओं का विस्तार किया। विजित राज्यों को उसने धन लेकर छोड़ दिया। दिग्विजय के बाद हम्मीर ने कोटि यज्ञों का आयोजन किया जिससे उसकी प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई। मेवाड़ के शासक समर सिंह को पराजित कर हम्मीर ने अपनी धाक सम्पूर्ण राजस्थान में जमा ली।

हम्मीर और अलाउद्दीन खिलजी

1296 ई. में अलाउद्दीन खिलजी अपने चाचा जलालुउद्दीन खिलजी की हत्याकर दिल्ली का सुल्तान बन गया। कुछ वर्षों बाद ही अलाउद्दीन खिलजी ने रणथम्भौर पर आक्रमण करने प्रारम्भ कर दिए।

आक्रमण के कारण: अलाउद्दीन खिलजी के रणथम्भौर पर आक्रमण करने के निम्नलिखित कारण थे-

  1. रणथम्भौर और सामरिक दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण था। अलाउद्दीन खिलजी इस अभेद्य दुर्ग पर अधिकार कर राजपूत नरेशों पर अपनी धाक जमाना चाहता था।
  2. रणथम्भौर दिल्ली के काफी निकट था। इस कारण यहाँ के चौहानों की बढ़ती हुई शक्ति को अलाउद्दीन खिलजी किसी भी स्थिति में सहन नहीं कर सकता था।
  3. अलाउद्दीन खिलजी से पहले उसके चाचा जलालुद्दीन खिलजी ने इस दुर्ग पर अधिकार करने के लिए दो बार प्रयास किए थे किन्तु वह असफल रहा। अलाउद्दीन खिलजी अपने चाचा की पराजय का बदला लेना चाहता था।
  4. अलाउद्दीन खिलजी एक महत्त्वाकांक्षी और साम्राज्यवादी शासक था। रणथम्भौर पर आक्रमण इस नीति का परिणाम था।

हम्मीर द्वारा अलाउद्दीन खिलजी के विद्रोहियों को शरण देना

नयनचन्द्र सूरी का रचना ‘हम्मीर महाकाव्य’ के अनुसार रणथम्भौर पर आक्रमण का कारण यहाँ के शासक हम्मीर द्वारा अलाउद्दीन खिलजी के विद्रोही सेनापति मीर मुहम्मद शाह को शरण देना था। मुस्लिम इतिहासकार इसामी ने भी अपने विवरण में इस कारण की पुष्टि की है। उसने लिखा है कि 1299 ई. में अलाउद्दीन खिलजी ने अपने दो सेनापतियों उलूग खाँ व नुसरत खाँ को गुजरात पर आक्रमण करने के लिए भेजा था।

गुजरात विजय के बाद जब सेना वापस लौट रही थी तो जालौर के पास लूट के माल के बँटवारे के प्रश्न पर ‘नवमुसलमानों’ (जलालुद्दीन खिलजी के समय भारत में बस चुके थे वे मंगोल, जिन्होंने इस्लाम स्वीकार का लिया था) ने विद्रोह कर दिया। यद्यपि विद्रोहियों का बर्बरता के साथ दमन कर दिया गया। किन्तु उनमें से मुहम्मद शाह व उसका भाई केहब्रू भागकर रणथम्भौर के शासक हम्मीरदेन के पास पहुँचने में सफल हो गए। हम्मीर ने न केवल उन्हें शरण दी अपितु मुहम्मद शाह को ‘जगाना’ की जागीर भी दी।

चन्द्रशेखर की रचना ‘हम्मीर हठ’ के अनुसार अलाउद्दीन खिलजी की एक मराठा बेगम से मीर मुहम्मद शाह को प्रेम हो गया था और उन दोनों ने मिलकर अलाउद्दीन खिलजी को समय रहते इस षड़यन्त्र की जानकारी मिल जाने के कारण मीर मुहम्मद शाह को बन्दी बनाने का प्रयास किया गया किन्तु वह भागकर हम्मीर की शरण में पहुँच गया। अलाउद्दीन खिलजी की तरफ से इन विद्रोहियों को सौंप देने की माँग की गई। इस माँग को जब हम्मीर द्वारा ठुकरा दिया गया तो अलाउद्दीन खिलजी की सेना ने रणथम्भौर पर आक्रमण कर दिया।

हम्मीर की प्रारम्भिक सफलताएँ

1999 ई. के अन्त में अलाउद्दीन खिलजी ने उलूग खाँ, अलपखाँ और नुसरत खाँ के नेतृत्व में एक सेना रणथम्भौर पर अधिकार करने के लिए भेजी। इस सेना ने ‘रणथम्भौरे की कुंजी’ झाँई पर अधिकार कर लिया। इसामी के अनुसार विजय के बाद उलूग खाँ ने झाँई का नाम बदलकर ‘नौ शहर’ कर दिया। हम्मीर महाकाव्य में लिखा है कि हम्मीर इस समय कोटियज्ञ समाप्त कर ‘मुनिव्रत’ में व्यस्त था। इस कारण स्वयं न जाकर अपने दो सेनापतियों-भीम सिंह व धर्म सिंह को सामना करने के लिए भेजा।

इन दोनों सेनापतियों ने खिलजी की सेना को पीछे की तरफ खदेड़ दिया तथा उनसे लूट का माल छीन लिया। राजपूत सेना ने शत्रु सेना पर भयंकर हमला किया जिसमें अलाउद्दीन खिलजी की सेना को पराजय का सामना करना पड़ा। शाही सेना से लूटी गई सामग्री लेकर धर्म सिंह के नेतृत्व में सेना का एक दल तो रणथम्भौर लौट गया किन्तु भीम सिंह पीछे रह गया। इस अवसर का लाभ उठाकर बिखरी हुई शाही सेना ने अलप खाँ के नेतृत्व में उस पर हमला कर दिया। इस संघर्ष में भीम सिंह अपने सैकड़ों सैनिकों सहित मारा गया।

1. भोजराज का नया मन्त्री बनाया जाना:
भीमसिंह की मृत्यु के लिए धर्मसिंह को उत्तरदायी मानते हुए उन्हें अन्धा कर दिया और उसके स्थान पर भोजराज’को नया मन्त्री बनाया। भोजराज़ रणथम्भौर की बिगड़ी हुई स्थिति को सम्भाल नहीं पाया और शीघ्र ही अलोकप्रिय हो गया। ऐसी स्थिति में धर्मसिंह ने हम्मीर को राज्य की आय बढ़ाने का आश्वासन देकर अपने पुराने अधिकार पुनः प्राप्त कर लिये। धर्मसिंह अपने अपमान का बदला लेना चाहता था इसलिए उसने प्रजा पर कई कर लगाकर उन्हें बलात् वसूल करना प्रारम्भ कर दिया। इसलिए प्रजा में असन्तोष बढ़ने लगा।

उधर भोजराज हम्मीर द्वारा अपनी सेवा से निकाले जाने पर नाराज होकर अलाउद्दीन खिलजी के दरबार में चला गया। उसने सुल्तान को रणथम्भौर पर आक्रमण करने के लिए उकसाना प्रारम्भ कर दिया। सुल्तान ने रणथम्भौर विजय के लिए सेना भेज दी किन्तु हिन्दुवाट की घाटी में हुए मुठभेड़ में चौहान सेना ने शाही सेना को बुरी तरह पराजित किया।

इस अपमानजनक पराजय की जानकारी मिलने पर सुल्तान ने उलूग खाँ और नुसरत खाँ के नेतृत्व में एक बड़ी सेना भेजी। इस सेना ने झाँई के दुर्ग पर अधिकार कर लिया। झाँई विजय के बाद उलूग खाँ ने मेहलनसी नामक दूत के साथ हम्मीर के पास अलाउद्दीन खिलजी का सन्देश पुनः भिजवाया। इस सन्देश में दोनों विद्रोहियों-मुहम्मद शाह व उसके भाई कैहबू को सौंपने के साथ हम्मीर की बेटी देवलदी का विवाह सुल्तान के साथ करने की माँग की गई थी। यद्यपि देवलदी ने राज्य की रक्षा के लिए इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लेने की सुझाव दिया किन्तु हम्मीर ने संघर्ष का रास्ता चुना।

उलूग खाँ ने रणथम्भौर दुर्ग पर घेरा डालकर उसके चारों तरफ पाशिव व गरमच बनवाये और मगरबों द्वारा दुर्ग रक्षकों पर पत्थरों की बौछार की। दुर्ग में भी भैरवयन्य ठिकुलिया व मर्कटी यन्त्र नामक पत्थर बरसाने वाले यन्त्र लगे थे जिनके द्वारा फेंका गया एक पत्थर संयोग से नुसरत खाँ को लगा। नुसरत खाँ इसमें घायल हुआ और कुछ दिनों बाद उसकी मृत्यु हो गई। इससे शाही सेना में निराशा की स्थिति पैदा हो गई। हम्मीर ने इस स्थिति का फायदा उठाने के लिए दुर्ग से बाहर निकलकर शाही सेना पर आक्रमण कर दिया। इस अप्रत्याशित आक्रमण से घबराकर उलूग खाँ को झाँई की तरफ पीछे हटना पड़ा।

अलाउद्दीन खिलजी का रणथम्भौर आना व रणथम्भौर पर अधिकार

उलूग खाँ की असफलता के बाद अलाउद्दीन खिलजी स्वयं रणथम्भौर पहुँचा। अमीर खुसरो ने अपनी रचना ‘खजाईन-उल-फुतूह’ में इस अभियान का आँखों देखा वर्णन करते हुए लिखा है कि सुल्तान ने इस आक्रमण में पशिब, मगरबी व अरबी की सहायता ली। काफी प्रयासों के बाद भी जब अलाउद्दीन खिलजी दुर्ग को जीतने में असफल रहा तो उसने छल और कूटनीति का आश्रय लेते हुए हम्मीर के पास सन्धि का प्रस्ताव भेजा।

हम्मीर द्वारा सन्धि के लिए अपने सेनापति रतिपाल को भेजा गया। अलाउद्दीन खिलजी ने रतिपाल व उसकी सहायता से हम्मीर के एक अन्य सेनापति रणमल को रणथम्भौर दुर्ग का प्रलोभन देकर अपनी ओर मिला लिया। चौहान रचनाओं में इस बात का उल्लेख किया गया है कि अलाउद्दीन ने हम्मीर के एक अधिकारी को अपनी तरफ मिलाकर दुर्ग में स्थित खाद्य सामग्री को दूषित करवा दिया। इससे दुर्ग में खाद्यान्न सामग्री का भयंकर संकट पैदा हो गया।

अमीर खुसरो ने इस सम्बन्ध में लिखा है कि “सोने के दो दानों के बदले में चावल का एक दाना भी नसीब नहीं हो। पा रहा था।” खाद्यान्न के अभाव में हम्मीर को दुर्ग के बाहर निकलना पड़ा किन्तु रणमल और रतिपाल के विश्वासघात के कारण उसे पराजय का मुँह देखना पड़ा। युद्ध के दौरान हम्मीर लड़ता हुआ मारा और उस कीरावी रंगदेवी के नेतृत्व में राजश्त वीरांगनाओं के द्वारा जौहर किया गया। यह रणथम्भौर की प्रथम साका कहा जाता है। जोधराज की रचना’ ‘हम्मीर रासो’ के अनुसार इस जौहर में मुहम्मद शाह की स्त्रियाँ भी रंगदेवी के साथ चिता में भस्म हो गई। कुछ स्थानों पर उल्लेख है कि रंगदेवी ने किले में स्थित ‘पदमला तालाब’ में जल – जौहर किया था। इस प्रकार 11 जुलाई, 1301 ई. को अलाउद्दीन खिलजी ने रणथम्भौर पर अधिकार कर लिया।

युद्ध में मीर मुहम्मद शाह भी हम्मीर की तरफ से संघर्ष करते हुए घायल हुआ। घायल मुहम्मद शाह पर नजर पड़ने पर अलाउद्दीन खिलजी ने उससे पूछा कि ‘अगर तुम्हें ठीक करवा दिया जाए तो तुम क्या करोगे?” इस पर बड़ी बहादुरी के साथ मुहम्मद शाह ने जबाब दिया कि अगर मुझे ठीक करवाया गया तो मैं दो काम करूंगा – पहला तुम्हें मार दूंगा और दूसरा हम्मीर के किसी वंशज को रणथम्भौर के सिंहासन पर बैठा दूंगा। ऐसा जवाब सुनकर अलाउद्दीन खिलजी कॉफी क्रोधित हुआ और उसने हाथी के पैरों के नीचे कुचलवाकर मुहम्मदशाह की हत्या करवा दी।

प्रश्न 4.
राव चन्द्रसेन की प्रारम्भिक कठिनाइयों का विवेचन कीजिए। अकबर ने राव चन्द्रसेन को अधीन करने के लिए क्या – क्या प्रयत्न किये और उनके क्या परिणाम निकले?

अथवा

“राव चन्द्रसेन अकबर का अग्रगामी था।” इस कथन को समझाइए।
उत्तर:
1. भूमिका:
राव चन्द्रसेन जोधपुर के प्रसिद्ध शासक राव मालदेव (1532-62 ई.) के कनिष्ठ पुत्र थे। राव मालदेव के समय दिल्ली के शासक शेरशाह सूरी ने मारवाड़ पर आक्रमण किया था। दोनों पक्षों के बीच 1544 ई. में लड़े गए। गिरि – सुमेल (पाली) युद्ध में छल – कपट के सहारे शेरशाह जीत हासिल करने में सफल रहा किन्तु राव मालदेव के पराक्रमी सेनापतियों जैता और कूपा ने युद्ध के दौरान उसे ऐसी कड़ी टक्कर दी कि इतिहासकार फरिश्ता के अनुसार शेरशाह अपने घोड़े से नीचे उतरकर सफलता के लिए अल्लाह से दुआ माँगने लगा। शेरशाह के भय का पता उसकी इस स्वीकारोक्ति से चलता है, जिसमें उसने युद्ध के बाद कहा था कि “मैं एक मुट्ठीभर बाजरे के लिए हिन्दुस्तान की बादशाहते खो बैठता।”

2. जीवन – परिचय:
जोधपुर राज्य की ख्यात के अनुसार चन्द्रसेन का जन्म 1541 ई. में हुआ था। राव मालदेव अपने ज्येष्ठ पुत्र राम से अप्रसन्न था, जबकि उसमें छोटे पुत्र उदयसिंह को पटरानी स्वरूप दे (चन्द्रसेन की माँ) राज्याधिकार से वंचित करवा दिया। इस कारण मालदेव की मृत्यु के बाद उसकी इच्छानुसार 31 दिसम्बर, 1562 ई. को चन्द्रसेन जोधपुर की गद्दी पर बैठा। मालदेव के काल में उसे बीसलपुर और सिवाना की जागीर मिली हुई थी।

3. आन्तरिक विद्रोह का दमन:
शासक बनने के कुछ ही समय बाद चन्द्रसेन ने आवेश में आकर अपने एक चाकर की हत्या कर दी। इससे जैतमाल और उससे मेल रखने वाले कुछ अन्य सरदार अप्रसन्न हो गए। नाराज सरदारों ने चन्द्रसेन को दण्डित करने के लिए उसके विरोधी भाईयों राम, उदय सिंह और रायमल के साथ गठबन्धन कर उन्हें आक्रमण के लिए आमंत्रित किया। राम ने सोजत और रायमल ने दूनाड़ा प्रान्त में उपद्रव शुरू कर दिया तथा उदय सिंह ने गांगाणी और बावड़ी पर अधिकार कर लिया।

सूचना मिलते ही चन्द्रसेन ने इन उपद्रवों को शान्त करने के लिए अपनी सेना भेजी जिससे राम और रायमल तो अपनी – अपनी जागीरों में लौट गए किन्तु उदयसिंह ने लोहावट नामक स्थान पर संघर्ष किया। इस युद्ध में उदयसिंह घायल हुआ और चन्द्रसेन विजयी रहा। 1563 ई. में राव चन्द्रसेन और उदयसिंह की सेनाओं के बीच नाडोल नामक स्थान पर पुनः संघर्ष हुआ किन्तु विजय की आशा न देखकर उदयसिंह बादशाह अकबर के पास चला गया।

4. जोधपुर पर मुगलों का अधिकार:
राव चन्द्रसेन के नाराज भाइयों राम उदयसिंह व रायमल के साथ अपनी कलह के कारण अकबर को हस्तक्षेप करने का मौका मिल गया। उसने शीघ्र ही हुसैन कुली खाँ की अध्यक्षता में एक सेना भेजी जिसने जोधपुर पर अधिकार कर लिया। जोधपुर की ख्यात में मुगल अभियान का अतिरंजित वर्णन करते हुए कहा गया है कि शाही सेना ने जोधपुर पर तीन बार हमला किया और लगभग दस माह के घेरे के बाद चन्द्रसेन को अन्न – जल की कमी के कारण गढ़ का परित्याग कर भाद्राजूण जाना पड़ा। जोधपुर राज्य से निकलने के बाद चन्द्रसेन की आर्थिक स्थिति बिगड़ने लगी और वह अपने रत्न आदि बेचकर खर्च चलाने लगा। पं. विशेश्वरनाथ रेऊ ने अकबर द्वारा जोधपुर पर आक्रमण का प्रमुख कारण जोधपुर के मालदेव द्वारा उसके पिता हुमायूँ के प्रति किए गए असहयोग को माना है।

5. नागौर दरबार:
1570 ई. में अपनी अजमेर यात्रा के समय अकबर मारवाड़ क्षेत्र में दुष्काल की खबरें सुनकर नागौर पहुँचा। इस अवसर पर उसने अपने सैनिकों से दुष्काल निवारणार्थ एक तालाब खुदवाया जो ‘शुक्र तालाब’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। वास्तव में इस दरबार का उद्देश्य मारवाड़ की राजनीतिक स्थिति का अध्ययन करना था।

