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RBSE Solutions for Class 11 Chemistry

RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 14 पर्यावरणीय रसायन

July 3, 2019 by Prasanna Leave a Comment

RBSE Class 11 Chemistry Chapter 14 1

Rajasthan Board RBSE Class 11 Chemistry Chapter 14 पर्यावरणीय रसायन

RBSE Class 11 Chemistry Chapter 14 पाठ्यपुस्तक के अभ्यास प्रश्न

RBSE Class 11 Chemistry Chapter 14 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
PAN का अर्थ है?
(अ) परऑक्सी ऐल्डीहाइड नाइट्रेट
(ब) परऑक्सी अमोनियम नाइट्रेट
(स) परऑक्सी ऐसीटाइल नाइट्रेट
(द) कोई नहीं

प्रश्न 2.
कणीय वायु प्रदूषक है –
(अ) क्लोरीन
(ब) कोयला
(स) अमोनिया
(द) उपरोक्त सभी

प्रश्न 3.
वैश्विक तापन का प्रमुख कारण है –
(अ) अम्ल वर्षा
(ब) नाभिकीय दुर्घटनाएँ
(स) तेजी से गर्मी पड़ना
(द) हरित गृह प्रभाव

प्रश्न 4.
CFC’s का प्रयोग किया जाता है।
(अ) प्रशीतकों में
(ब) प्लास्टिक निर्माण में
(स) बिजली के उपकरणों में
(द) उपरोक्त सभी में

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में से ग्रीन हाउस गैस नहीं है –
(अ) CO2
(ब) CH4
(स) COCl2
(द) N2O

प्रश्न 6.
ओजोन में ऑक्सीजन के परमाणुओं की संख्या होती है –
(अ) 3
(ब) 2
(स) 1
(द) 4

उत्तरमाला:
1. (स)
2. (ब)
3. (द)
4. (अ)
5. (स)
6. (अ)

RBSE Class 11 Chemistry Chapter 14 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 7.
ग्रीन हाउस प्रभाव से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
पृथ्वी के वातावरण में उपस्थित कार्बन डाइऑक्साइड, मेथेन तथा नाइट्रस ऑक्साइड गैसें दीर्घ तरंग दैर्ध्व वाली ताप विकिरणों को वायुमण्डल से बाहर नहीं जाने देतीं, इससे तापमान में होने वाली वृद्धि को हरित गृह प्रभाव कहते हैं।

प्रश्न 8.
अम्ल वर्षा के लिए उत्तरदायी कौनसी गैसें हैं?
उत्तर: सल्फर डाइऑक्साइड (SO2) तथा नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO2).

प्रश्न 9.
ओजोन कवच को प्रभावित करने वाली प्रमुख गैस कौनसी है?
उत्तर: फ्रेऑन अर्थात् क्लोरोफ्लुओरो कार्बन।

प्रश्न 10.
स्मॉग किन अवयवों के मिलने से बनता है?
उत्तर: स्मॉग, स्मोक तथा फोग (धुआँ तथा कोहरे) के मिलने से बनता है।

प्रश्न 11.
पृथ्वी के वायुमण्डल में किस गैस की मात्रा सर्वाधिक है?
उत्तर: पृथ्वी के वायुमण्डल में नाइट्रोजन गैस की मात्रा सर्वाधिक है।

प्रश्न 12.
मुख्य औद्योगिक वायु प्रदुषक कौनसे हैं?
उत्तर: मुख्य औद्योगिक वायु प्रदूषक सल्फर, नाइट्रोजन कार्बन के ऑक्साइड तथा हाइड्रोकार्बन हैं। जो कि क्रमशः SO2, SO3, NO, NO2CO तथा CO2 हैं।

प्रश्न 13.
ग्रीन हाउस प्रभाव के लिए कौन सी गैस उत्तरदायी है?
उत्तर: कार्बन डाइऑक्साइड, मेथेन, नाइट्रस ऑक्साइड, जल वाष्प तथा क्लोरोफ्लुओरो कार्बन (फ्रेऑन) ग्रीन हाउस प्रभाव के लिए उत्तरदायी है।

प्रश्न 14.
जल प्रदूषण कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर: जल प्रदूषण तीन प्रकार के होते हैं –

  • रोगजनक
  • प्राकृतिक स्रोतों से
  • मानव जनित स्रोतों से।

RBSE Class 11 Chemistry Chapter 14 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 15.
वायु प्रदूषण के मुख्य स्रोत कौनसे हैं?
उत्तर: वायु प्रदूषण के मुख्य स्रोत दो प्रकार के होते हैं –

  1. कणीय
  2. गैसीय

1. कणीय – वाष्प कण कोहरा, ऐरोसोल, धुआं, धूल, कज्जल, धूम्र, धूमिका तथा सूक्ष्म बूंदें कणीय प्रदूषक हैं।
2. गैसीय –

  • अकार्बनिक गैसें – क्लोरीन, कार्बन डाइऑक्साइड, ओजोन, हाइड्रोजन सल्फाइड, अमोनिया, नाइट्रिक ऑक्साइड, सल्फर के ऑक्साइड तथा कार्बन मोनोऑक्साइड आदि।
  • कार्बनिक पदार्थ ऐल्डिहाइड ऐसीटिलीन, प्रोपेन, मेथेन, एथेन, हाइड्रोकार्बन, ऐल्कोहॉल इत्यादि।

प्रश्न 16.
स्मॉग किस प्रकार बनता है तथा इसके कुप्रभाव क्या हैं?
उत्तर:
धूम कोहरा ‘धूम’ तथा ‘कोहरा’ दो शब्दों से मिलकर बना है, अर्थात् यह इन दोनों का मिश्रण है। (स्मोग = स्मोक + फोग) सामान्य धूम कोहरा (अपचायक धूम कोहरा) ठण्डी तथा नम जलवायु में उत्पन्न होता है तथा यह धूम, कोहरे एवं सल्फर डाइऑक्साइड का मिश्रण होता है। प्रकाश रासायनिक धूम कोहरा (ऑक्सीकारक स्मॉग) ऊष्ण, शुष्क एवं साफ जलवायु में बनता है। यह स्वचालित वाहनों एवं कारखानों से निकलने वाले नाइट्रोजन के ऑक्साइडों तथा हाइड्रोकार्बनों पर सूर्य के प्रकाश की क्रिया के कारण उत्पन्न होता है।
प्रकाश रासायनिक धूम – कोहरे के कुप्रभाव –

  • यह धातुओं, पत्थरों, भवन – निर्माण सामग्री तथा रंगी हुयी सतहों का संक्षारण करता है।
  • ओजोन तथा नाइट्रिक ऑक्साइड नोक एवं गले में जलन पैदा करते हैं।
  • इनकी उच्व सान्द्रता से सरदर्द, छाती में दर्द, गले का शुष्क होना, खाँसी एवं श्वास अवरोध हो सकता है।
  • यह पौधों पर हानिकारक प्रभाव डालता है।

प्रश्न 17.
अम्ल वर्षा का क्या अर्थ है तथा यह पर्यावरण प्रदूषण को किस प्रकार प्रभावित करती है?
उत्तर:
अम्ल वर्षा – जब वर्षा जल की pH 5.6 से कम हो जाती है, तो इसे अम्ल वर्षा कहते हैं। अम्लीय वर्षा के निम्नलिखित दुष्प्रभाव होते हैं, अत: यह पर्यावरण प्रदूषण को प्रभावित करती है –

  1. जलीय प्राणियों की मृत्यु।
  2. पेड़ – पौधों की वृद्धि के गिरावट।
  3. तांबा, सीसा आदि घातक तत्त्वों का जल में मिल जाना।
  4. मिट्टी की अम्लीयता में वृद्धि तथा मिट्टी में उपस्थित पोषक तत्त्वों (Ca, K, Fe, Mn) का अम्ल वर्षा के साथ बहकर जाना जिससे, मृदा की उर्वरा शक्ति में गिरावट होना।
  5. संगमरमर तथा चूने के पत्थर की बनी इमारतों तथा स्मारकों जैसे आगरा में स्थित ऐतिहासिक इमारत ताजमहल आदि पर अम्ल वर्षा का अत्यधिक प्रभाव पड़ता है क्योंकि सल्फ्यूरिक अम्ल तथा नाइट्रिक अम्ल दोनों ही संगमरमर को घोलकर क्रमश: CaSO4 तथा Ca(NO3)2 बनाते हैं।
    CaCO3 + H2SO4 → CaSO4 + CO2 + H2O
    CaCO3 + 2HNO3 → Ca(NO3)2 + CO2 + H2O
    ये लवण जल के साथ धीरे – धीरे बह जाते हैं अतः इन स्मारकों का धीरे – धीरे क्षरण होता जा रहा है।

प्रश्न 18.
ग्रीन हाऊस प्रभाव क्या है तथा यह जीवन को किस प्रकार प्रभावित करता है?
उत्तर:
पृथ्वी के वातावरण में मौजूद कार्बन डाइऑक्साइड, मेथेन तथा नाइट्रस ऑक्साइड आदि गैसें दीर्घ तरंग दैर्ध्व वाली ताप विकिरणों को वायुमण्डल से बाहर नहीं जाने देतीं। इस कारण तापमान में होने वाली वृद्धि को हरित गृह प्रभाव कहते हैं। पृथ्वी से होने वाला ताप का परावर्तन दीर्घ तरंगों द्वारा होता है जो वायुमण्डल में उपस्थित बादलों, जल वाष्प, कार्बन डाइऑक्साइड गैस आदि द्वारा सोख लिया जाता है। अतः आकाश स्वच्छ रहने पर पृथ्वी से दीर्घ तरंगीय विकिरण सुगमता से हो जाता है और निचले वायुमण्डल में तापमान बढ़ने नहीं पाता है। किन्तु मेघाच्छादित आकाश रहने पर विकिरण की दीर्घ तरंगें उसे पार नहीं कर पाती हैं तथा जलवाष्प, धूलकण, कार्बन डाईऑक्साइड आदि उसे वापस नीचे की ओर लौटा देते हैं। पृथ्वी के समीप वायुमण्डल में तापमान उसी प्रकार सुरक्षित रहता है जिस प्रकार शीशा (कांच) से आवरित पौधघर में हरे पौधों के लिए तापमान आरक्षित रहता है।
ग्रीन हाउस प्रभाव का जीवन पर प्रभाव –

  1. प्रदूषण के बढ़ने से वायुमण्डल में हरित गृह प्रभाव को बढ़ाने वाली गैसों में वृद्धि हुई जिसके कारण पृथ्वी के तापमान में भी वृद्धि हुई।
  2. अध्ययनों से यह ज्ञात हुआ है कि पृथ्वी की सतह का औसत तापमान पिछले 100 वर्षों में 0.08°C बढ़ गया है। जिसके कारण महासागरों का तापीय विस्तार हो गया है। परिणामस्वरूप सागर जल के स्तर में 12 से 27 सेंटीमीटर की वृद्धि हो गयी है।
  3. हरित गृह प्रभाव से मौसम चक्र का संतुलन बिगड़ने की संभावना है।
  4. तापमान के बढ़ने से बर्फ पिघलती है जिससे मानव जीवन को खतरा हो सकता है।
  5. खाद्यान्नों के उत्पादन पर भी इसका प्रभाव पड़ता है।
  6. इससे बहुत से संक्रामक रोग जैसे डेंगू, मलेरिया इत्यादि में वृद्धि हो जाती है।

प्रश्न 19.
ओजोन परत के अपक्षय के क्या प्रभाव हैं?
उत्तर:
ओजोन परत के अपक्षय के कारण होने वाले प्रभाव निम्न प्रकार हैं –
ओजोन परत के क्षय के कारण अधिकाधिक पराबैंगनी विकिरण क्षोभमण्डल में आते हैं, जिनके कारण त्वचा को जीर्णन, मोतियाबिंद, सनबर्न, त्वचा – कैंसर जैसी बीमारियाँ होती हैं तथा इससे पादपप्लवकों की मृत्यु एवं मत्स्य उत्पादन में कमी होती है। पौधों के प्रोटीन पराबैंगनी विकिरणों से आसानी से प्रभावित हो जाते हैं, जिससे कोशिकाओं में हानिकारक उत्परिवर्तन होते हैं, जिसके कारण पत्तियों के रन्ध्रों से जल का वाष्पीकरण बढ़ जाता है, अतः मिट्टी की नमी कम हो जाती है। बढ़े हुए पराबैंगनी विकिरण रंगों एवं रेशों को भी हानि पहुँचाते हैं, जिससे रंग जल्दी हल्के हो जाते हैं। पराबैंगनी विकिरणों से शिशुओं में भी विकृति उत्पन्न हो जाती है तथा न्यूक्लिक अम्ल को भी क्षति पहुँचती है।

प्रश्न 20.
जल प्रदूषण का पादपों पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
जल प्रदूषण का पादपों पर पड़ने वाला प्रभाव निम्न हैं –

  • जल में ऑक्सीजन वातावरण से या जलीय पौधों द्वारा प्रकाश संश्लेषण द्वारा पहुँचती है। रात्रि में प्रकाश संश्लेषण रुक जाता है किन्तु पौधे श्वसन करते रहते हैं जिससे जल में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। जल में यदि अधिक कार्बनिक पदार्थ उपस्थित हो तो सारी उपलब्ध ऑक्सीजन उपयोग में आ जाएगी जिससे जलीय जीवों तथा पादपों की मृत्यु हो सकती है। वायु जीवाणु (ऑक्सीजन की आवश्यकता वाले) कार्बनिक अपशिष्टों का विघटन करके जल को ऑक्सीजन रहित बना देते हैं।
  • मनुष्य प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कीटों, कवकों, खरपतवारों, सूक्ष्म जीवों आदि को नष्ट करने के लिए पीड़कनाशी का उपयोग करता है। इनसे जीव – जन्तु एवं पेड़ – पौधों में कई प्रकार के हानिकारक परिवर्तन दिखाई देने लगे हैं। इनके उपयोग से सम्पूर्ण खाद्य श्रृंखला एवं खाद्य चक्र ही प्रदूषित हो रहा है।

प्रश्न 21.
औद्योगिक बहिःस्त्राव क्या होता है तथा यह पर्यावरण को किस प्रकार प्रदूषित करता है।
उत्तर:
औद्योगिक इकाइयों द्वारा उत्पन्न विभिन्न प्रकार के अपशिष्ट वायुमण्डल, जल और मृदा को प्रदूषित करते हैं। औद्योगिक अपशिष्ट की श्रेणी उद्योग के प्रकार पर निर्भर करती है। अधिकतर प्रदूषक उद्योगों से निकलने वाले उत्प्रवाहियों से प्राप्त होते हैं, जिनमें कार्बनिक पदार्थ, अकार्बनिक लवण, निलंबित ठोस, उर्वरक आदि उपस्थित होते हैं। ये सभी ऊष्मा, जीवाणु एवं रोगजनकों के रूप में बाहर निकलते हैं। राजस्थान में जहाँ थर्मल पावर प्लांट है जैसे रावतभाटा (कोटा) से निकलने वाले उत्प्रवाही ऊष्मा, भारी धातुएँ, घुलनशील ठोस एवं अकार्बनिक पदार्थ होते हैं। जयपुर, कोटपूतली एवं अन्य स्थानों पर पेपर तथा पल्प उद्योगों द्वारा जो औद्योगिक उत्प्रवाही निकलते हैं वे जल की pH को प्रभावित करते हैं एवं COD, BOD के संतुलन को अनियमित करते हैं। जहाँ रबर उद्योग है वे क्लोराइड निलंबित घुलनशील ठोस उत्प्रवाही के रूप में वातावरण में मिश्रित करते हैं। स्टील उद्योग जो कि भिवाड़ी व अन्य औद्योगिक क्षेत्रों में उपस्थित है उनसे – अम्ल फीनोल, सायनोजन, लाइमस्टोन, तेलीय पदार्थ, सायनाइड, सायनेट आदि प्रदूषक के रूप में निकलते हैं।

ऑयल रिफाइनरीज के द्वारा अम्ल, ऐल्कली, रेजिन्स और पेट्रो ऑयल प्रदूषक के रूप में निकाले जाते हैं। पेस्टीसाइडस जो कि सभी बड़े शहरों के आस – पास पाए जाते हैं उनमें ऐरोमैटिक पदार्थ, अम्ल एवं कार्बनिक द्रव्य होते हैं। राजस्थान के जयपुर, उदयपुर एवं अन्य शहरों में सांश्लेषिक औषधियाँ तथा पूर्ववर्ती अणु बनाए जाते हैं, जिससे कई तरह के प्रदूषक वायुमण्डल, जल तथा मृदा को प्रदूषित कर रहे हैं। राजस्थान के सभी शहरों के औद्योगिक क्षेत्रों में कार्बनिक रसायन उद्योग स्थापित हैं जिनसे कई विषाक्त पदार्थ जैसे – फीनोल, अम्ल एवं क्षार प्रदूषक के रूप में निकलते हैं। जयपुर, उदयपुर, कोटा एवं अन्य शहरों में उर्वरक उद्योगों के द्वारा निकलने वाले अपशिष्टों में अमोनिया, फ्लोराइड्स, कार्बनिक पदार्थ, पोटैशियम, नाइट्रोजन तथा फॉस्फोरस के यौगिक होते हैं। राजस्थान के बहुत से शहरों में स्थापित डेयरी उद्योग अपशिष्ट के रूप में ग्रीसेज, वसाएँ, लेक्टोज, गलनीय ठोस एवं प्रोटीन्स उत्पन्न करते हैं। उदयपुर, राजसमन्द एवं अन्य जिलों में मार्बल उद्योग के कारण उत्पन्न मार्बल स्लरी मृदा तथा पानी का प्रदूषण करती है। भीलवाड़ा एवं अन्य टेक्सटाइल नगरों में रंग, फीनोल, फाइबर आदि का प्रदूषण व्याप्त है।

RBSE Class 11 Chemistry Chapter 14 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 22.
जल प्रदूषण के मुख्य स्रोत कौनसे हैं? जल प्रदूषण को नियंत्रित करने हेतु क्या उपाय किये जा सकते हैं?
उत्तर:
जल प्रदूषण परिभाषा:
प्राकृतिक जल में किसी अवांछित बाह्य पदार्थ (अपशिष्ट) की उपस्थिति जिससे जल की गुणवत्ता में कमी आती है, उसे जल प्रदूषण कहते हैं।
जल प्रदूषण के स्रोत दो प्रकार के होते हैं –

  1. बिन्दु स्रोत
  2. अबिन्दु स्रोत।

1. प्रदूषण के आसानी से ज्ञात स्रोतों या स्थानों को बिन्दु स्रोत कहते हैं। जैसे – नगरपालिका पाइप या औद्योगिक अपशिष्ट विसर्जन पाइप, जहाँ से प्रदूषक जलस्रोत में प्रवेश करते हैं।
2. जल प्रदूषण के अबिन्दु स्रोत वे हैं जहाँ पर प्रदूषण के स्रोत को आसानी से नहीं पहचाना जा सके, जैसे – कृषि अपशिष्ट (खेतों, जानवरों तथा कृषि भूमि से), अम्ल वर्षा, तीव्र जल निकासी (गलियों, उद्यानों तथा लॉन) इत्यादि। नीचे दी गयी सारणी में जल के मुख्य प्रदूषक तथा उनके स्रोत दिए गए हैं –
मुख्य जल प्रदूषक तथा उनके स्रोत
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 14 पर्यावरणीय रसायन img 1

जल प्रदूषण के कारण:
जल का प्रदूषण मानवजनित तथा प्राकृतिक कारणों से होता है जो कि निम्न प्रकार हैं –
1. रोगजनक –
सबसे ज्यादा गम्भीर जल प्रदूषक रोग कारकों को रोगजनक कहते हैं। ये जीवाणु तथा अन्य जीव होते हैं। जो घरेलू सीवेज एवं पशु अपशिष्ट द्वारा जल में प्रवेश करते हैं। इश्चरेशिया कोलाई (एशारिकिआ कोलाई), स्ट्रेप्टोकॉकस फिकेलिस आदि जीवाणु मानव अपशिष्ट में होते हैं जिनसे जठरांत्र बीमारियाँ होती हैं।
2. प्राकृतिक स्रोतों से जल प्रदूषण –
जल प्रदूषण के प्राकृतिक स्रोतों के अन्तर्गत जन्तुओं का मल, पेड़ – पौधों और जन्तुओं के अवशेष, विभिन्न प्रकार के खनिज पदार्थों का खानों से निकलकर जल में मिश्रित होना, मृदाअपरदन इत्यादि आते हैं। बहते हुए जल में कई बार विषैली धातुएँ जैसे आर्सेनिक, सीसा, कैडमियम, पारा इत्यादि की मात्रा अधिक हो जाती है तो जल जहरीला हो जाता है।
3. मानवजनित स्रोतों से जल प्रदूषण –

(a) घरेलू अपशिष्ट पदार्थ –
(i) घरों से निकलने वाले अपशिष्ट में सड़े फल, सब्जियों के छिलके, पत्तियाँ, घास, कूड़ा – करकट, साबुन, अपमार्जक आदि होते हैं। सामान्यतया ये गंभीर प्रदूषण नहीं करते किन्तु आजकल इनमें कीटनाशक, फीनोल तथा अम्लीय पदार्थ उपस्थित होने से जल प्रदूषित और जहरीला हो रहा है।
(ii) जल में उपस्थित कणीय पदार्थ, अत्यन्त सूक्ष्म अघुलनशील पदार्थ, कोलॉइड, कार्बोहाइड्रेट, वसा, प्रोटीन, घुलनशील अपद्रव्य एवं सूक्ष्म जीव पाए जाते है। रसोईघरों, स्नानघरों तथा शौचालयों से निकलने वाली गंदगी भी प्रदूषक के रूप में रहती है।
(iii) जल की अधिक मात्रा का उपयोग, कारखानों में पानी की मांग, वस्त्र, कागज तथा रसायन उद्योगों में पानी की खपत दिन – प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। प्रयोग के पश्चात् जल दूषित हो जाता है। इस तरह औद्योगीकरण की प्रगति के साथ – साथ जल प्रदूषण भी बढ़ता जा रहा है।
(iv) घरों तथा उद्योगों से निकले प्रदूषित जल को नदियों, नहरों तथा नालों में छोड़ दिया जाता है जिससे पानी के ये स्रोत प्रदूषित होते जा रहे हैं।
(v) नाइट्रोजन व फॉस्फोरस की मात्रा बढ़ने से तालाबों तथा समुद्रों में शैवालों की संख्या बढ़ रही है जिससे प्राकृतिक संतुलन बिगड़ने लगा है। जल में फ्लुओराइड की मात्रा अधिक होने से अस्थि रोग बढ़ने लगे हैं।

(b) वाहित मल द्वारा प्रदूषण – घरों, सार्वजनिक शौचालयों एवं नली नालों के किनारें, मानव एवं पशुओं के मल – मूत्र से प्रदूषित जल को वाहित मल या सीवेज कहते हैं। वाहित मल अधिकतर जैविक प्रदूषकों से युक्त होते हैं। इस संदूषण से विभिन्न बीमारियाँ जैसे हैजा, पेचिश, पीलिया, टाइफाइड, आंत्र शोध, अमीबायसिस आदि होने की संभावना रहती है।

(c) औद्योगिक बहिःस्राव द्वारा प्रदूषण – औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाली घुलनशील गैसें तथा रसायन जल की बड़ी मात्रा को प्रदूषित करके अनुपयोगी बना रहे हैं।

(d) ताप द्वारा प्रदूषण – ताप बिजलीघर एवं अन्य रिएक्टरों के गर्म हो जाने पर तालाबों और बांधों के जल से ठण्डा करने की प्रक्रिया के कारण जल स्रोतों के ताप में वृद्धि हो जाती है। इससे जैविक संतुलन बिगड़ जाता है।

(e) कृषि अपशिष्ट द्वारा प्रदूषण – खेती में अधिक पैदावार प्राप्त करने के लिए रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक जीवाणुनाशक आदि का उपयोग अधिक मात्रा में किया जा रहा है। इससे जल प्रदूषण बढ़ रहा है। कृषि क्षेत्र में उपर्युक्त रासायनिक पदार्थों में आर्सेनिक, सीसा, कैल्शियम, मर्करी गंधक, तांबा तथा फॉस्फोरस के यौगिक होते हैं।

(f) पीड़कनाशियों द्वारा प्रदूषण – मनुष्य प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कीटों, कवकों, खरपतवारों, सूक्ष्म जीवों आदि को नष्ट करने के लिए पीड़कनाशी का उपयोग करता है। इनसे जीव – जन्तु एवं पेड़ – पौधों में कई प्रकार के हानिकारक परिवर्तन दिखाई देने लगे हैं। इनके उपयोग से सम्पूर्ण खाद्य श्रृंखला एवं खाद्य चक्र ही प्रदूषित हो रहा है।

(g) जैविक प्रदूषण – विभिन्न प्रकार के जीवाणु जल में उपस्थित रह कर दूसरे जीवों में बीमारियाँ उत्पन्न करके उन्हें नुकसान पहुंचाते हैं। बैक्टीरिया की बहुत अधिक संख्या जल में कार्बनिक पदार्थों का अपघटन करती है। ये जल में विलेय ऑक्सीजन का उपयोग करते हैं लेकिन जल में विलेय ऑक्सीजन की मात्रा सीमित होती है। ठण्डे जल में घुली हुई ऑक्सीजन की सान्द्रता 10 ppm तक होती है, जबकि वायु में यह लगभग 2 लाख ppm होती है। इसी कारण जल में थोड़े से कार्बनिक पदार्थ के अपघटित होने पर भी इसमें ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। जल में घुली हुई ऑक्सीजन जलीय जीवन के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। जब जल में घुली हुई ऑक्सीजन की सान्द्रता 6 ppm से कम हो जाती है, तो मछलियों का विकास रुक जाता है।

जल में ऑक्सीजन या तो वातावरण से या कई जलीय पौधों द्वारा होने वाले प्रकाश – संश्लेषण द्वारा पहुँचती है। रात में पौधों के श्वसन के कारण जल में घुली हुई ऑक्सीजन कम हो जाती है तथा सूक्ष्म जीवाणुओं द्वारा कार्बनिक यौगिकों के ऑक्सीकरण में भी ऑक्सीजन उपयोग में ली जाती है। यदि जल में बहुत अधिक कार्बनिक पदार्थ मिला दिए जाएँ, तो जल में उपलब्ध सारी ऑक्सीजन का उपभोग हो जाता है, जिससे ऑक्सीजन पर आश्रित जलीय जीवों की मृत्यु हो जाती है। इस प्रकार अवायु जीवाणु, जिन्हें ऑक्सीजन की आवश्यकता नहीं होती है, कार्बनिक अपशिष्ट का विखण्डन आरम्भ कर देते हैं तथा इससे दूषित गंध वाले रसायन उत्पन्न होते हैं, जो मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होते हैं। वायु जीवाणु (ऑक्सीजन की आवश्यकता वाले) इन कार्बनिक अपशिष्टों का विघटन करते हैं जिससे जल में घुली हुई ऑक्सीजन की मात्रा बहुत कम हो जाती है।

जैव रासायनिक ऑक्सीजन माँग तथा रासायनिक ऑक्सीजन माँग –
जल के एक नमूने के निश्चित आयतन में उपस्थित कार्बनिक पदार्थों को विखण्डित करने के लिए जीवाणु द्वारा आवश्यक ऑक्सीजन को जैव रासायनिक ऑक्सीजन माँग (BOD) कहा जाता है। अतः BOD, जल में उपस्थित कार्बनिक पदार्थ को जैवीय रूप में विखण्डित करने के लिए आवश्यक ऑक्सीजन की मात्रा होती है। BOD की गणना करने के लिए जल के नमूने को ऑक्सीजन से संतृप्त करके 293 K ताप पर 5 दिन तक रखते हैं जिससे जल में उपस्थित जीवाणु कार्बनिक पदार्थों (प्रदूषकों) को विखण्डित कर देते हैं। इस प्रक्रम में जल में उपस्थित ऑक्सीजन की कुछ मात्रा प्रयुक्त हो जाती है तथा शेष ऑक्सीजन का निर्धारण कर लिया जाता है। अतः BOD मान से जल की गुणवत्ता का निर्धारण होता है। मानक दशा में शुद्ध जल का BOD मान 5 ppm से कम होता है, जबकि अत्यधिक प्रदूषित जल में यह मान 17 ppm या इससे अधिक होता है। अतः। BOD का उच्च मान जल में कार्बनिक अपशिष्ट की उपस्थिति को दर्शाता है।