6. चन्दसेन के खिलाफ मुगल अभियान:
नागौर दरबार के कुछ समय बाद मुगल सेना ने भाद्राजूण पर आक्रमण कर दिया। फरवरी, 1571 ई. में चन्द्रसेन भाद्राजूण का परित्याग का सिवाणा की तरफ चला गया। 1572 ई. में एक तरफ जहाँ गुजरात में विद्रोह फैला हुआ था, वहीं दूसरी तरफ महाराणा प्रताप के शासक बनने से मेवाड़ के भी आक्रामक होने का खतरा पैदा हो गया। ऐसी स्थिति में अकबर ने बीकानेर के रायसिंह को जोधपुर का शासक बनाकर गुजरात की तरफ भेजा ताकि महाराणा प्रताप गुजरात के मार्ग को रोककर हानि न पहुँचा सके।

1573 ई. में अकबर ने चन्द्रसेन को अपने अधीन बनाने के लिए शाहकुली खाँ के साथ जगत सिंह, केशवदास मेड़ातिया, बीकानेर के रायसिंह आदि को भेजा। यह सेना सोजत में चन्द्रसेन के भतीजे कल्ला को पराजित करते हुए सिवाना पहुँची। अपने सेनानायकों के परामर्श के अनुसार चन्द्रसेन किले की रक्षा का भार पत्ता राठौड़ को सौंपकर पहाड़ों में चला गया और वहीं से किले को घेरने वाली मुगल सेना के पाश्र्वो पर छापामार पद्धति से आक्रमण कर उसे क्षति पहुँचाने लगा। पत्रा राठौड़ और चन्द्रसेन के सम्मिलित सफल प्रतिरोध के कारण रायसिंह ने अकबर से अतिरिक्त सैन्य सहायता की माँग की। अकबर की तरफ से एक बड़ी सेना भेजे जाने पर चन्द्रसेन पहाड़ों में चला गया। यद्यपि मुगल सेना ने उसका पीछा किया किन्तु चन्द्रसेन को पकड़ने में वह असफल रही। इस असफलता से निराश अकबर ने अपने अमीरों को कड़ी फटकार लगाई।

7. सिवाना के दुर्ग पर अकबर का अधिकार:
चन्द्रसेन को अपने अधीन बनाने के लिए अकबर ने 1575 ई. में जलाल खाँ के नेतृत्व में सिवाना की एक तरफ बड़ी सेना भेजी जिसमें सैयद अहमद, सैयद हाशिम, शिमाल खाँ आदि अमीर भी शामिल थे। लम्बे संघर्ष के दौरान एक दिन अवसर पाकर चन्द्रसेन ने अपने सहयोगी देवीदास के साथ मुगल सेना पर आक्रमण कर दिया। इस आक्रमण में जलाल खाँ मारा गया। इस घटना से शाही सेना की प्रतिष्ठा को गहरा धक्का पहुँचा। अब अकबर ने शाहबाज खाँ को भेजा। उसने शीघ्र ही देवकोर और दूनाड़ा पर अधिकार का सिवाना को घेर लिया। खाद्य सामग्री समाप्त होने के कारण सिवानी दुर्ग के रक्षक को किला छोड़ना पड़ा। इस प्रकार 1575 ई. में सिवाना के दुर्ग पर अकबर का अधिकार हो गया।

‘संकटकालीन राजधानी’ सिवाणा हाथ से निकलने के बाद अक्टूबर, 1575 ई. में जैसलमेर के रावल हर राय ने पोकरण पर आक्रमण कर दिया। इस समय पोकरण में राव चन्द्र सेन की तरफ से किलेदार आनन्दराम पंचोली था। चार माह के घेरे के बाद रावल हरराय ने चन्द्रसेन के सामने प्रस्ताव रखा कि ‘एक लाख फदिये के बदले मुझे पोकरण दे दो, जोधपुर पर अधिकार होने के बाद एक लाख फदिये लौटाकर पोकरण मुझसे वापिस ले लेना।’ संकटापन्न आर्थिक दशा के कारण चन्द्रसेन ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर जनवरी, 1576 ई. में पोकरण भाटियों को दे दिया।

पोकरण के रूप में अन्तिम आश्रय स्थल हाथ से निकल जाने के भी चन्द्रसेन हताश नहीं हुआ। लगभग डेढ़-दो वर्ष तक सिरोही, डूंगरपुर और बाँसवाड़ा में घूमते रहने के बाद 1579 ई. में चन्द्रसेन ने सरवाड़ के मुगल थाने को लूटकर अपने अधिकार में ले लिया। इसके बाद उसने अजमेर प्रान्त पर भी धावे मारने शुरू कर दिये। यह समाचार मिलने पर बादशाह अकबर ने पायंदा मोहम्मद खाँ के नेतृत्व में सेना भेजी। चन्द्रसेन ने 1580 ई. में इस सेना का सामना किन्तु उसे असफल होकर पुन: पहाड़ों में लौटना पड़ा।

कुछ दिनों बाद चन्द्रसेन ने सेना को पुनः संगठित किया और 7 जुलाई, 1580 ई. को सोजत पर हमला कर दिया। सोजत पर अधिकार कर उसने सारण के पर्वतों में अपना निवास कायम किया। यहीं 11 जनवरी, 1581 ई. को उसकी मृत्यु हो गई। जोधपुर राज्य की ख्यात के अनुसार चन्द्रसेन के एक सामन्त बैरसल ने विश्वासघात कर भोजन में जहर दे दिया, जिससे उसकी मृत्यु हो गई।

8. चन्द्रसेन का मूल्यांकन:
राव चन्द्रसेन अकबरकालीन राजस्थान का प्रथम स्वतन्त्र प्रकृति का शासक था। उसके भाई शाही सत्ता का सुख भोगते रहे, वहीं उसे अपने रत्न – आभूषण बेचकर गुजारा चलाना पड़ा। चन्द्रसेन ने जोधपुर राज्य को छोड़कर रात – दिन पहाड़ों में घूमना और मुगल सेना से लड़ते रहना अंगीकार कर लिया किन्तु अधीनता स्वीकार नहीं थी। संघर्ष की जो शुरुआत चन्द्रसेन ने की थी उसी राह पर आगे चलकर महाराणा प्रताप ने बड़ा नाम कमाया। इस कारण चन्द्रसेन को ‘प्रताप का अग्रगामी’ तथा ‘मारवाड़ को प्रताप’ भी कहा जाता है।

इतिहास में समुचित महत्व न मिलने के कारण चन्द्रसेन को ‘मारवाड़ का भूला बिसरा नायक’ कहा जाता है। चन्द्रसेन का नाम इतिहास में विस्मृत होने का प्रमुख कारण यही है कि एक तरफ प्रताप की मृत्यु के बाद जहाँ मेवाड़ का राज्य उनके पुत्र-पौत्रादि के हाथों में रहा, वहीं चन्द्रसेन की मृत्यु के बाद मारवाड़ की गद्दी पर उसके भाई उदय सिंह का अधिकार हो गया। चन्द्रसेन और उदयसिंह के बीच विरोध चलता रहा।

9. चन्द्रसेन और प्रताप में तुलना:
रावचन्द्र सेन और महाराणा प्रताप दोनों मुगल बादशाह अकबर के साथ आजीवन संघर्ष के लिए प्रसिद्ध हैं। उनके बारे में कहा गया है कि-

अणदगिया तुरी ऊजला असमर, चाकर रहण न डिगियों चीत।
सारे हिन्दुस्तान तण सिर पातल नै चन्द्रसेण प्रवीत॥

(अर्थात् उस समय सारे हिन्दुस्तान में महाराणा प्रताप और राव चन्द्रसेन, यही दो वीर ऐसे थे, जिन्होंने न तो अकबर की अधीनता स्वीकार की और न अपने घोड़ों पर शाही दाग लगने दिया तथा जिनके शस्त्र हमेशा ही मुगल-सम्राट के विरुद्ध चमकते रहे।)

चन्द्रसेन व प्रताप दोनों को अपने भाई-बन्धुओं के विरोध का सामना करना पड़ा। प्रताप की भाँति चन्द्रसेन के अधिकार में मारवाड़ के कई भाग नहीं थे। मेवाड़ के माण्डलगढ़ और चित्तौड़ पर तो मारवाड़ के मेड़ता, नागौर, अजमेर आदि स्थानों पर मुगलों का अधिकार था। समानता के साथ दोनों शासकों की गतिविधियों में मूलभूत अन्तर भी पाया जाता है। दोनों शासकों ने अपने-अपने पहाड़ी क्षेत्रों में रहकर मुगलों को खूब छकाया किन्तु प्रताप के समान चन्द्रसेन चांवड़ जैसी कोई स्थायी राजधानी नहीं बसा पाया। विशेष अवसर पर चन्द्रसेन की उपस्थिति व मुगल सेना को विकेन्द्रित करने से प्रताप को सहयोग मिला।

प्रश्न 5.
शिवाजी का प्रारम्भिक जीवन तथा उनके मुगलों से सम्बन्धों की विवेचना कीजिए।

अथवा

शिवाजी ने मुगलों का प्रतिरोध किस प्रकार किया ? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
जीवन – परिचय:
शिवाजी मराठा सरदार शाहजी भौंसले वे जीजाबाई की सन्तान थे। उनका जन्म 20 अप्रैल, 1627 ई. को पूना (महाराष्ट्र) के समीप शिवनेर से पहाड़ी किले में हुआ था। शिवाजी का बाल्यकाल संरक्षक दादी कोंडदेव की देखरेख में पिता से दूर माता जीजाबाई की गोद में बीता। बालक शिवाजी को अपनी माता तथा संरक्षक द्वारा हिन्दू धर्म शास्त्रों के साथ सैनिक शिक्षा दी गई। शिवाजी ने बाल्यावस्था में ही रामायण, महाभारत तथा दूसरे हिन्दू-शास्त्रों को पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लिया। बारह वर्ष की आयु में ही उन्हें अपने पिता की जागीर पूना प्राप्त हो गई।

शिवाजी का विजय अभियान

1. बीजापुर के विरुद्ध सैन्य अभियान:
शिवाजी ने अपने जीवन काल के प्रारम्भिक सैन्य-अभियान बीजापुर राज्य के विरुद्ध किये। इस समय बीजापुर का सुल्तान मुहम्मद आदिल शाह लम्बी बीमारी के बाद मृत्यु शैय्या पर पड़ा था और राज्य अस्त-व्यस्त दशा में था। बीमारी के 1646 ई. में शिवाजी ने बीजापुर के तोरण नामक पहाड़ी किले पर अधिकार कर लिया। इस किले से उसे दो लाख हूण का खजाना मिला। शिवाजी ने इस धन से अपनी सेना का विस्तार किया और तोरण किले से पाँच मील पूर्व में मुरुम्बगढ़ के क्षत-विक्षत दुर्ग का नया रूप देकर उसे ‘राजगढ़’ नाम दिया। शिवाजी द्वारा बीजापुर के प्रमुख मन्त्रियों को घूस देकर अपनी तरफ मिला लेने तथा अपनी कमजोर स्थिति के कारण बीजापुर सुल्तान शिवाजी के विरुद्ध इस समय कोई कार्यवाही नहीं कर सकी।

2. अफजल खाँ की हत्या:
शिवाजी की बढ़ती हुई शक्ति से सुल्तान आदलशाह भयभीत हो गया। यहाँ तक कि बीजापुर का कोई भी सेनापति शिवाजी के विरुद्ध अभियान के लिए तैयार नहीं हुआ। अन्त में अफजल खाँ नामक सेना पति में यह कहले हुए बीड़ा उठाया कि मैं अपने घोड़े से उतरे बिना शिवाजी को बन्दी बनाकर ले आऊँगा।” 1659 ई. में अफजल खाँ एक बड़ी फौज लेकर शिवाजी के विरुद्ध रवाना हुआ।

अंफजल ने छल का सहारा लेते हुए अपने दूत कृष्ण जी भास्कर को भेजकर शिवाजी के सामने सन्धिवार्ता का प्रस्ताव रखा। शिवाजी ने अफजल खाँ के छिपे मन्तव्य को समझ लिया और सावधानी के साथ वार्ता के लिए अपनी स्वीकृत दे दी। निश्चित दिन शिवाजी वस्त्रों के नीचे कवच और लोहे की टोपी पहनकर अफजल खाँ से मिलने पहुँचे। अपने बायें हाथ में बाघनख और सीधी बाँह में विछवा नामक तेज कटार छुपा रखे थे।

मुलाकात के दौरान अफजल खाँ ने शिवाजी को गले लगाते समय गर्दन दबोचकर तलवार से वध करने का प्रयास किया, किन्तु शिवाजी का कुछ नहीं बिगाड़ सका। उसी समय शिवाजी ने बाघनख का प्रयोग कर अफजल खाँ को मार डाला। अफजल खाँ के मरते ही इधर-उधर जंगलों में छिपे हुए मराठा सैनिकों ने आक्रमण कर बीजापुरी सेना को खदेड़ दिया। इस घटना ने शिवाजी की प्रतिष्ठा में अद्वितीय वृद्धि कर दी। अफजल खाँ के बाद भी बीजापुर ने शिवाजी के विरुद्ध अनेक अभियान भेजे किन्तु कोई लाभ नहीं हुआ।

3. शिवाजी और मुगल:
शिवाजी की बढ़ती हुई शक्ति ने औरंगजेब को भी चिह्नित कर दिया। उसने शिवाजी के दमन, के लिए अपने शाइस्ताखाँ को दक्षिण का सूबेदार नियुक्त किया। शाइस्ताखाँ ने शीघ्र ही पूना पर अधिकार कर लिया और वहीं से शिवाजी के विरुद्ध कार्यवाही का संचालन करने लगा। शाइस्ताखाँ पूना के उसी महल में ठहरा हुआ था जहाँ शिवाजी ने। अपना बचपन बिताया था। 15 अप्रैल, 1663 की सन्ध्या शिवाजी लगभग चार सौ सैनिकों के साथ पूना पहुँचे। जब वे शाइस्ता खाँ के निवास स्थान के पास पहुँचे तो मुगल रक्षकों ने उन्हें टोका। शिवाजी ने उन्हें यह कहकर असावधान कर दिया कि वे मुगल सेना के ही मराठे सैनिक हैं और अपने-अपने स्थान पर जा रहे हैं।

अर्द्धरात्रि के समय शिवाजी ने अपने सैनिकों के साथ शाइस्ताखाँ के डेरे पर मारकाट आरम्भ कर दी। शाइस्ता खाँ की एक उंगली कट गई किन्तु वह रात्रि के अन्धकार का फायदा उठाकर भागने में सफल रहा। उसके एक पुत्र और छः पत्नियों सहित अनेक मुगल सैनिक इस अभियान में मारे गए। औरंगजेब को जब इस अभियान की जानकारी मिली तो उसके क्रोध का ठिकाना नहीं रहा। उसने शाइस्ताखाँ को उसकी असफलता का दण्ड देने के अभिप्रयास से बंगाल भेज दिया।

4. मुअज्जम और जसवन्तसिंह:
शाइस्ताखाँ के बाद औरंगजेब ने शिवाजी के दमन के लिए शाहजादा मुअज्जम और मारवाड़ के जसवन्त सिंह को भेजा किन्तु वे भी इस उद्देश्य में असफल रहे। इससे शिवाजी का हौंसला बढ़ा और वह निर्भय होकर मुगल प्रदेशों में लूटमार करने लगा। जनवरी, 1664 ई. में उसने सूरत के समृद्ध नगर को लूट लिया। इसे लूट से शिवाजी को एक करोड़ रुपये के आभूषण, रत्न आदि हाथ लगे।

जयसिंह और पुरन्दर की सन्धि-अब औरंगजेब ने आमेर में कुशल कूटनीतिज्ञ मिर्जा राजा जयासिंह के साथ सेनानायक दिलेर खाँ और ताज खाँ को भेजा। मिर्जा राजा जयसिंह ने कहा था कि “हम उसे वृत्त के घेरे की तरह बाँध लेंगे।” कूटनीतिज्ञ जयसिंह ने शिवाजी के विरोधियों को ही नहीं अपितु प्रलोभन देकर अनेक मराठों को भी अपने पक्ष में कर लिया। मराठ राज्य पर आक्रमण करते हुए उसने शिवाजी को पुरन्दर के किले में घेर लिया। विवश होकर शिवाजी को जून, 1665 ई. को जयसिंह के साथ पुरन्दर भी सन्धि करनी पड़ी।

इस सन्धि के अनुसार अपने 23 दुर्ग मुगलों के हवाले कर दिए और आवश्यकता पड़ने पर बीजापुर के विरुद्ध मुगलों की सहायता करने का आश्वासन दिया। शिवाजी को व्यक्तिगत रूप से दरबार में उपस्थित होने के लिए बाध्य नहीं किया जायेगा। इस सन्धि के समय फ्रांसीसी यात्री वर्नियर भी मौजूद था। सन्धि की धाराओं के अनुसार उल्लेख था कि शिवाजी को मुगल दरबार में उपस्थित होने के लिए बाध्य नहीं किया जायेगा। इसके बावजूद जयसिंह ने शिवाजी को आगरा चलने के लिए तैयार कर लिया।

सम्भवतः शिवाजी ने भी मुगल दरबार से सम्पर्क तथा उत्तरी भारत की स्थिति को जानने के लिए एक अच्छा अवसर समझा। मई, 1666 ई. में शिवाजी आगरा के मुगल दरबार में उपस्थित हुए। औरंगजेब ने शिवाजी को उचित सम्मान न देकर उनके प्रति रूखा व्यवहार किया और मनसबदारों की तृतीय पंक्ति में खड़ा कर दिया। शिवाजी ने देखा कि जसवन्तं सिंह उनके सामने खड़ा है, तो दु:खी होकर कहा “जिस जसवन्त सिंह की पीठ मेरे सैनिकों ने देखी थी, मुझे उसके पीछे खड़ा होना पड़ रहा है।

दरबार में सम्मानजनक व्यवहार नहीं मिलने पर नाराज शिवाजी वहाँ से रामसिंह (मिर्जा राजा जयसिंह का पुत्र) के निवास पर लौट आये। औरंगजेब ने शिवाजी को जयपुर भवन’ में बन्दी बना लिया और मार डालने का निश्चय किया। इस गम्भीर स्थिति में भी शिवाजी ने अपना धैर्य नहीं खोया और मुगलों की चंगुल से बच निकलने का उपाय खोजने लगे। शिवाजी ने बीमार होने का बहाना किया और हिन्दू परम्परा के अनुसार दीन – दुःखियों को मिठाई फल आदि दान देना आरम्भ कर दिया। प्रतिदिन बन्दीगृह में मिठाई और फलों के टोकरे आने लगे। शुरू – शुरू में तो पहरेदार टोकरों की गहन छानबीन करते थे किन्तु बाद में काफी लापरवाह हो गए। अवसर देखकर शिवाजी अपने पुत्र शम्भा जी के साथ इन टोकरों में बैठकर बन्दीगृह से निकलकर महाराष्ट्र पहुँचने में सफल हो गए।

बन्दी जीवन के कठिन यात्रा के कारण शिवाजी का स्वास्थ्य काफी गिर गया। उधर नया मुगल सूबेदार मुअज्जम आरामतलब आदमी था और उसका सहयोगी जसवन्त सिंह शिवाजी से सहानुभूति रखता था। दोनों पक्ष इस समय युद्ध-विराम चाहते थे। 1667 ई. में जसवन्त सिंह की मध्यस्थता से मुगल-मराठा सन्धि सम्पन्न हो गई जिसके अनुसार औरंगजेब ने शिवाजी को स्वतन्त्र शासक स्वीकार कर ‘राजा’ की उपाधि को मान्यता दे दी। सन्धि के बावजूद औरंगजेब शिवाजी के विरुद्ध चाल चलने से बाज नहीं आया। इस कारण 1670 ई. में शिवाजी ने सूरत को पुनः लूट लिया और अपने खोये हुए प्रदेशों पर अधिकार आना प्रारम्भ कर दिया।

5. राज्याभिषेक:
शिवाजी ने बनारस के गंगाभट्ट नामक ब्राह्मण को बुलाकरं जून, 1674 ई. को राजधानी रायगढ़ में अपना राज्याभिषेक करवाया और ‘छत्रपति’ हिन्दू धर्मोद्वारक,’ ‘गो ब्राह्मण प्रतिपालक’, आदि उपाधियाँ धारण की। शिवाजी के अन्तिम दिन चिन्ता में बीते। एक तरफ तो वे अपने पुत्र शम्भाजी के मुगलों की शरण में जाने से दु:खी थे, दूसरी तरफ उनकी पत्नी सायराबाई अपने पुत्र राजाराम को उत्तराधिकारी बनाने के लिए षड्यन्त्र रच रही थी। इन परिस्थितियों में अप्रैल, 1680 ई. में शिवाजी भी मृत्यु हो गई।

6. शिवाजी का मूल्यांकन:
शिवाजी ने देश के लोगों में नवजीवन का संचार करने तथा स्वतन्त्र हिन्दू राज्य की स्थापना के उद्देश्य से आजीवन संघर्षरत रहे। एक बड़ी सीमा तक वे अपने उद्देश्य में सफल रहे। सर यदुनाथ सकार के अनुसार शिवाजी हिन्दू प्रजाति का अन्तिम प्रतिभा सम्पन्न व्यक्ति और राष्ट्र-निर्माता शासक थी। जिस समय वह महाराष्ट्र के रंगमंच पर आये, उस समय मराठे विदेशी शासकों के अधीन दक्षिण में सर्वभ बिखरे हुए थे। शिवाजी ने उन्हें संगठित कर सिद्ध कर दिया कि वे एक राज्य की स्थापना की ही नहीं अपितु एक राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं। मुगलों का कड़ा प्रतिरोध कर उन्होंने मराठा स्वराज्य की स्थापना की।

प्रश्न 6.
शिवाजी के उपरान्त पेशवाओं का इतिहास लिखिए।
उत्तर:
शिवाजी के कमजोर उत्तराअधिकारियों के समय मराठा साम्राज्य की बागडोर उनके पेशवा (प्रधानमन्त्री) के हाथों में आ गई। पेशवाओं के शासन का प्रारम्भ बालाजी विश्वनाथ के समय हुआ।

1. बालाजी विश्वनाथ (1713 – 20 ई.)
बालाजी विश्वनाथ प्रथम पेशवा थे जिसे इस पद पर मराठा शासक शाहू द्वारा 1713 ई. में नियुक्त किया गया था। इसके समय में सैयद बन्धु अब्दुल्ला और हुसैन अली दिल्ली के शासक निर्माता थे। सैयद बन्धुओं ने बहादुर शाह प्रथम को हटाकर फर्रुखासियर को गुगल सिंहासन पर बैठाया था किन्तु वह शीघ्र ही इन दोनों भाइयों के खिलाफ षड्यन्त्र करने लगा। दक्खन में मौजूद मीरबख्शी हुसैनअली को जब इस षड्यन्त्र की जानकारी हुई तो उसने फर्रुखासियर पर प्रहार करने के लिए मराठा शासक शाहू के साथ 1719 ई. में एक सन्धि की। इस सन्धि के अनुसार

  1. मुगलों द्वारा शाहू को वे सब प्रदेश लौटा दिए जाएँगे जो शिवाजी के ‘स्वराज’ नाम से प्रसिद्ध थे।
  2. खानदेश, बरार, गोण्डवाना, हैदराबाद और कर्नाटक में मराठों द्वारा हाल ही में जीते गए प्रदेशों पर उनका अधिकार स्वीकार कर लिया जाएगा।
  3. मराठों को दक्खन के छः प्रान्तों में चौथ और सरदेश मुखी नामक कर वसूल करने की अनुमति दे दी जायेगी। चौथ के बदले पन्द्रह हजार मराठा सैनिक मुगल सम्राट की सेवा में रहेंगे।
  4. दिल्ली में नजरबन्द शाहू की माता यसूबाई व पत्नी सहित मराठा राजपरिवार के सदस्यों को मुक्त कर वापिस भेज दिया जाएगा।

हुसैन अली के दिल्ली की तरफ प्रस्थान करने पर सन्धि के अनुसार बानाजी विश्वनाथ व खण्डेरा व धनादे के नेतृत्व में पन्द्रह हजार मराठ्य सैनिकों ने उसका साथ दिया। सैय्यद बन्धुओं ने फर्रुखसियर को अपदस्त कर ‘रफी-उल-दरजात’ को मुगल बादशाह बना दिया जिसने उपरोक्त सन्धि को स्वीकृत प्रदान कर दी। दक्खन में चौथ और सरदेशमुखी भी वसूली के अधिकार प्राप्त करना बालाजी विश्वनाथ की बहुत बड़ी सफलता थी। उसे मराठा साम्राज्य का द्वितीय संस्थापक (संस्थापक शिवाजी) कहा जाता है।

2. पेशवा बाजीराव (1720 – 40 ई.):
पेशवा बालाजी विश्वनाथ की मृत्यु के बाद उसके बड़े पुत्र बाजीराव (1720 – 40 ई.) को पेशवा पद पर नियुकत किया गया। इस समय उसकी आयु मात्र बीस वर्ष थी मुगल साम्राज्य की शोचनीय दशा का लाभ उठाकर वह उसके अधिक से अधिक प्रदेशों को छीन लेना चाहता था। उसने अपनी तर्कपूर्ण व्याख्या द्वारा यह कहते हुए शाहू का समर्थन हासिल कर लिया। कि हमारे लिए यही समय है। कि हम विदेशियों को देश से निकालकर कीर्ति प्राप्त कर लें।

हमें सूखे वृक्ष की जड़ों पर प्रहार करना चाहिये शाखाएँ तो अपने आप गिर जायेंगी। पेशवा की योजना से प्रभावित होकर शाहू ने कहा, “तुम मराठा पताका को हिमालय की चोटी पर फहरा देंगे। तुम वास्तव में योग्य पिता के योग्य पुत्र हो।”अपनी नीति के अनुसार बाजीराव ने नर्मदा पार का 1724 ई. में मालवा जीत लिया। शाही सेवा में मौजूद जयपुर का शासक सवाई जयसिंह मराठ से सहानुभति रखने के कारण शीघ्र ही पेशवा का मित्र बन गया। इस कारण पेशवा को बहुत कम विरोध का सामना पड़ा।

पेशवा को सबसे जटिल समस्या का सामना के सबसे शक्तिशाली सरदार ‘नजाम-उल’ सम्बन्धों को व्यवस्थित करने में काना पड़ा। निजाम स्वयं को दक्खन या न्यायोचित शासक मानता था। इस क्षेत्र में मराठा अभियानों के कारण वह उन्हें अपना सबसे बड़ा शत्रु समझने लगा। इस कारण उसने 1917 ई. में सन्धि का उल्लंघन करना प्रारम्भ कर दिया और शाहू के स्थान पर उसके विरोधी शम्भाजी को मराठा साम्राज्य के मुखियों के रूप में मान्यता प्रदान कर दी मार्च 1728 ई. को औरंगाबाद के पास पात्नखेड़ नामक स्थान पर पेशवा ने निजाम की सेनाओं को पराजित कर उसे मुंगी शिवगाँव की सन्धि पर हस्ताक्षर के लिए बाध्य कर दिया।

3. सन्धि की शर्ते – इसे सन्धि के अनुसार:

  1. निजाम ने शम्भा जी की सुरक्षा की जिम्मेदारी छोड़कर उसे पन्हाला भेजना स्वीकार कर लिया।
  2. छीने गए मराठा प्रदेश तथा मराठा कैदियों को छोड़ देने का निर्णय लिया गया।
  3. 1719 ई. की सन्धि के अनुसार शाहू के चौथ तथा सरदेशमुखी कर भी वसूली के अधिकार को मान लिया।

कुछ समय बाद चौथ और सरदेशमुखी के बदले पेशवा ने प्रतिज्ञा कर ली कि वह निजाम के प्रदेशों पर आक्रमण नहीं करेगा और निजाम ने मराठों के उत्तरी भारत पर आक्रमण में तटस्थ रहना स्वीकार कर लिया। अब पेशवा ने उत्तर भारत पर अपना ध्यान केन्द्रित करते हुए 1728 ई. में मालवा और बुन्देलखण्ड के मुगल प्रदेशों पर अधिकार कर लिया। मार्च 1737 ई. में अवध के सूबेदार शाइस्ताखाँ ने मराठा सेनापति मल्लहारराव होल्करको पराजित किया और इस विजय की डींग मारते हुए दिल्ली में सूचना भेजी कि उसने मराठों को चम्बल के पार खदेड़ दिया। बाजीराव इस विजय का खण्डन करने के लिए चौदह दिन का सफर मात्र दो दिन में तय कर दिल्ली पर टूट पड़ा। इस आक्रमण से भयभीत मुगल सम्राट को बाजीराव ने सन्देश भेजा कि उसके अभियान का उद्देश्य कुछ प्राप्त करना नहीं अपितु सिर्फ यह दिखाना है कि वह अभी जिन्दा है।

दिल्ली से लौटने के बाद पेशवा ने निजाम को पराजित कर 17 जनवरी, 1738 को सराय की सन्धि करने के लिए बाध्य किया। इस सन्धि के अनुसार उसने सम्पूर्ण मालवा तथा नर्मदा से लेकर चम्बल तक में प्रवेश को बाजीराव के अधिपत्य में छोड़ दिया। 1740 ई. में बाजीराव बने ‘निजाम-उल-मुल्क’ के द्वितीय पुन नासिरजंग को परस्त का मुंगी शिवगाँव की सन्धि पर हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य किया। इसके अनुसार नासिरजंग ने हॉडिया और खरगाँव के जिले मराठों को सौंप दिए। 8 मई, 1740 ई. को नर्मदा नदी के किनारे रावर नामक स्थान पर अचानक बाजीराव की मृत्यु हो गई।

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RBSE Solutions for Class 12 History Chapter 4 मुगल आक्रमण: प्रकार और प्रभाव

July 6, 2019 by Prasanna

Rajasthan Board RBSE Class 12 History Chapter 4 मुगल आक्रमण: प्रकार और प्रभाव

RBSE Class 12 History Chapter 4 पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर

RBSE Class 12 History Chapter 4 बहुचयनात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
यह किसने कहा था कि “हमें सूखे वृक्ष की जड़ों पर प्रहार करना चाहिए, शाखाएँ तो अपने आप गिर जाएँगी”?
(ब) शिवाजी
(ब) शाहू
(स) बालाजी विश्वनाथ
(द) बाजीराव प्रथम।

प्रश्न 2.
इनमें से कौन – सी एक उपाधि बप्पा रावल ने धारण नहीं की थी?
(अ) हिन्दू सूर्य
(ब) राजगुरु
(स) चक्कवै
(द) हिन्दू सुरत्राण।

प्रश्न 3.
पृथ्वीराज चौहान और मुहम्मद गौरी के बीच युद्ध किस स्थान पर लड़े गए?
(अ) तराइन
(ब) पानीपत
(स) खानवा
(द) हल्दीघाटी।

प्रश्न 4.
रणथम्भौर पर अलाउद्दीन खिलजी ने किस वर्ष अधिकार किया?
(अ) 1299 ई.
(ब) 1300 ई.
(स) 1301 ई.
(द) 1303 ई.।

प्रश्न 5.
मलिक मुहम्मद जायसी की रचना ‘पद्मावत्’ के अनुसार अलाउद्दीन खिलजी के चित्तौड़ पर आक्रमण का कारण था
(अ) अलाउद्दीन खिलजी की साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा था
(ब) मेवाड़ की बढ़ती हुई शक्ति
(स) चित्तौड़ का भौगोलिक एवं सामरिक महत्व
(द) पद्मनी को प्राप्त करने की लालसा।

प्रश्न 6.
कौन-सा राजस्थानी शासक अपनी सांस्कृतिक उपलब्धियों के लिए इतिहास में प्रसिद्ध है?
(अ) महाराणा सांगा
(ब) महाराणा कुम्भा
(स) महाराणा प्रताप
(द) पृथ्वीराज चौहान।

प्रश्न 7.
महाराणा सांगा ने बाबर की सेना को किस स्थान पर पराजित किया?
(अ) खानवा
(ब) बयाना
(स) बाड़ी
(द) खातोली।

प्रश्न 8.
दुर्गादास राठौर ने राजस्थान की किस रियासत की रक्षा के लिए औरंगजेब से लम्बे समय तक संघर्ष किया?
(अ) आमेर
(ब) मारवाड़
(स) मेवाड़
(द) कोटा।

उत्तरमाला:
1. (द)
2. (द)
3. (अ)
4. (स)
5. (द)
6. (ब)
7. (ब)
8. (ब)।

RBSE Class 12 History Chapter 4 अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
महाराणा प्रताप को समझाने के लिए अकबर द्वारा किन – किन दरबारियों को भेजा गया?
उत्तर:
अकबर ने महाराणा प्रताप को समझाने के लिए अत्यन्त चतुर व वाक्पटु दरबारी जलाल खाँ कोरची तथा तीन अन्य दरबारी मानसिंह, भगवन्तदास और टोडरमल को भेजा गया।

प्रश्न 2.
‘भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में चित्तौड़ के ‘विजय स्तम्भ’ का क्या महत्व है?
उत्तर:
‘भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में चित्तौड़ के विजय स्तम्भ’ ने क्रान्तिकारियों के लिए प्रेरणा स्रोत का कार्य किया।

प्रश्न 3.
शिवाजी का जन्म कब और कहाँ हुआ?
उत्तर:
शिवाजी का जन्म 20 अप्रैल, 1627 ई. को पूना (महाराष्ट्र) के समीप शिवनेर के पहाड़ी किले में हुआ था।

प्रश्न 4.
हल्दीघाटी का युद्ध कब और किनके मध्य लड़ा गया?
उत्तर:
हल्दीघाटी का युद्ध 1576 ई. को अकबर और महाराणा प्रताप के मध्य लड़ा गया।

प्रश्न 5.
मारवाड़ के राव चन्द्रसेन को ‘प्रताप को अग्रगामी’ क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
मारवाड़ के राव चन्द्रसेन सिंह ने संघर्ष की जो शुरुआत की थी उसी राह पर आगे चल कर महाराणा प्रताप ने बड़ा नाम कमाया। इस कारण चन्द्रसेन को ‘प्रताप का अग्रगामी’ कहा जाता है।

प्रश्न 6.
चम्पानेर की सन्धि किन – किन के मध्य हुई?
उत्तर:
चम्पानेर की सन्धि 1565 ई. में मेवाड़ और गुजरात के मध्य में हुई थी।

प्रश्न 7.
महमूद गजनवी को अन्तिम भारत अभियान कब और किस शक्ति के विरुद्ध हुआ?
उत्तर:
महमूद गजनवी को अन्तिम आक्रमण 1027 ई. में सिन्ध के जाटों के विरुद्ध हुआ।

प्रश्न 8.
दिल्ली की गद्दी पर बैठने वला अन्तिम हिन्दू सम्राट कौन था?
उत्तर:
दिल्ली की गद्दी पर बैठने वाला अन्तिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान (चाहमान वंश) था।

प्रश्न 9.
हम्मीरदेव चौहान की जानकारी के कोई चार साहित्यिक स्रोतों का नाम लिखिए।
उत्तर:
हम्मीरदेव चौहान की जानकारी के चार प्रमुख साहित्यिक स्रोत हैं-

  1. हम्मीर महाकाव्य (नयन चन्द्र सूरी)
  2. हम्मीरायण (व्यास भाण्ड)
  3. हम्मीर रासो (जोधराज) तथा
  4. हम्मीरबन्धन (अमृत कैलाश)।

प्रश्न 10.
‘हिन्दू पत’ किस राजस्थानी शासक को कहा जाता है और क्यों?
उत्तर:
मेवाड़ के महाराणा सांगा को ‘हिन्दूपत’ या ‘हिन्दुपति’ कहा गया है क्योंकि सांगा भारत में हिन्दू राज्य स्थापित करना चाहता था।

प्रश्न 11.
मारवाड़ की ‘संकटकालीन राजधानी’ किसे कहा जाता है?
उत्तर:
मारवाड़ की संकटकालीन राजधानी ‘सिवाणा’ को कहा जाता है।