जल प्रदूषण को मापने का एक अन्य मापदण्ड रासायनिक ऑक्सीजन माँग COD है। कुछ रासायनिक पदार्थ भी जल में घुली हुई ऑक्सीजन से क्रिया करते हैं। COD की गणना करने के लिए जल को किसी ऑक्सीकारक (जैसे K2Cr2O7) की ज्ञात मात्रा के साथ अभिकृत करवाया जाता है तो यह कार्बनिक तथा अकार्बनिक प्रदूषकों को ऑक्सीकृत कर देता है। ऑक्सीकारक की शेष मात्रा का निर्धारण किसी उपयुक्त अपचायक द्वारा कर लिया जाता है जिससे प्रदूषकों के ऑक्सीकरण में प्रयुक्त ऑक्सीजन की मात्रा ज्ञात कर लेते हैं। यह मान ही COD कहलाता है तथा इसे भी ppm में व्यक्त किया जाता है।

(h) रासायनिक प्रदूषक –
जल एक अच्छा विलायक है अतः जल में विलेय अकार्बनिक रसायन तथा भारी धातुएँ जैसे मर्करी, कैडमियम तथा निकल (Cd, Hg, Ni) महत्त्वपूर्ण प्रदूषक हैं। ये सभी धातुएँ मनुष्य के लिए हानिकारक होती हैं, क्योंकि हमारा शरीर इनका विसर्जन नहीं कर पाता है। समय के साथ इनकी मात्रा निश्चित सीमा से ऊपर हो जाती है। तब ये प्रदूषक धातुएँ वृक्कों, केन्द्रीय तंत्रिका – तंत्र, यकृत आदि को नुकसान पहुँचाती हैं। खानों के सीवेज से प्राप्त अम्ल जैसे – सल्फ्यूरिक अम्ल एवं अनेक स्रोतों से प्राप्त लवण जिनमें ठण्डे मौसम में हिम एवं बर्फ को पिघलाने वाले लवण जैसे – सोडियम क्लोराइड एवं कैल्सियम क्लोराइड भी सम्मिलित हैं, जल में विलेय रासायनिक प्रदूषक हैं।

प्रदूषित जल में पाए जाने वाले कार्बनिक यौगिक प्रदूषकों का अन्य समूह है। पेट्रोलियम उत्पाद जैसे समुद्रों में बड़े तेल – बहाव जल के कई स्रोतों को प्रदूषित करते हैं, दूसरे गम्भीर प्रभाव वाले कार्बनिक यौगिक कीटनाशक हैं, जो स्प्रे द्वारा बहकर भूमि के नीचे आ जाते हैं। विभिन्न औद्योगिक रसायन, जैसे-पॉलीक्लोरीनेटेड बाइफिनायल (PCB8), अपमार्जक तथा उर्वरक भी जल – प्रदूषक होते हैं। PCB8 को कैन्सरजन्य माना जाता है। अधिकांश अपमार्जक जैव अपघटनीय होते हैं। फिर भी इनका प्रयोग कई समस्याएँ उत्पन्न करता है। अपमार्जकों को अपघटित करने वाले जीवाणु इन अपमार्जकों से भोजन प्राप्त करके तेजी से बढ़ते – हैं, जिससे वे जल में उपस्थित समस्त ऑक्सीजन का उपयोग करते हैं। जिसके कारण जल में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है।

ऑक्सीजन की कमी के कारण जलीय जीवन (जैसे-मछलियाँ तथा पौधे) मर जाते हैं। उर्वरकों में फॉस्फेट योगज के रूप में होते हैं। जल में फॉस्फेट की वृद्धि शैवाल की वृद्धि में सहायक होती है। शैवाल की यह बढ़ोतरी जलीय सतह को ढक लेती है जिससे जल में ऑक्सीजन की सान्द्रता बहुत कम हो जाती है। अतः अवायुवीय परिस्थिति उत्पन्न होने से दुर्गंध युक्त सड़न पैदा होती है तथा यह जलीय जन्तुओं की मृत्यु का कारण बनती है। इस प्रकार यह पुष्पकुंजग्रस्त जल अन्य जीवों की वृद्धि को रोकता है। अतः वह प्रक्रम जिसमें पोषकों से युक्त जल निकाय, पादपों की सघन वृद्धि में सहयोग करता है जिससे ऑक्सीजन की कमी होकर जन्तुओं की मृत्यु हो जाती है तथा जैव विविधता में कमी आती है, उसे सुपोषण कहते हैं।
विभिन्न प्रदूषक धातुएँ तथा उनके प्रभाव निम्न प्रकार हैं –

  1. मर्करी – मर्करी सामान्य ताप पर द्रव अवस्था में पाया जाने वाला धातु है जो कि तापमान बढ़ने के साथ वाष्पित होता है तथा अधिक जहरीला होता जाता है। इसके द्वारा उत्पन्न मिनीमाटा नामक बीमारी से जापान में कई परिवारों एवं जानवरों की रहस्यमय मृत्यु हो गयी थी।
  2. सीसा – इसके प्रदूषण से यकृत तथा वृक्क की कार्यक्षमता प्रभावित होती है, हीमोग्लोबिन कम हो जाता है तथा मानसिक विक्षिप्तता आती है।
  3. आर्सेनिक – यह लीवर सिरोसिस नामक जानलेवा बीमारी उत्पन्न करता है, फेफड़ों का कैंसर, वृक्कों की कार्यक्षमता का ह्रास तथा मानसिक विक्षिप्तता पैदा करता है।
  4. कैडमियम – यह वृक्कों पर अवांछित प्रभाव, हड्डियों की विकृति, खून की कमी, केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र एवं लीवर को नुकसान पहुँचाता है।
  5. तांबा – इससे तनाव व बुखार होता है तथा इसके अधिक मात्रा में पहुँचने पर व्यक्ति कोमा में भी चला जाता है।
  6. जिंक – यह वृक्कों को नुकसान पहुँचाता है तथा इससे उल्टी तथा ऐंठन आदि हो जाती है।

जल प्रदूषण का नियंत्रण:
निम्नलिखित प्रक्रियाओं द्वारा जल प्रदूषण को नियंत्रित किया जा सकता है –

  • पेयजल को अपमार्जक, साबुन इत्यादि के प्रयोग से सुरक्षित रखा जाए अर्थात् कुआँ, तालाब इत्यादि पर इनका प्रयोग प्रतिबन्धित किया जाए।
  • वाहित मल को जलस्रोतों में न मिलने दिया जाए।
  • नाभिकीय अथवा प्रौद्योगिक संस्थानों से निकलने वाले अपशिष्ट पदार्थों को जलस्रोतों से दूर रखना चाहिए अथवा उन्हें बिना उपचार के जलस्रोतों में नहीं मिलाया जाना चाहिए।
  • कृषि रसायन, कीटनाशक तथा उर्वरकों को जल में नहीं मिलाया जाना चाहिए।
  • डी.डी.टी. तथा मैलाथियोन जैसे कीटनाशी के प्रयोग से बचना चाहिए तथा इनके स्थान पर नीम की सूखी पत्तियों का प्रयोग करना चाहिए।
  • पेट्रोलियम तथा तेल पदार्थों को समुद्र में फैलने से बचाना चाहिए।
  • रेडियोधर्मी पदार्थों को समुद्र में डालने तथा समुद्र में परमाणु विस्फोट पर प्रतिबंध लगाना चाहिए।
  • नदी, तालाब तथा नहरों के पास मलमूत्र त्यागने पर पाबंदी लगानी चाहिए।
  • रासायनिक उर्वरकों के स्थान पर कंपोस्ट का प्रयोग करना चाहिए।
  • मृत जन्तु, मनुष्य तथा उनकी अस्थि इत्यादि को जल में प्रवाहित नहीं किया जाना चाहिए।
  • जल को स्वच्छ करने वाली मछलियाँ, कछुए, घोंघा इत्यादि को जल में डालने पर ये जलस्रोतों के प्रदूषण को कम करते हैं।
  • घरेलू पानी की टंकियों में पोटेशियम परमैंगनेट अथवा विरंजक चूर्ण (ब्लीचिंग पाउडर) की कुछ मात्रा समय – समय पर डालते रहना चाहिए।
  • जनता को प्रदूषित जल से होने वाले खतरों के बारे में। टी.वी., रेडियो तथा मीडिया के अन्य स्रोतों द्वारा समय – समय पर जानकारी देते रहना चाहिए।

प्रश्न 23.
औद्योगिक वायु प्रदूषण पर एक लेख लिखें।
उत्तर:
औद्योगिक इकाइयों द्वारा उत्पन्न विभिन्न प्रकार के अपशिष्ट वायुमण्डल, जल और मृदा को प्रदूषित करते हैं। औद्योगिक अपशिष्ट की श्रेणी उद्योग के प्रकार पर निर्भर करती है। अधिकतर प्रदूषक उद्योगों से निकलने वाले उत्प्रवाहियों से प्राप्त होते हैं, जिनमें कार्बनिक पदार्थ, अकार्बनिक लवण, निलंबित ठोस, उर्वरक आदि उपस्थित होते हैं। ये सभी ऊष्मा, जीवाणु एवं रोगजनकों के रूप में बाहर निकलते हैं। राजस्थान में जहाँ थर्मल पावर प्लांट है जैसे रावतभाटा (कोटा) से निकलने वाले उत्प्रवाही ऊष्मा, भारी धातुएँ, घुलनशील ठोस एवं अकार्बनिक पदार्थ होते हैं। जयपुर, कोटपूतली एवं अन्य स्थानों पर पेपर तथा पल्प उद्योगों द्वारा जो औद्योगिक उत्प्रवाही निकलते हैं वे जल की pH को प्रभावित करते हैं एवं COD, BOD के संतुलन को अनियमित करते हैं। जहाँ रबर उद्योग है वे क्लोराइड निलंबित घुलनशील ठोस उत्प्रवाही के रूप में वातावरण में मिश्रित करते हैं। स्टील उद्योग जो कि भिवाड़ी व अन्य औद्योगिक क्षेत्रों में उपस्थित है उनसे – अम्ल फीनोल, सायनोजन, लाइमस्टोन, तेलीय पदार्थ, सायनाइड, सायनेट आदि प्रदूषक के रूप में निकलते हैं।

ऑयल रिफाइनरीज के द्वारा अम्ल, ऐल्कली, रेजिन्स और पेट्रो ऑयल प्रदूषक के रूप में निकाले जाते हैं। पेस्टीसाइडस जो कि सभी बड़े शहरों के आस – पास पाए जाते हैं उनमें ऐरोमैटिक पदार्थ, अम्ल एवं कार्बनिक द्रव्य होते हैं। राजस्थान के जयपुर, उदयपुर एवं अन्य शहरों में सांश्लेषिक औषधियाँ तथा पूर्ववर्ती अणु बनाए जाते हैं, जिससे कई तरह के प्रदूषक वायुमण्डल, जल तथा मृदा को प्रदूषित कर रहे हैं। राजस्थान के सभी शहरों के औद्योगिक क्षेत्रों में कार्बनिक रसायन उद्योग स्थापित हैं जिनसे कई विषाक्त पदार्थ जैसे – फीनोल, अम्ल एवं क्षार प्रदूषक के रूप में निकलते हैं। जयपुर, उदयपुर, कोटा एवं अन्य शहरों में उर्वरक उद्योगों के द्वारा निकलने वाले अपशिष्टों में अमोनिया, फ्लोराइड्स, कार्बनिक पदार्थ, पोटैशियम, नाइट्रोजन तथा फॉस्फोरस के यौगिक होते हैं। राजस्थान के बहुत से शहरों में स्थापित डेयरी उद्योग अपशिष्ट के रूप में ग्रीसेज, वसाएँ, लेक्टोज, गलनीय ठोस एवं प्रोटीन्स उत्पन्न करते हैं। उदयपुर, राजसमन्द एवं अन्य जिलों में मार्बल उद्योग के कारण उत्पन्न मार्बल स्लरी मृदा तथा पानी का प्रदूषण करती है। भीलवाड़ा एवं अन्य टेक्सटाइल नगरों में रंग, फीनोल, फाइबर आदि का प्रदूषण व्याप्त है।

प्रश्न 24.
ओजोन परत का क्या अर्थ है? इसके अपक्षय के कारण क्या हैं? ओजोन पर अपक्षय से पृथ्वी का जीवन किस प्रकार प्रभावित हो सकता है?
उत्तरे:
समतापमंडलीय प्रदूषण:
ओजोन का विरचन एवं विघटन –
ऊपरी समताप – मण्डल (समुद्र तल से 10 – 50 km ऊपर तक का क्षेत्रफल) में ओजोन प्रचुर मात्रा में होती है। इसके अतिरिक्त N2, O2 तथा सूक्ष्म मात्रा में जल वाष्प भी पायी जाती है। ओजोन सूर्य से आने वाली पराबैंगनी विकिरणों के 99.5 प्रतिशत भाग को रोककर हमें इन हानिकारक विकिरणों से बचाती है। इन विकिरणों से त्वचा – कैंसर (मेलेनोमा) होता है। अतः ओजोन – कवच को बचाए रखना आवश्यक है। समतापमण्डल में पराबैंगनी विकिरणों की ऑक्सीजन से क्रिया द्वारा ओजोन का निर्माण होता है। पराबैंगनी विकिरण आण्विक ऑक्सीजन को मुक्त ऑक्सीजन (O) परमाणुओं में विखण्डित कर देते हैं। जो कि आण्विक ऑक्सीजन से संयुक्त होकर ओजोन बनाते हैं।
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 14 पर्यावरणीय रसायन img 2
ओजोन ऊष्मागतिकीय रूप से अस्थायी होती है एवं यह आण्विक ऑक्सीजन में विघटित हो जाती है। इस प्रकार ओजोन के निर्माण एवं विघटन के मध्य एक गतिक साम्य स्थापित हो जाता है। अभी हाल ही के वर्षों में समतापमण्डल में उपस्थित कुछ रसायनों के कारण ओजोन की इस सुरक्षा-परत का क्षय होना प्रारम्भ हो गया है। ओजोन परत के इस क्षय का मुख्य कारण क्लोरोफ्लोरोकार्बन (फ्रेऑन) (CFCs) का उत्सर्जन है। फ्रेऑन अक्रिय, अज्वलनशील तथा अविषाक्त पदार्थ हैं, अतः इन्हें रेफ्रिजरेटर, एयर – कंडीशनर, प्लास्टिक फोम के निर्माण में एवं इलेक्ट्रॉनिक उद्योग में कम्प्यूटर के पुर्षों की सफाई करने में प्रयुक्त किया जाता है। सामान्यतः ताप तथा दाब की परिस्थितियों में भूमध्य रेखा के ऊपर ओजोन की सांद्रता 0.29 cm और ध्रुवों पर यह 0.40 cm तक पायी जाती है।
वायुमण्डल में एक बार फ्रेऑन के उत्सर्जित होने पर ये वायुमण्डल की अन्य गैसों के साथ मिलकर सीधे समतापमण्डल में पहुँच जाते हैं। समतापमण्डल में ये शक्तिशाली पराबैंगनी विकिरणों द्वारा विघटित होकर क्लोरीन मुक्त मूलक बनाते हैं।
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क्लोरीन मुक्त मूलक समतापमण्डल में स्थित ओजोन से अभिक्रिया करके क्लोरीन मोनोऑक्साइड मूलक (\(\dot { C } \)lO) तथा आण्विक ऑक्सीजन बनाते हैं।
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क्लोरीन मोनोऑक्साइड मूलक परमाण्वीय ऑक्सीजन के साथ अभिक्रिया करके अधिक क्लोरीन मूलक उत्पन्न करता है।
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इस प्रकार क्लोरीन मूलक लगातार बनते रहते हैं तथा ओजोन को विखण्डित करते रहते हैं। अतः CFC समतापमण्डल में क्लोरीन मूलकों को उत्पन्न करने वाले एवं ओजोन परत को क्षति पहुँचाने वाले परिवहनीय कारक हैं। ओजोन परत के क्षय के कारणों को खोजने के लिए शेरवुड रोलेण्ड मारियो मेलिना एवं पॉल क्रट्जन को सन् 1945 में रसायन शास्त्र के क्षेत्र में नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

ओजोन छिद्र –
सन् 1980 में वायुमण्डलीय वैज्ञानिकों ने अंटार्कटिका पर कार्य करते हुए दक्षिणी ध्रुव के ऊपर ओजोन परत के क्षय के बारे में बताया जिसे सामान्य रूप से ‘ओजोन छिद्र’ कहा जाता है। गरमी में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड तथा मेथेन क्रमशः क्लोरीन मोनोऑक्साइड तथा क्लोरीन परमाणुओं से अभिक्रिया करके क्लोरीन सिंक बनाते हैं, जो ओजोन – क्षय को काफी हद तक रोकता है।
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सर्दी के मौसम में अंटार्कटिका के ऊपर विशेष प्रकार के बादल बनते हैं जिन्हें ध्रुवीय समतापमण्डलीय बादल कहते हैं। ये बादल एक प्रकार की सतह प्रदान करते हैं जिस पर क्लोरीन नाइट्रेट जलअपघटित होकर हाइपोक्लोरस अम्ल बनाता है तथा उपरोक्त अभिक्रिया में उत्पन्न हाइड्रोजन क्लोराइड भी क्लोरीन नाइट्रेट से क्रिया करके आण्विक क्लोरीन देता है।
ClONO2(g) + H2O (g) → HOCl (g) + HNO3 (g)
ClONO2 (g) + HCl (g) → Cl2 (g) + HNO3 (g)
बसंत ऋतु में जब सूर्य का प्रकाश अंटार्कटिका पर आता है तो सूर्य की गर्मी से बादल विखण्डित हो जाते हैं तथा सूर्य के प्रकाश से HOCl तथा Cl2 का भी अपघटन हो जाता है।
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इस प्रकार उत्पन्न क्लोरीन मूलक, ओजोन क्षय के लिए श्रृंखला अभिक्रिया प्रारम्भ कर देते हैं।
उपरोक्त अभिक्रियाओं को सम्मिलित रूप से इस प्रकार लिखा जा सकता है –
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ओजोन परत के क्षय के प्रभाव:
ओजोन परत के क्षय के कारण अधिकाधिक पराबैंगनी विकिरण क्षोभमण्डल में छनित होते हैं, जिनसे त्वचा का जीर्णन, मोतियाबिंद, सनबर्न, त्वचा – कैंसर जैसी बीमारियाँ होती हैं तथा इससे पादपप्लवकों की मृत्यु तथा मत्स्य उत्पादन में कमी होती है। पौधों के प्रोटीन, पराबैंगनी विकिरणों से आसानी से प्रभावित हो जाते हैं, जिससे कोशिकाओं में हानिकारक उत्परिवर्तन होता है। इसके कारण पत्तियों के रंध्रों से जल का वाष्पीकरण बढ़ जाता है, जिससे मिट्टी की नमी कम हो जाती है। बढ़े हुए पराबैंगनी विकिरण रंगों एवं रेशों को भी हानि पहुंचाते हैं, जिससे रंग जल्दी हल्के हो जाते हैं। पराबैंगनी विकिरणों से शरीर के सम्पूर्ण प्रतिरोधी तंत्र की कार्यक्षमता में गिरावट आ जाती है। इनसे शिशुओं में भी विकृतियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। ये विकिरण प्रकाश संश्लेषण की क्रिया को भी कम करते हैं। इनसे जैविक तत्त्वों के आनुवंशिक घटक न्यूक्लिक अम्ल को भी क्षति पहुँचती है तथा जीवन की खाद्य श्रृंखलाएँ अनियंत्रित हो जाती हैं। इस प्रकार इनसे सम्पूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र पर विनाशकारी प्रभाव पड़ता है।

वायु प्रदूषण का नियन्त्रण –
निम्नलिखित उपायों द्वारा वायु प्रदूषण को काफी हद तक कम किया जा सकता है –

  1. वायु प्रदूषण का सार्थक नियन्त्रण ‘हरित क्रान्ति’ द्वारा सम्भव है।
  2. औद्योगिक चिमनियों से निकलने वाली गैसों को कार्बन से मुक्त करके वायुमण्डल में छोड़ा जाना चाहिए।
  3. सीमित क्षेत्र में ही विशेष प्रकार के प्रदूषण रहित उद्योगों को स्थापित किया जाना चाहिए।
  4. मोटर वाहनों में सीसारहित पेट्रोल का प्रयोग किया जाना चाहिए।
  5. वाहनों में उत्प्रेरकीय कन्वर्टर’ लगाकर प्रदूषण को कम करना चाहिए।
  6. C.N.G. गैसयुक्त वाहनों को ही चलने की अनुमति प्रदान की जानी चाहिए।
  7. ईंधन के रूप में गोबर गैस, बायो गैस इत्यादि का प्रयोग किया जाना चाहिए।
  8. यथासंभव जीवाश्म ईंधन के स्थान पर सौर ऊर्जा द्वारा चलित वाहनों का प्रयोग किया जाना चाहिए।
  9. कूड़ा और जैव – क्षय के पदार्थों को खुली वायु में नहीं छोड़ा जाना चाहिए।
  10. मानवीय – जागरूकता द्वारा भी वायु – प्रदूषण को कम किया जा सकता है। जैसे – लाल बत्ती संकेतक पर खड़े हजारों वाहन यदि इंजन को कुछ समय के लिए बन्द कर दें तो काफी मात्रा में वायु प्रदूषण कम हो सकता है।

प्रश्न 25.
वायु प्रदूषण के कारणों और निवारण पर लेख लिखें।
उत्तर:
वायुमण्डलं:
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार वायु प्रदूषण उन परिस्थितियों तक सीमित रहता है जहाँ बाहरी वायुमण्डल में दूषित पदार्थों की सान्द्रता मनुष्य एवं पर्यावरण को हानि पहुँचाने की सीमा तक बढ़ जाती है। वायुमण्डल के प्राकृतिक संघटन में किसी प्रकार का परिवर्तन वायुमण्डलीय प्रदूषण कहलाता है। वायुमण्डलीय प्रदूषण में मुख्यतः क्षोभमण्डलीय तथा समतापमण्डलीय प्रदूषण का अध्ययन किया जाता है। वायुमण्डल, जो कि पृथ्वी को चारों तरफ से घेरे हुए है, की मोटाई हर ऊँचाई पर समान नहीं होती है। इसमें वायु की विभिन्न संकेन्द्री परतें अथवा क्षेत्र होते हैं तथा प्रत्येक परत का घनत्व भिन्न – भिन्न होता है।

वायुमण्डल का सबसे निचला क्षेत्र, जिसमें मनुष्य तथा अन्य प्राणी रहते हैं, को क्षोभमण्डल’ कहा जाता है। यह समुद्र – तल से लगभग 10 किमी. की ऊँचाई तक होता है, इसके ऊपर (समुद्र – तल से 10 से 50 किमी. के मध्य) समतापमण्डल होता है। क्षोभमण्डल धूल के कणों से युक्त क्षेत्र होता है, जिसमें वायु, जलवाष्प (आधिक्य में) तथा बादल होते हैं। इस क्षेत्र में वायु का तीव्र प्रवाह होता है तथा बादलों का निर्माण होता है, जबकि समतापमण्डल में डाइनाइट्रोजन, डाइऑक्सीजन, ओजोन तथा सूक्ष्म मात्रा में जलवाष्प उपस्थित होती है।

समतापमण्डल में उपस्थित ओजोन सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों के 99.5% भाग को पृथ्वी की सतह तक पहुँचने से रोकती है। तथा इसके प्रभाव से मानव तथा अन्य जीवों की रक्षा करती है। सामान्यतया वायु प्रदूषकों का उत्पत्ति के आधार पर अध्ययन किया जाता है –
(1) प्राथमिक – वे प्रदूषक जो वातावरण में ज्ञात प्रत्यक्ष स्रोतों से निष्कासित होते हैं तथा उसी अवस्था में अधिक समय तक स्थिर रहते हैं, उन्हें प्राथमिक प्रदूषक कहते हैं। जैसे – कार्बन मोनो ऑक्साइड, सल्फर डाइ ऑक्साइड, हाइड्रोकार्बन आदि।
(2) द्वितीयक – वे प्रदूषक जो प्राथमिक प्रदूषकों की आन्तरिक क्रियमों अथवा वायुमण्डल के साथ प्रक्रियाओं द्वारा निर्मित होते हैं, उन्हें द्वितीयक प्रदूषक कहते हैं।

क्षोभमण्इलीय प्रदूषण:
वायु में उपस्थित अवांछनीय ठोस अथवा गैस कणों के कारण क्षोभमण्डलीय प्रदूषण होता है। क्षोभमण्डल में मुख्यतः निम्नलिखित गैसीय तथा कणिकीय प्रदूषक पाए जाते हैं –
(1) कणीय आधार – वाष्प कण, कोहरा, ऐरोसोल, धुआं, धूल, कज्जल, धूम्र, धूमिका तथा सूक्ष्म बूंदें कणीय प्रदूषक हैं।
(2) गैसीय आधार
(i) अकार्बनिक गैसें – क्लोरीन, कार्बन – डाइऑक्साइड, ओजोन, हाइड्रोजन सल्फाइड, अमोनिया, नाइट्रिक ऑक्साइड, सल्फर के ऑक्साइड तथा कार्बन मोनो ऑक्साइड।
(ii) कार्बनिक पदार्थ ऐल्डिहाइड ऐसीटिलीन, प्रोपेन, मेथेन, एथेन, हाइड्रोकार्बन, ऐल्कोहॉल इत्यादि।
गैसीय वायु प्रदूषक –
(1) सल्फर के ऑक्साइड – जीवाश्म ईंधन के दहन से सल्फर के ऑक्साइड (SO2 तथा SO3) उत्पन्न होते हैं, इनमें सल्फर डाइऑक्साइड प्रमुख है जो कि मनुष्यों एवं जन्तुओं के लिए विषैली होती है। सल्फर डाइऑक्साइड की सूक्ष्म मात्रा भी मनुष्य में विभिन्न श्वसन रोग, जैसेअस्थमा, श्वसनी शोध, ऐम्फाइसीमा आदि उत्पन्न करती हैं। सल्फर डाइऑक्साइड के कारण आँखों में जलन भी होती है, जिससे आँखें लाल हो जाती हैं तथा आँसू आने लगते हैं। SO2 की उच्च सान्द्रता फूलों की कलियों में कड़ापन उत्पन्न करती है, जिससे ये शीघ्र पयावरणाय रसायन गिर जाती हैं। SO2 का ऑक्सीकरण धीमा होता है लेकिन प्रदूषित वायु जिसमें कणिकीय पदार्थ होते हैं, के कारण इसका ऑक्सीकरण तेजी से होता है अर्थात् ये इस अभिक्रिया को उत्प्रेरित करते हैं।
2SO2 (g) + O2 (g) → 2SO2 (g)
इस अभिक्रिया की गति वायुमण्डल में उपस्थित ओजोन तथा हाइड्रोजन परॉक्साइड द्वारा और बढ़ जाती है।
SO2 (g) + O2 (g) → SO3(g) + O2 (g)
SO2 (g) + H2O (g) → H2SO4 (aq)
इस प्रकार बनी SO3 तथा H2SO4 ही अम्ल वर्षा के लिए मुख्य रूप से उत्तरदायी है।
(2) नाइट्रोजन के ऑक्साइड –
वायु के प्रमुख अवयव नाइट्रोजन तथा ऑक्सीजन हैं। सामान्य ताप पर ये गैसें आपस में अभिक्रिया नहीं करती हैं, परन्तु जब आसमान में बिजली चमकती है, तब ये आपस में क्रिया करके नाइट्रोजन के ऑक्साइड (NO तथा NO2) बनाती हैं। NO2 के ऑक्सीकरण से NO3– आयन बनता है, जो मृदा में जाकर उर्वरक का कार्य करता है। किसी स्वचालित इंजन में भी उच्च ताप पर जब जीवाश्म ईंधन का दहन होता है, तो नाइट्रोजन तथा ऑक्सीजन मिलकर पर्याप्त मात्रा में नाइट्रिक ऑक्साइड (NO) तथा नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO2) बनाती हैं।
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NO, ऑक्सीजन से तेजी से क्रिया करके NO2 देती है।
2NO (g) + O2 (g) → 2NO2 (g)
जब समतापमण्डल में नाइट्रिक ऑक्साइड (NO) ओजोन से क्रिया करती है, तो नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO2) के बनने की दर बढ़ जाती है।
NO (g) + O3 (g) → NO2 (g) + O2 (g)
यातायात तथा सघन स्थानों पर स्थित तीक्ष्ण लाल धूम्र नाइट्रोजन ऑक्साइड के कारण ही होता है। NO2 की सान्द्रता अधिक होने पर पौधों की पत्तियाँ गिर जाती हैं तथा प्रकाश – संश्लेषण की दर कम हो जाती है। नाइट्रोजन डाइऑक्साइड फेफड़ों में उत्तेजना उत्पन्न करती है, जिससे बच्चों में श्वसन – रोग हो जाते हैं। यह जीव ऊतकों के लिए विषैली होती है। नाइट्रोजन डाइऑक्साइड विभिन्न प्रकार के रेशों तथा धातुओं के लिए भी हानिकारक होती है।
(3) हाइड्रोकार्बन –
हाइड्रोकार्बन केवल कार्बन तथा हाइड्रोजन से बने यौगिक हैं जो कि स्वचालित वाहनों में ईंधन के अपूर्ण दहन से उत्पन्न होते हैं। अधिकांश हाइड्रोकार्बनों के कारण कैंसर रोग उत्पन्न होता है। पौधों में काल प्रभावण, ऊतकों के निम्नीकरण पत्तियों एवं फूलों का असामयिक गिर जाना एवं पौधों तथा ऊतकों की वृद्धि में कमी आदि समस्याएँ इनके कारण ही उत्पन्न होती हैं।
कार्बन के ऑक्साइड –
कार्बन के तीन ऑक्साइड होते हैं। कार्बन मोनोऑक्साइड (CO), कार्बन डाइऑक्साइड (CO2), कार्बन सबऑक्साइड (C3O2)। इनमें से दो प्रकृति में पाए जाते हैं, कार्बन मोनोऑक्साइड और कार्बन डाइऑक्साइड।
(1) कार्बन मोनोऑक्साइड – कार्बन मोनोऑक्साइड एक गम्भीर वायु प्रदूषक है जो कि रंगहीन तथा गंधहीन गैस होती है। यह श्वसनीय प्राणियों के लिए हानिकारक है। यह कार्बन के अपूर्ण दहन के कारण उत्पन्न होती है। इसकी सर्वाधिक मात्रा मोटरवाहनों से निकलने वाले धुएँ में होती है। कोयला, ईंधन लकड़ी तथा पेट्रोल का अपूर्ण दहन इत्यादि इसके अन्य स्रोत हैं। अधिकतर वाहनों का उचित रखरखाव नहीं होता है। तथा इनमें प्रदूषण नियंत्रक उपकरण नहीं होते हैं जिसके कारण अत्यधिक मात्रा में कार्बन मोनोऑक्साइड तथा अन्य प्रदूषक गैसें उत्सर्जित होती हैं। कार्बन मोनोऑक्साइड अंगों तथा ऊतकों में जाने वाली ऑक्सीजन के प्रवाह को रोकती है।