प्रश्न 12.
किस मुस्लिम इतिहासकार ने हल्दीघाटी के युद्ध में अकबर की तरफ से भाग लिया था?
उत्तर:
हल्दीघाटी के युद्ध में इतिहासकार ,बदायूँनी ने अकबर की तरफ से भाग लिया था।

प्रश्न 13.
कौन – कौन सी दो उपाधियाँ महाराणा कुम्भा को महान संगीत ज्ञाता होने की प्रमाण हैं?
उत्तर:
महाराणा कुम्भा के संगीत ज्ञाता होने की दो उपाधियाँ-

  1. ‘अभिनव भरताचार्य’ तथा
  2. ‘वीणावादन प्रवीणेन’ हैं।

प्रश्न 14.
महाराणा साँगा को ‘एक सैनिक को भग्नावशेष’ क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
अपने भाई पृथ्वीराज के साथ झगड़े में उसकी एक आँख फूट गई, इब्राहीम लोदी के साथ खातोली के युद्ध में उसका हाथ कट गया और एक पैर से वह लंगड़ा हो गया। मृत्यु समय तक उसके शरीर पर तलवारों व भालों के कम-से-कम 80 निशान लगे हुए थे जो ‘एक सैनिक का भग्नावशेष’ सिद्ध करते हैं।

RBSE Class 12 History Chapter 4 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत पर अरबों के आक्रमण के क्या कारण थे?
उत्तर:
भारत पर अरबों के आक्रमण के निम्नलिखित कारण थे-

  1. इस्लाम ने अरबवासियों को संगठित कर उनमें मजहबी प्रचार की तीव्र अभिलाषा उत्पन्न कर दी थी। अन्य देशों की तरह भारत में भी इस्लाम के प्रसार के उद्देश्य ने उन्हें आक्रमण करने के लिए प्रेरित किया।
  2. खलीफा इस्लामी जगत् का मजहबी प्रमुख ही नहीं अपितु राजनैतिक अधिकारी भी होता था। ऐसे में साम्राज्य विस्तार की भावना होना भी स्वाभाविक था।
  3. अरबवासी भारत की आर्थिक समृद्धि से परिचित थे। वे यहाँ आक्रमण कर धन प्राप्त करना चाहते थे।

प्रश्न 2.
अरबों की सिन्ध विजय के सांस्कृतिक परिणामों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
सांस्कृतिक दृष्टि से भारत ने अरबों पर विजय प्राप्त की। भारतीय दर्शन, विज्ञान, गणित, चिकित्सा और ज्योतिष ने अरबों को बहुत प्रभावित किया। उन्होंने कई भारतीय संस्कृत ग्रन्थों का अरबी भाषा में अनुवाद करवाया जिनमें ब्रह्मगुप्त का ‘ब्रह्म सिद्धान्त’ तथा ‘खण्ड खांड्यक’ अधिक प्रसिद्ध है। अरब के लोगों ने अंक, दशमलव पद्धति, चिकित्सा व खगोल शास्त्र के कई मौलिक सिद्धान्त भारतीयों से सीखे और कला तथा साहित्य के क्षेत्र में भी भारतीय पद्धतियों को अपनाया। भारतीय दर्शन, साहित्य व कला की अनेक बातें अरबों के माध्यम से यूरोप के लोगों ने सीखी। इस प्रकार अरबों द्वारा भारतीय ज्ञान पश्चिमी देशों में पहुँचने में सफल रहा।

प्रश्न 3.
नागभट्ट प्रथम के मुस्लिम प्रतिरोध का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
नागभट्ट प्रथम के समय सिन्ध की दिशा से बिलोचों तथा अरबों ने भारत पर आक्रमण किया। उसने न केवल मुस्लिम आक्रमण से पश्चिम भारत की रक्षा की अपितु उनके द्वारा रौंदे हुए प्रदेशों पर दु: अधिकार कर लिया। ग्वालियर प्रशस्ति में नागभट्ट प्रथम को मलेच्छों (विदेशी आक्रमणकारी) का दमनकारक और दोनों का उद्धारक होने के कारण ‘नारायण’ उपाधि से विभूषित किया गया है। मुस्लिम लेखक अलबिलादुरी के विवरण से भी ज्ञात होता है कि समकालीन अरब शासक जुनैद को मालवा के विरुद्ध सफलता नहीं मिली। नौसारी अभिलेख में अरबों द्वारा पराजित राजाओं के नाम दिए गए हैं किन्तु इस सूची में नागभट्ट प्रथम का न होना उपरोक्त तथ्यों को प्रमाणित करता है।

प्रश्न 4.
मुहम्मद गौरी के विरुद्ध पृथ्वीराज चौहान की असफलता के क्या कारण थे?
उत्तर:
विजेता होने के बावजूद पृथ्वीराज चौहान में दूरदर्शिता व कूटनीति का अभाव था। उसने अपने पड़ोसी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित नहीं किए अपितु उनके साथ युद्ध करके शत्रुता मोल ले ली। इसी कारण मुहम्मद गौरी के विरुद्ध संघर्ष में उसे उनका कोई सहयोग नहीं मिला। 1178 ई. में जब मुहम्मद गौरी ने गुजरात के शासक भीमदेव द्वितीय पर आक्रमण किया था, उस समय पृथ्वीराज ने गुजरात की कोई सहायता न कर एक भूल की। तराइन के प्रथम युद्ध में पराजित होकर भागती तुर्क सेना पर आक्रमण न करना भी उसकी एक भयंकर भूल सिद्ध हुई। यदि उस समय शत्रु सेना पर प्रबल आक्रमण करता तो मुहम्मद गौरी भारत पर पुनः आक्रमण करने के बारे में कभी नहीं सोचता। इस प्रकार उपरोक्त कारणों से पृथ्वीराज को असफल होना पड़ा।

प्रश्न 5.
मारवाड़ के इतिहास में राव चन्दसेन को समुचित महत्व क्यों नहीं मिल पाया?
उत्तर:
इतिहास में समुचित महत्व न मिलने के कारण चन्द्रसेन को मारवाड़ का ‘भूला – बिसरा नायक’ कहा जाता है। चन्द्रसेन का नाम इतिहास में विस्मृत होने का प्रमुख कारण यही है कि एक तरफ प्रताप की मृत्यु के बाद जहाँ मेवाड़ का राज्य उनके पुत्र – पौत्रादि के हाथों में रहा, वहीं चन्द्रसेन की मृत्यु के बाद मारवाड़ की गद्दी पर उसके भाई उदय सिंह का अधिकार हो गया। चन्द्रसेन और उदय सिंह के बीच विरोध चलता आया था।

प्रश्न 6.
आप कैसे कह सकते हैं कि महाराणा प्रताप धार्मिक रूप से सहिष्णु शासक था?
उत्तर:
महाराणा प्रताप ने धर्म रक्षक व राज चिह्न की सदैव रक्षा की। उनकी मान्यता थी, जो दृढ़ राखे धर्म को तिहि राखे करतार। प्रताप के संरक्षण में चावण्ड में रहते हुए चक्रपाणि मिश्र ने तीन संस्कृत ग्रन्थ – राज्याभिषेक पद्धति, मुहूर्त माला एवं विश्व वल्लभ लिखे। ये ग्रन्थ क्रमशः गद्दीनशीनी की शास्त्रीय पद्धति, ज्योतिषशास्त्र और उद्यान विज्ञान के विषयों से सम्बन्धित है। प्रताप के राज्यकाल में भामाशाह के भाई ताराचन्द्र की प्रेरणा से 1595 ई. में हेमरत्न सूरि द्वारा गोरा बादल’ कथा पद्मनी चौपाई काव्य ग्रन्थ लिखे। उपरोक्त तथ्य प्रताप की धार्मिक सहिष्णुता का परिचायक है।

प्रश्न 7.
खानवा के युद्ध में महाराणा सांगा की पराजय के क्या कारण थे?
उत्तर:
खानवा के युद्ध में महाराणा सांगा की पराजय के निम्नलिखित कारण थे-

  1. महाराणा सांगा की पराजय का मुख्य कारण बयाना विजय के तुरन्द बाद ही युद्ध न करके बाबर को तैयारी करने का पूरा समय देना था।
  2. राजपूत सैनिक परम्परागत हथियारों से युद्ध लड़ रहे थे। वे तीर, कमान, भालों व तलवारों से बाबर की तोपों के गोलों का मुकाबला नहीं कर सकते थे।
  3. हाथी पर सवार होकर भी सांगा ने बड़ी भूल की क्योंकि इससे शत्रु को उस पर ठीक से निशाना लगाकर घायल करने का मौका मिला।
  4. राजपूत सेना में एकता और तालमेल का अभाव था क्योंकि सम्पूर्ण सेना अलग-अलग सरदारों के नेतृत्व में एकत्रित हुई थी।
  5. अपनी गतिशीलता के कारण राजपूतों की हस्ति सेना पर बाबर की अश्व सेना भारी पड़ गयी। बाबर की तोपों ने सांगा के हाथियों को अपनी ही सेना को रौंदने का मौका दिया।

प्रश्न 8.
औरंगजेब के विरुद्ध राठौर – सिसौदिया गठबन्धन का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर:
अजीत सिंह को लेकर मारवाड़ के सरदार जोधपुर पहुँचे किन्तु जोधपुर पर शाही अधिकार ले जाने के कारण वे अजीत सिंह की सुरक्षा को लेकर चिन्तित थे। महाराजा जसवन्त सिंह की सबसे बड़ी रानी जसवन्त दे बूंदी के राव छत्रसाल की पुत्री थी। उसकी सौतेली बहन काननकुमारी का विवाह महाराणा राजसिंह के साथ हुआ था। इस कारण दुर्गादास ने काननकुमारी के माध्यम से उनके बहनोई महाराणा राजसिंह के पास अजीत सिंह को सुरक्षा देने की प्रार्थना की। पूरे मामले में मेवाड़ की सुरक्षा भी जुड़ी हुई थी। इस कारण राजसिंह ने प्रार्थना को स्वीकार करते हुए अजीतसिंह को बारह गाँवों सहित केलवे का पट्टा दे दिया। औरंगजेब को जब इसकी जानकारी मिली तो उसने महाराणा के पास फरमान भेज कर अजीत सिंह की माँग की किन्तु महाराणा ने इस पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया।

प्रश्न 9.
पुरन्दर की सन्धि की प्रमुख शर्तों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
जून, 1665 ई. में शिवाजी और जयसिंह के मध्य पुरन्दर की सन्धि हुई। इस सन्धि की शर्ते निम्नलिखित र्थी| इस सन्धि के अनुसार अपने 23 दुर्ग मुगलों के हवाले कर दिए और आवश्यकता पड़ने पर बीजापुर के विरुद्ध मुगलों की सहायता करने का आश्वासन दिया। शिवाजी को व्यक्तिगत रूप से दरबार में उपस्थित होने के लिए बाध्य नहीं किया गया। इस सन्धि के समय फ्रांसीसी यात्री बर्नियर भी मौजूद था।

प्रश्न 10.
महाराणा सांगा के समय मेवाड़ और दिल्ली सल्तनत के मध्य संघर्ष का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
सांगा (मेवाड़) ने सिकन्दर लोदी के समय ही दिल्ली के अधीनस्थ राज्यों (इलाकों) पर अधिकार करना शुरू कर दिया था किन्तु अपने राज्य की निर्बलता के कारण वह महाराणा के साथ संघर्ष के लिए तैयार नहीं हो सका। सिकन्दर लोदी के उत्तराधिकारी इब्राहीम लोदी ने 1517 ई. में मेवाड़ पर आक्रमण कर दिया। खातोली (कोटा) नामक स्थान पर दोनों पक्षों के बीच युद्ध हुआ जिसमें सांगा की विजय हुई। सुल्तान युद्ध के मैदान से भाग निकलने में सफल रहा किन्तु उसके एक शहजादे को कैद कर लिया गया। इस युद्ध में तलवार से साँगा का बायाँ हाथ कट गया और घुटने पर तीर लगने से वह हमेशा के लिए लंगड़ा हो गया। खातौली की पराजय का बदला लेने के लिए 1518 ई. में इब्राहिम लोदी ने मियाँ माखन की अध्यक्षता में साँगा के विरुद्ध एक सेना भेजी किन्तु साँगा ने बाड़ी (धौलपुर) नामक स्थान पर लड़े गए युद्ध में एक बार फिर शाही सेना को पराजित किया।

प्रश्न 11.
शिवाजी की धार्मिक नीति का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर:
विद्वान ब्राह्मणों को प्रोत्साहन देने के लिए शिवाजी ने एक पृथक् धनराशि की व्यवस्था की थी। आग्रही हिन्दू होने के कारण शिवाजी एक धर्म सहिष्णु शासक थे। उन्होंने अपनी मुस्लिम प्रजा को विचार और नमाज की पूरी स्वतन्त्रता दे रखी थी तथा मुसलमान फकीर व पीरों को समान रूप से आर्थिक सहायता प्रदान की। उन्होंने केलोशी के बाबा याकूत के लिए आश्रम बनवाया। युद्ध अभियानों के समय उनके सैनिकों के हाथ अगर कुरान लग जाती थी तो वे उसे अपने मुस्लिम साथियों को पढ़ने के लिए दे देते थे। मुस्लिम इतिहासकार खफ़ी खाँ ने भी शिवाजी की धर्म सहिष्णुता की प्रशंसा की है।

प्रश्न 12.
महाराणा प्रताप और राव चन्द्रसेन में क्या – क्या समानता व असमानता थी?
उत्तर:
समानताएँ:
चन्द्रसेन व प्रताप दोनों को अपने भाई – बन्धुओं के विरोध का सामना करना पड़ा। प्रताप की भाँति चन्द्रसेन के अधिकार में मारवाड़ के कई भाग नहीं थे। मेवाड़ के माण्डलगढ़ और चित्तौड़ पर तो मारवाड़ के मेड़ता, नागौर, अजमेर आदि स्थानों पर मुगलों का अधिकार था।

असमानताएँ:
समानता के साथ – साथ दोनों शासकों की गतिविधियों में मूलभूत अन्तर भी पाया जाता है। दोनों शासकों ने अपने – अपने पहाड़ी क्षेत्रों में रह कर मुगलों को खूब छकाया किन्तु प्रताप के समान चन्द्रसेन चावंड जैसी कोई स्थायी राजधानी नहीं बसा पाया। विशेष अवसर पर चन्द्रसेन की उपस्थिति व मुगल सेना को विकेन्द्रित करने से प्रताप को सहयोग मिला।

प्रश्न 13.
अगर हम्मीर चौहान के स्थान पर आप होते तो अलाउद्दीन खिलजी के विद्रोहियों को लौटाने के प्रति क्या निर्णय लेते और क्यों?
उत्तर:
हम्मीर महाकाव्य के अनुसार रणथम्भौर पर आक्रमण करने का कारण यहाँ के शासक हम्मीर द्वारा विद्रोही सेनापति मीर मोहम्मद शाह को शरण देना था। इसामी ने भी इस कथन की पुष्टि की है। 1299 ई. में अलाउद्दीन खिलजी ने अपने दो सेनापतियों उलूग खाँ व नुसरत खाँ को गुजरात पर आक्रमण करने के लिए भेजा था। विजयोपरान्त जब यह सेना वापस लौट रही थी तो जालौर के पास लूट के माल के बँटवारे के प्रश्न पर नवमुसलमानों ने विद्रोह कर दिया।

विद्रोहियों के दमन के उपरान्त उनमें से मुहम्मद शाह व उसका भाई कैहब्रू भागकर हम्मीरदेव की शरण में चला गया। हम्मीर ने न केवल उन्हें शरण दी अपितु मुहम्मद को जगाना’ की जागीर भी दी। हम्मीरदेव ने इन विद्रोहियों को अलाउद्दीन खिलजी को सौंपने से मना कर दिया विद्रोहियों को शरण देना यह शास्त्र के अनुसार धर्म नीति है-इस प्रकार का उदाहरण राजा रघु और समुद्रगुप्त ने भी दक्षिण भारत के राज्यों के साथ किया। हम्मीरदेव ने ऐसा करके राजधर्म का पालन किया। यही उचित भी है।

प्रश्न 14.
एक विजेता के रूप में बप्पारावल की उपलब्धियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
बप्पा रावल को मेवाड़ के गुहिल वंश का वास्तविक संस्थापक कहा जाता है। बप्पा चित्तौड़ के शासक मानमोरी की सेवा में चला गया। इसी समय विदेशी मुस्लिम सेना ने चित्तौड़ पर आक्रमण कर दिया। राजा मान ने अपने सामन्तों को विदेशी सेना का मुकाबला करने के लिए कहा किन्तु उन्होंने इन्कार कर दिया। अन्त में बप्पा रावल ने इस चुनौती को स्वीकार करते हुए युद्ध के लिए प्रस्थान किया। बप्पा के अद्भुत पराक्रम के सामने विदेशी आक्रमणकारी टिक नहीं पाये और सिन्ध की तरफ भाग निकले। शत्रुओं का पीछा करता हुआ बप्पा अपने पूर्वजों की राजधानी गजनी तक पहुँच गया। गजनी के शासक सलीम को हराकर बप्पा ने अपने भानजे को वहाँ के सिंहासन पर बैठाया। बप्पा ने सलीम की पुत्री के साथ विवाह किया और चिंत्तौड़ लौट गया। इस प्रकार बप्पा एक सफल विजेता शासक था।

RBSE Class 12 History Chapter 4 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
महाराणा कुम्भा की राजनैतिक एवं सांस्कृतिक उपलब्धियों का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर:
महाराणा कुम्भा 1433 ई. में मेवाड़ की राजगद्दी पर बैठा। उसके पिता का नाम महाराणा के मोकल तथा माता का नाम सौभाग्य देवी था। शासक बनने के बाद उसने अपने यशस्वी पराक्रम द्वारा न केवल आन्तरिक और बाह्य कठिनाइयों का सफलतापूर्वक सामना किया अपितु अपनी युद्धकालीन और सांस्कृतिक उपलब्धियों द्वारा मेवाड़ के गौरव को पराकाष्ठा पर पहुँचा दिया।