यह हीमोग्लोबिन के साथ ऑक्सीजन की अपेक्षा अधिक प्रबलता से संयुक्त होकर कार्बोक्सीहीमोग्लोबिन बनाती है, जो कि ऑक्सीजन हीमोग्लोबिन (ऑक्सीहीमोग्लोबिन) संकुल से 320 गुना अधिक स्थायी होता है। जब रक्त में कार्बोक्सीहीमोग्लोबिन की मात्रा 3.6 प्रतिशत से अधिक हो जाती है, तो रक्त में ऑक्सीजन ले जाने की क्षमता कम हो जाती है। ऑक्सीजन की इस कमी से सिरदर्द, नेत्रदृष्टि में कमी, तंत्रिकीय आवेग में न्यूनता, हृदयवाहिका में अव्यवस्था आदि समस्याएँ उत्पन्न हो जाती हैं। इसी कारण धूम्रपान स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। गर्भवती महिलाओं के रक्त में CO की मात्रा बढ़ने से समय पूर्व बच्चे का जन्म, गर्भपात तथा बच्चों में विकृति उत्पन्न हो जाती है। CO की 1300 pprn सान्द्रता आधे घण्टे में प्राणघातक हो सकती है।
(2) कार्बन डाइऑक्साइड – श्वसन, जीवाश्म ईंधन, कार्बनिक पदार्थ का दहन, सीमेन्ट निर्माण में काम आने वाले चूना – पत्थर (CaCO3) आदि से कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) उत्सर्जित होती है। कार्बन डाइऑक्साइड गैस केवल क्षोभमण्डल में होती है। सामान्यतः वायुमण्डल में इसकी मात्रा आयतन के अनुसार 0.03% होती है। कार्बन डाइऑक्साइड के आधिक्य को हरे पौधे प्रकाश संश्लेषण द्वारा कम कर देते हैं, जिससे वायुमण्डल में CO2 की निश्चित मात्रा बनी रहती है। हरे पौधे प्रकाश – संश्लेषण के लिए CO2 काम में लेते हैं तथा ऑक्सीजन मुक्त करते हैं इसलिए संतुलित चक्र बना रहता है। वनों के कटने तथा जीवाश्म ईंधन के अधिक दहन के कारण वायुमण्डल में CO2 की मात्रा बढ़ गई है अतः पर्यावरण – संतुलन बिगड़ गया है। हालांकि CO2 का कोई प्रत्यक्ष नकारात्मक प्रभाव नहीं होता लेकिन इसकी बढ़ी हुई मात्रा ही भूमण्डलीय तापवृद्धि तथा वैश्विक तापन के लिए उत्तरदायी है तथा आँकड़ों के अनुसार प्रतिदशक में CO2 की सान्द्रता निरंतर बढ़ती जा रही है।

भूमण्डलीय ताप वृद्धि तथा हरित गृह (ग्रीन हाउस) प्रभाव –
सौर ऊर्जा का 75% भाग पृथ्वी की सतह द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है, जिससे इसके ताप में वृद्धि होती है। ऊष्मा – की शेष मात्रा वायुमण्डल में पुनः विकिरिंत हो जाती है। ऊष्मा का कुछ भाग वायुमण्डल में उपस्थित गैसों जैसे – कार्बन डाइऑक्साइड, ओजोन, क्लोरोफ्लोरोकार्बन (फ्रीऑन्स) तथा जलवाष्प द्वारा ग्रहण कर लिया जाता है, जिससे वायुमण्डल के ताप में वृद्धि होती है, इसे ही भूमण्डलीय ताप वृद्धि कहते हैं। ठण्डे स्थानों पर फल – फूल, सब्जियाँ आदि काँच के आवरण जिसे ‘हरितगृह’ कहते हैं, में विकसित किए जाते हैं। इसी प्रकार मनुष्य भी एक प्राकृतिक हरित गृह में रहता है, जो कि वायु का एक आवरण है, जिसे ‘वायुमण्डल’ कहते हैं, जिसके कारण शताब्दियों से पृथ्वी का ताप स्थिर है, परन्तु आजकल इसमें धीरे – धीरे परिवर्तन हो रहा है। जिस प्रकार हरितगृह में काँच सूर्य की गरमी को अन्दर थामे रखता है, उसी प्रकार वायुमण्डल भी सूर्य की ऊष्मा को पृथ्वी के निकट अवशोषित कर लेता है।

इससे पृथ्वी गरम रहती है अर्थात् इसके तापमान में वृद्धि होती है। इसे ‘प्राकृतिक हरितगृह प्रभाव’ कहते हैं, क्योंकि यह पृथ्वी के तापमान को संरक्षित करके उसे जीवन – योग्य बनाता है। दृश्यप्रकाश हरितगृह के पारदर्शी काँच में से गुजरकर, सूर्य के विकिरण द्वारा मृदा तथा पौधों को गरम रखता है। गरम मृदा तथा पौधे ऊष्मीय क्षेत्र के अवरक्त विकिरणों का उत्सर्जन करते हैं। चूँकि यह काँच विकिरण के लिए अपारदर्शक होता है, अतः यह इन विकिरणों को आंशिक रूप से अवशोषित तथा शेष को परावर्तित कर देता है। इस क्रियाविधि से हरितगृह में सौर – ऊर्जा संगृहीत रहती है। इसी प्रकार कार्बन डाइऑक्साइड के अणु ऊष्मा को संगृहीत कर लेते हैं, क्योंकि ये सूर्य के प्रकाश के लिए पारदर्शक होते हैं, ऊष्मा के विकिरणों के लिए नहीं। अतः जब कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा 0.03% से अधिक हो जाती है, तो प्राकृतिक हरितगृह का संतुलन बिगड़ जाता है। इसलिए भूमण्डलीय तापवृद्धि में कार्बन डाइऑक्साइड का विशिष्ट योगदान होता है।
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कार्बन डाइऑक्साइड के अतिरिक्त अन्य हरितगृह गैसें, मेथेन (CH4), जलवाष्प, नाइट्रसऑक्साइड (N2O), क्लोरोफ्लोरोकार्बन तथा ओजोन हैं। ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में जब वनस्पतियों को जलाया या सड़ाया जाता है, तब मेथेन गैस उत्पन्न होती है। धान के क्षेत्रों, कोयले की खानों, दलदली क्षेत्रों तथा जीवाश्म ईंधनों द्वारा भी अधिक मात्रा में मेथेन उत्पन्न होती है। क्लोरोफ्लोरोकार्बन कृत्रिम रसायन है, जो वायुप्रशीतक आदि में काम आते हैं। ये भी ओजोन – परत को हानि पहुँचा रहे हैं। नाइट्रस ऑक्साइड (N2O) वातावरण में प्राकृतिक रूप से उत्पन्न होता है, परन्तु पिछले कुछ वर्षों में जीवाश्म ईंधन एवं उर्वरकों के अधिक प्रयोग से इसकी मात्रा में काफी वृद्धि हुई है।
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वायुमण्डल जनित सूर्यातप प्रभाव पृथ्वी के तापमान को नियंत्रित करने में सहायक होता है। सौर विकिरण की लघु तरंगें वायुमण्डल को सुगमतापूर्वक पार करके पृथ्वी तक पहुँच जाती हैं। पृथ्वी से होने वाले ताप का परावर्तन दीर्घ तरंगों द्वारा होता है जो कि वायुमण्डल में उपस्थित बादलों, जल वाष्प तथा कार्बन डाइऑक्साइड गैसों द्वारा सोख लिया जाता है। इसी कारण आकाश स्वच्छ रहने पर पृथ्वी से दीर्घ तरंगीय विकिरण सुगमता से हो जाता है और निचले वायुमण्डल का तापमान नहीं बढ़ पाता है। किन्तु मेघाच्छादित आकाश रहने पर विकिरण की दीर्घ तरंगें उसे पार नहीं कर पाती हैं तथा जलवाष्प, धूलकण, कार्बन डाइऑक्साइड आदि उसे वापस नीचे की ओर लौटा देते हैं।

पृथ्वी के समीप वायुमण्डल का तापमान उसी प्रकार सुरक्षित रहता है, जिस प्रकार काँच से आवरित पौध गृह में हरे पौधों के लिए तापमान आरक्षित रहता है। पौध गृह प्रभाव के कारण ही आकाश स्वच्छ रहने पर रातें अपेक्षाकृत ठंडी होती हैं और आकाश मेघाच्छादित रहने पर गर्म रहती हैं। धरती के वातावरण के तापमान को प्रभावित करने वाले अनेक कारक हैं जिनमें से ग्रीन हाउस प्रभाव भी एक है। ग्रीन हाउस प्रभाव की खोज सन् 1824 में जोसेफ फुरिअर ने की थी। इस पर विश्वसनीय ढंग से प्रयोग सन् 1858 में जॉन टिण्डल ने किया। किन्तु सबसे पहले इसके बारे में आंकिक जानकारी सन् 1896 में स्वान्ते अर्हिनिअस ने प्रकाशित की।

हमारी पृथ्वी की जलवायु सूर्य की ऊष्मा द्वारा जीवन पाती है। अर्थात् सूर्य से उत्पन्न ऊर्जा का मानव जीवन से सीधा सम्बन्ध होता है। यह प्रकृति के प्रारम्भ से लेकर वर्तमान तक (लगभग चार अरब वर्षों) वृहद् श्रृंखला प्रक्रिया के तहत चलता रहता है। सूर्य से ली गयी विकिरण ऊर्जा पृथ्वी पर उत्सर्जित भी होती रहती है। इस प्रक्रिया से पृथ्वी अतिरिक्त ऊर्जा से सुरक्षित भी रहती है। बार – बार विकीर्णन एवं उत्सर्जन की प्रक्रिया में पर्यावरण से कुछ रेडियोएक्टिव किरणें, इनसे ऊर्जा शोषित कर लेती है और कुछ गैसे निकाल देती है। इस प्रक्रिया से निकलने वाली कुछ हरित गृह गैसें होती हैं, जिनका निर्माण जलवाष्प पानी के वाष्पन से होता है। अतः स्पष्ट है कि “हरित गृह प्रभाव वह क्रिया है। जो पार्थिव विकिरण को वायुमण्डल द्वारा रोक लिए जाने के कारण पृथ्वी के तापमान बढ़ने से सम्बन्धित है।”

हरित गृह प्रभाव के परिणाम – हरित गृह प्रभाव के परिणाम निम्नलिखित हैं –

  1. प्रदूषण के बढ़ने से वायुमण्डल में हरित गृह प्रभाव को बढ़ाने वाली गैसों में वृद्धि हुई जिसके कारण पृथ्वी में तापमान में भी वृद्धि हुई।
  2. अध्ययनों से यह ज्ञात हुआ है कि पृथ्वी की सतह का औसत तापमान पिछले 100 वर्षों में 0.08°C बढ़ गया है, जिसके कारण महासागरों का तापीय विस्तार हो गया है। परिणामस्वरूप सागर जल के स्तर में 12 से 27 सेंटीमीटर की वृद्धि हो गयी है।
  3. अगर इसी प्रकार से महासागरों का तापीय विस्तार होता गया तो जल चक्र पर कुप्रभाव पड़ने की आशंका है और जल चक्र के असंतुलित होने पर पूरे पारितंत्र के चक्र पर भी कुप्रभाव पड़ेगा।
  4. मानव की प्रकृति विरोधी नीतियों एवं कार्यों के कारण संतुलित वातावरण (जलवायु) में परिवर्तन हो रहा है और इसी संदर्भ में हरित गृह प्रभाव उत्पन्न करने वाली प्रमुख गैसों की मात्रा वायुमण्डल में आवश्यकता से अधिक बढ़ गयी है। जिससे पृथ्वी का तापमान औसत से अधिक बढ़ता जा रहा है और यदि यही स्थिति जारी रही तो आने वाले समय में पृथ्वी के प्राणी जगत, वनस्पति जगत एवं मौसम चक्र का संतुलन बिगड़ जायेगा।
  5. हरित गृह प्रभाव के बारे में यूरोप के भू – वैज्ञानिकों ने एक संगोष्ठी के माध्यम से (1986) में भविष्यवाणी की कि सन् 2050 तक पृथ्वी के तापमान में 1.5 से 4.5 डिग्री सेन्टीग्रेड की वृद्धि होने की सम्भावना है, और वर्तमान में इसके दुष्परिणाम भी सामने आने लगे हैं।
  6. मार्च 2002 में लंदन के वैज्ञानिकों ने सुदूर संवेदन उपग्रह से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर बताया कि अण्टार्कटिका के पूर्वी प्रायद्वीप भाग से जुड़ा लार्सन बी हिमनद टूट गया है। 1250 वर्ग मील क्षेत्रफल एवं 650 फुट मोटाई वाली बर्फ की इस चट्टान के टूटने को, दुनिया के लिए खतरा बताया जा रहा है।
  7. पृथ्वी के बढ़ते तापमान से जहाँ एक ओर बर्फ के पिघलने की इन घटनाओं ने मानव को खतरे में डाल दिया है वहीं पिघली बर्फ का पानी जब सागरों में आएगा तो उसमें बाढ़ आ जाने से भारत एवं विश्व के कोलकाता, मुम्बई, बैंकॉक, बोस्टन, ढाका जैसे शहर जो समुद्र तट पर बसे हैं समुद्र की चपेट में आकर डूब जायेंगे।
  8. खाद्यानों के उत्पादन में हरित गृह प्रभाव का भी असर होता है। एक निश्चित तापमान न मिलने के कारण उत्पादन कम होता है। क्योंकि 15 से 4.5 डिग्री सेल्सियस ताप में वृद्धि होने से ताप, दाब एवं आर्द्रता की स्थितियों में परिवर्तन के कारण क्षेत्रीय जलवायु में परिवर्तन होता है जिससे फसलों के उत्पादन तथा फसल चक्र में परिवर्तन होंगे जिससे अमेरिका, भारत, आस्ट्रेलिया पूर्वोत्तर अफ्रीका व मध्य – पूर्व के देशों की अर्थव्यवस्थाएँ प्रभावित होंगी।
  9. इसके साथ ही मौसम के इस परिवर्तन से क्षेत्रीय पारिस्थितिक तंत्र भी लड़खड़ा जायेगा और वहाँ की घास, वनस्पतियाँ तो नष्ट होंगी ही साथ में पशु-पक्षियों का क्षेत्र भी बदल जायेगा।
  10. वैश्विक परिवेश में अलनीनो की ठण्डी जल धारा जो अमेरिका (दक्षिणी) के तट पर बहती थी अब वह गर्म हो गयी है जिससे इसमें रहने वाले जीवों को अनेक कष्ट उठाने पड़ रहे हैं।
  11. भूमण्डलीय तापवृद्धि के कारण बहुत से संक्रामक रोगों, जैसे – डेंगू, मलेरिया, पीत ज्वर, निद्रा रोग आदि में भी वृद्धि हो जाती है।

हरित गृह प्रभाव के संरक्षण के उपाय – (भूमण्डलीय ताप वृद्धि को कम करने के उपाय) –
हरित गृह प्रभाव का संरक्षण करने के लिए वर्तमान में बढ़ती हुई उपभोक्तावादी संस्कृति का प्रसार विश्व स्तर पर रोका जाना चाहिए। प्रकृति से स्नेह रखते हुए मानव को सादगीपूर्ण जीवन जीना चाहिए। यह एक ऐसी जागरूकता है जो किसी के दबाव में नहीं हो सकती है बस इसके लिए जरूरत है केवल दृढ़ इच्छा शक्ति की। इसके अतिरिक्त कुछ सैद्धान्तिक उपायों द्वारा भी हरित गृह प्रभाव को पूर्णतया तो समाप्त नहीं किया जा सकता है लेकिन इसमें कमी अवश्य की जा सकती है जो कि निम्न प्रकार हैं –

  1. वृक्षारोपण अधिक से अधिक किया जाना चाहिए जिससे हरित आवरण बढ़ सके।
  2. जनसंख्या वृद्धि को रोका जाना चाहिए।
  3. जीवाष्म ईंधन के स्थान पर सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा एवं ज्वारीय ऊर्जा के उपयोग में वृद्धि की जानी चाहिए।
  4. सोलर ऊर्जा एवं गोबर गैस संयंत्र को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
  5. स्वचालित वाहनों में पेट्रोल तथा डीजल के स्थान पर सी.एन.जी. एवं एल.पी.जी. आदि का प्रयोग किया जाना सुनिश्चित हो।
  6. पशुपालन अधिकतम होना चाहिए।
  7. क्लोरोफ्लोरोकार्बन पर प्रतिबन्ध हो तथा इसके उपभोक्ता देशों पर भी कड़ी नजर रखी जाये।
  8. जन जागरूकता के द्वारा जन सामान्य को औपचारिक तथा अनौपचारिक शिक्षा द्वारा हरित गृह प्रभाव के कारण होने वाली हानियों एवं दुष्परिणामों से अवगत कराया जाना चाहिए।
  9. वनों के विनाश को रोकना चाहिए।
  10. औद्योगिक इकाइयों तथा स्वचालित वाहनों से निकलने वाली ग्रीन गैसों को वातावरण में छोड़े जाने से रोकना चाहिए।
  11. यातायात के व्यक्तिगत साधनों का प्रयोग कम करना चाहिए तथा इसके स्थान पर साईकिल तथा जनसाधारण के यातायात के साधन काम में लेने चाहिए।
  12. कार पूल का प्रयोग करना चाहिए अर्थात् पास – पास रहने वाले एक ही विभाग के 3 – 4 कर्मचारी एक ही कार का प्रयोग कर सकते हैं।
    उपर्युक्त उपायों के नहीं किए जाने पर मानव जाति ही नहीं अपितु सम्पूर्ण जीवमण्डल के लिए खतरा उत्पन्न हो जाएगा।

अम्ल वर्षा:
वायुमण्डल में उपस्थित कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) की जल से क्रिया के कारण कार्बोनिक अम्ल (H2CO3) बनता है जिसके आयनन से प्राप्त H+ आयनों के कारण वर्षा जल की pH 5.6 से 6.0 के मध्य होती है। वायुमण्डल में उपस्थित सल्फर तथा नाइट्रोजन के ऑक्साइड जल में घुलकर अम्लीय बूंदों की रचना करते हैं। अम्लीय बूंदों का वर्षा के रूप में पृथ्वी पर आना अम्ल वर्षा कहलाता है।
H2O (l) + CO2 (g) → H2CO3 (aq)
H2CO3 (aq) + H+ (aq) + HCO3– (aq)
जब वर्षा जल की pH 5.6 से कम हो जाती है, तो इसे ‘अम्ल वर्षा’ कहते हैं।

अम्ल वर्षा का कारण – नाइट्रोजन तथा सल्फर के ऑक्साइड जो कि अम्लीय होते हैं, वायुमण्डल में ठोस कणों के साथ हवा में बहकर अन्त में धरती पर ठोस कणों के रूप में अथवा जल में द्रव रूप में कुहासे से या हिम की भाँति निक्षेपित होते हैं। मानवीय क्रियाकलापों से वातावरण में नाइट्रोजन तथा सल्फर के ऑक्साइड उत्सर्जित होते हैं। जीवाश्म ईंधन (जैसे – कोयला, शक्ति संयंत्रों, भट्टियों तथा मोटर इंजनों में डीजल तथा पेट्रोल (जिसमें सल्फर तथा नाइट्रोजन युक्त पदार्थ होते हैं) के दहन से सल्फर डाइऑक्साइड (SO2) तथा नाइट्रोजन के ऑक्साइड (NO2) उत्पन्न होते हैं। प्रदूषित वायु में उपस्थित कणिकीय द्रव्य ऑक्सीकरण को उत्प्रेरित करते हैं। अतः SO2 तथा NO2 का ऑक्सीकरण होता है तथा प्राप्त उत्पाद जल के साथ अभिक्रिया करके H2SO4 तथा HNO3 बनाते हैं जिनको अम्ल वर्षा में प्रमुख योगदान होता है।
2SO2 (g) + O2 (g) + 2H2O (l) → 2H2SO4 (aq)
NO + O3 → NO2O2
4NO2 (g) + O2 (g) + 2H2O (l) → 4HNO3 (aq)
इसमें अमोनियम लवण भी बनते हैं जो वायुमण्डलीय धुंध (एरोसॉल के सूक्ष्म कण) के रूप में दिखाई देते हैं। वर्षा की बूंदों में ऑक्साइड तथा अमोनियम लवणों के एरोसॉल कणों का नम निक्षेपण होता है।

अम्ल वर्षा के दुष्प्रभाव –
(1) अम्ल वर्षा कृषि तथा पेड़-पौधों आदि के लिए हानिकारक होती है, क्योंकि यह इनकी वृद्धि के लिए आवश्यक पोषक तत्वों (Ca, K, Fe, Mn) को घोलकर पृथक् कर देती है। जिससे मृदा की उर्वरा शक्ति कम होकर पेड़ – पौधों की वृद्धि में गिरावट होती है तथा इससे मृदा की अम्लीयता भी बढ़ती है।
(2) यह मनुष्यों तथा जानवरों में श्वसन में अवरोध पैदा करती है।
(3) जब अम्ल वर्षा का जल सतही जल के साथ बहकर नदी तथा झीलों तक पहुँचता है, तो जलीय पौधों एवं जन्तुओं के जीवन को प्रभावित करता है, इससे मछलियाँ तथा अन्य जीव मर जाते हैं।
(4) अम्ल वर्षा के कारण जल के पाइपों का संक्षारण होता है, जिससे आयरन, लेड, कॉपर आदि धातुएँ घुलकर पेयजल में पहुँच जाती हैं जो कि स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।
(5) यह पत्थर एवं धातुओं से बनी संरचनाओं तथा भवनों आदि को नष्ट करती है।
(6) हमारे देश में ताजमहल जैसी ऐतिहासिक इमारतें भी इससे प्रभावित हो रही हैं; क्योंकि सल्फ्यूरिक अम्ल तथा नाइट्रिक अम्ल दोनों ही संगमरमर को घोलकर क्रमशः CaSO4 तथा Ca(NO3)2 बनाते हैं।
CaCO3 + H2SO4 → CaSO4 + CO2+ H2O
CaCO3 + 2HNO3 → Ca(NO3)2 + CO2 + H2O
ये लवण जल के साथ धीरे – धीरे बह जाते हैं अतः इन स्मारकों का धीरे – धीरे क्षरण होता जा रहा है।
(7) अम्ल वर्षा से सड़कों तथा रेलमार्गों पर बने पुल कमजोर हो जाते हैं।
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अम्ल वर्षा को कम करना – निम्नलिखित उपायों द्वारा अम्ल वर्षा को कम किया जा सकता है –

  • शक्ति संयंत्रों तथा उद्योगों में सल्फर की कम मात्रा वाला ईंधन काम में लेना चाहिए।
  • कोयले के स्थान पर प्राकृतिक गैस का प्रयोग करना चाहिए।
  • उत्प्रेरकीय परिवर्तक युक्त गाड़ियों का प्रयोग करना चाहिए ताकि वायुमण्डल में उत्सर्जित धूम्र का प्रभाव कम हो सके। उत्प्रेरकीय परिवर्तक में सिरेमिक का मधुकोश होता है जिस पर Pd, Pt तथा Rh जैसी दुर्लभ धातुओं की परत चढ़ी होती है। गाड़ी (कार) से उत्सर्जित गैसें जिसमें बिना जला ईंधन, CO तथा NOx होते हैं जब 573 K ताप पर उत्प्रेरकीय परिवर्तक में से गुजरती है तो यह इन्हें CO2 तथा N2 में परिवर्तित कर देता है।

अम्ल वर्षा से बचाव –
अम्ल वर्षा से बचाव के उपाय निम्नलिखित हैं –

  • अम्ल वर्षा के बाद इमारत को सामान्य जल से धोना।
  • एन्टी अम्ल पदार्थ का छिड़काव करना।
  • कम क्षेत्रफल वाले स्थान को प्लास्टिक से ढकना।
  • अम्ल वर्षा के बाद शुष्क हवा बहाना।
  • अम्ल वर्षा के बाद मृदा में क्षारीयता बढ़ाने वाले पदार्थ, जैसे चूना पत्थर डालना।

कणिकीय प्रदूषक –
वायु में निलंबित सूक्ष्म ठोस कण या द्रवीय बूंद कणिकीय प्रदूषक हैं। ये मोटर वाहनों के उत्सर्जन, आग के धूम्र, धूलकण एवं उद्योगों की राख होते हैं। ये कणिकाएँ जीवित (सजीव) तथा निर्जीव दोनों प्रकार की हो सकती हैं। जीवाणु, कवक, फफूद तथा शैवाल आदि जीवित कणिकाओं के उदाहरण हैं। जबकि धूम, धूल, कोहरा तथा धूम्र निर्जीव कणिकाएँ हैं। वायु में पाए। जाने वाले कुछ कवक मनुष्य में एलर्जी उत्पन्न करते हैं तथा ये पौधों में रोग भी उत्पन्न कर सकते हैं।

कणिकाओं का वर्गीकरण – कणिकाओं के आकार तथा उनकी प्रकृति के आधार पर इन्हें चार भागों में वर्गीकृत किया जाता है –
(1) धूम – धूम कणिकाओं में ठोस तथा ठोस – द्रव कणों का मिश्रण होता है, जो कि कार्बनिक पदार्थों के दहन से उत्पन्न होते हैं, जैसे – सिगरेट का धुआँ, जीवाश्म ईंधन के दहन से प्राप्त धूम्र, गंदगी का ढेर, सूखी पत्तियाँ तथा तेल – धूम्र इत्यादि।
(2) धूल – धूल में बारीक ठोस कण (व्यास 1 – 4 µm से अधिक) होते हैं, जो ठोस पदार्थों के पीसने, कुचलने तथा आरोपण से बनते हैं। विस्फोट से प्राप्त बालू, लकड़ी के कार्य से प्राप्त बुरादा, कोयले का बुरादा, कारखानों से उड़ने वाली राख, सीमेन्ट तथा धुएँ के गुबार इत्यादि इस प्रकार के कणिकीय उत्सर्जन के कुछ प्रारूपिक उदाहरण हैं।
(3) कोहरा – फैले हुए द्रव – कणों एवं वाष्प के हवा में संघनन से कोहरा उत्पन्न होता है। जैसे – सल्फ्यूरिक अम्ल का कोहरा तथा शाकनाशी व कीटनाशी, जो अपने लक्ष्य पर न जाकर हवा से गमन करते हैं तथा कोहरा बनाते हैं।
(4) धूम् – धूम्र सामान्यतया ऊर्ध्वपातन, आसवन, क्वथन एवं अन्य रासायनिक अभिक्रियाओं के दौरान प्राप्त वाष्प के संघनन के कारण बनते हैं। प्रायः कार्बनिक विलायक, धातुएँ तथा धात्विक ऑक्साइड धूम्र कणों का निर्माण करते हैं।