कुम्भा की प्रारम्भिक कठिनाइयाँ:
शासक बनने के समय कुम्भा के समय अनेक आन्तरिक और बाह्य समस्याएँ थीं। मेवाड़ के महाराणा क्षेत्र सिंह (1364 – 82 ई.) की उपपत्नी की सन्तान चाचा और मेरा उसके पिता मोकल की हत्या कर मेवाड़ पर अधिकार करने के लिए प्रयास करने लगे थे। इस कारण मेवाड़ी सरदार दो भागों में विभाजित हो चुके थे-एक गुट कुम्भा समर्थक तथा दूसरा गुट उसके विरोधियों चाची, मेरा व मंहपा पंवार का समर्थक।

इस अव्यवस्था का लाभ उठाकर अनेक राजपूत सामन्त अपने स्वतन्त्र राज्य स्थापित करने के प्रयास करने लगे थे। कुम्भा द्वारा रणमल व राघवदेव के नेतृत्व में भेजी गई सेना ने शीघ्र ही विद्रोहियों का दमन कर दिया। चाचा और मेरा अपने अनेक समर्थकों के साथ मारे गए किन्तु चाचा के पुत्र एक्का व महपा पंवार भागकर मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी की शरण में पहुँचने में सफल हो गए।

महाराणा कुम्भा की राजनैतिक उपलब्धियाँ

1. मेवाड़ और मालवा का सम्बन्ध:
मेवाड़ और मालवा दोनों एक-दूसरे के पड़ोसी राज्य थे और यहाँ के शासक अपने-अपने राज्यों की सीमाओं का विस्तार करना चाहते थे। इस कारण दोनों राज्यों के बीच संघर्ष होना आवश्यक था किन्तु दोनों के बीच संघर्ष का तात्कालिक कारण मालवा के सुल्तान द्वारा कुम्भा के विद्रोही सरदारों को अपने यहाँ शरण देना था। मोकल के हत्यारे महपा पंवार ने मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी के पास शरण ले रखी थी।

कुम्भा ने सुल्तान को पत्र लिखकर महपा की माँग की जिसे सुल्तान द्वारा अस्वीकार कर दिया गया। इसलिए कुम्भा ने मालवा पर आक्रमण करने का फैसला किया। 1437 ई. में सारंगपुर नामक स्थान पर दोनों की सेनाओं के बीच घनघोर संघर्ष हुआ जिसमें पराजित होकर महमूद भाग गया। कुम्भा ने महमूद का पीछा करते हुए मालवा को घेर लिया और उसे कैद कर चित्तौड़ ले आया। छः माह तक सुल्तान को अपने यहाँ कैद रखने के कुम्भा ने उसे बिना शर्त रिहा कर दिया।

महमूद खिलजी ने अपनी पहली पराजय का बदला लेने के लिए 1443 ई. में कुम्भलगढ़ पर आक्रमण कर दिया। कुम्भा ने किले के दरवाजे के नीचे वाणमाता के मन्दिर के पास दीपसिंह के नेतृत्व में एक मजबूत सेना नियुक्त कर रखी थी। सात दिन तक चले भयंकर संघर्ष में दीपसिंह व उनके साथियों की मृत्यु के बाद ही मन्दिर पर शत्रु की सेना अधिकार कर पाई। इस मोर्चे को तोड़ने में महमूद की सेना को इतनी हानि उठानी पड़ी कि मन्दिर को नष्ट – भ्रष्ट कर उसकी टूटी हुई मूर्तियाँ कसाइयों को माँस तौलने के लिए दे दी गई।

नन्दी की मूर्ति का चूना पकाकर राजपूतों को पान में खिलाया गया। महमूद की सेना ने चित्तौड़ पर अधिकार करने का प्रयास भी किया किन्तु उसे सफलता नहीं मिली। 1446 ई. में महमूद ने एक बार फिर माण्डलगढ़ व चित्तौड़ पर अधिकार करने का प्रयास किया किन्तु सफलता उसे इस बार भी न मिल सकी। 1456 ई. में महमूद ने माण्डलगढ़ पर अधिकार करने का अन्तिम असफल प्रयास किया।

2. मेवाड़ – गुजरात सम्बन्ध:
कुम्भा के समय गुजरात की अव्यवस्था समाप्त हो चुकी थी और वहाँ के शासक अपने प्रभाव क्षेत्र के विस्तार के लिए लालायित थे। मालवा मेवाड़ के बीच चलने वाले संघर्ष तथा सिरोही व गुजरात की राजनीतिक स्थिति ने मेवाड़ – गुजरात के बीच संघर्ष को आवश्यक बना दिया। 1456 ई. में फिरोज खाँ की मृत्य के बाद उसका पुत्र शम्स खाँ नागौर का नया स्वामी बना किन्तु फिरोज के छोटे भाई मुजाहिद खाँ ने शम्स खाँ को पराजित कर नागौर पर अपना अधिकार कर लिया। शम्स खाँ ने महाराणा कुम्भा की सहायता से नागौरपर पुनः अधिकार कर लिया किन्तु शीघ्र ही उसने कुम्भा की शर्त के विपरीत नागौर के किले की मरम्मत करवानी प्रारम्भ कर दी। नाराज कुम्भा ने नागौर पर आक्रमण कर अपना अधिकार कर लिया।

शम्स खाँ ने गुजरात के सुल्तान कुतुबुद्दीन के साथ अपनी लड़की का विवाह कर उससे सहायता की माँग की। इस पर कुतुबुद्दीन मेवाड़ पर आक्रमण के लिए रवाना हुआ। सिरोही के देवड़ा शासक की प्रार्थना पर उसने अपने सेनापति मलिक शहवान को आबू विजय के लिए भेजा और स्वयं कुम्भलगढ़ की तरफ चला। इतिहासकार फरिश्ता के अनुसार राणी से धन मिलने के बाद सुल्तान गुजरात लौट आया। इसी समय कुतुबुद्दीन के सामने महमूद खिलजी के प्रतिनिधि ताज खाँ ने मेवाड़ पर गुजरात – मालवा के संयुक्त आक्रमण की योजना रखी जिसके अनुसार मेवाड़ के दक्षिण भाग पर गुजरात और मेवाड़ के खास भाग वे अहीरवाड़ा पर मालवा का अधिकार होना था।

1456 ई. में चम्पानेर नामक स्थान पर हुई इस आशय की सन्धि के बाद कुतुबुद्दीन आबू पर अधिकार कर चित्तौड़ की तरफ बढ़ा, वहीं महमूद खिलजी ने मालवा की तरफ से मेवाड़ पर आक्रमण किया। फरिश्ता के अनुसार कुम्भा ने धन देकर आक्रमणकारियों को विदा किया जबकि कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति और रसिक प्रिया के अनुसार कुम्भा ने दोनों सुल्तानों को पराजित कर दिया। मुस्लिम शासकों पर विजय के कारण कुम्भा ‘हिन्दू सुरत्राण’ (हिन्दू बादशाह) के रूप में प्रसिद्ध हुआ।

महाराणा कुम्भा की सांस्कृतिक उपलब्धियाँ

कुम्भा एक वीर योद्धा ही नहीं अपितु कलाप्रेमी और विद्यानुरागी शासक भी था। इसकारण उसे ‘युद्ध में स्थिर बुद्धि’ कहा गया है। एक लिंग के माहात्म्य के अनुसार वह वेद, स्मृति, मीमांसा, उपनिषद्, व्याकरण, राजनीति और साहित्य में बड़ा निपुण था। महान संगीत ज्ञाता होने के कारण उसे ‘अभिनव भरताचार्य’ तथा ‘वीणावादन प्रवीणेन’ कहा जाता है। कीर्तिस्तम्भ प्रशस्ति के अनुसार वह वीणा बजाने में निपुण था। संगीत राज, संगीत मीमांसा, संगीत क्रम दीपिका व सूड प्रबन्ध उसके द्वारा लिखे प्रमुख ग्रन्थ हैं।

‘संगीतराज’ के पाँच भाग – पाठ रत्नकोश, गीत रत्न कोश, वाद्यरत्नकोश, नृत्य रत्न कोश और रस रत्न कोश हैं। उसने चण्डीगढ़ की व्याख्या, जयदेव के संगीत ग्रन्थ गीत गोविन्द और शारंगदेव के संगीत रत्नाकर की टीकाएँ भी लिखी। कुम्भ ने महाराष्ट्री (मराठी), कर्णाटी (कन्नड़) तथा मेवाड़ी भाषा में चार नाटकों की रचना की। उसने कीर्ति स्तम्भों के विषय पर एक ग्रन्थ रचना और उसको शिलाओं पर खुदवाकर विजय स्तम्भ पर लगवाया जिसके अनुसार उसने जय और अपराजित के मतों को देखकर इस ग्रन्थ की रचना की थी। उसका ‘कामराज रतिसार’ नामक ग्रन्थ सात अंगों में विभक्त है।

कुम्भा को ‘राणौ रासो’ (विद्वानों का संरक्षक) कहा गया है। उसके दरबार में ‘एकलिंग महात्म्य’ का लेखक कान्ह व्यास तथा प्रसिद्ध वास्तुशास्त्री ‘मण्डन’ रहते थे। मण्डन ने देवमूर्ति प्रकरण (रूपावतार), प्रासाद मण्डन, राजवल्लभ (भूपतिवल्लभ), रूपमण्डन, वास्तुमण्डन, वास्तुशास्त्र और वास्तुकार नामक वास्तु ग्रन्थ लिखे। मण्डन के भाई नाथा ने वास्तुमंजरी और पुत्र गोविन्द ने उद्दारधोरिणी, कलानिधि’ देवालयों के शिखर विधान पर केन्द्रित है जिसे शिखर रचना व शिखर के अंग – उपांगों के सम्बन्ध में कदाचित् एकमात्र स्वतन्त्र ग्रन्थ कहा जा सकता है। आयुर्वेदज्ञ के रूप में गोविन्द की रचना ‘सार समुच्चय’ में विभिन्न व्याधियों के निदान व उपचार की विधियाँ दी गई हैं। कुम्भा की पुत्री रमाबाई को ‘वागीश्वरी’ कहा गया है, वह भी अपने संगीत प्रेम के कारण प्रसिद्ध रही।

कवि ‘मेहा’ महाराणा कुम्भा के समय का एक प्रतिष्ठित रचनाकार था। उसकी रचनाओं में ‘तीर्थमाला’ प्रसिद्ध है। जिसमें 120 तीर्थों का वर्णन है। मेहा कुम्भा के समय के दो सबसे महत्वपूर्ण निर्माण कार्यों कुम्भलगढ़ और रणकपुर जैन मन्दिर के समय उपस्थित था। उसने बताया है कि हनुमान की जो मूर्तियाँ सोजत और नागौर से लाई गई थी, उन्हें कुम्भलगढ़ और रणकपुर में स्थापित किया गया। रणकपुर जैन मन्दिर के प्रतिष्ठा समारोह में भी मेहा स्वयं उपस्थित हुआ था। हीरानन्द मुनि को कुम्भा अपना गुरु मानते थे और उन्हें ‘कविराज’ की उपाधि दी।

कविराज श्यामलदास की रचना ‘वीर विनोद’ के अनुसार मेवाड़ के कुल 84 दुर्गों में से अकेले महाराणा कुम्भा ने 32 दुर्गों का निर्माण करवाया। अपने राज्य की पश्चिमी सीमा के तंग रास्तों को सुरक्षित रखने के लिए नाकाबन्दी की और सिरोही के निकट बसन्ती का दुर्ग बनवाया। मेरों के प्रभाव रोकने के लिए मचान के दुर्ग का निर्माण करवाया। केन्द्रीय शक्ति को पश्चिमी क्षेत्र में अधिक शक्तिशाली बनाने व सीमान्त भागों को सैनिक सहायता पहुँचाने के लिए 1452 ई. में परमारों के प्राचीन दुर्ग के अवशेषों पर अचलगढ़ का पुनर्निर्माण करवाया। कुम्भा द्वारा निर्मित कुम्भलगढ़ दुर्ग का परकोटा 36 किलोमीटर लम्बा है जो चीन की दीवार के बाद विश्व की सबे लम्बी दीवार मानी जाती है। रणकपुर (पाली) का प्रसिद्ध जैन मन्दिर महाराणा कुम्भा के समय में ही धारणकशाह द्वारा बनवाया गया था।

कुम्भा को अपने अन्तिम दिनों में उन्माद का रोग हो गया था और वह अपना अधिकांश समय कुम्भलगढ़ दुर्ग में ही बिताता था। यहीं पर उसके सत्तालोलुप पुत्र उदा ने 1468 ई. में उसकी हत्या कर दी। कुम्भलगढ़ शिलालेख में उसे धर्म और पवित्रता का ‘अवतार’ तथा दानी राजा भोज व कर्ण से बढ़कर बताया गया है। वह निष्ठावान वैष्णव था और यशस्वी गुप्त सम्राटों के समान स्वयं को ‘परम भागवत’ कहा करता था। उसने ‘आदिवाराह’ की उपाधि भी अंगीकार की थी-‘वसन्धुररोद्धरणादिवराहेण’ विष्णु के प्राथमिक अवतार ‘वाराह’ के समान वैदिक व्यवस्था का पुनस्र्थापक था।

1. विजय स्तम्भ:
चित्तौड़ दुर्ग के भीतर स्थित नौ मंजिले और 122 फीट ऊँचे विजय स्तम्भ का निर्माण महाराणा कुम्भा ने मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी पर विजय की स्मृति में करवाया। इसका निर्माण प्रधान शिल्पी ‘जैता’ व उसके तीन पुत्रों – नापा, पोमा और पूंजा की देखरेख में हुआ। अनेक हिन्दू देवी – देवताओं की कलात्मक प्रतिमाएँ उत्कीर्ण होने के कारण विजय स्तम्भ को ‘पौराणिक हिन्दू मूर्तिकला का अनमोल खजाना’ (भारतीय मूर्तिकला का विश्वकोष) कहा जाता है। डॉ. गोपीनाथ शर्मा ने इसे ‘हिन्दू देवी – देवताओं से सजाया हुआ एक व्यवस्थित संग्रहालय’ तथा गौरीशंकर हीरा चन्द ओझा ने ‘पौराणिक देवताओं के अमूल्य कोष’ की संज्ञा दी है।

मुख्य द्वार पर भगवान विष्णु की प्रतिमा होने के कारण विजय स्तम्भ को ‘विष्णुध्वज’ भी कहा जाता है। महाराजा स्वरूप सिंह (1442 – 61 ई.) के काल में इसका पुनर्निर्माण करवाया गया। भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान विजय स्तम्भ ने क्रान्तिकारियों के लिए प्रेरणा स्रोत का कार्य किया। प्रसिद्ध क्रान्तिकारी संगठन अभिनव भारत समिति के संविधान के अनुसार प्रत्येक नए सदस्य को मुक्ति संग्राम से जुड़ने के लिए विजय स्तम्भ के नीचे शपथ लेनी पड़ती थी।

प्रश्न 2.
महाराणा सांगा व बाबर के मध्य संघर्ष का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
पानीपत के प्रथम युद्ध (1526 ई.) में इब्राहीम लोदी को पराजित कर बाबर ने भारत में मुगल साम्राज्य की नींव डाली। शीघ्र ही बाबर और राणा सांगा के बीच संघर्ष प्रारम्भ हो गया। इस संघर्ष के निम्नलिखित कारण थे।

1. सांगा पर वचन भंग का आरोप:
तुर्की भाषा में लिखी अपनी आत्मकथा ‘तुजुक-ए-बाबरी’ में बाबर ने लिखी है कि “सांगा ने काबुल में मेरे पास दूत भेजकर दिल्ली पर आक्रमण करने के लिए कहा, उसी समय सांगा ने स्वयं आगरा पर हमला करने का वायदा किया था किन्तु सांगा अपने वचन पर नहीं रहा। मैंने दिल्ली और आगरा पर अधिकार जमा लिया तो भी सांगा की तरफ से हिलने का कोई चिह्न दृष्टिगत नहीं हुआ।” सांगा पूर्व में इब्राहीम लोदी को अकेला ही दो बार पराजित कर चुका था, ऐसे में उसके विरुद्ध काबुल से बाबर को भारत आमंत्रित करने का आरोप तर्कसंगत प्रतीत नहीं होता।

2. महत्वाकांक्षाओं का टकराव:
बाबर की इब्राहीम लोदी पर विजय के बाद सांगा ने सोचा था कि वह अपने पूर्वज तैमूर तथा अन्य आक्रमणकारियों की भाँति माल लूटकर वापस चला जायेगा किन्तु वह उसको भ्रम था। बाबर सम्पूर्ण भारत में अपना आधिपत्य स्थापित करना चाहता था। ‘हिन्दूपत’ (हिन्दू प्रमुख) सांगा को पराजित करना चाहता था। ‘हिन्दूपत’ (हिन्दू प्रमुख) सांगा को पराजित किए बिना ऐसा सम्भव नहीं था। दोनों का उत्तरी भारत में एक साथ बने रहना ठीक वैसा ही था जैसे एक म्यान में दो तलवार।

3. राजपूत – अफगान मैत्री:
यद्यपि पानीपत के प्रथम युद्ध में अफगान पराजित हो गए थे। इस कार्य के लिए सांगा को उपयुक्त पात्र समझकर अफगानों के नेता हसन खाँ मेवाती और मृतक सुल्तान इब्राहीम लोदी का भाई महमूद लोदी उसकी शरण में पहुँच गए। राजपूत-अफगान मोर्चा बाबर के लिए भय का कारण बन गया। अतः उसने सांगा की शक्ति को नष्ट करने का फैसला कर लिया।

4. सांगा द्वारा सल्तनत के क्षेत्रों पर अधिकार करना:
पानीपत के युद्ध में इब्राहीम लोदी की पराजय से उत्पन्न अव्यवस्था का लाभ उठाते हुए सांगा ने खण्डार दुर्ग (रणथम्भौर के पास) व उसके निकटवर्ती दो सौ गाँवों को अधिकृत कर लिया जिससे वहाँ के मुस्लिम परिवारों को पलायन करना पड़ा।