कणिकीय प्रदूषकों का प्रभाव – कणिकीय प्रदूषकों का प्रभाव मुख्यतः उनके कणों के आकार पर निर्भर करता है। हवा द्वारा उत्पन्न कण, जैसे – धूल, धूम, कोहरा आदि मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होते हैं। 5 माइक्रोन से बड़े कणिकीय प्रदूषक नासिकाद्वार में एकत्रित हो जाते हैं, जबकि 1.0 माइक्रोन के कण फेफड़ों में आसानी से प्रवेश कर जाते हैं। वाहनों द्वारा उत्सर्जित लेड मुख्य वायु – प्रदूषक होता है। भारतीय शहरों में लेडयुक्त पेट्रोल वायुजनित लेड – उत्सर्जन का प्राथमिक स्रोत है। लेडविहीन (सीसारहित) पेट्रोल का उपयोग करके इस समस्या पर नियंत्रण किया जा सकता है। लेड, लाल रक्त कणिकाओं के विकास एवं उनके परिपक्व होने में बाधा उत्पन्न करता है।

धूम कोहरा या स्मॉग –
स्मॉग एक कोलॉइडी तंत्र है जिसका निर्माण वायुमण्डल में । कोहरा तथा धूम से मिलकर होता है। (स्मोग = स्मोक + फोग) यह वायु प्रदूषण का एक प्रमुख उदाहरण है जो कि विश्व के अनेक शहरों में होता है जहाँ तापमान कम रहता है।

वर्गीकरण – स्मॉग को उसके बनने तथा संरचना के आधार पर दो वर्गों में वर्गीकृत किया जाता है –
(1) अपचायक स्मॉग – इसे सामान्य स्मॉग भी कहते हैं। यह शीतल (ठण्डी) तथा नम जलवायु में उत्पन्न होता है। इसका कारण वायुमण्डल में उपस्थित SO2 गैस है। ईंधन तथा वाहनों में दहन से वायुमण्डल में SO2 गैस उत्सर्जित होती है जो कि धूम तथा कोहरे के साथ मिलकर इसका निर्माण करती है अतः अपचायक स्मॉग धूम, कोहरा तथा SO2 का मिश्रण है। अपचायक स्मॉग का निर्माण सूर्योदय से पूर्व होता है। सूर्योदय के पश्चात् कुछ समय तक इसका प्रभाव बढ़ता जाता है; क्योंकि सूर्य के प्रकाश में SO2, SO3 में ऑक्सीकृत हो जाती है। SO3 जल से क्रिया करके H2SO4 का ऐरोसॉल बनाती है जो कि धुएँ के कार्बन कणों पर संघनित होकर स्मॉग का निर्माण करती है।
2SO2 + O2 → 2SO3
SO3 + H2O → H2SO4
रासायनिक रूप से यह एक अपचायक मिश्रण है।
(2) ऑक्सीकारक स्मॉग – इसे प्रकाश रासायनिक स्मॉग भी कहते हैं। यह गर्म (उष्ण), शुष्क, स्वच्छ तथा धूप युक्त जलवायु में बनता है। मोटरवाहनों तथा कारखानों से उत्सर्जित नाइट्रोजन के ऑक्साइडों तथा हाइड्रोकार्बनों पर सूर्य के प्रकाश की क्रिया से इसका निर्माण होता है। प्रकाश रासायनिक स्मॉग में ऑक्सीकारक पदार्थों की सान्द्रता उच्च होती है इसलिए इसे ऑक्सीकारक स्मॉग भी कहा जाता है।
प्रकाश रासायनिक धूम कोहरे का निर्माण – जब स्वचालित वाहनों तथा कारखानों में जीवाश्म ईंधनों का दहन होता है, तब पृथ्वी के वातावरण में कई प्रदूषकों का उत्सर्जन होता है। इनमें हाइड्रोकार्बन (अदहित ईंधन) तथा नाइट्रिक ऑक्साइड (NO) मुख्य हैं। जब इन प्रदूषकों का स्तर बहुत अधिक हो जाता है, तो सूर्य के प्रकाश से इनकी क्रिया के कारण श्रृंखला अभिक्रिया होती है, जिससे NO, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO2) में परिवर्तित हो जाती है।
2NO(g) + O2(g) → 2NO2(g)
यह सूर्य के प्रकाश से ऊर्जा ग्रहण करके पुनः नाइट्रिक ऑक्साइड तथा मुक्त ऑक्सीजन परमाणु में विघटित हो जाती है।
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ऑक्सीजन परमाणु के अत्यधिक क्रियाशील होने के कारण यह O2 के साथ संयुक्त होकर उसे ओजोन में परिवर्तित कर देता है।
O(g) + O2(g) → O3(g)
इस प्रकार प्राप्त ओजोन पूर्व में प्राप्त NO से तेजी से क्रिया करके पुनः NO2 बनाती है।
NO(g) + O3(g) → NO2(g) +O2(g)
यह एक भूरी गैस होती है, जिसका उच्च स्तर धुंध का कारण हो सकता है। NO2 तथा O3 दोनों ही प्रबल ऑक्सीकारक हैं अतः ये प्रदूषित वायु में उपस्थित अदहित हाइड्रोकार्बन जैसे मेथेन इत्यादि से क्रिया करके कई हानिकारक कार्बनिक यौगिकों जैसे फॉर्मेल्डिहाइड (HCHO), एक्रोलीन (CH2 = CH – CHO) तथा परॉक्सी ऐसीटिल नाइट्रेट
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(द्वितीयक प्रदूषक) का निर्माण करते हैं।
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प्रकाश रासायनिक धूम कोहरे के प्रभाव –

  1. प्रकाश रासायनिक धूम कोहरे के सामान्य घटक ओजोन, नाइट्रिक ऑक्साइड, एक्रोलीन, फार्मेल्डिहाइड एवं परॉक्सीऐसीटिल नाइट्रेट (PAN) हैं।
  2. इसके कारण गंभीर स्वास्थ्य समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। जैसे O3 तथा NO नाक एवं गले में जलन पैदा करते हैं।
  3. ओजोन तथा PAN आँखों में बहुत अधिक जलन उत्पन्न करते हैं।
  4. ओजोन तथा नाइट्रिक ऑक्साइड की उच्च सान्द्रता से सिरदर्द, छाती में दर्द, गले का शुष्क होना, खाँसी तथा श्वास लेने में तकलीफ जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।
  5. प्रकाश रासायनिक धूम कोहरे से रबर में दरार उत्पन्न हो जाती है।
  6. यह धातुओं, पत्थरों, भवन निर्माण सामग्री तथा पेन्ट की हुई सतहों का संक्षारण करता है।
  7. इससे पौधों पर भी हानिकारक प्रभाव होता है।

प्रकाश रासायनिक धूम कोहरे का नियंत्रण –
प्रकाश रासायनिक धूम – कोहरे को नियंत्रित करने के लिए कई तकनीकों का प्रयोग किया जाता है। यदि प्रकाश रासायनिक धूम – कोहरे के लिए जिम्मेदार प्राथमिक पूर्वगामी, जैसे – NO2 तथा हाइड्रोकार्बन को नियंत्रित कर लिया जाए तो द्वितीयक पूर्वगामी जैसे – ओजोन, PAN तथा प्रकाश रासायनिक धूम – कोहरा स्वतः ही कम हो जाएगा। स्वचालित वाहनों में उत्प्रेरित परिवर्तक के प्रयोग से वायुमण्डल में नाइट्रोजन के ऑक्साइड तथा हाइड्रोकार्बन का उत्सर्जन बहुत कम होता है। क्वेरकस पाईनस, पायरस, विटिस तथा जुनीपेरस जैसे पौधे नाइट्रोजन ऑक्साइडों का उपापचयन करते हैं अतः इनके रोपण से भी प्रकाश रासायनिक धूम कोहरे के निर्माण में कमी लायी जा सकती है।

समतापमंडलीय प्रदूषण:
ओजोन का विरचन एवं विघटन –
ऊपरी समताप – मण्डल (समुद्र तल से 10 – 50 km ऊपर तक का क्षेत्रफल) में ओजोन प्रचुर मात्रा में होती है। इसके अतिरिक्त N2, O2 तथा सूक्ष्म मात्रा में जल वाष्प भी पायी जाती है। ओजोन सूर्य से आने वाली पराबैंगनी विकिरणों के 99.5 प्रतिशत भाग को रोककर हमें इन हानिकारक विकिरणों से बचाती है। इन विकिरणों से त्वचा – कैंसर (मेलेनोमा) होता है। अतः ओजोन – कवच को बचाए रखना आवश्यक है। समतापमण्डल में पराबैंगनी विकिरणों की ऑक्सीजन से क्रिया द्वारा ओजोन का निर्माण होता है। पराबैंगनी विकिरण आण्विक ऑक्सीजन को मुक्त ऑक्सीजन (O) परमाणुओं में विखण्डित कर देते हैं। जो कि आण्विक ऑक्सीजन से संयुक्त होकर ओजोन बनाते हैं।
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ओजोन ऊष्मागतिकीय रूप से अस्थायी होती है एवं यह आण्विक ऑक्सीजन में विघटित हो जाती है। इस प्रकार ओजोन के निर्माण एवं विघटन के मध्य एक गतिक साम्य स्थापित हो जाता है। अभी हाल ही के वर्षों में समतापमण्डल में उपस्थित कुछ रसायनों के कारण ओजोन की इस सुरक्षा – परत का क्षय होना प्रारम्भ हो गया है। ओजोन परत के इस क्षय का मुख्य कारण क्लोरोफ्लोरोकार्बन (फ्रेऑन) (CFCs) का उत्सर्जन है। फ्रेऑन अक्रिय, अज्वलनशील तथा अविषाक्त पदार्थ हैं, अतः इन्हें रेफ्रिजरेटर, एयर – कंडीशनर, प्लास्टिक फोम के निर्माण में एवं इलेक्ट्रॉनिक उद्योग में कम्प्यूटर के पुर्षों की सफाई करने में प्रयुक्त किया जाता है। सामान्यतः ताप तथा दाब की परिस्थितियों में भूमध्य रेखा के ऊपर ओजोन की सांद्रता 0.29 cm और ध्रुवों पर यह 0.40 cm तक पायी जाती है।
वायुमण्डल में एक बार फ्रेऑन के उत्सर्जित होने पर ये वायुमण्डल की अन्य गैसों के साथ मिलकर सीधे समतापमण्डल में पहुँच जाते हैं। समतापमण्डल में ये शक्तिशाली पराबैंगनी विकिरणों द्वारा विघटित होकर क्लोरीन मुक्त मूलक बनाते हैं।
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क्लोरीन मुक्त मूलक समतापमण्डल में स्थित ओजोन से अभिक्रिया करके क्लोरीन मोनोऑक्साइड मूलक (\(\dot { C } \)lO) तथा आण्विक ऑक्सीजन बनाते हैं।
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क्लोरीन मोनोऑक्साइड मूलक परमाण्वीय ऑक्सीजन के साथ अभिक्रिया करके अधिक क्लोरीन मूलक उत्पन्न करता है।
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इस प्रकार क्लोरीन मूलक लगातार बनते रहते हैं तथा ओजोन को विखण्डित करते रहते हैं। अतः CFC समतापमण्डल में क्लोरीन मूलकों को उत्पन्न करने वाले एवं ओजोन परत को क्षति पहुँचाने वाले परिवहनीय कारक हैं। ओजोन परत के क्षय के कारणों को खोजने के लिए शेरवुड रोलेण्ड मारियो मेलिना एवं पॉल क्रट्जन को सन् 1945 में रसायन शास्त्र के क्षेत्र में नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

ओजोन छिद्र –
सन् 1980 में वायुमण्डलीय वैज्ञानिकों ने अंटार्कटिका पर कार्य करते हुए दक्षिणी ध्रुव के ऊपर ओजोन परत के क्षय के बारे में बताया जिसे सामान्य रूप से ‘ओजोन छिद्र’ कहा जाता है। गरमी में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड तथा मेथेन क्रमशः क्लोरीन मोनोऑक्साइड तथा क्लोरीन परमाणुओं से अभिक्रिया करके क्लोरीन सिंक बनाते हैं, जो ओजोन – क्षय को काफी हद तक रोकता है।
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सर्दी के मौसम में अंटार्कटिका के ऊपर विशेष प्रकार के बादल बनते हैं जिन्हें ध्रुवीय समतापमण्डलीय बादल कहते हैं। ये बादल एक प्रकार की सतह प्रदान करते हैं जिस पर क्लोरीन नाइट्रेट जलअपघटित होकर हाइपोक्लोरस अम्ल बनाता है तथा उपरोक्त अभिक्रिया में उत्पन्न हाइड्रोजन क्लोराइड भी क्लोरीन नाइट्रेट से क्रिया करके आण्विक क्लोरीन देता है।
ClONO2 (g) + H2O (g) → HOCl (g) + HNO3 (g)
ClONO2 (g) + HCl (g) → Cl2 (g) + HNO3 (g)
बसंत ऋतु में जब सूर्य का प्रकाश अंटार्कटिका पर आता है तो सूर्य की गर्मी से बादल विखण्डित हो जाते हैं तथा सूर्य के प्रकाश से HOCl तथा Cl2 का भी अपघटन हो जाता है।
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इस प्रकार उत्पन्न क्लोरीन मूलक, ओजोन क्षय के लिए श्रृंखला अभिक्रिया प्रारम्भ कर देते हैं।
उपरोक्त अभिक्रियाओं को सम्मिलित रूप से इस प्रकार लिखा जा सकता है –
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ओजोन परत के क्षय के प्रभाव:
ओजोन परत के क्षय के कारण अधिकाधिक पराबैंगनी विकिरण क्षोभमण्डल में छनित होते हैं, जिनसे त्वचा का जीर्णन, मोतियाबिंद, सनबर्न, त्वचा – कैंसर जैसी बीमारियाँ होती हैं तथा इससे पादपप्लवकों की मृत्यु तथा मत्स्य उत्पादन में कमी होती है। पौधों के प्रोटीन, पराबैंगनी विकिरणों से आसानी से प्रभावित हो जाते हैं, जिससे कोशिकाओं में हानिकारक उत्परिवर्तन होता है। इसके कारण पत्तियों के रंध्रों से जल का वाष्पीकरण बढ़ जाता है, जिससे मिट्टी की नमी कम हो जाती है। बढ़े हुए पराबैंगनी विकिरण रंगों एवं रेशों को भी हानि पहुंचाते हैं, जिससे रंग जल्दी हल्के हो जाते हैं।पराबैंगनी विकिरणों से शरीर के सम्पूर्ण प्रतिरोधी तंत्र की कार्यक्षमता में गिरावट आ जाती है। इनसे शिशुओं में भी विकृतियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। ये विकिरण प्रकाश संश्लेषण की क्रिया को भी कम करते हैं। इनसे जैविक तत्त्वों के आनुवंशिक घटक न्यूक्लिक अम्ल को भी क्षति पहुँचती है तथा जीवन की खाद्य श्रृंखलाएँ अनियंत्रित हो जाती हैं। इस प्रकार इनसे सम्पूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र पर विनाशकारी प्रभाव पड़ता है।

वायु प्रदूषण का नियन्त्रण –
निम्नलिखित उपायों द्वारा वायु प्रदूषण को काफी हद तक कम किया जा सकता है –

  1. वायु प्रदूषण का सार्थक नियन्त्रण ‘हरित क्रान्ति’ द्वारा सम्भव है।
  2. औद्योगिक चिमनियों से निकलने वाली गैसों को कार्बन से मुक्त करके वायुमण्डल में छोड़ा जाना चाहिए।
  3. सीमित क्षेत्र में ही विशेष प्रकार के प्रदूषण रहित उद्योगों को स्थापित किया जाना चाहिए।
  4. मोटर वाहनों में सीसारहित पेट्रोल का प्रयोग किया जाना चाहिए।
  5. वाहनों में उत्प्रेरकीय कन्वर्टर’ लगाकर प्रदूषण को कम करना चाहिए।
  6. C.N.G. गैसयुक्त वाहनों को ही चलने की अनुमति प्रदान की जानी चाहिए।
  7. ईंधन के रूप में गोबर गैस, बायो गैस इत्यादि का प्रयोग किया जाना चाहिए।
  8. यथासंभव जीवाश्म ईंधन के स्थान पर सौर ऊर्जा द्वारा चलित वाहनों का प्रयोग किया जाना चाहिए।
  9. कूड़ा और जैव-क्षय के पदार्थों को खुली वायु में नहीं छोड़ा जाना चाहिए।
  10. मानवीय – जागरूकता द्वारा भी वायु – प्रदूषण को कम किया जा सकता है। जैसे – लाल बत्ती संकेतक पर खड़े हजारों वाहन यदि इंजन को कुछ समय के लिए बन्द कर दें तो काफी मात्रा में वायु प्रदूषण कम हो सकता है।

प्रश्न 26.
हरित रसायन क्या है तथा प्रदूषण घटाने में इसके योगदान का वर्णन कीजिये।
उत्तर:
हरित रसायन:
पर्यावरण प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए 1990 के दशक में एक सिद्धान्त प्रतिपादित किया गया जिसे हरित रसायन के नाम से जाना जाता है। इसके अनुसार उन प्रक्रियाओं, प्रणालियों एवं उत्पादों को विकसित करने पर जोर दिया जाना चाहिए जो हानिकारक पदार्थों के उपयोग और उत्पादन को यथासंभव कम कर दे या रोक दे, जिससे विषैले पदार्थ वायुमण्डल, जल या भूमि में विसरित ना हो तथा पर्यावरण को प्रदूषित ना कर सके। अतः रसायन विज्ञान तथा विज्ञान की अन्य शाखाओं के उन सिद्धान्तों का ज्ञान, जिनके प्रयोग से पर्यावरण के दुष्प्रभावों को कम किया जा सकता है, उसे ‘हरित रसायन’ कहते हैं। हरित रसायन के अनुसार औद्योगिक जगत में, प्रयोग शालाओं में तथा अनुसंधान संस्थाओं में उन अभिकर्मकों, आरम्भिक पदार्थों, विलायकों आदि का प्रयोग किया जाना चाहिए जो मानव समाज एवं पर्यावरण के लिए हानिकारक न हो या कम हो तथा ये कम से कम अपशिष्ट या न्यूनतम अपशिष्ट उत्पन्न करे।

वस्त्रों की धुलाई में प्रयुक्त होने वाले अपमार्जकों को एंजाइमों द्वारा समाप्त किया जाए। वाहनों में उपयोग में लिए जाने वाले ईंधन के धुएँ से वायु प्रदूषण होता है। अतः वैज्ञानिक खोजों से हाइड्रोजन, बायोडीजल तथा ईंधन सेल से चलने वाले वाहनों को विकसित करने का प्रयास किया जा रहा है। कुछ ऐसे जलीय एवं अजलीय विलायक तैयार किए जा रहे हैं जो मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नहीं है और न ही पर्यावरण को प्रदूषित करते हैं। जल कीउच्च विशिष्ट ऊष्मा तथा कम वाष्पशीलता के कारण इसे संश्लेषित अभिक्रियाओं में माध्यम के रूप में प्रयुक्त किया जा सकता है। जल सस्ता, अज्वलनशील एवं अकैंसरजन्य माध्यम है।

कुछ ऐसे उपकरण तथा प्रक्रियाओं का विकास किया जा रहा है जो अपशिष्टों को औद्योगिक रसायनों तथा ईंधन आदि में बदल देता है। कृषि रसायन की नवीन विधियों के अनुसार सायनाइड जैसे विषैले पदार्थों के उपयोग की आवश्यकता ही नहीं होगी। फ्रिओन्स (क्लोरोफ्लोरोकार्बन) के स्थान पर द्रव नाइट्रोजन, द्रव कार्बन डाइऑक्साइड आदि का प्रयोग किया जा रहा है। रासायनिक अभिक्रियाओं को पराबैंगनी प्रकाश ध्वनि तरंगों एवं सूक्ष्म तरंगों आदि की उपस्थिति में करवाए जाने का प्रयास किया जा रहा है। इसी तरह उत्प्रेरकों को काम में लेते हुए भी अभिक्रिया करवायी जा सकती है। कुछ देशों में सल्फर डाइ ऑक्साइड को तप्त कोल विधि अथवा चूने के पत्थर से परिवर्तित कर दिया जाता है, अतः इससे होने वाला प्रदूषण कम हो जाता है।
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 14 पर्यावरणीय रसायन img 25
अतः हरित रसायन पदार्थों के उत्पादन का प्रक्रम है जो पर्यावरण में न्यूनतम प्रदूषण उत्पन्न करता है। सारांशतः यह कहा जा सकता है कि विकास कार्यों के साथ – साथ वर्तमान ज्ञान का रासायनिक हानि को कम करने के लिए उपयोग में लाना ही हरित रसायन का मूल आधार है।
दैनिक जीवन में हरित रसायन – दैनिक जीवन में हरित रसायन को निम्नलिखित उदाहरणों द्वारा समझा जा सकता है –
(1) कपड़ों की निर्जल धुलाई में –
प्रारम्भ में निर्जल धुलाई के लिए टेट्राक्लोरोएथीन (CCl2 = CCl2) का उपयोग किया जाता था लेकिन यह भू – जल को प्रदूषित कर देता है तथा यह एक संभावित कैंसरजन्य भी है। अतः आजकल धुलाई में इसके स्थान पर उपयुक्त अपमार्जक के साथ द्रव CO2 को प्रयुक्त किया जाता है। हैलोजेनीकृत विलायक का द्रव CO2 से प्रतिस्थापन भू – जल के लिए कम हानिकारक होता है। आजकल लॉन्ड्री में कपड़ों के विरंजन के लिए हाइड्रोजन परॉक्साइड का उपयोग किया जाता है, जिससे अच्छे परिणाम प्राप्त होते हैं तथा इसमें जल का उपयोग भी कम होता है।
(2) पेपर का विरंजन –
पहले पेपर के विरंजन के लिए क्लोरीन गैस उपयोग में लेते थे। आजकल उत्प्रेरक की उपस्थिति में हाइड्रोजन परॉक्साइड को विरंजन के लिए प्रयोग में लाया जाता है, जिससे विरंजन की दर बढ़ जाती है।
(3) रसायनों का संश्लेषण –
रासायनिक उत्प्रेरकों की उपस्थिति में जलीय विलयन में एथीन के ऑक्सीकरण से लगभग 90% एथेनैल प्राप्त होता है। यह एथेनैल बनाने की व्यापारिक विधि है।
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संक्षेप में, हरित रसायन एक कम लागत का उपागम है, जो कम पदार्थ, कम ऊर्जा-उपभोग तथा कम अपशिष्ट जनन से सम्बन्धित है।

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RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन

July 2, 2019 by Prasanna Leave a Comment

RBSE Class 11 Chemistry Chapter 13 34

Rajasthan Board RBSE Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन

RBSE Class 11 Chemistry Chapter 13 पाठ्यपुस्तक के अभ्यास प्रश्न

RBSE Class 11 Chemistry Chapter 13 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
आइसोपेन्टेन में 3°, 2° तथा 1° हाइड्रोजन की संख्या क्रमशः होगी –
(अ) 1, 9, 2
(ब) 9, 1, 2
(स) 2, 1, 9
(द) 1, 2, 9

प्रश्न 2.
2 – ब्यूटीन व HBr के योग से प्राप्त उत्पाद की वुटुंज अभिक्रिया कराने पर प्राप्त ऐल्केन –
(अ) एकशाखित होगी
(ब) द्विशाखित होगी।
(स) त्रिशाखित होगी
(द) अशाखित होगी

प्रश्न 3.
योगात्मक अभिक्रिया निम्न वर्ग के यौगिकों द्वारा नहीं दर्शाई जाती है –
(अ) ऐल्केन
(ब) एल्काडाइईन
(स) साइक्लोएल्कीन
(द) कीटोन

प्रश्न 4.
सामान्य दशा के अन्तर्गत मेथेन से कौन अभिक्रिया नहीं करेगा –
(अ) I2
(ब) Cl2
(स) Br2
(द) F2

प्रश्न 5.
एथीलीन व HX की क्रिया में एथिल कार्बोनियम आयन किसमें तीव्रता से बनता है –
(अ) HI
(ब) HBr
(स) HCl
(द) उपरोक्त सभी

उत्तरमाला:
1. (द)
2. (ब)
3. (अ)
4. (अ)
5. (अ)

RBSE Class 11 Chemistry Chapter 13 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 6.
पैराफिन और ओलिफिन किन्हें कहते हैं? प्रत्येक का एक – एक उदाहरण दीजिये और उनमें विभेद करने के रासायनिक परीक्षण लिखिये।
उत्तर:
ऐल्केनों को पैराफिन कहते हैं क्योंकि Parum यानी कम तथा affins यानी क्रियाशील होता है अर्थात् ये कम क्रियाशील होते हैं।
उदाहरण – एथेन।
एल्कीनों को ओलिफीन कहा जाता है क्योंकि इस श्रेणी का प्रथम सदस्य (एथीन) क्लोरीन से क्रिया करके तैलीय द्रव जैसे उत्पाद बनाता है तथा ओलिफीन का अर्थ होता है तैलीय पदार्थ बनाने वाले।
उदाहरण – एथीन एथीन ब्रोमीन विलयन को विरंजित करती है लेकिन एथेन नहीं।

प्रश्न 7.
ऐल्कीनों का सामान्य सूत्र लिखिये और उनको बनाने की सामान्य विधियों का वर्णन कीजिये।
उत्तर:
ऐल्कीनों का सामान्य सूत्र CnH2n होता है तथा इनके बनाने की सामान्य विधियों –

  1. एल्काइनों के आंशिक हाइड्रोजनीकरण से:
    ऐल्काइनों की अभिक्रिया, सल्फर जैसे विषाक्त यौगिकों द्वारा आंशिक निष्क्रिय पैलेडिकृत चारकोल की उपस्थिति में हाइड्रोजन की परिकलित मात्रा के साथ करवाने पर आंशिक अपचयन द्वारा ऐल्कीन बनती है। आंशिक निष्क्रिय पैलेडिकृत चारकोल को लिंडलार उत्प्रेरक कहते हैं। यह Pd, CaCO3, लैड एसीटेट तथा क्विनोलीन का मिश्रण होता है। इस अभिक्रिया लिण्डलार उत्प्रेरक के साथ समपक्ष ऐल्कीन बनती है लेकिन सोडियम तथा द्रव NH3 से अपचयन कराने पर विपक्ष ऐल्कीन बनती है। (त्रिविम विशिष्ट योग)
    RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 1
  2. ऐल्किल हैलाइडों के विहाइड्रोहैलोजेनीकरण द्वारा:
    ऐल्किल हैलाइड को ऐल्कोहॉली कॉस्टिक पोटाश (KOH) विलयन या एथिल ऐल्कोहॉल में सोडियम एथॉक्साइड के साथ गरम करने पर हैलोजेन अम्ल के अणु का विलोपन होकर ऐल्कीन प्राप्त होती है। इस अभिक्रिया को विहाइड्रोहैलोजेनीकरण कहते हैं।
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    यह एक β – विलोपन अभिक्रिया है क्योंकि इसमें β – कार्बन परमाणु (हैलोजन युक्त कार्बन का अगला कार्बन) से हाइड्रोजन परमाणु का विलोपन होता है। अभिक्रिया का वेग ऐल्किल समूह तथा हैलोजन परमाणु की प्रकृति पर निर्भर करता है। ऐल्किल समूह बदलने पर अभिक्रिया का वेग निम्न क्रम में होता है – 3°> 2° > 1° तथा हैलोजन बदलने पर अभिक्रिया के वेग का क्रम निम्न प्रकार होता है – आयोडीन > ब्रोमीन > क्लोरीन
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    जब किसी ऐल्किल हैलाइड के विहाइड्रोहैलोजेनीकरण से दो समावयवी ऐल्कीनों के बनने की सम्भावना हो तो अधिक प्रतिस्थापित एथिलीन अधिक मात्रा में बनती है। इसे सैत्जेफ का नियम कहते हैं। जैसे – द्वितीयक-ब्यूटिल हैलाइड के विहाइड्रोहैलोजेनीकरण पर β – ब्यूटिलीन (80%) तथा α – ब्यूटिलीन (20%) का मिश्रण प्राप्त होता है।
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    नोट – ऐल्किल हैलाइड का विहाइड्रोहैलोजेनीकरण ब्यूटिल ऐल्कोहॉल में पोटैशियम ब्यूटॉक्साइड द्वारा कराने पर कम स्थायी (कम प्रतिस्थापित) ऐल्कीन मुख्य उत्पाद होती है।
  3. डाइलाइडों के विहैलोजेनीकरण से:
    (a) निकटवर्ती (सन्निध) डाइहैलाइडों द्वारा –
    वे डाइहैलाइड जिनमें हैलोजन परमाणु दो निकटवर्ती कार्बन परमाणुओं पर उपस्थित होते हैं उन्हें निकटवर्ती डाइहैलाइड कहते हैं। निकटवर्ती डाइहैलाइडों को जिंक रज तथा मेथिल ऐल्कोहॉल के साथ गर्म करने पर एल्कीन बनती है। इस अभिक्रिया को विहैलोजेनीकरण कहते हैं क्योंकि इसमें हैलोजन का विलोपन होता है।
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    (b) जेम डाइहैलाइडों से: वे डाइहैलाइड जिनमें दोनों हैलोजन परमाणु एक ही कार्बन परमाणु से जुड़े होते हैं उन्हें जेम डाइहैलाइड कहा जाता है। इनकी क्रिया जिंक तथा मेथिल ऐल्कोहॉल के साथ करवाने पर उच्च तथा सममित एल्कीन बनती है जिसमें कार्बन परमाणुओं की संख्या जेम डाइहैलाइड से दुगुनी होती है।
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  4. ऐल्कोहॉलों के निर्जलीकरण से:
    ऐल्कोहॉलों को सान्द्र H2SO4 (निर्जलीकारक तथा उत्प्रेरक) के साथ गरम करने पर जल के एक अणु में विलोपन होकर ऐल्कीन बनती है। इस अभिक्रिया को ऐल्कोहॉलों का अम्लीय निर्जलीकरण कहते हैं। यह भी एक β – विलोपन अभिक्रिया है, क्योंकि इसमें β – कार्बन परमाणु से हाइड्रोजन परमाणु हटता है।
    RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 7
    निर्जलीकारक के रूप में सान्द्र H3PO4, Al2O3, ऐलुमिना (350° C) ZnCl2 तथा P2O5 इत्यादि को भी प्रयुक्त किया जा सकता है। ऐल्कोहॉलों के निर्जलीकरण की सुगमता का क्रम निम्न प्रकार होता है – 3° > 2० > 1°
    RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 8
    इस अभिक्रिया में भी सेत्जैफ का नियम लागू होता है जिसके अनुसार यदि किसी ऐल्कोहॉल के निर्जलीकरण से दो प्रकार की ऐल्कीन बनने की संभावना हो तो अधिक प्रतिस्थापित ऐल्कीन अधिक मात्रा में बनती है।
  5. ऐल्केनों के ताप अपघटन द्वारा विहाइड्रोजनीकरण:
    ऐल्केनों को 500 – 700°C पर गरम करने पर ऐल्कीन, निम्नतर ऐल्केन तथा हाइड्रोजन का मिश्रण प्राप्त होता है।
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  6. एस्टरों के ताप अपघटन द्वारा:
    एस्टर की वाष्प को 400 – 600°C पर गरम करने से कार्बोक्सिलिक अम्ल के विलोपन द्वारा ऐल्कीन बनती है।
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  7. कोल्बे विद्युत अपघटनी संश्लेषण द्वारा:
    जब पोटैशियम अथवा सोडियम सक्सिनेट के सान्द्र जलीय विलयन का विद्युत अपघटन किया जाता है। तो ऐनोड पर एथीन प्राप्त होती है। इसी प्रकार सोडियम सक्सिनेट के ऐल्किल व्युत्पन्नों के प्रयोग से विभिन्न एल्कीन बनाई जा सकती हैं।
    RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 11
  8. ग्रीन्यार अभिकर्मक द्वारा:
    ऐल्किलमैग्नीशियम हैलाइड (ग्रीन्यार अभिकर्मक) की ऐलिल हैलाइड से क्रिया द्वारा उच्च अन्तस्थ एल्कीन बनती है। जैसे मेथिलमैग्नीशियम क्लोराइड की ऐलिल क्लोराइड से क्रिया कराने पर α – ब्यूटिलीन प्राप्त होती है।
    RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 12

प्रश्न 8.
निम्नलिखित से केवल एक पद में एथीन बनाने की समीकरण लिखिये
(क) एथेनॉल
(ख) एथिल ब्रोमाइड
(ग) एथाइन
(घ) एथिलीन डाइब्रोमाइड।
उत्तर:
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 13
प्रश्न 9.
मार्कोनीकॉफ नियम की परिभाषा लिखिये तथा उपयुक्त उदाहरण दीजिये।
उत्तर:
मार्कोनीकॉफ का नियम – इस नियम के अनुसार, असममित ऐल्कीन तथा ऐल्काइन पर जुड़ने वाले यौगिक का ऋणात्मक भाग उस असंतृप्त कार्बन पर जुड़ता है, जिस पर हाइड्रोजन परमाणुओं की संख्या कम हो।
उदाहरण –
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 14
प्रश्न 10.
ऐल्कीनों में HBr का योग मार्कोनीकॉफ नियम के आधार पर समझाइये।
उत्तर:
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 15
इस अभिक्रिया में B\(\bar { r } \) द्वितीय कार्बन पर जुड़ रहा है जो कि मार्कोनीकॉफ के नियम के अनुसार है क्योंकि इस नियम के अनुसार यौगिक का ऋणात्मक सिरा उस असंतृप्त कार्बन पर जुड़ता है जिस पर हाइड्रोजन परमाणुओं की संख्या कम हो।

प्रश्न 11.
ऐसीटीलीन श्रेणी के प्रथम तीन सदस्यों के सूत्र और नाम लिखिये।
उत्तर:
ऐसीटीलीन श्रेणी के प्रथम तीन सदस्य HC ≡ CH (एथाइन), CH3C ≡ CH (प्रोपाइन) तथा CH3 – CH2 – C ≡ CH (ब्यूट – 1 – आइन)

प्रश्न 12.
ऐल्कीन और ऐल्काइन श्रेणियों के सामान्य सूत्र बताइये और उनमें विभेद करने के रासायनिक परीक्षण लिखिए।
उत्तर:
ऐल्कीन और ऐल्काइन श्रेणी के सामान्य सूत्र CnH2n तथा CnH2n-2 हैं। एल्कीन सोडामाइड तथा अमोनियामय क्युप्रस क्लोराइड से क्रिया नहीं करती लेकिन 1 – एल्काइन इनसे क्रिया करके धातु व्युत्पन्न बनाती हैं।

प्रश्न 13.
1°, 2° और 3° हाइड्रोजन किसे कहते हैं? उदाहरण द्वारा समझाइये।
उत्तर:
1°, 2° और 3° हाइड्रोजन क्रमशः 1°, 2° तथा 3° कार्बन से जुड़े होते हैं। 1°, 2° तथा 3° कार्बन क्रमशः 1, 2, तथा 3 कार्बन से जुड़े होते हैं।
उदाहरण –
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 16
आइसोपेन्टेन में 1°, 2° तथा 3° हाइड्रोजन परमाणुओं की संख्या क्रमशः 9, 2 तथा 1 है।

प्रश्न 14.
मेथेन का चतुष्फलकीय चित्र खींचिये और H – C – H कोण का मान बताइये।
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 17
मेथेन में H – C – H बन्ध कोण 109° 28′ (109.5°) होता है।

प्रश्न 15.
निम्नलिखित से केवल एक पद में ऐसीटिलीन बनाने की समीकरणे लिखिये –
1. एथिलीन डाइब्रोमाइड
2. ट्राइक्लोरोमेथेन
3. एथिलिडीन डाइक्लोराइड
4. ऐसीटिलीन टेट्राब्रोमाइड
उत्तर:
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 18
प्रश्न 16.
कार्बनिक यौगिकों में असंतृप्तता पहचान करने के दो रासायनिक परीक्षण दीजिये।
उत्तर:
कार्बनिक यौगिक में असंतृप्तता होने पर वह बेयर अभिकर्मक के गुलाबी रंग को रंगहीन कर देता है तथा ब्रोमीन के नारंगी, लाल विलयन को भी विरंजित करता है।

प्रश्न 17.
समीकरण देते हुए बताइये क्या होता है? जब –

  1. एथिल ऐल्कोहॉल को सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल के आधिक्य के साथ 160°C पर गर्म करते हैं।
  2. एथाइन को क्षारीय पोटेशियम परमैंगनेट के ठण्डे जलीय विलयन में प्रवाहित करते हैं।
  3. एथिल ऐल्कोहॉल की वाष्प को गर्म ऐलुमिनियम ऑक्साइड में 360°C पर प्रवाहित करते हैं।
  4. आइसोप्रोपिल ब्रोमाइड को ऐल्कोहॉलिक KOH के साथ गर्म करते हैं।
  5. एथिलीन पर परॉक्साइड उत्प्रेरक की उपस्थिति में उच्च दाब पर लगाया जाता है।
  6. प्रोपिलीन को पोटेशियम परमैंगनेट के गर्म जलीय विलयन में प्रवाहित करते हैं।
  7. एथिलीन की हाइपोक्लोरस अम्ल से अभिक्रिया होती है।
  8. ओजोन की एथिलीन से अभिक्रिया करायी जाती है।

उत्तर:
1. एथीन बनती है –
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 19
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 20
प्रश्न 18.
एथिलीन से निम्नलिखित कैसे बनायेंगे –

  1. ऐसीटिलीन
  2. फॉर्मेल्डिहाइड
  3. एथिलीन ग्लाइकॉल
  4. एथिलीन क्लोरोहाइड्रिन
  5. एथिल ऐल्कोहॉल
  6. एथिलीन ऑक्साइड

उत्तर:
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 21
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 22
प्रश्न 19.
एथेन, एथिलीन और ऐसीटिलीन में कार्बन – कार्बन बन्ध की तुलना बन्धन दूरी, दृढ़ता और अभिक्रियाशीलता में कीजिये।
उत्तर:
एथेन, एथिलीन और ऐसीटिलीन में कार्बन – कार्बन बन्ध के विभिन्न गुणों का क्रम निम्न प्रकार है –
बन्धन दूरी – एथेन > एथिलीन > ऐसीटिलीन
दृढ़ता – एथेन > ऐसीटिलीन > एथिलीन
क्रियाशीलता – एथिलीन > ऐसीटिलीन > एथेन

प्रश्न 20.
निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिये –

  1. एथिलीन का ब्रोमीनीकरण
  2. एथिलीन का बहुलकीकरण
  3. मार्कोनीकॉफ का नियम
  4. ओजोनी अपघटन

उत्तर:

  1. एथिलीन की ब्रोमीन विलयन (CCl4 में) से क्रिया कराने पर एथिलीन ब्रोमाइड बनता है। इसे एथिलीन का ब्रोमीनीकरण कहते हैं।
    RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 23
  2. एथिलीन का उच्च ताप, उच्च दाब तथा उत्प्रेरक की उपस्थिति में बहुलकीकरण करने पर पॉलिएथिलीन (पॉलिथीन) बनती है।
    RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 24
  3. मार्कोनीकॉफ का नियम – इस नियम के अनुसार, असममित ऐल्कीन तथा ऐल्काइन पर जुड़ने वाले यौगिक का ऋणात्मक भाग उस असंतृप्त कार्बन पर जुड़ता है, जिस पर हाइड्रोजन परमाणुओं की संख्या कम हो।
    उदाहरण –
    RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 25
  4. एल्कीनों की ओजोन से क्रिया कराने पर पहले एल्कीन ओजोनाइड बनता है जिसकी क्रिया Zn की उपस्थिति में H2O से कराने पर कार्बोनिल यौगिक बनते हैं। इस अभिक्रिया को ओजोनी अपघटन कहते हैं।
    उदाहरण –
    RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 26

प्रश्न 21.
निम्नलिखित के संरचना सूत्र लिखिये –

  1. एथिलीन ग्लाइकॉल
  2. एथिलिडीन डाइब्रोमाइड
  3. एथिलीन डाइब्रोमाइड
  4. आइसोप्रोपिल ब्रोमाइड
  5. 2 – मेथिल – 3 – हेक्सीन
  6. प्रोपिलीन ऑक्साइड

उत्तर:
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 27

RBSE Class 11 Chemistry Chapter 13 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 22.
परॉक्साइड प्रभाव किसे कहते हैं? एक उदाहरण देकर समझाइए।
उत्तर:
परॉक्साइड प्रभाव – परॉक्साइड की उपस्थिति में किसी असममित ऐल्कीन पर HBr का योग परॉक्साइड प्रभाव (खराश प्रभाव) या प्रति मार्कोनीकॉफ नियम के अनुसार होता है, जिसके अनुसार किसी असममित ऐल्कीन पर परॉक्साइड की उपस्थिति में HBr का योग होने पर ब्रोमीन मुक्त मूलक उस असंतृप्त कार्बन पर जुड़ता है जिस पर हाइड्रोजन परमाणुओं की संख्या अधिक होती है।
उदाहरण –
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 28

प्रश्न 23.
सिस – 2 – ब्यूटीन की ब्रोमीन से अभिक्रिया कराने पर बने त्रिविम – समावयवियों की संरचनाएँ लिखिये।
उत्तर:
सिस – 2 – ब्यूटीन की ब्रोमीन से अभिक्रिया कराने पर निम्नलिखित तीन त्रिविम समावयवी बनते हैं –
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 29
प्रश्न 24.
1 – ब्यूटीन की ब्रोमीन (Br2) से अभिक्रिया कराने पर बने उत्पादों की संरचनाएँ और उनके नाम लिखिये।
उत्तर:
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 30
इसके दो समावयवी होते हैं – d तथा l
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 31

प्रश्न 25.
1, 3 – ब्यूटाडाइईन में केन्द्रीय कार्बन – कार्बन आबन्ध, n – ब्यूटेन के सम्बन्धित आबन्ध से छोटा होता है। क्यों?
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 32
1, 3 – ब्यूटाडाइईन का केन्द्रीय कार्बन कार्बन आबन्ध sp2 – sp2 अतिव्यापन से बना है जबकि ब्यूटेन में यह आबन्ध sp3 – sp3 अतिव्यापन से बना है। sp2 कक्षक में s गुण (33%) sp3 कक्षक में s गुण (25%) से अधिक होता है जिससे बन्ध छोटा हो जाता है क्योंकि s गुण बढ़ने पर बन्ध – लम्बाई कम हो जाती है।

प्रश्न 26.
रासायनिक समीकरण देते हुए बताइये क्या होता है, जब –

  1. अमोनियामय क्यूप्रस क्लोराइड विलयन में ऐसीटिलीन गैस प्रवाहित की जाती है।
  2. ऐसीटिलीन गैस को रक्त तप्त नली में प्रवाहित करते हैं।
  3. ऐसीटिलीन तनु सल्फ्यूरिक अम्ल में मयूंरिक सल्फेट की उपस्थिति में प्रवाहित की जाती है।
  4. ऐसीटिलीन मयूंरिक क्लोराइड की उपस्थिति में हाइड्रोक्लोरिक अम्ल से क्रिया करती है।
  5. ऐसीटिलीन Hg+ और H+ आयनों युक्त जलीय विलयन में प्रवाहित की जाती है।
  6. ऐसीटिलीन गैस को हाइपोक्लोरस अम्ल में प्रवाहित करते है।

उत्तर:
1. क्युप्रस ऐसीटिलाइड का लाल अवक्षेप बनता है –
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 33
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5.
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 35
6. डाइक्लोरो ऐसीटैल्डिहाइड बनता है –
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 36
प्रश्न 27.
निम्नलिखित के बीच कैसे विभेद कीजियेगा? रासायनिक परीक्षण दीजिये –

  1. एथिलीन और ऐसीटिलीन
  2. एथेन और एथाइन
  3. संतृप्त और असंतृप्त हाइड्रोकार्बन
  4. 1 – ब्यूटीन और 1 – ब्यूटाइन
  5. 2 – ब्यूटाइन और 1 – ब्यूटाइन
  6. CH4 और C2H2
  7. एथिलीन और ऐसीटिलीन

उत्तर:

  1. एथिलीन सोडामाइड तथा अमोनियामय क्युप्रस क्लोराइड से क्रिया नहीं करती लेकिन ऐसीटिलीन इनसे क्रिया करके धातु व्युत्पन्न बनाती है क्योंकि इसमें सक्रिय हाइड्रोजन उपस्थित है।
  2. एथेन (संतृप्त हाइड्रोकार्बन) या एल्केन की ब्रोमीन विलयन से क्रिया नहीं होती जबकि एथाइन (असंतृप्त हाइड्रोकार्बन) ब्रोमीन विलयन को विरंजित कर देती है।
  3. एथेन (संतृप्त हाइड्रोकार्बन) या एल्केन की ब्रोमीन विलयन से क्रिया नहीं होती जबकि एथाइन (असंतृप्त हाइड्रोकार्बन) ब्रोमीन विलयन को विरंजित कर देती है।
  4. 1 – ब्यूटीन अमोनियामय सिल्वर नाइट्रेट विलयन से क्रिया नहीं। करती जबकि 1 – ब्यूटइन इससे क्रिया करके श्वेत अवक्षेप देती है।
  5. 2 – ब्यूटाइन की अमोनियामय सिल्वर नाइट्रेट विलयन से क्रिया नहीं होती लेकिन 1 – ब्यूटाइन इससे क्रिया करके श्वेत अवक्षेप देती है।
  6. एथेन (संतृप्त हाइड्रोकार्बन) या एल्केन की ब्रोमीन विलयन से क्रिया नहीं होती जबकि एथाइन (असंतृप्त हाइड्रोकार्बन) ब्रोमीन विलयन को विरंजित कर देती है। CH4 (मेथेन) एल्केन है लेकिन C2H2 (एथाइन) एक एल्काइन है।
  7. एथिलीन सोडामाइड तथा अमोनियामय क्युप्रस क्लोराइड से क्रिया नहीं करती लेकिन ऐसीटिलीन इनसे क्रिया करके धातु व्युत्पन्न बनाती है क्योंकि इसमें सक्रिय हाइड्रोजन उपस्थित है।

प्रश्न 28.
ऐसीटिलीन बनाने की औद्योगिक विधि का वर्णन कीजिये। आवश्यक रासायनिक समीकरण दीजिये।
उत्तर:

  • ऐल्काइनों के प्रथम तीन सदस्य (C2) से C4) गैस, अगले आठ सदस्य (C5 से C12) द्रव तथा शेष उच्चतर सदस्य ठोस होते हैं।
  • समस्त ऐल्काइन रंगहीन होते हैं।
  • एथाइन में अशुद्धि के कारण अभिलाक्षणिक गंध (लहसुन जैसी) होती है, लेकिन इस श्रेणी के अन्य सदस्य गंधहीन होते हैं।
  • ऐल्काइन अल्प ध्रुवीय, जल से हल्की तथा जल में लगभग अविलेय होती हैं, लेकिन ये ऐल्केनों तथा ऐल्कीनों की तुलना में कुछ अधिक विलेय होती हैं तथा कार्बनिक विलायकों जैसेकार्बनटेट्राक्लोराइड, ईथर, बेन्जीन एसीटोन में विलेय होते हैं।
  • ऐल्काइनों के गलनांक, क्वथनांक तथा घनत्व अणुभार के साथ बढ़ते हैं लेकिन ऐल्काइनों के गलनांक, क्वथनांक तथा घनत्व के मान संगत ऐल्केनों तथा ऐल्कीनों की तुलना में उच्च होती हैं।
  • समावयवी ऐल्काइनों के गलनांक तथा क्वथनांक पार्श्व श्रृंखलाओं की संख्या बढ़ने के साथ कम होते जाते हैं।
  • अन्तस्थ ऐल्काइनों (1 – ऐल्काइनों) के क्वथनांक समावयवी 2 – ऐल्काइनों की अपेक्षा कम होते हैं।

इस विधि में कैल्सियम कार्बाइड के जल अपघटन से ऐसीटिलीन बनायी जाती है।

प्रश्न 29.
ऐसीटिलीन अणु की ज्यामितीय आकृति चित्र द्वारा प्रदर्शित कीजिये और अणु में उपस्थित विभिन्न बन्धों की प्रकृति बताइये।
उत्तर:
एथाइन के कार्बन परमाणु sp संकरित होते हैं तथा प्रत्येक कार्बन परमाणु के पास दो sp संकरित कक्षक होते हैं। इन दोनों कार्बन परमाणुओं के sp संकरित कक्षकों के समाक्ष अतिव्यापन से C – C σ बन्ध बनता है तथा प्रत्येक कार्बन के शेष sp संकरित कक्षक अंतरनाभिकीय अक्ष पर हाइड्रोजन के 1s कक्षक के साथ समाक्ष अतिव्यापन करके दो C – H σ बन्ध बनाते हैं।
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 37
एथाइन में H – C – C बंध कोण 180° होता है तथा प्रत्येक कार्बन परमाणु के पास कार्बन – कार्बन बंध के तल तथा एक – दूसरे के लंबवत् दो असंकरित p – कक्षक होते हैं। एक कार्बन परमाणु के 2p कक्षक दूसरे कार्बन परमाणु के 2p कक्षकों के समान (Parallel) होते हैं, जो कि समपाश्विक अतिव्यापन करके दो पाई बंध बनाते हैं। अतः एथाइन में एक C – C सिग्मा बंध, दो C – H सिग्मा बंध तथा दो C – C पाई बंध होते हैं।
C ≡ C की बंध सामर्थ्य या बंध एन्थैल्पी C = C द्विबंध की बंध एन्थैल्पी तथा C – C एकल बंध की बंध एन्थैल्पी से अधिक होती है तथा C = C की आबंध लम्बाई (120 pm), C = C द्विआबंध (13 pm) तथा C – C एकल आबंध (154 pm) की अपेक्षा कम होती है। दो कार्बन परमाणुओं के मध्य इलेक्ट्रॉन अभ्र अंतरानाभिकीय अक्ष पर बेलनाकार सममित होते हैं। अतः एथाइन एक रेखीय अणु है।
एथाइन में C – H बन्ध दूरी 106 pm होती है तथा यह बन्ध लम्बाई एथेन > एथीन > एथाइन क्रम में घटती है क्योंकि σ बन्ध बनाने में प्रयुक्त कक्षकों के s – लक्षण कार्बन परमाणु की sp3-, sp2-, sp– संकरित अवस्था के क्रम में बढ़ता है।
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 38
प्रश्न 30.
रासायनिक समीकरण देते हुए बताइये क्या होता है। जब –

  1. ऐसीटिलीन की ब्रोमीन जल से क्रिया होती है।
  2. ऐसीटिलीन में हाइड्रोजन ब्रोमाइड का योग होता है।
  3. ऐसीटिलीन ठण्डे तनु क्षारीय पोटेशियम परमैंगनेट विलयन में प्रवाहित की जाती है।
  4. कार्बन टेट्राक्लोराइड विलायक में एसीटिलीन की ओजोन से अभिक्रिया कराकर उत्पाद को जल द्वारा अपघटित किया जाता है।

उत्तर:
1.1, 1, 2, 2 – टेट्राब्रोमो एथेन बनता है तथा Br2 विलयन विरंजित हो जाता है।
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 39
4. मेथेनोइक अम्ल बनता है –
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 40
प्रश्न 31.
n – पेन्टेन का क्वथनांक नियोपेन्टेन से ज्यादा है। कारण बताइये।
उत्तर:
अणु भार (आण्विक द्रव्यमान) बढ़ने पर ऐल्केनों के क्वथनांक भी बढ़ते हैं क्योंकि इससे अणु का आकार तथा पृष्ठीय क्षेत्रफल बढ़ता है जिससे अंतराण्विक आकर्षण बल (वान्डरवाल बल) बढ़ते हैं। ऐल्केनों में शाखित श्रृंखलाओं की संख्या बढ़ने से अणु की आकृति लगभग गोलाकार हो जाती है, जिससे इन अणुओं का पृष्ठ क्षेत्रफल कम हो जाता है अतः इनमें दुर्बल अंतराण्विक बल पाए जाते हैं। इसलिए इनके क्वथनांक कम हो जाते हैं। इसी कारण n – पेन्टेन का क्वथनांक नियो पेन्टेन से ज्यादा है क्योंकि n – पेन्टेन एक सीधी श्रृंखला युक्त एल्केन है जबकि नियोपेन्टेन एक द्विशाखित एल्केन है।

RBSE Class 11 Chemistry Chapter 13 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 32.
1 – ब्रोमोप्रोपेन तथा 2 – बोमोप्रोपेन की ईथर की। उपस्थिति में सोडियम से अभिक्रिया कराने से प्राप्त विभिन्न ऐल्केनों के संरचना सूत्र तथा आई.यू.पी.ए.सी. नाम लिखिये। इस अभिक्रिया का नाम क्या है?
उत्तर:
इस अभिक्रिया में तीन ऐल्केनों का मिश्रण प्राप्त होता है –
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 42
हैलोएल्केन की क्रिया शुष्क ईथर में सोडियम के साथ करवाने पर उच्च एल्केन बनते हैं जिनमें सम संख्या में कार्बन परमाणु होते हैं। इसे वुटुंज अभिक्रिया या वुज संश्लेषण कहते हैं। इस विधि द्वारा कार्बन श्रृंखला की लम्बाई बढ़ती है।
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 43
मिश्र वुज संश्लेषण (दो भिन्न ऐल्किल हैलाइड लेकर) से विषम संख्या में कार्बन परमाणु युक्त एल्केन भी बनते हैं। इस अभिक्रिया में तीन एल्केनों का मिश्रण प्राप्त होता है।
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 44
वुज अभिक्रिया द्वारा मेथेन नहीं बनाया जा सकता है। यह अभिक्रिया मुक्त मूलक क्रियाविधि एवं आयनिक क्रियाविधि दोनों द्वारा सम्पन्न होती है।
मुक्त मूलक क्रियाविधि
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 44
आयनिक क्रियाविधि ।
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 45
हैलोएल्केन की क्रिया शुष्क ईथर में सोडियम के साथ करवाने पर उच्च एल्केन बनते हैं जिनमें सम संख्या में कार्बन परमाणु होते हैं। इसे वुटुंज अभिक्रिया या वुज संश्लेषण कहते हैं। इस विधि द्वारा कार्बन श्रृंखला की लम्बाई बढ़ती है।

प्रश्न 33.
ऐल्केन किन्हें कहते हैं? ऐल्केनों का सामान्य सूत्र लिखिये और उनके बनाने की चार सामान्य विधियों का वर्णन कीजिये।
उत्तर:

  • ऐल्केन शाखित तथा अशाखित विवृत श्रृंखलायुक्त संतृप्त हाइड्रोकार्बन होते हैं जिनमें केवल कार्बन – कार्बन एकल आबन्ध अर्थात् σ आबन्ध होते हैं।
  • ये रासायनिक अभिकर्मकों के प्रति निष्क्रिय होते हैं अतः इनकी अम्लों (HCl, H2SO4 तथा HNO3), क्षारों (KOH, NaOH) तथा ऑक्सीकारकों (अम्लीय या क्षारीय KMnO4, K2Cr2O7) से कोई क्रिया नहीं होती है। इसी कारण प्रारम्भ में इन्हें पैराफिन कहा जाता था क्योंकि ग्रीक शब्द पैरम का अर्थ है कम तथा ऐफिनिस का अर्थ है क्रियाशीलता अर्थात् ये कम क्रियाशील होते हैं।
  • ऐल्केनों का सामान्य सूत्र CnH2n+2 होता है जहाँ n = 1, 2, 3…. ऐल्केनों को R – H, R – R तथा R – R’ द्वारा भी दर्शाया जा सकता है।
  • ऐल्केनों के अणु असमतलीय या बहुसमतलीय होते हैं क्योंकि इनमें उपस्थित सभी कार्बन परमाणु sp3 संकरित अवस्था में होते हैं तथा सभी कार्बन परमाणुओं की ज्यामिति चतुष्फलकीय होती है।
  • संयोजकता कोश इलेक्ट्रॉन युग्म प्रतिकर्षण सिद्धान्त के अनुसार मेथेन भी चतुष्फलकीय होती है जिसमें कार्बन परमाणु केन्द्र में तथा हाइड्रोजन परमाणु समचतुष्फलक के चारों कोनों पर स्थित होते हैं।
    RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 46
  • ऐल्केनों में बन्ध कोण का मान 109°28′ होता है। अतः कार्बन श्रृंखलाएँ सीधी न होकर टेढ़ी – मेढ़ी होती हैं।
  • ऐल्केनों में चतुष्फलक आपस में जुड़े रहते हैं जिनमें C – C आबन्ध लम्बाई 154pm तथा C – H आबन्ध लम्बाई 112pm होती है।
  • ऐल्केनों में जब एक कार्बन परमाणु अन्य कार्बन परमाणु के साथ sp3 – sp3 अतिव्यापन करता है तो एक σ आबन्ध बनता है, जबकि C – H σ आबन्ध sp3 – s अतिव्यापन द्वारा बनता है।
  • ऐल्केनों में C – C बन्ध ऊर्जा लगभग 83 किलोकैलोरी प्रति मोल तथा C – H बन्ध ऊर्जा लगभग 99 किलोकैलोरी प्रति मोल होती है।
  • ऐल्केन परिवार का प्रथम सदस्य मेथेन (CH4) है तथा इसमें क्रमशः CH2 जोड़ते जाने पर अन्य सदस्यों के सूत्र प्राप्त होते जाते हैं।
  • ऐल्केनों को आबन्ध रेखा सूत्रों द्वारा भी दर्शाया जा सकता है, जैसे –
    RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 47
  • मेथेन (CH4) को मार्श गैस, विस्फोटी खनिज गैस तथा फायर डैम्प भी कहा जाता है।
  • द्रवित पेट्रोलियम गैस जो कि मुख्यतः प्रोपेन तथा ब्यूटेन का मिश्रण है, को घरेलू ईंधन के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। यह एक कम प्रदूषण वाला ईंधन है।
  • कैलोर गैस मुख्यतः n – ब्यूटेन तथा आइसोब्यूटेन का मिश्रण है, भी एक ईंधन है।
  • C6 से C8 तक के ऐल्केनों का मिश्रण गैसोलीन अथवा पेट्रोल कहलाता है जो कि स्वचालित वाहनों के ईंधन के रूप में प्रयुक्त होता है।
  • संपीड़ित प्राकृतिक गैस भी एक ईंधन है जो प्राकृतिक गैस के द्रवीकरण से प्राप्त होता है। इसे आजकल द्रवित प्राकृतिक गैस भी कहा जाता है।
  • पेट्रोल तथा सी.एन.जी. से चलने वाले स्वचालित वाहनों से प्रदूषण कम होता है।
  • C12 से C16 तक के ऐल्केनों का मिश्रण किरोसिन तेल कहलाता है जिसका उपयोग घरेलू ईंधन के रूप में किया जाता है, लेकिन इससे कुछ प्रदूषण होता है।