बाबर और महाराणा सांगा से यद्ध

दोनों शासकों ने भावी संघर्ष को देखते हुए अपनी-अपनी स्थिति सुदृढ़ करनी प्रारम्भ कर दी। मुगल सेनाओं ने बयाना, धौलपुर और ग्वालियर पर अधिकार कर लिया जिससे बाबर की शक्ति में वृद्धि हुई। इधर सांगा के नियन्त्रण में अफगान नेता हसन खाँ मेवाती और. महमूद लोदी, मारवाड़ का मालदेव, आमेर का पृथ्वीराज, ईडर का राजा भारमल, वीरमदेव मेड़तिया, बागड़ का रावल, उदय सिंह, सलूम्बर कारावत रत्न सिंह, चन्देरी को मेदिनीराय, सादड़ी का झाला अज्जा, देवलिया का रावत बाघसिंह और बीकानेर का कुँवर कल्याणमल ससैन्य आ डटे।

फरवरी, 1527 ई. में सांगा रणथम्भौर से बयाना पहुँच गया, जहाँ इस समय बाबर की तरफ से मेंहदी ख्वाजा दुर्ग रक्षक के रूप में तैनात था। सांगा न दुर्ग को घेर लिया जिससे दुर्ग में स्थित मुगल सेना की स्थिति काफी खराब हो गई। बाबर ने बयाना की रक्षा के लिए मुहम्मद सुल्तान मिर्जा की अध्यक्षता में एक सेना भेजी किन्त राजपूतों ने उसे खदेड़ दिया। अन्ततः बयाना पर सांगा का अधिकार हो गया। बयाना विजय बाबर के विरुद्ध सांगा की एक महत्वपूर्ण विजय थी।

इधर बाबर भी तैयारियों में जुटा था किन्तु महाराणा भी तीव्र गति, बयाना की लड़ाई और वहाँ से लौटे हुए शाह मंसूर किस्मती आदि से राजपूतों की वीरता भी प्रशंसा सुनकर चिन्तित हो गया। इसी समय एक मुस्लिम ज्योतिषी मुहम्मद शरीफ ने भविष्यवाणी की कि “मंगल का तारा पश्चिम में है, इसलिए पूर्व से लड़ने वाले पराजित होंगे।” बाबर की सेना की स्थिति पूर्व में ही थी। चारों तरफ निराशा का वातावरण देख बाबर ने अपने सैनिकों को उत्साहित करने के लिए कभी शराब न पीने की प्रतिज्ञा की और शराब पीने की कीमती सुराहियाँ व प्याले तुड़वाकर गरीबों में बाँट दिये। सैनिकों के मजहबी भावों को उत्तेजित करने के लिए उसने कहा- “सरदारों और सिपाहियों ! प्रत्येक मनुष्य, जो संसार में आता है, अवश्य मरता है।

जब हम चले जायेंगे तब एक खुदा ही बाकी रहेगा। जो कोई जीवन का भोग करने बैठेगा, उसको अवश्य मरना भी होगा। जो इस संसार रूपी सराय में आता है, उसे एक दिन यहाँ से विदा भी होना पड़ता है। इसलिए बदनाम होकर जीने की अपेक्षा प्रतिष्ठ के साथ मरना अच्छा है। मैं भी यही चाहता हूँ कि कीर्ति के साथ मृत्यु हो तो अच्छा होगा, शरीर तो नाशवान है। खुदा ने हम पर बड़ी कृपा की है कि इस लड़ाई में हम मरेंगे तो ‘शहीद’ होंगे और जीतेंगे तो ‘गाजी’ कहलायेंगे।

इसलिए सबको कुरान हाथ में लेकर कसम खानी चाहिए कि प्राण रहते कोई भी युद्ध में पीठ दिखाने का विचार न करे।” इसके साथ ही बाबर ने रायसेन के सरदार सलहदी तंवर के माध्यम से सुलह की बात भी चलाई। महाराणा ने इस प्रस्ताव पर अपने सरदारों से बात की किन्तु सरदारों को सलहदी की मध्यस्थता पसन्द नहीं आई। इसलिए उन्होंने अपनी सेना की प्रबलता और बाबर की निर्बलता प्रकट कर सन्धि की बात बनने ने दी।

सन्धि वार्ता का लाभ उठाते हुए बाबर तेजी से अपनी तैयारी करता रहा और खानवा के मैदान में आ डेटा। कविराज श्यामलदास कृत ‘वीर विनोद’ के अनुसार 16 मार्च, 1527 ई. को सुबह खानवा (भरतपुर) के मैदान में युद्ध प्रारम्भ हुआ। पहली मुठभेड़ में बाजी राजपूतों के हाथ लगी किन्तु अचानक सांगा के सिर में एक तीर लगने के कारण उसे युद्ध भूमि से हटना पड़ा। युद्ध संचालन के लिए अब सरदारों ने सलूम्बर के रावत रत्नसिंह चूण्डावत से सैन्य संचालन के लिए प्रार्थना की।

रत्नसिंह ने यह कहते हुए उक्त प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया कि मेरे पूर्वज मेवाड़ का राज्य छोड़ चुके हैं इसलिए मैं एक छड़ के लिए भी राज्य चिह्न धारण नहीं कर सकता परन्तु जो कोई राज्य छत्र धारण करेगा, उसकी पूर्ण रूप से सहायता करूंगा और प्राण रहने तक शत्रु से लडूंगा। इसके बाद झाला अज्जा को हाथी पर बिठाकर युद्ध जारी रखा गया। राजपूतों ने अन्तिम दम तक लड़ने का निश्चय किया किन्तु बाबर की सेना के सामने उनकी एक न चली और उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा। विजय के बाद बाबर ने ‘गाजी’ की पदवी धारण की और विजय – चिह्न के रूप में राजपूत सैनिकों के सिरों की एक मीनार बनवाई।

राणा सांगा की पराजय के कारण

  1. इतिहासकार गौरीशंकर हीराचन्द ओझा के अनुसार सांगा की पराजय का मुख्य कारण बताया विज के तुरन्त बाद ही युद्ध न करके बाबर को तैयारी करने का पूरा समय देना था। लम्बे समय तक युद्ध को स्थगित रखना महाराणा की बहुत बड़ी भूल सिद्ध हुई। महाराणा के विभिन्न सरदार देश – प्रेम के भाव से इस युद्ध में शामिल नहीं हो रहे थे। सभी के अलग – अलग स्वार्थ थे, यहाँ तक कि कइयों में तो परस्पर शत्रुता भी थी। सन्धिवार्ताओं के कारण कई दिन शान्त बैठे रहने से उन्हें युद्ध के प्रति वह जोश व उत्साह नहीं रहा जो युद्ध के लिए रवाना होते समय था।
  2. राजपूत सैनिक परम्परागत हथियारों से युद्ध लड़ रहे थे। वे तीर – कमान, भालों व तलवारों से बाबर भी तोपों के गोलों का मुकाबला नहीं कर सकते हैं।
  3. हाथी पर सवार होकर भी साँगा ने बड़ी भूल की क्योंकि इससे शत्रु को उस पर ठीक निशाना लगाकर घायल करने का मौका मिला। उसके युद्ध भूमि से बाहर जाने से सेना का मनोबल कमजोर हुआ।
  4. राजपूत सेना में एकता और तालमेल का अभाव था क्योंकि सम्पूर्ण सेना अलग – अलग सरदारों के नेतृत्व में एकत्रित हुई थी।
  5. अपनी गतिशीलता के कारण राजाओं की हारती सेना पर बाबर की अश्व सेना भारी पड़ी। बाबर भी तोपों के गोलों से भयभीत हाथी ने पीछे लौटते समय अपनी ही सेना को रौंदकर नुकसान पहुँचाया।

खानवा युद्ध के परिणाम

खानवा के युद्ध में बाबर के विरुद्ध राणा सांगा की पराजय के निम्नलिखित कारण थे

  1. भारत में राजपूतों की सर्वोच्चता का अन्त हो गया। राजपूतों का वह प्रताप सूर्य जो भारत के गगन के उच्च स्थान पर पहुँच कर लोगों में चकाचौंध कर रहा था, अब अस्तांचल की ओर खिसकने लगा।
  2. मेवाड़ की प्रतिष्ठा और शक्ति के कारण निर्मित राजपूत संगठन इस पराजय के साथ ही समाप्त हो गया।
  3. भारतवर्ष में मुगल साम्राज्य स्थापित हो गया और बाबर स्थिर रूप से भारत का बादशाह बन गया।

प्रश्न 3.
दुर्गादास राठौर के जीवन – चरित्र व उपलब्धियों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
1. जीवन चरित्र:
दुर्गादास का जन्म 1638 ई. में सालवा गाँव में हुआ था। वे जोधपुर के महाराजा जसवन्त सिंह की सेवा में रहने वाले आसकरण की तीसरी पत्नी के सन्तान थे। आसकरण को मारवाड़ में सालवा की जागीर मिली हुई थी और कालान्तर में ‘मुहणौत नैणसी’ के बाद उसे मारवाड़ का प्रधानमन्त्री भी नियुक्त किया गया था। अपनी पत्नी से प्रेम न रहने के कारण उसने पत्नी, पुत्र दोनों को अलग कर दिया। बालक दुर्गादास अपनी माता के साथ लूणावे गाँव में रहकर खेती-बाड़ी द्वारा गुजारा चलाने लगा। 1655 ई. में आपसी कहा-सुनी के बाद उसने अपने खेत से होकर सांडनियाँ (मादा ऊँट) ले जाने पर राजकीय चरवाहे को मार डाला। खबर मिलने पर महाराजा ने आसकरण से सफाई माँगी।

आसकरण ने कहा कि उसके सब बेटे राज्य की सेवा में है और गाँव में कोई बेटा नहीं है। तब महाराजा ने दुर्गादास को बुलाकर सारी बात पूछी। दुर्गादास ने अपना अपराध स्वीकार करते हुए कहा कि उक्त चरवाहे की लापरवाही के कारण न केवल किसानों की फसल नष्ट हो रही थी अपितु उसने आपके दुर्ग को भी अपशब्दों के साथ ‘बिना छज्जे का धोका ढूंढ़ा’ (बिना छत का सफेद खण्डहर) कहा। इस कारण मैंने उसकी हत्या कर दी। पूरी जानकारी प्राप्त कर महाराजा ने आसकरण से जब यह पूछा कि ‘तुम तो कहते थे कि गाँव में मेरा कोई बेटा नहीं है’

तो आसकरण ने कहा कि कपूत को बेटों में नहीं गिनते। महाराजा जसवन्त सिंह बोले, “यह आपका भ्रम है। यही कभी डगमगाते हुए मारवाड़ को कंधा देगा” और इसके बाद दुर्गादास को अपनी सेवा में रख लिया। 1667 ई. में दुर्गादास को बारह हजार रुपये की वार्षिक आय वाले पाँच गाँव-झांवर, समदड़ी, जगीसा, कोठड़ी, आम्बा-रो-बाड़ो और अमरसर प्रदान किए गए। कालान्तर में जसवन्त सिंह द्वारा मारवाड़ के रायमल बालो, जवणदेसर और बांभसेण गाँवों के साथ रोहतक परगने का लुणोद गाँवं भी दुर्गादास को जागीर के रूप में दिया गया।

2. जोधपुर पर शाही नियन्त्रण स्थापित होना:
महाराज जसवन्त सिंह और मुगल बादशाह औरंगजेब के बीच प्रायः विरोध की स्थिति बनी रही। इस कारण औरंगजेब ने जसवन्त सिंह को मारवाड़ से बहुत दूर जमरुद (अफगानिस्तान) के थाने पर नियुक्त कर दिया। 1678 ई. में जमरुद्ध में जसवन्त सिंह की मृत्यु की खबर सुनते ही औरंगजेब के मुँह से निकल पड़ा- “दरवाजा-ए-कुफ्र शिकस्त” (आज मजहब विरोध का दरवाजा टूट गया)।

पर जब महल में बेगम ने यह हाल सुनी तो कहा- “आज शोक का दिन है कि बादशाह का ऐसा स्तम्भ टूट गया।” जसवन्त सिंह की मृत्यु के बाद औरंगजेब ने जोधपुर को खालसा घोषित कर ताहिर खाँ को फौजदार, खिदमत गुजार खाँ को किलेदार, शेर अनवर को अमीन और अब्दुर्रहीम को कोतवाल बनाकर प्रबन्ध के लिए नियुक्त कर दिया।

मारवाड़ पर पूरी तरह नियन्त्रण स्थापित हो जाने के बाद खानजहाँ बहादुर मन्दिरों के तोड़ने से एकत्रित हुई मूर्तियों को गाड़ियों मे भरवाकर अप्रैल, 1679 ई. में दिल्ली पहुँच गया। बादशाह ने उसकी बड़ी प्रशंसा की और मूर्तियाँ दरबार के जलूखाने (आंगन) तथा जुमा मस्जिद की सीढ़ियों के नीचे डाली जाने की आज्ञा दी ताकि ये लोगों के पैरों के नीचे कुचली जा सकें।

26 मई, 1679 ई. को औरंगजेब ने इन्द्रासिंह (जसवन्त सिंह के बड़े भाई अमर सिंह का पौत्र) को जोधपुर को राज्य, राजा का खिताब, खिलअत, जड़ाऊ साज की तलवार, सोने के साज सहित घोड़ा, हाथी झण्डा और नक्कारा दिया। उसने भी बादशाह को छत्तीस लाख रुपये की पेशकशी देना स्वीकार कर लिया। इन्द्रसिंह न तो जोधपुर का प्रबन्ध कर पाया और न वहाँ होने वाले उपद्रवों को शान्त कर पाया जिसके कारण बादशाह ने लगभग दो माह बाद ही उसे वापस बुला लिया।

3. अजीत सिंह की सुरक्षा:
जसवन्त सिंह की मृत्यु के बाद राठौड़ सरदार उनकी दोनों गर्भवती रानियों को लेकर जमरुद से रवाना हुए किन्तु शाही परवाना न होने के कारण अटक नदी पर अफसरों ने उन्हें रोक लिया। इन अफसरों से लड़ाई कर राठौड़ दल ने अटक नदी पार किया। वहीं दोनों रानियों ने 19 फरवरी, 1679 ई. को आधे घण्टे के अन्तराल पर क्रमशः अजीत सिंह और दलथंभन नामक पुत्रों को जन्म दिया। जोधपुर की ख्यात के अनुसार इन कुंवरों के जन्म का समाचार मिलने पर बादशाह ने व्यंग्य से मुस्कराते हुए कहा कि, “बन्दा कुछ सोचता है और खुदा उससे ठीक उल्टा करता है।” शाही आज्ञा से इन बालकों को वहाँ से दिल्ली ले जाया गया।

दिल्ली में दोनों कुंवरों व रानियों को किशनगढ़ के राजा रूपसिंह की हवेली में ठहराया गया। बादशाह की नीयत साफ न देखकर राठौढ़ रणछोड़दास, भाटी रघुनाथ, राठौड़ रूपसिंह, राठौड़ दुर्गादास आदि सरदारों ने फैसला किया कि यहाँ रहकर मरने में कोई लाभ नहीं, यदि जिन्दा रहे तो संघर्ष कर जोधपुर पर अधिकार कर लेंगे। इसलिए प्रमुख – प्रमुख राठौड़ सरदारों को दिल्ली से जोधपुर भेजने का फैसला किया गया। इस योजना का एक लाभ तो यह था कि जोधपुर पहुँचने वाले सरदार वहाँ अपनी शक्ति संगठित कर सकेंगे, वहीं बादशाह को उनकी अपने प्रति स्वामिभक्ति पर भी शक नहीं होगा। इतिहासकार गोपीनाथ शर्मा के अनुसार इस सम्पूर्ण योजना के पीछे दुर्गादास का मस्तिष्क ही था।

जब राठौड़ सरदार एक – एक कर दिल्ली से विदाई लेने लगे तो औरंगजेब ने इसकी शक्ति कम होती देख राज परिवार के प्रति अधिक कठोर नीति अपनानी प्रारम्भ कर दी। उसने कोतवाल फौलाद खाँ को आदेश दिया कि राठौड़ रानियों और राजकुमारों को रूपसिंह की हवेली से हटाकर नूरगढ़ पहुँचा दिया जाए और अगर राठौड़ इससे आनाकानी करें तो उन्हें दण्ड दिया जाये। सौभाग्य से इसके एक दिन पहले ही दुर्गादास और चाम्पावत सोनिंग अजीत सिंह को लेकर मारवाड़ के लिए निकल गए थे। बादशाह को जब राजकुमारों के भागने की खबर लगी तो उसने पीछा करने का आदेश दिया। दुर्गादास ने मार्ग में शाही सेना को रोक दिया जिसके कारण अजीत सिंह सुरक्षित जोधपुर पहुँचने में सफल रहा। इधर बादशाह ने एक जाली अजीतसिंह का नाम मोहम्मदी राज रखकर अपनी पुत्री जैबुन्निशा को परवरिश के लिए सौंप दिया।

4. राठौड़ – सिसौदिया गठबन्धन:
अजीत सिंह को लेकर मारवाड़ के सरदार जोधपुर पहुँचे किन्तु जोधपुर पर शाही अधिकार हो जाने के कारण वे अजीत सिंह की सुरक्षा को लेकर चिन्तित थे। इस कारण बालक अजीतसिंह को उनकी विमाता देवड़ाजी की सलाह पर कालिन्द्री (सिरोही) भेज दिया गया। यहाँ उसे पुष्करण ब्राह्मण जयदेव के संरक्षण में रखा गया और सुरक्षा के लिए गुप्त रूप से मुकुन्ददास खची को नियुक्त कर दिया गया।

महाराजा जसवन्त सिंह की सबसे बड़ी रानी जसवन्त दे बूंदी के राव छत्रसाल की पुत्री थी। उसकी सौतेली बहन कानन कुमारी का विवाह महाराणा राजसिंह के साथ हुआ था। इस कारण दुर्गादास ने काननकुमारी के माध्यम से उनके बहनोई महाराणा राजसिंह के पास अजीतसिंह को सुरक्षा देने की प्रार्थना भिजवाई। पूरे मामले से मेवाड़ की सुरक्षा भी जुड़ी हुई थी। इस कारण राजसिंह ने प्रार्थना को स्वीकार करते हुए अजीत सिंह को बारह गाँवों सहित केलवे का पट्टा दे दिया। ओरंगजेब को जब इस बात की जानकारी मिली तो उसने महाराणा के पास फरमान भेजकर अजीत सिंह की माँग की किन्तु महाराणा ने उस पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया।

5. शाहजादा अकबर का विद्रोह:
दुर्गादास ने महाराणा राजसिंह के साथ मिलकर शाहजादे मुअज्जम (जो दरबारी के पास उदय सागर पर ठहरा हुआ था) को बादशाह के खिलाफ खड़ा करने का प्रयत्न किया किन्तु मुअज्जम अपनी माता नवाब बाई की सलाह के कारा राजपूतों की इस योजना से सहमत नहीं हुआ। इसके बाद उन्होंने शाहजादा अकबर को अपने पक्ष में मिलाने का प्रयास किया। यद्यपि इसी दौरान अक्टूबर, 1680 ई. में महाराणा राजसिंह की मृत्यु हो गई किन्तु नये महाराणा जयसिंह के साथ भी यह वार्ता चलती रही। इसका परिणाम यह हुआ कि एक जनवरी, 1681 ई. को अकबर ने नाडोल में स्वयं को बोदशाह घोषित कर दिया और राजपूत सेना का साथ लेकर औरंगजेब के विरुद्ध अजमेर के लिए रवाना हो गया।

औरंगजेब की सेना ने अजमेर के पास दौराई नामक स्थान पर पड़ाव डाल रखा था। 15 जनवरी को औरंगजेब ने छल-कपट का सहारा लेते हुए अकबर के मुख्य सेनापति तहव्वर खाँ (अजमेर का फौजदार जो औरंगजेब का साथ छोड़कर अकबर के साथ हो गया था) को उसके ससुर इनायत खाँ (बादशाह का सेनापति) के द्वारा इस आशय का खत लिखाकर अपने पास बुलाया कि यदि वह चला आयेगा तो उसका अपराध क्षमा कर दिया जाएगा, अन्यथा उसकी स्त्रियाँ सबके सामने अपमानित की जायेंगी और बच्चे कुत्तों के मूल्य पर गुलामों के तौर पर बेच दिए जाएँगे। इस धमकी के कारण तहव्वर खाँ सोते हुए अकबर और दुर्गादास को सूचित किए बिना ही औरंगजेब के पास चला आया, जहाँ शाही नौकरों ने उसे मार डाला।

इसके बाद औरंगजेब ने अकबर और राजपूतों के बीच विरोध पैदा करने के लिए एक और चाल चली। उसने एक जाली पत्र अकबर के नाम इस आशय का लिखा कि तुमने राजपूतों के साथ खूब धोखा किया है और उन्हें मेरे सामने लाकर बहुत ही प्रशंसनीय कार्य किया है। अब तुम्हें चाहिए कि उन्हें हरावल (युद्ध में सेना का सबसे आगे वाला भाग) में रखो, जिससे कल प्रात:काल के युद्ध में उन पर दोनों तरफ से हमला किया जा सके। यह पत्र किसी तरह दुर्गादास के डेरे के पास पहुँचा दिया गया जिसे पढ़ते ही उसके मन में खटका हो गया। दुर्गादास उसी समय अकबर के डेरे पर गया किन्तु अर्द्धरात्रि के समय उसे किसी भी दशा में जगाने की आज्ञा नहीं थी।

इसके बाद उसने तहव्वर खाँ को बुलाने के लिए आदमी भेजे तो पता चला कि वह तो बादशाह के पास जा चुका है। ऐसे में उसका सन्देह विश्वास में बदल गया और प्रातः काल होने से पहले ही राजपूत सेना अकबर का सामान लूटते ही मारवाड़ की तरफ चली गई। सुबह अकबर अपने को अकेला पाकर राजपूतों के पीछे भागा। दो दिन तक वह निराश्रित जान बचाता भागता रहा। तब दुर्गादास को औरंगजेब की चाल समझ में आई। उसने अकबर को अपने साथ लिया और सुरक्षित मराठा राज्य में पहुँचाया।

6. दुर्गादास को मारने का प्रयास:
जोधपुर में विद्रोह की सम्भावना से भयभीत औरंगजेब ने 1701 ई. में शहजादे आजम को लिखा कि दुर्गादास को शाही सेवा में भेजने का प्रयत्न करें या उसे मार डालें। आजम ने धोखे से दुर्गादास को गिरफ्तार करने का प्रयास किया किन्तु सन्देह का पूर्व ज्ञान हो जाने के कारण दुर्गादास बच निकला। मारवाड़ में पहुँच कर दुर्गादास मुगल क्षेत्रों में खुल्लमखुल्ला विद्रोह करने लगा।

7. महाराजा अजीत सिंह व दुर्गादास के बीच अनबन:
शिशु अजीत सिंह को औरंगजेब की चंगुल से बचाने का सर्वाधिक श्रेय दुर्गादास को ही है। दिल्ली से सुरक्षित निकालने के बाद दुर्गादास की योजनानुसार ही उसे गुप्त स्थान पर रखा गया था। अप्रैल, 1687 ई. में दक्षिण से लौटने पर दुर्गादास यह जानकर काफी व्यथित हुआ कि उसके निर्देशों के बावजूद उसके मारवाड़ लौटने से पहले ही 23 मार्च, 1687 ई.को अज्ञातवास से निकाल कर अजीत सिंह को पालड़ी गाँव (सिरोही) में सावर्जनिक किया जा चुका है। इस समय तक दुर्गादास से अप्रसन्न राठौड़ सामन्त अजीत सिंह के आसपास एकत्र हो चुके थे।

अब दुर्गादास की स्थिति में परिवर्तन आ गया और वह अजीत सिंह के भाग्य को निर्धारित करने वाले केन्द्रीय शक्ति नहीं। रहा। इस कारण उसने दूर रहकर बदलती हुई परिस्थितियों को समझने का फैसला किया। अक्टूबर, 1687 ई. में अजीत सिंह ने भीमरलाई गाँव में दुर्गादास से मिलकर गिले-शिकवे दूर किए। 1707 ई. में औरंगजेब की मृत्यु की खबर मिलने के बाद अजीतसिंह ने जोधपुर के नायब फौजदार जाफरकुली को भगाकर अपने पैतृक राज्य पर कब्जा कर लिया। यह आक्रमण इतनी जल्दी हुआ कि किले में मौजूद कुछ मुसलमानों को जान बचाने के लिए हिन्दुओं का वेश बनाकर भागना पड़ा।

जोधपुर राज्य की ख्यात में लिखा है कि सांभर विजय (3 अक्टूबर, 1708 ई.) के बाद वहाँ डेरे होने पर दुर्गादास ने अपनी सेना सहित अलग डेरा किया। महाराजा ने उसे मिसल (सरदारों की पंक्ति) में डेरा करने को कहा तो उसने उत्तर दिया कि मेरी तो उमर अब थोड़ी रह गई है, मेरे पीछे के लोग मिसल में डेरा करेंगे। अजीत सिंह के व्यवहार से आहत दुर्गादास मेवाड़ के महाराणा अमर सिंह द्वितीय की सेवा में चला गया और वहाँ से बुलाने पर भी जोधपुर नहीं लौटा।

अजीत सिंह ने दुर्गादास की अभिरक्षा में अकबर के बच्चों की सुरक्षा करने वाले रघुनाथ सांचोरा को सार्वजनिक रूप से कोड़े मारकर अपमानित किया और काल कोठरी में भूखा – प्यासा रखकर मरने के लिए बाध्य कर दिया (अक्टूबर, 1707 ई.)। जुलाई, 1708 ई. में अपने महामन्त्री मुकुन्ददास चम्पावत तथा उसके भाई रघुनाथ चम्पावत की हत्या करवा दी। इतिहासकार रघुवीर सिंह के अनुसार इन घटनाओं से दुर्गादास को अहसास हो गया कि अगली बारी उसी की है।

8. अन्तिम समय:
महाराणा अमर सिंह द्वितीय ने उसे विजयपुर की जागीर देकर अपने पास रखा और उसके लिए पाँच सौ रुपये रोजाना नियत कर दिए। बाद में वह रामपुरा का हाकिम नियत किया गया, जहाँ रहते हुए 22 नवम्बर, 1718 ई. में उज्जैन में उसकी मृत्यु हो गई। उसका अन्तिम संस्कार क्षिप्रा नदी के तट पर किया गया, जहाँ आज भी उनकी छतरी बनी दुर्गादास का मूल्यांकन – शाहजहाँ के पुत्रों के बीच हुए उत्तराधिकार युद्ध के दौरान दुर्गादास ने महाराजा जसवन्त सिंह के साथ धरमत के युद्ध में भाग लिया था।

दुर्गादास के सम्पर्क में रहे समकालीन लेखक कुम्भकर्ण सांदू की रचना ‘रतनरासो’ में इस युद्ध के दौरान दुर्गादास की वीरता का वर्णन करते हुए कहा गया है कि, “दुर्गादास राठौड़ ने एक के बाद एक चार घोड़ों की सवारी थी और जब चारों एक-एक कर मारे गए तो अन्त में वह पाँचवें घोड़े पर सवार हुआ, लेकिन यह पाँचवाँ घोड़ा भी मारा गया। तब तक न केवल उसके सारे हथियार टूट चुके थे बल्कि उसका शरीर भी बुरी तरह से घायल हो चुका था। अन्ततः वह भी रणभूमि में गिर पड़ा। ऐसा लगता था कि जैसे एक और भीष्म शरशैय्या पर लेटा हुआ हो। जसवन्त सिंह के आदेश से घायल दुर्गादास को युद्ध-स्थल से हटा लिया गया और जोधपुर भेज दिया गया।”

दुर्गादास एक कुशल कूटनीतिज्ञ था। उसने न केवल अजीत सिंह की रक्षा की अपितु जोधपुर के सिंहासन पर आसीन भी किया। इसके लिए उसने न केवल मेवाड़ के महाराणा राजसिंह के साथ मिलकर ‘राठौर-सिसौदिया गठबन्धन’ किया अपितु शाहजादा अकबर को बादशाह के विरुद्ध विद्रोह के लिए प्रेरित भी किया। अकबर का विद्रोह असफल होने के बाद उसे दक्षिण में सुरक्षित ले गया और उसके ईरान जाने तक साथ ही रहा। अकबर के पुत्र बुलन्द अख्तर और पुत्री सफी यतुन्निसा को न केवल अपने पास रखकर दुर्गादास ने मित्रता निभाई, वान् अपने धर्म दर्शन ‘सर्वपन्थ समादर’ को परिचय भी दिया।

उसने दोनों बच्चों की देख-रेख और शिक्षा-दीक्षा की भी ठीक वैसी ही व्यवस्था की जो कि एक सुन्नी मतावलम्बी के लिए आवश्यक होती है। अवसर आने पर उन्हें सम्मानपूर्वक बादशाह के पास भेज दिया। दुर्गादास ने अपने इन्हीं वीरोचित् गुणों द्वारा औरंगजेब जैसे पाषाण हृदय व्यक्ति का दिल जीत लिया और मनसब प्राप्त किया। कर्नल जेम्स टॉड ने उसे ‘राठौड़ों का यूलीसैस’ कहा है। राजस्थान के प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. गौरीशंकर हीराचन्द्र ओझा ने ‘जोधपुर राज्य का इतिहास’ का दूसरा खण्ड दुर्गादास राठौड़ को ही समर्पित किया है।

प्रश्न 4.
चित्तौड़ पर अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के कारणों का उल्लेख करते हुए पद्मनी की कहानी अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
रावल समर सिंह की मृत्यु के बाद 1302 ई. में मेवाड़ के सिंहासन पर उसका पुत्र रत्नसिंह (1302 ई. से 1303 ई.) बैठा। रत्न सिंह को केवल एक वर्ष ही शासन करने का अवसर मिला जो दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के चित्तौड़ पर आक्रमण के लिए प्रसिद्ध है।

अलाउद्दीन खिलजी के चित्तौड़ पर आक्रमण के कारण:

अलाउद्दीन खिलजी के चित्तौड़ पर आक्रमण के निम्न कारण थे-
1. अलाउद्दीन खिलजी की साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा:
अलाउद्दीन खिलजी एक महत्वाकांक्षी और साम्राज्यवादी शासक था। वह सिकन्दर के समान विश्व विजेता बनना चाहता था जिसका प्रमाण उसकी उपाधि ‘सिकन्दर सानी’ (द्वितीय सिकन्दर) थी। दक्षिण भारत की विजय और उत्तर भारत पर अपने अधिकार को स्थायी बनाये रखने के लिए राजपूत राज्यों को जीतना आवश्यक था। चित्तौड़ पर उसका आक्रमण इसी नीति का हिस्सा था।

2.  मेवाड़ की बढ़ती हुई शक्ति:
जैत्रसिंह, तेजसिंह और समर सिंह जैसे पराक्रमी शासकों के काल में मेवाड़ की सीमाओं में लगातार वृद्धि होती जा रही थी। इल्तुतमिश, नासिरुद्दीन महमूद और बलबन जैसे सुल्तानों ने मेवाड़ की इस बढ़ती शक्ति पर लगाम लगाने का प्रयास किया, किन्तु वे पूरी तरह सफल नहीं हुए। 1299 ई. में मेवाड़ के रावल समर सिंह ने गुजरात अभियान के लिए जाती हुई शाही सेना का सहयोग करना तो दूर, उल्टे उससे दण्ड वसूल करके ही आगे जाने दिया। अलाउद्दीन खिलजी उस घटना को भूल नहीं पाया था।

3. चित्तौड़ का भौगोलिक एवं सामरिक महत्व:
दिल्ली से मालवा, गुजरात तथा दक्षिण जाने वाला प्रमुख मार्ग चित्तौड़ के पास से ही गुजरता था। इस कारण अलाउद्दीन खिलजी के लिए मालवा, गुजरात और दक्षिण भारत पर राजनीतिक एवं व्यापारिक प्रभुत्व बनाए रखने के लिए चित्तौड़ पर अधिकार करना आवश्यक था। मौर्य राजा चित्रांगद द्वारा निर्मित चित्तौड़ को दुर्ग अभी तक किसी भी मुस्लिम आक्रमणकारी द्वारा जीता नहीं जा सका था। यह भी अलाउद्दीन खिलजी के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती थी।

4. पद्मनी को प्राप्त करने की लालसा:
कुछ इतिहासकारों के अनुसार अलाउद्दीन खिलजी मेवाड़ के शासक रत्नसिंह की सुन्दर पत्नी पद्मनी को प्राप्त करना चाहता था। उसने रत्नसिंह को सन्देश भिजवाया कि वह सर्वनाश से बचना चाहता है तो अपनी पत्नी पद्मनी को शाही हरम में भेज दे। रत्न सिंह द्वारा इस प्रस्ताव को अस्वीकार किए जाने पर अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ पर आक्रमण कर दिया। शेरशाह सूरी के समय 1540 ई. के लगभग लिखी गई मलिक मुहम्मद जायसी की रचना ‘पद्मावत्’ के अनुसार इस आक्रमण का कारण पद्मनी को प्राप्त करना ही था।

अलाउद्दीन खिलजी का आक्रमण

28 जनवरी, 1303 को दिल्ली से रवाना होकर अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ को घेर लिया। रत्नसिंह ने शाही सेना को मुँह तोड़ जवाब दिया जिसके कारण दो माह की घेरेबन्दी के बाद भी शाही सेना कोई सफलता अर्जित नहीं कर पाई। ऐसी स्थिति में सुल्तान को अपनी रणनीति में परिवर्तन करना पड़ा। उसने दुर्ग की दीवार के पास ऊँचे-ऊँचे चबूतरों का निर्माण करवाया और उन पर ‘मंजनिक’ तैनात करवाये। किले की दीवार पर भारी पत्थरों के प्रहार शुरु हुए किन्तु दुर्भेद्य दीवारें टस से मस नहीं हुई। लम्बे घेरे के कारण दुर्ग में खाद्यान्न सामग्री नष्ट होने लग गई थी। चारों तरफ सर्वनाश के चिह्न दिखाई देने पर राजपूत सैनिक किले के द्वार खोलकर मुस्लिम सेना पर टूट पड़े। भीषण संघर्ष में रत्नसिंह वीरगति को प्राप्त हुआ और उधर पद्मनी के नेतृत्व में चित्तौड़ का पहला जौहर हुआ।

इस प्रकार 26 अगस्त, 1303 ई. को चित्तौड़ पर अलाउद्दीन खिलजी को अधिकार हो गया। अगले दिन सुल्तान ने अपने सैनिकों को आम जनता के कत्लेआम का आदेश दिया। इस अभियान के दौरान मौजूद अमीर खुसरो ने अपनी रचना ‘खजाईन-उल-फुतूह’ (तारीखे अलाई) में लिखा है कि एक ही दिन में लगभग तीस हजार असहाय लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया। अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ का नाम बदलकर ‘खिज़ाबाद’ कर दिया और अपने बेटे खिज्रखाँ को वहाँ का प्रशासन सौंपकर दिल्ली लौट आया। खिज्र खाँ ने गम्भीरी नदी पर एक पुल का निर्माण करवाया। उसने चित्तौड़ की तलहटी में एक मकबर बनवाया जिसमें लगे हुए एक फारसी लेख में अलाउद्दीन खिलजी को ईश्वर की छाया और संसार का रक्षक कहा गया है।

1. पद्मनी की कहानी:
सिंहल द्वीप (श्रीलंका) में गन्धर्व सेन नामक राजा था। उसकी पटरानी चम्पावती से पद्मनी नामक एक अत्यन्त रूपवती कन्या उत्पन्न हुई। उसके पास हीरामन नाम का एक सुन्दर और चतुर तोता था। एक दिन वह पिंजरे से उड़ गया और एक बहेलिए द्वारा पकड़ा जाकर एक ब्राह्मण के हाथ बेचा गया। उस ब्राह्मण ने उसको चित्तौड़ के राजा रत्नसिंह को एक लाख रुपये में बेच दिया। रत्नसिंह की रानी नागमती ने एक दिन श्रृंगार कर तोते से पूछा-क्या मेरी जैसी सुन्दरी जगत् में कोई है? इस पर तोते ने उत्तर दिया कि जिस सरोवर में हंस नहीं आया वहाँ बगुला ही हंस कहलाता है। रत्नसिंह तोते के मुख से पद्मनी के रूप, गुण आदि की प्रशंसा सुनकर उस पर मुग्ध हो गया और योगी बनकर तोते सहित सिंहल को चला।