ऐल्केनों के बनाने की सामान्य विधियाँ:
ऐल्केनों के मुख्य स्रोत पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैस हैं। इनके अतिरिक्त ऐल्केनों को निम्नलिखित विधियों द्वारा बनाया जा सकता है –

  1. असंतृप्त हाइड्रोकार्बनों (एल्कीन तथा एल्काइन) के हाइड्रोजनीकरण द्वारा – सूक्ष्म विभाजित धातु उत्प्रेरक (जैसे – प्लैटिनम, पैलेडियम तथा निकल) की उपस्थिति में ऐल्कीन तथा एल्काइन के साथ हाइड्रोजन गैस के योग से ऐल्केन बनते हैं। इस क्रिया को हाइड्रोजनीकरण कहते हैं। प्लैटिनम तथा पैलेडियम की उपस्थिति में यह अभिक्रिया कमरे के ताप पर ही हो जाती है परन्तु निकल उत्प्रेरक के लिए उच्च ताप तथा दाब की आवश्यकता होती है।
    RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 47
    प्रोपेन रेने निकल की उपस्थिति में 473 – 573K ताप पर एल्कीन तथा एल्काइन का हाइड्रोजनीकरण किया जाता है तो इस अभिक्रिया को साबात्ये सेन्डेरेन्स अभिक्रिया कहते हैं।
    नोट – इस अभिक्रिया द्वारा एल्कीनों से मेथेन तथा नियोपेन्टेन एल्काइनों से मेथेन, आइसोब्यूटेन तथा नियोपेन्टेन नहीं बनाए जा सकते हैं।
  2. ऐल्किल हैलाइडों से:
    (i) वुटुंज अभिक्रिया द्वारा – हैलोएल्केन की क्रिया शुष्क ईथर में सोडियम के साथ करवाने पर उच्च एल्केन बनते हैं जिनमें सम संख्या में कार्बन परमाणु होते हैं। इसे वुज अभिक्रिया या वुज संश्लेषण कहते हैं। इस विधि द्वारा कार्बन श्रृंखला की लम्बाई बढ़ती है।
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    मिश्र वुज संश्लेषण (दो भिन्न ऐल्किल हैलाइड लेकर) से विषम संख्या में कार्बन परमाणु युक्त एल्केन भी बनते हैं। इस अभिक्रिया में तीन एल्केनों का मिश्रण प्राप्त होता है।
    RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 49
    वुटुंज अभिक्रिया द्वारा मेथेन नहीं बनाया जा सकता है। यह अभिक्रिया मुक्त मूलक क्रियाविधि एवं आयनिक क्रियाविधि दोनों द्वारा सम्पन्न होती है।
    मुक्त मूलक क्रियाविधि
    RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 50
    आयनिक क्रियाविधि
    RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 51
    (ii) ऐल्किल हैलाइडों के अपचयन द्वारा –
    (a)
    RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 52
    अपचायक के रूप में निम्नलिखित अभिकर्मकों में से किसी को भी प्रयुक्त किया जा सकता है –
    लीथियम ऐलुमिनियम हाइड्राइड (LiAlH4), सोडियम बोरोहाइड्राइड (NaBH4), Na/एथेनॉल, Zn – Cu युग्म/तनु HCl या C2H5OH, Zn/सान्द्र HCl, Na – Hg (सोडियम अमलगम) अथवा Al – Hg युग्म के साथ जल या ऐल्कोहॉल।
    RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 53
    यह अपचयन जिंक धातु द्वारा होता है न कि नवजात हाइड्रोजन द्वारा। जिंक परमाणु से इलेक्ट्रॉनों का स्थानान्तरण ऐल्किल हैलाइड के कार्बन परमाणु पर होता है तथा अम्ल या एथिल ऐल्कोहॉल प्रोटॉन दाता का कार्य करता है।
    ऐल्किल हैलाइडों की अपचयन की सुगमता का क्रम निम्न प्रकार होता है। अतः ऐल्किल फ्लुओराइडों से ऐल्केन बनाना बहुत ही मुश्किल होता है।
    RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 54
    (b) ऐल्किल हैलाइड के उत्प्रेरकी हाइड्रोजनीकरण द्वारा
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    (c) लाल फॉस्फोरस तथा HI के मिश्रण द्वारा ऐल्किल आयोडाइड के अपचयन द्वारा (बर्थेलो विधि)
    RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन 56
  3. संतृप्त मोनो कार्बोक्सिलिक अम्लों द्वारा –
    (i) विकार्बोक्सिलीकरण – प्रयोगशाला विधि –
    संतृप्त मोनो कार्बोक्सिलिक अम्लों (वसा अम्लों) के सोडियम लवणों को सोडा लाइम (NaOH + CaO) के साथ गरम करने (शुष्क आसवन) पर ऐल्केन बनते हैं। इस अभिक्रिया में – COOH के स्थान पर हाइड्रोजन परमाणु आ जाता है।
    RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 57
    1. इस अभिक्रिया में प्रारम्भिक अम्ल के अणु में उपस्थित कार्बन परमाणुओं की संख्या से एक कार्बन कम युक्त ऐल्केन बनता है क्योंकि कार्बोक्सिलिक अम्ल में से CO2 का एक अणु निकल जाता है। अतः इसे विकार्बोक्सिलीकरण कहते हैं। इसलिए यह अभिक्रिया एक सजातीय श्रेणी में अवरोहण (कार्बन की लम्बाई कम करना) के लिए प्रयुक्त की जाती है।
    2. इस विधि में अनबुझा चूना (CaO) वातावरण की नमी को अवशोषित कर NaOH को गीला होने से रोकता है जिससे काँच के पात्र की NaOH से क्रिया नहीं होती।
    RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 58
    इसी प्रकार विभिन्न अम्लों के सोडियम लवण लेकर अन्य ऐल्केन बना सकते हैं।
    (ii) कोल्बे की विद्युत अपघटनी विधि – संतृप्त मोनोकार्बोक्सिलिक अम्लों के सोडियम अथवा पोटैशियम लवणों के सान्द्र जलीय विलयन का विद्युत – अपघटन करने पर ऐनोड पर समसंख्या में कार्बनयुक्त उच्चतर ऐल्केन प्राप्त होते हैं।
    RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 58
    अभिक्रिया की क्रियाविधि – सोडियम ऐल्केनोएट पहले आयनित होता है फिर समांश विखण्डन अर्थात् मुक्त मूलक क्रियाविधि द्वारा अभिक्रिया सम्पन्न होती है।
    RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 59
    विद्युत धारा प्रवाहित करने पर धनायन ऋणाग्र की ओर तथा ऋणायन धनाग्र की ओर गमन करते हैं तथा वहाँ पहुँच कर अपना आवेश मुक्त कर देते हैं।
    ऐनोड पर –
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    कैथोड पर –
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    इस विधि से मेथेन नहीं बनायी जा सकती है। सोडियम प्रोपिओनेट (C2H5COONa) के सान्द्र जलीय विलयन का विद्युत – अपघटन करने पर n – ब्यूटेन मुख्य उत्पाद के रूप में तथा एथेन, एथिलीन और एथिल प्रोपिओनेट उपजातों (सहउत्पाद) के रूप में बनते हैं।
    नोट – मिश्र वुज अभिक्रिया के समान इस अभिक्रिया में भी दो प्रकार के अम्लों का मिश्रण लेने पर तीन प्रकार के ऐल्केनों का मिश्रण प्राप्त होता है।
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  4. ऐल्कोहॉलों, ऐल्डिहाइडों, कीटोनों तथा कार्बोक्सिलिक अम्लों का लाल फॉस्फोरस तथा HI द्वारा अपचयन से:
    ROH, RCHO, RCOR तथा RCOOH का लाल फॉस्फोरस तथा HI से अपचयन कराने पर ऐल्केन प्राप्त होते हैं। इन अभिक्रियाओं में बनने वाले ऐल्केन में उतने ही कार्बन परमाणु होते हैं जितने कि प्रारम्भिक कार्बनिक यौगिक में होते हैं।
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  5. क्लीमेन्सन अपचयन:
    कार्बोनिल यौगिकों का अमलगमित जिंक तथा सान्द्र HCl(Zn/Hg + HCl) के मिश्रण से अपचयन कराने पर ऐल्केन बनते हैं। इस अभिक्रिया को क्लीमेन्सन अपचयन कहते हैं।
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    यह अभिक्रिया मुख्यतः कीटोनों के लिए प्रयुक्त की जाती है। क्योंकि सान्द्र HCl की उपस्थिति में ऐलिफैटिक ऐल्डिहाइडों का बहुलकीकरण हो जाता है। इस अभिक्रिया से मेथेन, एथेन, आइसोब्यूटेन तथा नियोपेन्टेन नहीं बना सकते हैं क्योंकि इनमें > CH2 समूह नहीं है। जबकि इस अभिक्रिया में कीटोन का > C = O, > CH2 में परिवर्तन होता है।
  6. वोल्फ – किश्नर अपचयन:
    कार्बोनिल यौगिकों की हाइड्रेजीन के साथ अभिक्रिया कराने के पश्चात् C2H5O–Na+ या ऐथिलीन ग्लाइकॉल (विलायक) में सोडियम या पोटैशियम हाइड्रॉक्साइड के साथ गरम करने पर > C = O समूह – CH2 समूह में बदल जाता है तथा ऐल्केन प्राप्त होते हैं।
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    इस अभिक्रिया में डाइएथिलीन ग्लाइकॉल (HO – CH2 – CH2O – CH2 – CH2 – OH) तथा KOH लेने पर इसे हुएंगमिनलॉन अभिक्रिया कहते हैं।
  7. ग्रीन्यार अभिकर्मक से:
    (i) हैलोऐल्केन की शुष्क ईथर की उपस्थिति में मैग्नीशियम के साथ अभिक्रिया कराने पर ग्रीन्यार अभिकर्मक (ऐल्किल मैग्नीशियम हैलाइड) बनता है।
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    क्रियाशील हाइड्रोजन परमाणु युक्त यौगिकों, जैसे H2O, RO – H, NH3, R – NH2, R – COOH, HX, H – C ≡ C – H, C6H5OH, C6H5NH2 इत्यादि की क्रिया ग्रीन्यार अभिकर्मकों से कराने पर ग्रीन्यार अभिकर्मक के एल्किल समूह पर क्रियाशील हाइड्रोजन परमाणु जुड़कर संगत ऐल्केन बनता है।
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    इस विधि द्वारा किसी अणु में उपस्थित क्रियाशील हाइड्रोजन परमाणुओं की संख्या ज्ञात की जाती है तथा इस विधि को क्रियाशील हाइड्रोजन परमाणुओं के आकलन की जेरेविटिनॉफ विधि कहते हैं।
    (ii) उच्च ऐल्केन बनाना – ग्रीन्यार अभिकर्मक की हैलोएल्केन से अभिक्रिया कराने पर उच्च ऐल्केन बनते हैं।
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    मेथेन बनाने की विशिष्ट विधियाँ –
    (i) सीधे संश्लेषण द्वारा
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    (ii) ऐलुमिनियम कार्बाइड से – ऐलुमिनियम कार्बाइड पर तनु HCl की अभिक्रिया से जल – अपघटन द्वारा मेथेन गैस प्राप्त होती है।
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    (iii) सेलुलोस के किण्वन द्वारा
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    (iv) कार्बन डाइसल्फाइड तथा H2S से – CS2 वाष्प तथा H2S के मिश्रण को तप्त कॉपर पर प्रवाहित करने से मेथेन प्राप्त होती है।
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प्रश्न 34.
ब्यूटेन, पेन्टेन और हेक्सेन के समावयवियों के सूत्र और उनके साधारण व आई.यु.पी.ए.सी, नाम का वर्णन लिखिये।
उत्तर:
ऐल्केनों का नामकरण तथा समावयवता:
नामकरण – ऐल्केनों के IUPAC नामकरण में अनुलग्न ऐन (ane) प्रयुक्त किया जाता है तथा इनका नाम कार्बन परमाणुओं की संख्या के आधार पर दिया जाता है। इनके रूढ़ नाम (सामान्य नाम), व्युत्पन्न नाम तथा IUPAC नाम का विस्तृत विवेचन अध्याय 12 में किया जा चुका है। ऐल्केन परिवार के एक से पाँच कार्बन परमाणु तक के सभी सदस्यों के अणु सूत्र, संघनित सूत्र, संरचनात्मक सूत्र, रूढ़ नाम तथा IUPAC नाम निम्न प्रकार होते हैं –
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हेक्सेन (C6H14) के पाँच समावयवी होते हैं जो कि निम्न प्रकार हैं –
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इनमें से संरचना (ii) व (iii) एवं (iv) व (v) आपस में स्थिति (स्थान) समावयवी हैं।
अध्याय 12 में वर्णित IUPAC नाम पद्धति के सामान्य नियमों के आधार पर प्रतिस्थापी ऐल्केनों के नामकरण को निम्नलिखित उदाहरणों द्वारा आसानी से समझा जा सकता है
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नोट – इस उदाहरण में मेथिल की तरफ से अंकन किया गया है। क्योंकि यह कार्बन – 2 पर है जबकि एथिल समूह दाहिनी ओर से कार्बन – 3 पर है, लेकिन इन्हें अंग्रेजी वर्णमाला क्रम में लिखा गया है।
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नोट – इस यौगिक में अंकन दाहिनी ओर से किया गया है क्योंकि कार्बन – 3 पर दो एथिल समूह उपस्थित हैं तथा ऐल्किल मूलकों को अंग्रेजी वर्णमाला क्रम में लिखा गया है।
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नोट – इस यौगिक में पाश्र्व श्रृंखला के प्रतिस्थापियों का भी अंकन किया गया है।
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नोट – इस उदाहरण में अंकन बायीं ओर से किया गया है क्योंकि इस तरफ से एथिल समूह कार्बन – 3 पर है जबकि दायीं ओर से मेथिल समूह कार्बन – 3 पर है अतः अंग्रेजी वर्णमाला क्रम के अनुसार एथिल को प्राथमिकता दी गयी है।
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नोट – अंग्रेजी वर्णमाला क्रम में द्वितीयक का प्रथम अक्षर नहीं देखा जाता है जबकि आइसोप्रोपिल का प्रथम अक्षर देखा जाता है क्योंकि आइसोप्रोपिल को एक शब्द माना जाता है।
समावयवता:
ऐल्केन श्रृंखला स्थिति तथा प्रकाशिक समावयवता दर्शाते हैं। श्रृंखला तथा स्थिति समावयवती संरचनात्मक समावयता के प्रकार हैं, जबकि प्रकाशिक समावयवता त्रिविम समावयवता का प्रकार है।
(i) श्रृंखला समावयवता:
शृंखला समावयवता में कार्बन परमाणुओं का ढांचा भिन्न होता है। अर्थात् इनमें कार्बन परमाणुओं की श्रृंखला में भिन्नता होती है। ब्यूटेन के दो श्रृंखला समावयवी संभव हैं
C4H10
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पेन्टेन (C5H12) के तीन, हेक्सेन (C6H14) के पाँच, हेप्टेन (C7H16) के नौ तथा डेकेनं (C10H22) के 75 समावयवी संभव हैं। इन समावयवियों के क्वथनांक तथा भौतिक गुणधर्म भिन्न होते हैं।
(ii) स्थिति समावयवता: उच्च ऐल्केन स्थिति समावयवता दर्शाते हैं जिनमें ऐल्किल समूह की स्थिति भिन्न होती है।
उदाहरण –
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(iii) प्रकाशिक समावयवती: 3मेथिल हेक्सेन सरलतम एल्केन है जो प्रकाशिक समावयवता दर्शाता है। क्योंकि इसमें असममित कार्बन उपस्थित है।
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प्रश्न 35.
ऐल्केन रासायनिक रूप से निष्क्रिय क्यों होती हैं? ऐल्केनों की सामान्य अभिक्रियाओं का वर्णन कीजिये।
उत्तर:
ऐल्केनों के रासायनिक गुण:
सामान्य परिस्थितियों में ऐल्केनों की सान्द्र अम्लों, क्षारकों, प्रबल ऑक्सीकारकों, जैसे KMnO4, K2Cr2O7 तथा अपचायकों से कोई क्रिया नहीं होती क्योंकि इनमें सभी प्रबल σ आबन्ध होते हैं। अतः ये अत्यधिक स्थायी यौगिक हैं। लेकिन ये विशेष परिस्थितियों में निम्नलिखित अभिक्रियाएं दर्शाते हैं –
(a) प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ:
ऐल्केनों के एक या अधिक हाइड्रोजन परमाणु दूसरे परमाणु या समूह जैसे हैलोजन, नाइट्रोसमूह तथा सल्फोनिक अम्ल समूह द्वारा प्रतिस्थापित हैं तो इन्हें प्रतिस्थापन अभिक्रियाएं कहते हैं।
सामान्यतः ऐल्केनों की प्रतिस्थापन अभिक्रियाएं मुक्तमूलक क्रियाविधि द्वारा सम्पन्न होती हैं तथा इनके हाइड्रोजन परमाणुओं के प्रतिस्थापन की सुगमता का क्रम निम्न प्रकार होता है
तृतीयक H > द्वितीयक H > प्राथमिक H > मेथेन H
(1) हैलोजेनीकरण:
उच्चताप (573 – 773 K) अथवा सूर्य के विसरित प्रकाश या पराबैंगनी विकिरणों या उत्प्रेरकों की उपस्थिति में ऐल्केनों की हैलोजन से क्रिया कराने पर हाइड्रोजन परमाणुओं का प्रतिस्थापन हैलोजन परमाणुओं द्वारा हो जाता है, इस अभिक्रिया को हैलोजनीकरण कहते हैं।
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ऐल्केनों की विभिन्न हैलोजन के साथ अभिक्रिया की क्रियाशीलता का क्रम F2 >>> Cl2 >> Br2 > I2 है तथा ऐल्केनों के हाइड्रोजन के प्रतिस्थापन की दर निम्न प्रकार होती है – 3° > 2° > 1° अतः फ्लुओरीनीकरण तीव्र व अनियंत्रित होता है जबकि आयोडीनीकरण बहुत धीमे होता है। अतः आयोडीनीकरण एक उत्क्रमणीय अभिक्रिया है। इसलिए यह अभिक्रिया ऑक्सीकारक (जैसे HIO3 या HNO3) की उपस्थिति में करवायी जाती है जिससे ये प्राप्त HI से क्रिया करके पुनः I2 दे देते हैं।
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उदाहरण – मेथेन के क्लोरीनीकरण से विभिन्न उत्पाद प्राप्त होते हैं जब क्लोरीन को आधिक्य में लिया जाता है।
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इस अभिक्रिया में मेथेन को आधिक्य में लेने पर क्लोरोमेथेन मुख्य उत्पाद के रूप में प्राप्त होता है।
सूर्य के सीधे प्रकाश में मेथेन की क्लोरीन से अभिक्रिया निम्न प्रकार होती है –
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क्रियाविधि: हैलोजनीकरण अभिक्रिया मुक्त मूलक प्रतिस्थापन क्रियाविधि द्वारा सम्पन्न होती है। इस क्रियाविधि में तीन पद होते हैंश्रृंखला प्रारम्भन पद, श्रृंखला संचरण पद तथा श्रृंखला समापन पद –
(i) प्रारम्भन – इस पद में वायु तथा प्रकाश की उपस्थिति में Cl2 अणु का समांश विखण्डन होकर क्लोरीन मुक्तमूलक बनते हैं।
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(ii) संचरण – क्लोरीन मुक्तमूलक, मेथेन से क्रिया करके उसके C – H बंध को तोड़कर HCl तथा मेथिल मुक्तमूलक बनाते हैं, जिससे अभिक्रिया अग्र दिशा में जाती है।
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मेथिल मुक्त – मूलक क्लोरीन के दूसरे अणु से क्रिया करके CH3 – Cl तथा एक अन्य क्लोरीन मुक्त-मूलक बनाते हैं, जो क्लोरीन अणु के समांश विखण्डन के कारण बनते हैं।
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 89
मेथिल तथा क्लोरीन मुक्त-मूलक, जो उपर्युक्त दो पदों (a) तथा (b) से प्राप्त होते हैं, पुनः व्यवस्थित होकर श्रृंखला अभिक्रिया प्रारम्भ करते हैं। संचरण पद (a) तथा (b) से सीधे ही मुख्य उत्पाद प्राप्त होते हैं। लेकिन अन्य कई संचरण पद भी सम्भव हैं, ऐसे पद निम्नलिखित हैं। जिनसे अधिक हैलोजनयुक्त उत्पाद बनते हैं
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(iii) समापन: अभिकर्मक की समाप्ति तथा विभिन्न पार्श्व अभिक्रियाओं के कारण अभिक्रिया समाप्त हो जाती है।
विभिन्न संभव श्रृंखला समापन पद निम्नलिखित हैं –
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यद्यपि पद (c) में CH3 – Cl एक उत्पाद है, लेकिन इससे मुक्त मूलकों की कमी हो जाती है। मेथेन के क्लोरोनीकरण में एथेन भी एक उपउत्पाद के रूप में प्राप्त होता है, इसकी व्याख्या उपरोक्त क्रियाविधि द्वारा हो जाती है।
एथेन
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प्रोपेन से 2° उत्पाद अधिक बन रहा है क्योंकि 2°H की क्रियाशीलता में 1°H से अधिक है।
आइसोब्यूटेन
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आइसोब्यूटेन में 1° तथा 3° हाइड्रोजन परमाणुओं का अनुपात 9 : 1 है जबकि 1° तथा 3° उत्पादों का अनुपात 2 : 1 है, इससे यह सिद्ध होता है कि 3° हाइड्रोजन की क्रियाशीलता 1° हाइड्रोजन की क्रियाशीलता से बहुत अधिक है।
(2) नाइट्रीकरण:
वाष्प अवस्था में ऐल्केन तथा सान्द्र HNO3 को 400 – 500°C ताप पर गरम करने पर विभिन्न नाइट्रोऐल्केन बनते हैं।
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(3) सल्फोनीकरण: अशाखित तथा निम्न ऐल्केनों में सल्फोनीकरण की अभिक्रिया बहुत धीरे होती है। लेकिन उच्च ऐल्केन एवं शाखित ऐल्केन सधूम सल्फ्यूरिक अम्ल (ओलियम, H2SO4 + SO3 या H2S2O7) से क्रिया करके ऐल्केन सल्फोनिक अम्ल देते हैं।
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(4) क्लोरोसल्फोनीकरण अथवा रीड अभिक्रिया:
पराबैंगनी प्रकाश की उपस्थिति में SO2 (आधिक्य) तथा Cl2 का मिश्रण ऐल्केनों से क्रिया कर ऐल्केनसल्फोनिल क्लोराइड बनाता है, इस क्रिया को रीड अभिक्रिया कहते हैं। यह क्रिया अपमार्जकों के औद्योगिक उत्पादन में प्रयुक्त होती है।
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(b) मेथिलीन समूह (> CH2) का समावेशन: पराबैंगनी प्रकाश की उपस्थिति में ऐल्केन पर डाइएजोमेथेन (CH2N2) अथवा कीटोन (CH2 = C = O) की क्रिया से उच्च ऐल्केन बनते हैं।
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(c) समावयवीकरण: सीधी श्रृंखला युक्त ऐल्केनों (n – ऐल्केन) का उत्प्रेरकों की उपस्थिति में शाखित श्रृंखला वाले ऐल्केनों में परिवर्तन समावयवीकरण कहलाता है। यह अभिक्रिया लगभग 35 वायु. दाब पर AlCl3 तथा HCl की उपस्थिति में करवायी जाती है। AlCl3 तथा HCl के स्थान पर AlBr3 व HBr या Al2(SO4)3 व H2SO4 भी लिया जा सकता है।
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 100
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(d) ऐरोमैटीकरण: उच्च तापमान (723 से 873K) पर ऐलुमिना (Al2O3) आधार पर भारी धातुओं (जैसे Cr, Mo, V इत्यादि) के ऑक्साइड उत्प्रेरकों की उपस्थिति में ऐल्केनों को गरम करने से संगत ऐल्कीन बनती है तथा हाइड्रोजन गैस निकलती है।
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एथीन जब ऐल्केनों में छः अथवा अधिक कार्बन परमाणुओं की अशाखित श्रृंखला होती है तो उपर्युक्त अभिक्रिया में उच्च ताप तथा उच्च दाब (10 से 20 वायु.) पर विहाइड्रोजनीकरण द्वारा। चक्रीकरण हो जाता है तथा ऐरोमैटिक यौगिक बनते हैं। इस अभिक्रिया को हाइड्रोसम्भवन अथवा उत्प्रेरकी पुनर्संभवन कहते हैं।
उदाहरण – n – हेक्सेन से बेन्जीन, n – हेप्टेन से टालूईन, n – ऑक्टेन से जाइलीन तथा नोनेन से मेसीटिलीन बनती हैं।
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 103
(e) ताप अपघटन:
उच्च ऐल्केनों को उच्च ताप पर वायु की अनुपस्थिति में गरम करने पर ये निम्न ऐल्केनों तथा ऐल्कीनों में अपघटित हो जाते हैं। ऊष्मा के द्वारा उच्च ऐल्केनों के निम्न हाइड्रोकार्बनों में विखण्डित होने की इस प्रक्रिया को तापअपघटन या भंजन कहते हैं।
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प्रोपीन एथीन मेथेन ताप अपघटन प्रक्रम मुक्त मूलक क्रियाविधि द्वारा सम्पन्न होता है। किरोसीन तेल या पेट्रोल से, तेल गैस या पेट्रोल गैस बनाने में भंजन का सिद्धान्त ही प्रयुक्त होता है, जैसे डोडेकेन (किरोसिन तेल का घटक) को 973K ताप पर Pt, Pd या Ni उत्प्रेरक की उपस्थिति में गरम करने पर हेप्टेन, पेन्टीन तथा अन्य हाइड्रोकार्बनों का मिश्रण प्राप्त होता है।
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(f) दहन: ऐल्केनों को वायु तथा ऑक्सीजन की उपस्थिति में गरम करने पर ये ज्योतिहीन ज्वाला के साथ जलते हैं। तथा पूर्णतः ऑक्सीकृत होकर कार्बन डाइऑक्साइड और जल बनाते हैं। तथा साथ ही अत्यधिक मात्रा में ऊष्मा व प्रकाश उत्सर्जित होती है। इस क्रिया को दहन कहते हैं। दहन का सामान्य समीकरण निम्नलिखित है
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दहन से अधिक मात्रा में ऊष्मा उत्सर्जित होने के कारण ऐल्केनों को ईंधन के रूप में काम में लिया जाता है। ऐल्केनों का अपर्याप्त वायु तथा ऑक्सीजन द्वारा अपूर्ण दहन होने पर कार्बन कज्जल बनता है।
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 109
(g) नियंत्रित ऑक्सीकरण: उच्च दाब पर ऑक्सीजन तथा वायु के प्रवाह में उपयुक्त उत्प्रेरक की उपस्थिति में एल्केनों को गरम करने पर इनके ऑक्सीकरण से विभिन्न उत्पाद प्राप्त होते हैं।
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(h) मेथेन की विशिष्ट अभिक्रियाएँ:
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प्रश्न 36.
रासायनिक समीकरण देते हुए बताइये क्या होता है। जब?