अनेक संकट सहता हुआ वह सिंहल द्वीप पहुँचा। तोते ने पद्मनी के सम्मुख रत्नसिंह के रूप, कुल, ऐश्वर्य, तेज आदि की प्रशंसा कर कहा कि तेरे योग्य वर तो यही है और वह तेरे प्रेम से मुग्ध होकर यहाँ आ पहुँचा है। बसन्त पंचमी के दिन वह बन ठन करे उस मन्दिर में गई, जहाँ रत्नसिंह ठहरा हुआ था। वहाँ दोनों एक-दूसरे को देखते ही परस्पर प्रेमबद्ध हो गए। अन्त में गन्धर्वसेन ने उसके वंश आदि का हाल जानकर दोनों का विवाह कर दिया। विवाह के बाद रत्नसिंह पद्मनी के साथ अपनी राजधानी चित्तौड़ लौट आया।

रत्नसिंह द्वारा मेवाड़ से निकाले गए राघव चेतन नामक तान्त्रिक ने अपने अपमान का बदला लेने के लिए दिल्ली जाकर सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के समक्ष पद्मनी के रूप की तारीफ की और उसे चित्तौड़ पर आक्रमण करने के लिए प्रोत्साहित किया। इस पर अलाउद्दीन खिलजी चित्तौड़ पर चढ़ आया। आठ वर्ष तक घेरा डालने के पश्चात् भी जब सुल्तान चित्तौड़ को नहीं जीत पाया तो उसने प्रस्ताव रखा कि यदि उसे पद्मनी का प्रतिबिम्ब ही दिखा दिया जाये तो वह दिल्ली लौट जायेगा।

राणा ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। दर्पण में पद्मनी का प्रतिबिम्ब देखकर जब अलाउद्दीन खिलजी वापस लौट रहा था, उस समय उसने रत्नसिंह को कैद कर लिया और रिहाई के बदले पद्मनी की माँग की। सारा वृत्तान्त ज्ञात होने पर पद्मनी ने राणा को छुड़ाने की योजना बनाई और अलाउद्दीन के पास अपनी सोलह सौ सहेलियों के साथ आने का प्रस्ताव भेजा। प्रस्ताव स्वीकार होने पर पद्मनी सहेलियों के स्थान पर पालकियों में राजपूत योद्धाओं को बैठाकर रवाना हो गई। दिल्ली के पास पहुँचकर शाही हरम में शामिल होने से पहले उसने अन्तिम बार अपने पति से मिलने की इच्छा प्रकट की जिसे सुल्तान द्वारा स्वीकृति दे दी गई।

जब दोनों पति-पत्नी मिल रहे थे उसी समय राजपूत योद्धा सुल्तान की सेना पर टूट पड़े और उन्हें सुरक्षित चित्तौड़ निकाल दिया। अलाउद्दीन को दल का पता लगा तो उसने ससैन्यं राजपूतों का पीछा किया। रत्नसिंह अपने सेनानायकों गोरा व बादल के साथ लड़ता हुआ मारा गया और पद्मनी ने जौहर किया। पद्मनी की कहानी का ऐतिहासिक उल्लेख मलिक मुहम्मद जायसी की रचना ‘पद्मावत’ में किया गया है। इसके बाद अबुल फजल (अकबरनामा), फरिश्ता (गुलशन-ए-इब्राहिमी), हाजी उद्दवीर (जफरुलवली), कर्नल टॉड (एनल्स एण्ड एन्टिक्वीटिज ऑफ राजस्थान), फ्रांसीसी यात्री मनूची (स्टीरियो डी मेगोर) तथा गुहणौत नैणसी (नैणसी री ख्यात) ने भी इस कहानी का कुछ हेर-फेर के साथ उल्लेख किया है। बूंदी के प्रसिद्ध कवि सूर्यमल्ल मिश्रण व कुछ आधुनिक इतिहासकारों ने पद्मनी की कहानी की ऐतिहासिकता को स्वीकार नहीं किया है।

प्रश्न 5.
महाराणा प्रताप द्वारा किए गए मुगल प्रतिरोध को मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर:
महाराणा प्रताप का जीवन व राज्यारोहण-महाराणा प्रताप का जन्म वि. सं. 1597, ज्येष्ठ शुक्ला तृतीय (9 मई, 1540 ई.) को कुम्भलगढ़ दुर्ग में हुआ। वे मेवाड़ के महाराणा उदयसिंह के ज्येष्ठ पुत्र थे तथा उनकी माँ का नाम जैवन्ताबाई (जीवन्त कंवर या जयवन्ती बाई) था किन्तु उदय सिंह की एक अन्य रानी धीर कंवर थी। धीर कंवर अपने पुत्र जगमाल को मेवाड़ की गद्दी पर बैठाने के लिए उदयसिंह को राजी करने में सफल रही। उदय सिंह की मृत्यु के बाद जगमाल ने स्वयं को मेवाड़ का महाराजा घोषित कर दिया किन्तु सामन्तों ने प्रताप का समर्थन करते हुए उसे मेवाड़ के सिंहासन पर बैठा दिया। इस प्रकार होली के त्यौहार के दिन 28 फरवरी, 1572 ई. को गोगुंदा में महाराणा प्रताप का राजतिलक हुआ।

महाराणा प्रताप के राज्यारोहण के समय मेवाड़ की स्थितियाँ काफी खराब थी। मुगलों के साथ चलने वाले दीर्घकालीन युद्धों के कारण मेवाड़ की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो चुकी थी। चित्तौड़ सहित मेवाड़ के अधिकांश भागों पर मुगलों का अधिकार हो चुका था और अकबरे मेवाड़ के बचे हुए क्षेत्र पर भी अपना अधिकार करना चाहता था।

इस समय के चित्तौड़ के विध्वंस और उसकी दीन दशा को देखकर कवियों ने उसे ‘आभूषण रहित विधवा स्त्री’ की उपमा तक दे दी थी। शासक बनने पर प्रताप ने आमेर, बीकानेर, जैसलमेर जैसी रियासतों की तरफ अकबर की अधीनता स्वीकार न कर मातृभूमि की स्वाधीनता को महत्व दिया और अपने वंश की प्रतिष्ठा के अनुकूल संघर्ष का मार्ग चुना। मेवाड़ पर मुगलों के आक्रमणों से प्रताप के अन्य सामन्तों के साहस में कमी आने लगी।

ऐसी स्थिति में प्रताप ने सब सामन्तों को एकत्रित कर उनके सामने रघुकुल की मर्यादा की रक्षा करने और मेवाड़ को पूर्ण स्वतन्त्र करने का विश्वास दिलाया और प्रतिज्ञा की कि जब तक मेवाड़ को स्वतन्त्र नहीं करा लँगा तब तक राजमहलों में नहीं रहूँगा, पलंग पर नहीं सोऊँगा और पंचधातु (सोना, चाँदी, ताँबा और पीतल, काँसी) के बर्तनों में भोजन नहीं करूंगा। आत्मविश्वास के साथ मेवाड़ के स्वामिभक्त सरदारों तथा भीलों की सहायता से शक्तिशाली सेना का संगठन किया ओर मुगलों से अधिक दूर रहकर युद्ध का प्रबन्ध करने के लिए अपनी राजधानी गोगुंदा से कुम्भलगढ़ स्थानान्तरित की।

अकबर को प्रताप द्वारा मेवाड़ राज्य में उसकी सत्ता के विरुद्ध किए जा रहे प्रयत्नों की जानकारी मिलने लगी। अतः अकबर ने पहल करते हुए प्रताप के राज्यारोहण के वर्ष से ही उसे अधीनता स्वीकार करवाने के लिए एक के बाद एक चार दूत भेजे। महाराणा प्रताप के सिंहासन पर बैठने के छः माह बाद सितम्बर, 1572 ई. में अकबर ने अपने अत्यन्त चतुर वाक्पटु दरबारी जलाल खाँ कोरची के साथ सन्धि – प्रस्ताव भेजा। अगले वर्ष अकबर ने प्रताप को अपने अधीन करने के लिए क्रमशः तीन अन्य दरबारी – मान सिंह, भगवन्तदास और टोडरमल भेजे किन्तु प्रताप किसी भी कीमत पर अकबर की अधीनता स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हुआ।

1. हल्दीघाटी का युद्ध:
मेवाड़ पर आक्रमण की योजना को कार्य रूप में परिणत करने के लिए मार्च, 1576 ई. में अकबर स्वयं अजमेर जा पहुँचा। वहीं पर मानसिंह को मेवाड़ के विरुद्ध भेजी जाने वाली सेना का सेनानायक घोषित किया। 13 अप्रैल, 1576 ई. को मानसिंह सेना लेकर मेवाड़ विजय के लिए चल पड़ा। दो माह माण्डलगढ़ में रहने के बाद अपने सैन्य बल में वृद्धि कर मानसिंह खमनौर गाँव के पास आ पहुँचा। इस समय मानसिंह के साथ गाजी खाँ व बख्शी, ख्वाजा गयासुद्दीन अली, आसिफ खाँ, जगन्नाथ कछवाह, सैय्यद राजू मिहत्तर खाँ, भगवतदास का भाई माधोसिंह, मुजाहिद बेग आदि सरदार उपस्थित थे।

मुगल इतिहास में यह पहला अवसर था जब किसी हिन्दू को इतनी बड़ी सेना का सेनापति बनाकर भेजा गया था। मानसिंह को मुगल सेना का प्रधान सेनापति बनाये जाने से मुस्लिम दरबारियों में नाराजगी फैल गई। बदायूँनी ने अपने संरक्षक नकीब खाँ से भी इस युद्ध में चलने के लिए कहा तो उसने उत्तर दिया कि “यदि इस सेना का सेनापति एक हिन्दू न होता, तो मैं पहला व्यक्ति होता जो इस युद्ध में शामिल होता।”

ग्वालियर के राजा रामशाह और पुराने अनुभवी योद्धाओं ने राय दी कि मुगल सेना के अधिकांश सैनिकों को पर्वतीय भाग में लड़ने का अनुभव नहीं है। अत: उनको पहाड़ी भाग में घेरकर नष्ट कर देना चाहिए। किन्तु युवा वर्ग ने इस राय को चुनौती देते हुए इस बात पर जोर दिया कि मेवाड़े के बहादुरों को पहाड़ी भाग से बाहर निकलकर शत्रु सेना को खुले मैदान में पराजित करना चाहिए। अन्त में मानसिंह ने बनास नदी के किनारे मोलेला में अपना शिविर स्थापित किया तथा प्रताप ने मानसिंह से छः मील दूर लोसिंग गाँव में पड़ाव डाला।

मुगल सेना में टहरावल (सेना का सबसे आगे वाला भाग) का नेतृत्व सैय्यद हाशिम कर रहा था। उसके साथ मुहम्मद बादख्शी रफी, राजा जगन्नाथ और आसफ खाँ थे। प्रताप की सेना के दो भाग थे, प्रताप की सेना के हरावल में हकीम खाँ सूरी, अपने पुत्रों सहित ग्वालियर का रामशाह, पुरोहित गोपीनाथ, शंकरदास, चारणजैसा, पुरोहित जगन्नाथ, सलूम्बर का चूड़ावत कृष्णदास, सरदारगढ़ का भीमसिंह, देवगढ़ को रावत सांगा, जयमल मेड़तिया का पुत्र रामदास आदि शामिल थे। दूसरे भाग का नेतृत्व सेना के केन्द्र में रहकर स्वयं महाराणा कर रहे थे जिनके साथ भामाशाह व उनका भाई ताराचन्द था।

18 जून, 1576 ई. को प्रात:काल प्रताप ने लोसिंग से हल्दीघाटी में गोगुन्दा की ओर बढ़ती सेना का सामना करने का निश्चय कर कूच किया। युद्ध के प्रथम भाग में मुगल सेना का बल तोड़ने के लिए राणा ने अपने हाथी लूना को आगे बढ़ाया जिसका मुकाबला मुगल हाथी गजमुख (गजमुक्ता) ने किया। गजमुख घायल होकर भागने ही वाला था कि लूना का महावत तीर लगने से घायल हो गया और लूना लौट पड़ा। इस पर महाराणा के विख्यात हाथी रामप्रसाद को मैदान में उतारना पड़ा।

युद्ध का प्रारम्भ प्रताप की हरावल सेना के भीषण आक्रमण से हुआ। मेवाड़ के सैनिकों ने अपने तेज हमले और वीरतापूर्ण युद्ध-कौशल द्वारा मुगल पक्ष की अग्रिम पंकित व बायें पाश्र्व को छिन्न-भिन्न कर दिया। बदायूँनी के अनुसार इस हमले से घबराकर मुगल सेना लूणकरण के नेतृत्व में भेड़ों की झुण्ड की तरफ भाग निकली। इस समय जब प्रताप के राजपूत सैनिकों और मुगल सेना के राजपूत सैनिकों के मध्ये फर्क करना कठिन हो गया तो बदायूँनी ने यह बात मुगल सेना के दूसरे सेनापति आसफ खाँ से पूछी।

आसफ खाँ ने कहा कि, “तुम तो तीर चलाते जाओ। राजपूत किसी भी ओर का मारा जाये, इससे इस्लाम का तो लाभ ही होगा।” मानसिंह को मुगल सेना का सेनापति बनाने का बदायूँनी भी विरोधी था, किन्तु जब उसने मानसिंह को प्रताप के विरुद्ध बड़ी वीरता और चातुर्य से लड़ते देखा तो प्रसन्न हो गया। युद्ध के दौरान सैय्यद हाशिम घोड़े से गिर गया और आसफ खाँ ने पीछे हटकर मुगल सेना के मध्य भाग में जाकर शरण ली। जगन्नाथ कछवाहा भी मारा जाता किन्तु उसकी सहायता के लिए चन्दावल (सेना में सबसे पीछे की पंक्ति) से सैन्य टुकड़ी लेकर माधोसिंह कछवाहा आ गया।

मुगल सेना के चन्दाबल में मिहतर खाँ के नेतृत्व में आपातस्थिति के लिए सुरक्षित सैनिक टुकड़ी रखी गई थी। अपनी सेना को भागते देख मिहतर खाँ आगे की ओर चिल्लाता हुआ आया कि “बादशाह सलामत एक बड़ी सेना के साथ स्वयं आ रहे हैं। इसके बाद स्थिति बदल गई और भागती हुई मुगल सेना नये उत्साह और जोश के साथ लौट पड़ी। राणा प्रताप अपने प्रसिद्ध घोड़े चेतक पर सवार होकर लड़ रहा था और मानसिंह ‘मरदाना’ नामक हाथी पर सवार था। रण छोड़ भट्ट कृत संस्कृत ग्रन्थ ‘अमरकाव्य’ में वर्णन है कि प्रताप ने बड़े वेग के साथ चेतक के अगले पैरों को मानसिंह के हाथी के मस्तक पर टिका दिया और अपने भाले से.मानसिंह पर वार किया।

मानसिंह ने हौदे में नीचे झुककर अपने को बचा लिया किन्तु उसका महावंत मारा गया। इस हमले में मानसिंह के हाथी की सँड़ पर लगी तलवार से चेतक का एक अगला पैर कट गया। प्रताप को संकट में देखकर बड़ी सादड़ी के झाला बीदा ने राजकीय छत्र स्वयं धारण कर युद्ध जारी रखा और प्रताप ने युद्ध को पहाड़ों की ओर मोड़ लिया। हल्दी घाटी से कुछ दूर बलीचा नामक स्थान पर घायल चेतक की मृत्यु हो गई, जहाँ उसका चबूतरा आज भी बना हुआ है। हल्दी घाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप की तरफ से हकीम खाँ सूरी, झाला बीदा, मानसिंह सोनगरा, जयमल मेड़तिया का पुत्र रामदास, रामशाह और उसके तीन पुत्र (शालिवाहन, भवानी सिंह व प्रताप सिंह) वीरता का प्रदर्शन करते हुए मारे गए। सलूम्बर का रावत कृष्णदास चूड़ावत, घाड़ेराव का गोपालदास, भामाशाह, ताराचन्द्र आदि रणक्षेत्र में बचने वाले प्रमुख सरदार थे।

जब युद्ध पूर्ण गति पर था, तब प्रताप ने युद्ध स्थिति में परिवर्तन किया। युद्ध को पहाड़ी की ओर मोड़ दिया। मानसिंह ने मेवाड़ी सेना का पीछा नहीं किया। मुगलों द्वारा प्रताप की सेना का पीछा न करने के बदायूँनी ने तीन कारण बताये हैं-

  1. जून माह की झुलसाने वाली तेज धूप।
  2. मुगल सेना की अत्यधिक थकान से युद्ध करने की क्षमता ने रहना।
  3. मुगलों को भय था कि प्रताप पहाड़ों में घात लगाए हुए हैं और उसके अचानक आक्रमण से अत्यधिक सैनिकों का जीवन खतरे में पड़ जाएगा।

इस तरह अकबर की इच्छानुसार वह न तो प्रताप को पकड़ सका अथवा मार सका और न ही मेवाड़ की सैन्य-शक्ति का विनाश कर सका। अकबर का यह सैन्य अभियान असफल रहा तथा पासा महाराणा प्रताप के पक्ष में था। युद्ध के परिणाम से खिन्न अकबर ने मानसिंह और आसफ खाँ की कुछ दिनों के लिए ड्योढ़ी बन्द कर दी अर्थात् उनको दरबार में सम्मिलित होने से वंचित कर दिया।

शहंशाह अकबर की विशाल साधन सम्पन्न सेना का गर्व मेवाड़ी सेना ने ध्वस्त कर दिया। जब राजस्थान के राजाओं में मुगलों के साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित कर उनकी अधीनता मानने की होड़ मची हुई थी, उस समय प्रताप द्वारा स्वतन्त्रता का मार्ग चुनना नि:सन्देह सराहनीय कदम था।

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