  1. शुष्क सोडियम ऐसीटेट को सोडालाइम के साथ गर्म करते हैं।
  2. ईथर विलयन में मेथिन आयोडाइड की सोडियम से क्रिया करायी जाती है।
  3. पोटेशियम ऐसीटेट के सान्द जलीय विलयन का विद्युत अपघटन करते हैं।
  4. ऐलुमिनियम कार्बाइड जल से अभिक्रिया करता है।

उत्तर:
1. मेथेन बनती है – (विकार्बोक्सिलीकरण) –
कार्बोक्सिलिक अम्लों के सोडियम लवण को सोडालाइम (सोडियम हाइड्रॉक्साइड एवं कैल्सियम ऑक्साइड का मिश्रण) के साथ गरम करने पर कार्बोक्सिलिक अम्ल से एक कम कार्बन परमाणु युक्त ऐल्केन बनता है। इस अभिक्रिया में कार्बोक्सिलिक अम्ल में से कार्बन डाइऑक्साइड निकलती है अतः इसे विकार्बोक्सिलीकरण कहते हैं।
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 हाइड्रोकार्बन img 112
मेथेन इसी प्रकार विभिन्न अम्ल लेकर अन्य ऐल्केन भी बना सकते हैं।
2. एथेन बनती है –
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3. कार्बोक्सिलिक अम्लों के सोडियम या पोटेशियम लवण के जलीय विलयन में विद्युत प्रवाहित करने पर (विद्युत अपघटन) एनोड पर सम कार्बन परमाणु युक्त ऐल्केन प्राप्त होते हैं। इसे कोल्बे की विद्युत अपघटनी विधि कहते हैं।
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यह अभिक्रिया निम्नलिखित पदों में होती है –
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RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 कार्बनिक रसायन: कुछ मूल सिद्धान्त और तकनीकें

July 1, 2019 by Prasanna Leave a Comment

RBSE Class 11 Chemistry Chapter 12 17

Rajasthan Board RBSE Class 11 Chemistry Chapter 12 कार्बनिक रसायन: कुछ मूल सिद्धान्त और तकनीकें

RBSE Class 11 Chemistry Chapter 12 पाठ्यपुस्तक के अभ्यास प्रश्न

RBSE Class 11 Chemistry Chapter 12 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से किस विधि द्वारा नाइट्रोजन का निर्धारण किया जाता है?
(अ) लीबिंग विधि
(ब) लैसे विधि
(स) जैल्डाल विधि
(द) केरियस विधि

प्रश्न 2.
नाइट्रोजन युक्त कार्बनिक यौगिक को सोडियम धातु के साथ संगलित करने पर बना सोडियम लवण है –
(अ) NaNO2
(ब) NaNO3
(स) NaCN
(द) NaNH2

प्रश्न 3.
आइसोब्यूटेन का IUPAC नाम है –
(अ) 2 – मेथिल ब्यूटेन
(ब) 2 – मेथिल प्रोपेन
(स) 2 – ऐथिल ब्यूटेन
(द) 2 – ब्यूटाइन

प्रश्न 4.
– COOR क्रियात्मक समूह का पूर्वलग्न है –
(अ) कार्बोमायल
(ब) कार्बोनिल
(स) कार्बोक्सी
(द) ऐल्कॉक्सीकार्बोनिल

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में से कौनसा प्रतिस्थापी समूह +1 प्रभाव नहीं दर्शाता है –
(अ) – CHO
(ब) – CH3
(स) – CH2R
(द) – CHR2

प्रश्न 6.
निम्नलिखित में कौनसा अभिकर्मक नाभिकस्नेही है –
(अ) Br+
(ब) R – OH
(स) FeCl3
(द) CO2

प्रश्न 7.
निम्नलिखित में सबसे स्थायी कार्बधनायन है –
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 कार्बनिक रसायन: कुछ मूल सिद्धान्त और तकनीकें img 1
प्रश्न 8.
समांश विदलन से बनता है –
(अ) कार्बधनायन
(ब) कार्बन
(स) नाइट्रीन
(द) मुक्तमूलक

प्रश्न 9.
निम्नलिखित में कौनसा समूह योगात्मक अभिक्रिया नहीं देता है –
(अ) C ≡ C
(ब) C = C
(स) C = O
(द) CH3 – CH3 (C – C)

उत्तरमाला:
1. (स)
2. (स)
3. (ब)
4. (द)
5. (अ)
6. (ब)
7. (द)
8. (द)
9. (द)

RBSE Class 11 Chemistry Chapter 12 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 10.
– I प्रेरणिक प्रभाव के दो उदाहरण दीजिये।
उत्तर:
– CN तथा – COOH समूह – I प्रभाव दर्शाते हैं।

प्रश्न 11.
दो उदासीन एवं दो ऋणात्मक आवेश के नाभिक स्नेही के नाम लिखिये।
उत्तर:
उदासीन नाभिक स्नेही –
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 कार्बनिक रसायन: कुछ मूल सिद्धान्त और तकनीकें img 2
तथा
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 कार्बनिक रसायन: कुछ मूल सिद्धान्त और तकनीकें img 3
ऋणात्मक आवेश युक्त नाभिक स्नेही – \(\bar { C } \)l तथा R\(\bar { O } \)।

प्रश्न 12,
हेलोजनों का निर्धारण की जाने वाली विधि का नाम बताइये।
उत्तर: कैरियस विधि।

प्रश्न 13.
जेल्डाल (केल्डाल) विधि में नाइट्रोजन प्रतिशतता का समीकरण लिखो।
उत्तर:
नाइट्रोजन की प्रतिशतता
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 कार्बनिक रसायन: कुछ मूल सिद्धान्त और तकनीकें img 4
N1 = अम्ल की नार्मलता,
V1 = प्रयुक्त अम्ल का आयतन
W = कार्बनिक यौगिक का द्रव्यमान

प्रश्न 14.
कार्बन एवं हाइड्रोजन का निर्धारण किस विधि से किया जाता है, नाम लिखिए।
उत्तर: लीबिंग की दहन विधि।

प्रश्न 15.
अनुनाद को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
किसी यौगिक की एक से अधिक संरचनाएँ होने पर उनमें से किसी एक संरचना द्वारा उस यौगिक के सभी गुणों को नहीं समझाया जा सकता तो इन संरचनाओं को अनुनादी संरचनाएँ कहते हैं तथा वास्तविक यौगिक इन सभी संरचनाओं के मिश्रित रूप (अनुनाद संकर) के समान व्यवहार करता है तो इस गुण को अनुनाद कहते हैं।

प्रश्न 16.
कार्बऋणायन में कार्बन परमाणु का संकरण बताइए।
उत्तर:
कार्बऋणायन में कार्बन परमाणु sp3 संकरित होता है।

प्रश्न 17.
प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक कार्बधनायनों के स्थायित्व का क्रम लिखिए।
उत्तर:
प्राथमिक < द्वितीयक < तृतीयक

प्रश्न 18.
कार्बान को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
किसी अभिक्रिया में एक ही कार्बन परमाणु से समॉश विखण्डन द्वारा दो समूह निकलने पर प्राप्त मध्यवर्ती को कार्बान कहते हैं। इस कार्बन पर दो अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं।

प्रश्न 19.
ट्राई मेथिल मेथेन का IUPAC नाम लिखिये।
उत्तर:
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 कार्बनिक रसायन: कुछ मूल सिद्धान्त और तकनीकें img 5
प्रश्न 20.
OHC – CH2 – CH2 – COOH का IUPAC नाम लिखिये।
उत्तर:
4 – ऑक्सो ब्यूटेनोइक अम्ल।

प्रश्न 21.
– OH समूह का पूर्व लग्न और अनुलग्न नाम लिखिये।
उत्तर:
– OH समूह का पूर्वलग्न हाइड्रॉक्सी तथा अनुलग्न ऑल होता है।

प्रश्न 22.
CH3 – CH2 – C ≡ C – CH2 – CH2 का व्युत्पन्न प्रणाली में नाम लिखिये।
उत्तर: डाइएथिल एसीटिलीन।

प्रश्न 23.
दो निकटतम सजात अणुसूत्र के अणुभार में कितना अन्तर होता है?
उत्तर: 14 का।

प्रश्न 24.
दो एरोमैटिक विषम चक्रीयों के नाम एवं संरचना लिखिये।
उत्तर:
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 कार्बनिक रसायन: कुछ मूल सिद्धान्त और तकनीकें img 6

RBSE Class 11 Chemistry Chapter 12 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 25.
नाइट्रोजन, सल्फर तथा हैलोजनों का परीक्षण किस विधि के द्वारा किया जाता है?
उत्तर:

  • नाइट्रोजन का परीक्षण – यौगिक के लैसे विलयन को आयरन (II) सल्फेट (FeSO4) तथा NaOH विलयन के साथ उबालकर विलयन में FeCl3 की कुछ बूंदें मिलाते हैं। अब इसमें 3 – 4 बूंद सान्द्र HCl या H2SO4 मिलाने पर प्रशियन ब्लू रंग आता है। इससे नाइट्रोजन की उपस्थिति निश्चित होती है।
  • सल्फर का परीक्षण – लैसे विलयन में 3 – 4 बूंदें सोडियम नाइट्रोप्रसाइड विलयन की मिलाने पर बैंगनी रंग आता है तो यौगिक में सल्फर उपस्थित है।
  • हैलोजनों का परीक्षण – सोडियम संगलन निष्कर्ष लैसे विलयन को नाइट्रिक अम्ल द्वारा अम्लीकृत करके उसमें सिल्वर नाइट्रेट (AgNO3) विलयन मिलाते हैं तो अमोनियम हाइड्रॉक्साइड में विलेय श्वेत अवक्षेप क्लोरीन की उपस्थिति को, अमोनियम हाइड्रॉक्साइड में अल्प – विलेय पीला अवक्षेप ब्रोमील की उपस्थिति को तथा अमोनियम हाइड्रॉक्साइड में अविलेय पीला अवक्षेप आयोडीन की उपस्थिति को सिद्ध करता है।

प्रश्न 26.
निम्नलिखित यौगिकों के संरचना सूत्र तथा IUPAC नाम दीजिए –

  1. फॉर्मिक अम्ल
  2. ऐथिल ऐसीटेट
  3. ऐथिलमेथिल ईथर।

उत्तर:
1. फॉमिक अम्ल – HCOOH मेथेनोइक अम्ल
2. ऐथिल ऐसीटेट –
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 कार्बनिक रसायन: कुछ मूल सिद्धान्त और तकनीकें img 7
एथिल एथेनोएट
3. एथिल मेथिल ईथर – CH3 – CH2 – O – CH3 मेथॉक्सी एथेन।

प्रश्न 27.
समांश एवं विषमांश विखण्डन में क्या अन्तर है?
उत्तर:

  • समांश विखण्डन में विदलित होने वाले बन्ध के साझित इलेक्ट्रॉन युग्म के एक – एक इलेक्ट्रॉन दोनों परमाणुओं पर चले जाते हैं। तथा मुक्त मूलक बनते हैं जबकि विषमांश विखण्डन में बन्ध के दोनों इलेक्ट्रॉन एक ही परमाणु पर चले जाते हैं जिससे आयन बनते हैं।
  • समांश विखण्डन उच्च ताप, प्रकाश तथा अध्रुवीय माध्यम द्वारा होता है जबकि विषमांश विखण्डन निम्न ताप तथा ध्रुवीय माध्यम द्वारा होता है।

प्रश्न 28.
– I प्रेरणिक प्रभाव दर्शाने वाले दो उदाहरण लिखिए।
उत्तर:
– NO2 तथा – CN, – I प्रेरणिक प्रभाव दर्शाते हैं।

प्रश्न 29.
किन्हीं चार उदासीन इलेक्ट्रानस्नेही के उदाहरण दीजिये।
उत्तर:
SO3, AlCl3, BF3 तथा FeCl3 ऐसे उदासीन यौगिक हैं। जो इलेक्ट्रॉन स्नेही के समान व्यवहार करते हैं।

प्रश्न 30.
निम्नलिखित में +1 प्रभाव के घटते हुए क्रम में व्यवस्थित कीजिए – (CH3)2CH -, CH3 -, (CH3)3C -,CH3 CH2 -.
उत्तर:
(CH3)3 C – > (CH3)2CH – > CH3 – CH2 – > CH3 –
+1 प्रभाव का घटता क्रम

प्रश्न 31.
एल्केन, एल्कीन एवं एल्केनोन की तृतीय समजात के नाम एवं संरचना लिखिए।
उत्तर:
1. एल्केन – CH3 – CH2 – CH3 प्रोपेन
2. एल्कीन – CH3 – CH2 – CH = CH2 ब्यूट – 1 – ईन
3.
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 कार्बनिक रसायन: कुछ मूल सिद्धान्त और तकनीकें img 8
प्रश्न 32.
एल्केनों को पेराफिन्स क्यों कहते हैं?
उत्तर:
एल्केनों को पेराफिन्स भी कहा जाता है, क्योंकि ये बहुत कम क्रियाशील होते हैं तथा लैटिन भाषा में Para का अर्थ है कम तथा affins का अर्थ है क्रियाशीलता। इस कम क्रियाशीलता का कारण इनमें प्रबल σ बन्धों का पाया जाना है।

प्रश्न 33.
क्लोरोफार्म, फार्मिक अम्ल एवं आइसो पेन्टेन के IUPAC नाम लिखिए।
उत्तर:
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 कार्बनिक रसायन: कुछ मूल सिद्धान्त और तकनीकें img 9
प्रश्न 34.
आइसोब्यूटिल एल्कोहॉल एवं ब्यूटिल क्लोराइड के सूत्र लिखिये।
उत्तर:
1. आइसोब्यूटिल एल्कोहॉल –
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 कार्बनिक रसायन: कुछ मूल सिद्धान्त और तकनीकें img 10
2. ब्यूटिल क्लोराइड –
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 कार्बनिक रसायन: कुछ मूल सिद्धान्त और तकनीकें img 11
प्रश्न 35.
निम्नलिखित को इलेक्ट्रॉनस्नेही एवं नाभिकस्नेही में विभेदित कीजिए – NH3, BF3, H2O, FeCl3, \(\bar { O } \)H, H3\(\overset { + }{ O } \), SO3, :CCl2.
उत्तर:
1. इलेक्ट्रॉनस्नेही – BF3, FeCl3, H3\(\overset { + }{ O } \), SO3, :CCl2
2. नाभिकस्नेही – NH3, H2O, \(\bar { O } \)H

प्रश्न 36.
इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक अभिक्रियाएँ किन यौगिकों में पायी जाती हैं? समझाइये।
उत्तर:
इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक अभिक्रिया एल्कीनों तथा एल्काइनों में पायी जाती है। ये निम्न प्रकार होती हैं –
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 कार्बनिक रसायन: कुछ मूल सिद्धान्त और तकनीकें img 12
प्रश्न 37.
पुनर्विन्यास अभिक्रिया उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर:
वह अभिक्रिया जिसमें किसी यौगिक में उत्प्रेरक, ताप तथा दाब के द्वारा परमाणु या समूहों की स्थिति बदल जाती है, जिससे एक नया यौगिक बनता है इसे पुनर्विन्यास अभिक्रिया कहते हैं। उदाहरण:
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 कार्बनिक रसायन: कुछ मूल सिद्धान्त और तकनीकें img 13
प्रश्न 38.
संमांश एवं विषमांश विखण्डन में अन्तर कीजिए।
उत्तर:

  • समांश विखण्डन में विदलित होने वाले बन्ध के साझित इलेक्ट्रॉन युग्म के एक – एक इलेक्ट्रॉन दोनों परमाणुओं पर चले जाते हैं। तथा मुक्त मूलक बनते हैं जबकि विषमांश विखण्डन में बन्ध के दोनों इलेक्ट्रॉन एक ही परमाणु पर चले जाते हैं जिससे आयन बनते हैं।
  • समांश विखण्डन उच्च ताप, प्रकाश तथा अध्रुवीय माध्यम द्वारा होता है जबकि विषमांश विखण्डन निम्न ताप तथा ध्रुवीय माध्यम द्वारा होता है।

प्रश्न 39.
मुक्तमूलक अभिक्रिया समझाइए।
उत्तर:
वे अभिक्रियाएँ जिनमें मुक्तमूलक, मध्यवर्ती के रूप में बनता है उन्हें मुक्त मूलक अभिक्रिया कहते हैं। इन अभिक्रियाओं में समांश विखण्डन होता है।
उदाहरण:
1. मुक्तमूलक प्रतिस्थापन अभिक्रिया – CH  +Cl2 \(\underrightarrow { hv } \) CH3Cl+HCl
2. मुक्त मूलक योगात्मक अभिक्रिया –
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 कार्बनिक रसायन: कुछ मूल सिद्धान्त और तकनीकें img 14
मुक्तमूलक अभिक्रियाएँ श्रृंखला अभिक्रियाएँ कहलाती हैं।

प्रश्न 40.
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 कार्बनिक रसायन: कुछ मूल सिद्धान्त और तकनीकें img 15

प्रश्न 41.
2 – मेथॉक्सी – 2 – मेथिल प्रोपेन का संरचना सूत्र दीजिये।
उत्तर:
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 कार्बनिक रसायन: कुछ मूल सिद्धान्त और तकनीकें img 16

प्रश्न 42.
थायोफीन एवं पिरीडीन में उपस्थित विषम परमाणु बताइये।
उत्तर:
थायोफीन तथा पिरीडीन के संरचना सूत्र निम्नलिखित हैं –
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 कार्बनिक रसायन: कुछ मूल सिद्धान्त और तकनीकें img 17
अतः इनमें विषम परमाणु सल्फर (S) तथा नाइट्रोजन हैं।

प्रश्न 43.
निम्नलिखित में से किसमें अधिक अतिसंयुग्मन होगा? कारण सहित बताइये –
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 कार्बनिक रसायन: कुछ मूल सिद्धान्त और तकनीकें img 18
में अतिसंयुग्मन अधिक होगा क्योंकि इसमें α – H परमाणुओं की संख्या 9 है जबकि CH3 – C\(\overset { + }{ { H }_{ 2 } } \) में केवल 3α – H है, तथा α – H परमाणुओं की संख्या अधिक होने पर अतिसंयुग्मन भी अधिक होता है। इसी कारण (CH3)3\(\overset { + }{ C } \), CH3 – C\(\overset { + }{ { H }_{ 2 } } \) से अधिक स्थायी है।

प्रश्न 44.
निम्नलिखित अभिक्रियाओं को वर्गीकृत कीजिए –
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 कार्बनिक रसायन: कुछ मूल सिद्धान्त और तकनीकें img 19
उत्तर:
(1) यह एक इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक अभिक्रिया है।
(2) यह एक विलोपन अभिक्रिया है।
(3) यह पुनर्विन्यास के साथ नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया का उदाहरण है।

प्रश्न 45.
विलोपन अभिक्रिया को उचित उदाहरण से समझाइये।
उत्तर:
विलोपन अभिक्रिया में किसी यौगिक में से एक या अधिक अणु का विलोपन होता है अर्थात् ये यौगिक में से पृथक् हो जाते हैं। इनमें नया बंध बनता है तथा ये अभिक्रियाएँ एक या दो पदों में सम्पन्न होती हैं।
उदाहरण – एकपदीय –
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 कार्बनिक रसायन: कुछ मूल सिद्धान्त और तकनीकें img 20

प्रश्न 46.
बैलेस्टाइन परीक्षण समझाइये।
उत्तर:
बैलेस्टाइन परीक्षण द्वारा हैलोजन का परीक्षण किया जाता है। इसमे कॉपर के तार को ऑक्सीकारक बुन्सन ज्वाला में गर्म करके इस पर थोड़ा सा पदार्थ लगाकर पुनः गर्म करते हैं तो ज्वाला का रंग हरा हो जाता है। इससे यौगिक में हैलोजन की उपस्थिति सिद्ध होती है। इस परीक्षण में कॉपर हैलाइड बनता है।

प्रश्न 47.
ग्लिसरॉल एवं क्रोटोनिक अम्ल के IUPAC नाम लिखिये।
उत्तर:
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 कार्बनिक रसायन: कुछ मूल सिद्धान्त और तकनीकें img 22

RBSE Class 11 Chemistry Chapter 12 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 48.
संक्षिप्त टिप्पणियाँ लिखिये –
(अ) केकुले की चतुःसंयोजकता का नियम
(ब) वान्टहॉफ एवं ली बेल का सिद्धान्त
(स) सजातीय श्रेणी।
उत्तर:
(अ) केकुले की चतुःसंयोजकता का नियम:
केकुले (1858) ने कार्बन तथा इसके यौगिकों के विषय में एक सिद्धान्त दिया जिसके महत्त्वपूर्ण बिन्दु निम्न हैं –
1. कार्बन परमाणु चतु:संयोजी होता है अर्थात् इसकी संयोजकता चार होती है।
2. कार्बन परमाणु अन्य कार्बन परमाणुओं से बन्धित होकर विभिन्न विवृत श्रृंखला (Open Chain) तथा संवृत श्रृंखला (Closed Chain) यौगिक बना सकता है। कार्बन के इस गुण को श्रृंखलन कहते हैं।
3. कार्बन परमाणु अन्य कार्बन परमाणुओं या दूसरे तत्त्व के परमाणुओं के साथ एकल बन्ध, द्विबन्ध या त्रिबन्ध द्वारा बन्धित हो सकता है। इस आधार पर कार्बन परमाणु की चार संयोजकताएँ निम्नलिखित चार प्रकार से पूर्ण हो सकती है –
(a) चार एकल बंधों द्वारा – जैसे –
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 कार्बनिक रसायन: कुछ मूल सिद्धान्त और तकनीकें img 23
(b) दो एकल बंध तथा एक द्विबन्ध द्वारा – जैसे –
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 कार्बनिक रसायन: कुछ मूल सिद्धान्त और तकनीकें img 24
(c) एक एकल बन्ध तथा एक त्रिबन्ध द्वारा – जैसे –
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 कार्बनिक रसायन: कुछ मूल सिद्धान्त और तकनीकें img 25
(d) दो द्विबन्धों द्वारा – जैसे –
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 कार्बनिक रसायन: कुछ मूल सिद्धान्त और तकनीकें img 26

(ब) वान्टहॉफ एवं ली बेल का सिद्धान्त:
ले बैल तथा वान्ट हॉफ के अनुसार कार्बन की चारों संयोजकताएं एक समचतुष्फलक (Tetrahedron) के चारों शीर्षों की ओर इंगित होती है तथा कार्बन परमाणु इस चतुष्फलक के केन्द्र पर स्थित होता है। कार्बन के चारों बन्ध एक – दूसरे के साथ 109°28′ का कोण बनाते हैं। जिसे बंध कोण (Bond angle) कहते हैं। कार्बन की चारों संयोजकताएँ समान होती हैं।
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 कार्बनिक रसायन: कुछ मूल सिद्धान्त और तकनीकें img 27
कार्बन परमाणु की चतुष्फलकीय ज्यामिति के पक्ष में प्रमाण:
मेथेन के एक हाइड्रोजन परमाणु को जब किसी अन्य परमाणु या समूह द्वारा प्रतिस्थापित किया जाता है तो केवल एक ही प्रकार का उत्पाद प्राप्त होता है। इसी प्रकार जब इसमें से दो हाइड्रोजन परमाणुओं का प्रतिस्थापन किया जाए तो भी एक ही प्रकार का द्विप्रतिस्थापी उत्पाद बनता है। जैसे – CH3 – Cl तथा CH2Cl2।
कार्बन परमाणु की ज्यामिति को चतुष्फलकीय न मानकर वर्गाकार समतलीय या वर्गाकार पिरैमिडी माना जाए तो मेथेन के द्विप्रतिस्थापी उत्पाद CH2Cl2 (Ca2b2) की दो प्रकार की संरचनाएं संभव हैं जबकि वास्तव में इसकी केवल एक ही संरचना होती है। वर्गाकार समतलीय ज्यामिति में कार्बन परमाणु तथा चारों प्रतिस्थापी एक ही तल में स्थित होते हैं जबकि वर्गाकार पिरैमिडी ज्यामिति में चारों प्रतिस्थापी एक ही तल में वर्ग के चारों कोनों पर स्थित होते हैं तथा कार्बन परमाणु इस वर्गाकार तल के ऊपर या नीचे स्थित होता है।
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 कार्बनिक रसायन: कुछ मूल सिद्धान्त और तकनीकें img 28
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 कार्बनिक रसायन: कुछ मूल सिद्धान्त और तकनीकें img 29
CH2Cl2 की केवल एक संरचना की व्याख्या चतुष्फलकीय ज्यामिति द्वारा ही की जा सकती है, इससे कार्बन परमाणु की चतुष्फलकीय ज्यामिति की पुष्टि होती है। इससे यह स्पष्ट होता है कि कार्बन की चारों संयोजकताएँ एक ही तल में स्थित नहीं होती हैं।
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 कार्बनिक रसायन: कुछ मूल सिद्धान्त और तकनीकें img 30
कार्बनिक यौगिकों की पुष्टि इलेक्ट्रॉन विवर्तन तथा अन्य प्रयोगों द्वारा हो चुकी है तथा लै बैल तथा वान्ट हाफ का सिद्धान्त कार्बनिक यौगिकों में त्रिविम समावयवता को समझने में बहुत सहायक सिद्ध हुआ है। कार्बन उत्तेजित अवस्था में ही चतु:संयोजकता दर्शाता है तथा कार्बनिक यौगिकों में तीन प्रकार का संकरण पाया जाता है –
1. sp3 संकरण
2. sp2 संकरण तथा
3. sp संकरण
जिनमें क्रमश: चतुष्फलकीय, त्रिकोणीय समतल तथा रेखीय ज्यामिति होती है तथा सहसंयोजी बन्ध का निर्माण दो परमाणु कक्षकों के अतिव्यापन से होता है जिनमें अयुग्मित इलेक्ट्रॉन उपस्थित होते हैं।

(स) सजातीय श्रेणी:
संरचनात्मक गुणों में समानता रखने वाले कार्बनिक यौगिकों के समूह के सदस्यों को बढ़ते हुए अणुभार के क्रम में लिखा जाता है, तो उस श्रेणी को सजातीय श्रेणी कहते हैं। कार्बनिक यौगिकों के समूह अथवा ऐसी श्रेणी, जिसमें एक विशिष्ट क्रियात्मक समूह उपस्थित हो, सजातीय श्रेणी बनाते हैं। सजातीय श्रेणी के सदस्य जिनके अणु सूत्रों में एक या अधिक > CH2 का अन्तर होता है को सजात अथवा समजात कहते हैं तथा इस गुण को सजातीयता कहते हैं। सजात कभी समावयवी नहीं होते तथा समावयी कभी सजात नहीं होते हैं क्योंकि सजातों के अणु सूत्र में > CH2 का अन्तर होता है। जबकि समावयवियों का अणुसूत्र हमेशा समान होता है।
सजातीय श्रेणी के अभिलक्षण (विशेषताएँ) – सजातीय श्रेणी की निम्न विशेषताएँ होती हैं –
1. सजातीय श्रेणी के दो क्रमागत सदस्यों के मध्य – CH2 का अन्तर होता है। अतः उनके अणुभार में 14 का अन्तर होता है।
2. किसी सजातीय श्रेणी के सदस्यों को एक सामान्य सूत्र द्वारा प्रदर्शित किया जा सकता है।
3. इस श्रेणी के यौगिकों के भौतिक गुणों में क्रमिक परिवर्तन होता है क्योंकि भौतिक गुण अणुभार पर निर्भर करते हैं।
4. सजातीय श्रेणी के सभी सदस्यों के रासायनिक गुण सामान्यतः समान होते हैं क्योंकि रासायनिक गुण मुख्यतः क्रियात्मक समूह पर निर्भर करते हैं।
5. किसी सजातीय श्रेणी के सभी सदस्यों को एक सामान्य विधि द्वारा बनाया जा सकता है।
सजातीय श्रेणियों के कुछ मुख्य वर्ग निम्नलिखित हैं –
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 कार्बनिक रसायन: कुछ मूल सिद्धान्त और तकनीकें img 31
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 कार्बनिक रसायन: कुछ मूल सिद्धान्त और तकनीकें img 32
नोट – एक से अधिक सजातीय श्रेणियों के सामान्य सूत्र समान हो सकते हैं।
अत: इन श्रेणियों के यौगिक आपस में क्रियात्मक समूह समावयवी होते हैं। जैसे –
1. एल्कीन तथा साइक्लोऐल्केन
2. ऐल्कोहॉल तथा ईथर
3. ऐल्डिहाइड तथा कीटोन
4. कार्बोक्सिलिक अम्ल तथा एस्टर इत्यादि।
कार्बन परमाणुओं के प्रकार – कार्बन परमाणु चार प्रकार के होते हैं –
1. प्राथमिक (Primary) p या 1°
2. द्वितीयक (Secondary) s या 2°
3. तृतीयक (Tertiary) t या 3°
4. चतुष्क (Quaternary) q या 4°
किसी कार्बनिक यौगिक में उपस्थित वह कार्बन परमाणु जो एक कार्बन परमाणु से जुड़ा होता है उसे 1°, जो दो कार्बन परमाणुओं से जुड़ा होता है उसे 2°, जो तीन कार्बन परमाणुओं से जुड़ा होता है उसे 3° तथा चार कार्बन परमाणुओं से जुड़े कार्बन को 4° कार्बन कहते हैं।
उदाहरण:
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 कार्बनिक रसायन: कुछ मूल सिद्धान्त और तकनीकें img 33
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 कार्बनिक रसायन: कुछ मूल सिद्धान्त और तकनीकें img 34
हाइड्रोजन परमाणुओं के प्रकार – हाइड्रोजन परमाणु तीन प्रकार के होते हैं –
1. प्राथमिक (Primary) p या 1°
2. द्वितीयक (Secondary) s या 2°
3. तृतीयक (Tertiary) t या 3°
वे हाइड्रोजन परमाणु जो प्राथमिक (1°), द्वितीयक (2°) तथा तृतीयक (3°) कार्बन परमाणुओं से जुड़े होते हैं, उन्हें क्रमशः 1°, 2° तथा 3° हाइड्रोजन परमाणु कहते हैं।
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 कार्बनिक रसायन: कुछ मूल सिद्धान्त और तकनीकें img 35

प्रश्न 49.
निम्नलिखित की व्याख्या कीजिए –
(अ) प्रेरणिक प्रभाव
(ब) इलेक्ट्रोमेरिक प्रभाव
(स) मीसोमेरिक प्रभाव
(द) अतिसंयुग्मन।
उत्तर:
(अ) प्रेरणिक प्रभाव:
प्रेरणिक प्रभाव एक स्थायी प्रभाव है तथा इसके बारे में इन्गोल्ड नामक वैज्ञानिक ने बताया था। कार्बनिक यौगिकों में परमाणुओं की विद्युत ऋणता में अन्तर के कारण साझे का इलेक्ट्रॉन युग्म अधिक विद्युत ऋणी परमाणु या समूह की ओर आंशिक रूप से विस्थापित हो जाता है जिससे बन्ध में ध्रुवता उत्पन्न हो जाती है। इसके कारण समीप का σ बन्ध भी ध्रुवीय हो जाता है। इस प्रकार धुवीय सहसंयोजक बंध की उपस्थिति के कारण किसी समूह या परमाणु द्वारा कार्बन श्रृंखला में निकटवर्ती बंधों में इलेक्ट्रॉनों के विस्थापन को प्रेरणिक प्रभाव कहते हैं।
उदाहरण –
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बंध ध्रुवीय है। इसके कारण कार्बन -1 पर आंशिक धनावेश (δ+) तथा क्लोरीन पर आंशिक ऋणावेश (δ–) उत्पन्न हो जाता है। आंशिक आवेशों को दर्शाने के लिए δ (डेल्टा) चिह्न का प्रयोग किया जाता है। तथा इलेक्ट्रॉनों के विस्थापन को तीर के निशान (δ+ से δ–) द्वारा दर्शाया जाता है। कार्बन -1 आंशिक धनावेश के कारण समीप के C – C बंध के इलेक्ट्रॉनों को अपनी ओर आकर्षित करता है जिससे C1 पर इलेक्ट्रॉन घनत्व में कमी की आंशिक पूर्ति हो जाती है तथा कार्बन – 2 पर भी कुछ धनावेश (δδ+) उत्पन्न हो जाता है लेकिन यह धनावेश C – 1 पर स्थित धनावेश की तुलना में कम होता है अर्थात् C – Cl बन्ध की ध्रुवता के कारण पास के बंध में ध्रुवता उत्पन्न हो जाती है। यह प्रभाव कार्बन श्रृंखला के द्वारा आगे बढ़ता जाता है लेकिन बंधों की संख्या बढ़ने के साथ-साथ यह प्रभाव कम होता जाता है तथा तीन बंधों के बाद प्रेरणिक प्रभाव नगण्य हो जाता है। प्रेरणिक प्रभाव हाइड्रोजन के सापेक्ष देखा जाता है तथा इसका प्रेरणिक प्रभाव शून्य माना जाता है। प्रेरणिक प्रभाव कार्बन श्रृंखला से जुड़े प्रतिस्थापी समूह की इलेक्ट्रॉनों को अपनी ओर आकर्षित करने या प्रतिकर्षित करने (इलेक्ट्रॉन प्रदान करना) की क्षमता पर निर्भर करता है। इस आधार पर प्रेरणिक प्रभाव को दो प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है –
(1) ऋणात्मक प्रेरणिक प्रभाव या इलेक्ट्रॉन आकर्षी प्रभाव (- I):
यह प्रभाव उन परमाणुओं या समूहों द्वारा दर्शाया जाता है जिनकी विद्युत ऋणता हाइड्रोजन से अधिक होती है। इसी कारण यह इलेक्ट्रॉन आकर्षी प्रभाव होता है। इसमें प्रतिस्थापी समूह पर ऋणात्मक चिह्न आता है अतः इसे – I प्रभाव कहते हैं। निम्नलिखित समूह – I प्रभाव दर्शाते हैं। तथा इनके -1 प्रभाव का क्रम निम्नलिखित है –
– NO > SO3R > – CN > – COOH > F > CI > Br > I > OAr > COOR > OH > OAr > – COR > C6H5
(2) धनात्मक प्रेरणिक प्रभाव या इलेक्ट्रॉन प्रतिकर्षी प्रभाव (+I प्रभाव):
परमाणुओं के समूह जिनकी विद्युतऋणता हाइड्रोजन से कम होती है वे + I प्रभाव दर्शाते हैं। इसमें प्रतिस्थापी पर धनावेश आ जाता है अतः इसे + I प्रभाव कहते हैं। यह एक इलेक्ट्रॉन प्रतिकर्षी प्रभाव है। सामान्यतः ऐल्किल समूह + I प्रभाव दर्शाते हैं जिसका कारण अतिसंयुग्मन है लेकिन – I प्रभाव की तुलना में + I प्रभाव दुर्बल होता है। ऐल्किल समूह का आकार बढ़ने पर + I प्रभाव बढ़ता है लेकिन समान कार्बन परमाणुओं युक्त ऐल्किल समूहों में शाखन (Branching) बढ़ने पर + 1 प्रभाव बढ़ जाता है। अतः विभिन्न ऐल्किल समूहों के + I प्रभाव का क्रम निम्नलिखित है –
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प्रेरणिक प्रभाव के अनुप्रयोग – प्रेरणिक प्रभाव की सहायता से अम्लों तथा क्षारों के सामर्थ्य (प्रबलता) की व्याख्या की जा सकती है –
(1) कार्बोक्सिलिक अम्लों की अम्लीय प्रबलताकार्बोक्सिलिक अम्लों की अम्लीय प्रबलता:
– COOH से जुड़े समूह की प्रकृति पर निर्भर करती है। जब – COOH समूह से जुड़ा समूह + I प्रभाव दर्शाता है तो इसके इलेक्ट्रॉन प्रतिकर्षी गुण के कारण – COOH के – O – H समूह के ऑक्सीजन पर इलेक्ट्रॉन घनत्व बढ़ जाता है जिससे अम्ल का आयनन कम हो जाता है अत: इसकी H+ देने की प्रवृत्ति कम हो जाती है अर्थात् अम्लीय गुण में कमी हो जाती है। इसी कारण + I प्रभाव बढ़ने पर अम्लीय गुण कम होता है –
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 कार्बनिक रसायन: कुछ मूल सिद्धान्त और तकनीकें img 38
जब कार्बोक्सिलिक अम्लों में -1 प्रभाव दर्शाने वाला समूह उपस्थित होता है तो इसके इलेक्ट्रॉन आकर्षी गुण के कारण – COOH के – O – H समूह के ऑक्सीजन पर इलेक्ट्रॉन घनत्व कम हो जाता है। जिससे अम्ल का आयनन बढ़ जाता है अत: इसकी H+ देने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है अर्थात् अम्लीय गुण में वृद्धि हो जाती है। इसी कारण – I प्रभाव बढ़ने पर अम्लीय गुण बढ़ता है।
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 कार्बनिक रसायन: कुछ मूल सिद्धान्त और तकनीकें img 39
इस उदाहरण में – Cl की संख्या में वृद्धि हो रही है जिससे – 1 प्रभाव बढ़ रहा है अतः अम्लीय गुण में वृद्धि हो रही है।
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 कार्बनिक रसायन: कुछ मूल सिद्धान्त और तकनीकें img 40
इस उदाहरण में अम्ल से जुड़े समूह का – 1 प्रभाव कम हो रहा है अतः अम्लीय गुण में कमी हो रही है।

नोट – कार्बोक्सिलिक अम्लों के समान फीनॉल में भी – I प्रभाव दर्शाने वाले समूह उपस्थित होने पर अम्लीय गुण में वृद्धि होती है।
(2) ऐमीनों की क्षारीय प्रबलता-सामान्यतयाः
+ I प्रभाव बढ़ने पर ऐमीनों के क्षारीय गुण में वृद्धि होती है तथा – I प्रभाव बढ़ने पर क्षारीय गुण में कमी होती है लेकिन प्रेरणिक प्रभाव के साथ अन्य कारक भी होते हैं जो ऐमीनों के क्षारीय गुण को प्रभावित करते हैं जिनका विस्तृत विवेचन आगे की कक्षाओं में किया जाएगा।

(ब) इलेक्ट्रोमेरिक प्रभाव:
(1) इलेक्ट्रोमरी प्रभाव एक अस्थायी प्रभाव है। अर्थात् यह प्रभाव आक्रमणकारी अभिकर्मक की उपस्थिति में ही होता है तथा आक्रमणकारी अभिकर्मक के हटते ही यह प्रभाव समाप्त हो जाता है।
(2) यह प्रभाव
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समूह युक्त यौगिकों द्वारा दर्शाया जाता है।
(3) आक्रमणकारी अभिकर्मक की माँग पर साझित इलेक्ट्रॉन युग्म का बहुबंध (C = C, C ≡ C) से बंधित एक परमाणु पर पूर्णरूप से विस्थापित होना इलेक्ट्रोमरी प्रभाव कहलाता है।
(4) इस प्रभाव में इलेक्ट्रॉन के संचलन को मुड़े हुए तीर के निशान (↷) द्वारा दर्शाया जाता है।
(5) इलेक्ट्रोमरी प्रभाव दो प्रकार का होता है –
(a) + E प्रभाव
(b) – E प्रभाव
(a) धनात्मक इलेक्ट्रोमेरी प्रभाव (+ E प्रभाव): इसमें बहुआबंध के π – इलेक्ट्रॉनों का विस्थापन उस परमाणु पर होता है, जिससे आक्रमणकारी अभिकर्मक जुड़ता है। जैसे –
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(b) ऋणात्मक इलेक्ट्रोमेरी प्रभाव (- E प्रभाव): इस प्रभाव में बहु-आबंध के π – इलेक्ट्रॉनों का विस्थापन उस परमाणु पर होता है, जिससे आक्रमणकारी अभिकर्मक बंधित नहीं होता है। जैसे –
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(स) मीसोमेरिक प्रभाव:
दो – आबंधों की अन्योन्य क्रिया अथवा – बंध एवं समीप के परमाणु पर उपस्थित एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म के मध्य अन्योन्य क्रिया के कारण किसी अणु में उत्पन्न ध्रुवता को अनुनाद प्रभाव’ या ‘मेसोमरी प्रभाव’ कहते हैं। यह प्रभाव श्रृंखला में संचरित होता है। अनुनाद प्रभाव दो प्रकार के होते हैं –
(1) + M या + R प्रभाव
(2) – M या – R प्रभाव
(1) धनात्मक अनुनाद प्रभाव (+ R या + M प्रभाव) + R प्रभाव में इलेक्ट्रॉन का विस्थापन संयुग्मित अणु में बंधित परमाणु या प्रतिस्थापी समूह से दूर होता है अर्थात् इलेक्ट्रॉन बेन्जीनवलय की ओर विस्थापित होते हैं अर्थात् + M प्रभाव दर्शाने वाले समूहों में इलेक्ट्रॉन प्रदान (प्रतिकर्षित) करने की क्षमता होती है। अतः इस इलेक्ट्रॉनविस्थापन के कारण अणु में ऑर्थों व पैरा स्थितियों पर इलेक्ट्रॉन घनत्व बढ़ जाता है। उदाहरण ऐनिलीन –
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अतः धनात्मक अनुनाद प्रभाव तभी होता है जब बेन्जीन चलय से जुड़े परमाणु पर एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म उपस्थित हो।
संयुग्मित निकाय:
किसी विवृत श्रृंखला अथवा चक्रीय निकाय में एकान्तर एकल तथा द्विबन्ध उपस्थित होने पर इसे ‘संयुग्मित निकाय’ कहते हैं। 3 – ब्यूटाडाइईन, ऐनिलीन, नाइट्रोबेन्जीन इत्यादि इसके उदाहरण हैं। ऐसे निकायों में π – इलेक्ट्रॉन विस्थापित होते हैं जिससे अणु में ध्रुवता उत्पन्न होती है।
(2) ऋणात्मक अनुनाद प्रभाव (- R या – M प्रभाव) – R प्रभाव में इलेक्ट्रॉन का विस्थापन संयुग्मित अणु में बंधित परमाणु अथवा प्रतिस्थापी समूह की ओर होता है, अर्थात् इलेक्ट्रॉन बेन्जीन वलय से बाहर की ओर विस्थापित होते हैं अर्थात् – M प्रभाव दर्शाने वाले समूहों में इलेक्ट्रॉन क्षमता आकर्षित करने की क्षमता होती है जिससे बेन्जीन वलय में इलेक्ट्रॉन घनत्व कम हो जाता है। उदाहरण – नाइट्रोबेन्जीन
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अतः ऋणात्मक अनुनाद प्रभाव तब होता है जब बेन्जीन वलय से जुड़े परमाणु की विद्युत ऋणता कार्बन से अधिक हो तथा उस पर बन्ध की ध्रुवता के कारण धनावेश आ जाता है। जैसे –
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(द) अतिसंयुग्मन:
कार्बनिक यौगिकों के प्रतिस्थापी समूह के σ बंधों तथा निकटवर्ती π तंत्र के मध्य σ – π अस्थायीकरण को अतिसंयुग्मन कहते हैं। अतिसंयुग्मन को आबन्ध रहित अनुनाद भी कहते हैं। क्योंकि इसमें 1 – कार्बन परमाणु तथा H+ के मध्य कोई वास्तविक बंध नहीं होता है। अतिसंयुग्मन एक सामान्य स्थायीकरण प्रभाव है, जिसमें σ इलेक्ट्रॉनों का अनुनाद होता है। अतः यह σ बन्ध अनुनाद भी कहलाता है। इसमें किसी असंतृप्त निकाय के परमाणु से सीधे बंधित ऐल्किल समूह के C – H आबंध अथवा असहभाजित p कक्षक वाले परमाणु के σ इलेक्ट्रॉनों का विस्थानीकरण होता है। अतः ऐल्किल समूह के C – H आबंध के σ इलेक्ट्रॉन निकटवर्ती असंतृप्त निकाय अथवा असहभाजित p कक्षक के साथ आंशिक संयुग्मन दर्शाते हैं। अतिसंयुग्मन एक स्थायी प्रभाव है।
अतिसंयुग्मन को CH3\(\overset { + }{ C } \)H2 (एथिल कार्बधनायन) द्वारा समझाया जा सकता है जिसमें धनावेशित कार्बन पर एक रिक्त p कक्षक है। मेथिल समूह का एक C – H आबंध, रिक्त p कक्षक के तल के संरेखण में हो जाता है, जिसके कारण C – H आबंध के इलेक्ट्रॉन रिक्त p कक्षक में विस्थानीकृत हो जाते हैं, जैसा कि चित्र में दर्शाया गया है।
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अतः इस अतिव्यापन से कार्बधनायन का स्थायित्व बढ़ जाता है, क्योंकि निकटवर्ती σ आबंध के कारण धनावेश का विस्थानीकरण हो जाता है।
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सामान्यतया धनावेशित कार्बन से जुड़े ऐल्किल समूहों की संख्या बढ़ने पर अतिसंयुग्मन अधिक होता है, जिससे कार्बधनायन का स्थायित्व बढ़ता है। अतः विभिन्न कार्बधनायनों के स्थायित्व का क्रम निम्न प्रकार होता है।
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अतिसंयुग्मन ऐल्कीनों तथा ऐल्किलऐरीनों द्वारा भी प्रदर्शित किया जाता है। इसके द्वारा एल्कीनों के आपेक्षिक स्थायित्व को समझाया जा सकता है। प्रोपीन में अतिसंयुग्मन द्वारा इलेक्ट्रॉनों का विस्थानीकरण निम्न प्रकार होता है –
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ऐसा माना जाता है कि अतिसंयुग्मन के कारण C – H आबंध में आंशिक आयनिक गुण आ जाता है।
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प्रश्न 50.
निम्नलिखित तत्त्वों, नाइट्रोजन, सल्फर एवं ब्रोमीन के गुणात्मक विश्लेषण का रसायन लिखिए।
उत्तर:
(1) नाइट्रोजन का परीक्षण:
लैसे विलयन की थोड़ी सी मात्रा को एक परखनली में लेकर उसमें बराबर मात्रा में फेरस सल्फेट (FeSO4) का ताजा बना संतृप्त विलयन मिला देते हैं। इसमें एक – दो बूंद सोडियम हाइड्रॉक्साइड विलयन की डाल देते हैं (यहाँ प्राप्त हरा अवक्षेप किसी भी स्थिति में नाइट्रोजन की उपस्थिति का संकेत नहीं देता है)। अब इस मिश्रण को गर्म करके ठण्डा कर लेते हैं और इसमें फेरिक क्लोराइड की। कुछ बूंदें मिलाते हैं। इसके पश्चात् इसमें 3 – 4 बूंद सान्द्र हाइड्रोक्लोरिक या सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल की मिलाने पर यदि विलयन का रंग हरा नीला (प्रशियन ब्लू) हो जाए तो यौगिक में नाइट्रोजन उपस्थित होता है। इसमें प्रयुक्त अभिक्रियाएँ निम्न हैं
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(2) सल्फर का परीक्षण:
यह निम्नलिखित दो विधियों द्वारा किया जाता है –
1. एक परखनली में लैसे विलयन (सोडियम निष्कर्ष) लेकर उसमें 3 – 4 बूंदें सोडियम नाइट्रोसाइड विलयन की मिलाते हैं। यदि विलयन का रंग बैंगनी हो जाता है तो यौगिक में सल्फर उपस्थित हैं। सोडियम निष्कर्ष में उपस्थित सोडियम सल्फाइड, सोडियम नाइट्रोनुसाइड से अभिक्रिया करके बैंगनी रंग का सोडियम थायो नाइट्रोनुसाइड बना देता है।
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2. सोडियम निष्कर्ष को एक परखनली में लेकर उसे ऐसीटिक अम्ल द्वारा अम्लीकृत करके उसमें लेड एसीटेट विलयन डालने पर लेड सल्फाइड का काला अवक्षेप प्राप्त होता है।
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(3) हैलोजनो का परीक्षण:
1. सोडियम निष्कर्ष में 50 प्रतिशत नाइट्रिक अम्ल डालकर उबालते हैं। विलयन को ठण्डा करके उसमें सिल्वर नाइट्रेट के ताजा बने विलयन की कुछ बूंदें डालने पर श्वेत अवक्षेप आता है जो कि अमोनियम हाइड्रॉक्साइड विलयन के आधिक्य में घुल जाता है तथा तनु नाइट्रिक अम्ल डालने पर पुनः अवक्षेप आ जाता है, क्लोरीन की उपस्थिति दर्शाता है।
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हल्के पीले रंग का अवक्षेप जो कि अमोनियम हाइड्रॉक्साइड विलयन में आंशिक रूप से विलेय होता है, ब्रोमीन की उपस्थिति दर्शाता है।
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गहरे पीले रंग का अवक्षेप जो कि अमोनियम हाइड्रॉक्साइड विलयन में पूर्णतया अविलेय होता है, आयोडीन की उपस्थिति दर्शाता है।
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2. सोडियप निष्कर्ष की थोड़ी सी मात्रा को तनु नाइट्रिक अम्ल द्वारा अम्लीकृत करके कुछ बूंदें क्लोरोफार्म या कार्बन टेट्राक्लोराइड की डालकर बूंद – बूंद करके ताजा क्लोरीन जल डालकर हिलाते हैं –
क्लोरोफॉर्म की परत का रंग लाल – भूरा या नारंगी हो जाता है, जो कि ब्रोमीन की उपस्थिति दर्शाता है।
2NaBr + Cl2 → 2NaCl + Br2
Br2 + क्लोरोफार्म → ब्रोमीन का क्लोरोफार्म में लाल – भूरा विलयन
क्लोरोफार्म की परत का रंग गुलाबी या बैंगनी हो जाता है, जो कि आयोडीन की उपस्थिति दर्शाता है।
2NaI + Cl2 → 2NaCl + I2
I2 + क्लोरोफार्म → आयोडीन का क्लोरोफार्म में बैंगनी विलयन

प्रश्न 51.
ड्यूमा एवं जेल्डाल (केल्डाल) विधि का वर्णन कीजिए। नाइट्रोजन प्रतिशतता की गणना समझाइए।
उत्तर:
नाइट्रोजन का आकलन निम्नलिखित दो विधियों द्वारा किया जाता है –
(1) ड्यूमा विधि (Duma Method)
(2) जेल्डाल विधि या कैल्टॉल विधि (Kjeldahl Method)
(1) ड्यूमा विधि: इस विधि द्वारा सभी प्रकार के यौगिकों में उपस्थित नाइट्रोजन की प्रतिशतता का निर्धारण किया जाता है।
सिद्धान्त:
कार्बनिक यौगिक और क्यूप्रिक ऑक्साइड के मिश्रण को कार्बन डाइऑक्साइड के वातावरण में तेज गर्म करने पर यौगिक में उपस्थित कार्बन और हाइड्रोजन क्रमशः कार्बन डाइऑक्साइड और जल (वाष्प) में ऑक्सीकृत हो जाते हैं तथा नाइट्रोजन गैस मुक्त होती है।
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अल्प मात्रा में बने नाइट्रोजन के ऑक्साइडों को कॉपर. के गर्म तार पर प्रवाहित करके इन्हें नाइट्रोजन में अपचयित कर दिया जाता है। उत्पन्न गैसों के मिश्रण को एक नाइट्रोमीटर में KOH के जलीय विलयन के ऊपर एकत्रित करते हैं जिससे CO2 गैस KOH के विलयन में अवशोषित हो जाती है।
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गणना – माना कि ड्यूमा के प्रयोग में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा m ग्राम, एकत्रित N2 का आयतन V1ml तथा कक्ष तापमान T1K है।
अतः मानक ताप व दाब (S.T.P) पर N2 का आयतन (V) =
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P1 तथा V1 क्रमशः N2 के दाब तथा आयतन हैं। P1 वह दाब जिस पर नाइट्रोजन एकत्रित की गई है, जो कि वायुमण्डलीय दाब से भिन्न है।
P1 = वायुमण्डलीय दाब – जलीय तनाव
∴ S.T.P पर 22400 mL N2 (1 मोल) का द्रव्यमान = 28 ग्राम
∵ S.T.P पर V ml N2 का भार = \(\frac { 28\times { V } }{ 22400 } \) ग्राम
अतः m ग्राम यौगिक में नाइट्रोजन की % मात्रा
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अंशांकित नली में एकत्रित नाइट्रोजन गैस का आयतन माप लेते हैं। प्रयोग के ताप और दाब पर मापित नाइट्रोजन के आयतन को गैस समीकरण द्वारा मानक ताप व दाब (S.T.P) पर बदल कर उससे नाइट्रोजन की मात्रा की गणना कर लेते हैं। कार्बनिक यौगिक और नाइट्रोजन की मात्राओं से यौगिक में नाइट्रोजन की प्रतिशतता की गणना की जाती है।
(2) जेल्डॉल विधि: नाइट्रोजन के निर्धारण की यह एक अच्छी एवं व्यावहारिक विधि है, लेकिन यह विधि
(i) विषम चक्रीय यौगिकों (जैसे पिरीडीन, पायरोल, क्विनोलीन आदि) के लिए प्रयुक्त नहीं की जा सकती है।
(ii) नाइट्रो एवं एजो समूह युक्त यौगिकों के लिए भी यह विधि अनुपयुक्त है, क्योंकि दी गयी प्रायोगिक परिस्थितियों में ये यौगिक नाइट्रोजन को अमोनियम सल्फेट में परिवर्तित नहीं करते हैं।
सिद्धान्त – इस विधि में नाइट्रोजन युक्त यौगिक को सान्द्र H2SO4 के साथ क्युप्रिंक सल्फेट तथा पोटेशियम सल्फेट उत्प्रेरक की उपस्थिति में गरम करते हैं जब तक कि विलयन पारदर्शी न हो जाए जिससे इसमें उपस्थित नाइट्रोजन, अमोनियम सल्फेट [(NH4)2SO4] में परिवर्तित हो जाती है जिसे NaOH के आधिक्य में गरम करने पर अमोनिया गैस निकलती है। प्राप्त गैस को मानक H2SO4 HCl विलयन के ज्ञात आयतन में अवशोषित कर लिया जाता है। इसके पश्चात् बचे हुए H2SO4 का अनुमापन NaOH के मानक विलयन द्वारा करके (उदासीनीकरण) इसकी मात्रा ज्ञात कर लेते हैं। अम्ल (H2SO4) की प्रारम्भिक मात्रा तथा अभिक्रिया के पश्चात् बची हुई मात्रा का अन्तर, अमोनिया के साथ अभिकृत, अम्ल की मात्रा के बराबर होगी।
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कैल्डॉल विधि में प्रयुक्त होने वाला उपकरण नीचे दिए गए चित्र में दर्शाया गया है।
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गणना – कार्बनिक यौगिक तथा अमोनिया की मात्राओं की सहायता से यौगिक में नाइट्रोजन की प्रतिशतता की गणना की जा सकती है।
माना कार्बनिक यौगिक का द्रव्यमान = W ग्राम,
प्रयुक्त अम्ल का आयतन = V1 मिली,
अम्ल की नार्मलता = N1
नार्मलता की परिभाषा के अनुसार 1N NH3 विलयन के 1000 मिली = 17 ग्राम अमोनिया तथा 14 ग्राम नाइट्रोजन
∴ 1N NH3 विलयन के V1 मिली में नाइट्रोजन =
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यौगिक में नाइट्रोजन का भार =
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अतः यौगिक में नाइट्रोजन की प्रतिशतता
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प्रश्न 52.
निम्नलिखित मध्यवर्तियों का निर्माण, संरचना, स्थायित्व एवं ज्यामिति का संक्षिप्त वर्णन कीजिये – कार्बऋणायन, कान, नाइट्रीन।
उत्तर:
कार्बऋणायन:
वह मध्यवर्ती अस्थायी स्पीशीज जिसमें कार्बन पर ऋणावेश होता है, उसे कार्बऋणायन कहते हैं। इसमें ऋणावेशित कार्बन पर एक एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म सहित इलेक्ट्रॉनों का अष्टक पूर्ण होता है। कार्बऋणायन भी सहसंयोजी बन्ध के विषमांश विखण्डन से बनता है। कार्बधनायन के समान कार्बऋणायन भी अस्थायी तथा क्रियाशील स्पीशीज होती है तथा ये नाभिक – स्नेही या लुइस क्षार (इलेक्ट्रॉन युग्मदाता) के समान व्यवहार करती है, क्योंकि इसमें इलेक्ट्रॉनों की प्रचुरता होती है।
उदाहरण:
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कार्बऋणायन में ऋणावेशित कार्बन परमाणु sp3 संकरित अवस्था में होता है। इसमें ऋणावेशित कार्बन परमाणु तीन sp3 संकरित कक्षकों के द्वारा अन्य तीन परमाणुओं के साथ σ बंध बनाता है और चौथे sp3 संकरित कक्षक में एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म उपस्थित होता है। अतः इसकी संरचना पिरामिडीय होती है।
कार्बऋणायन का बनना –
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कार्बनऋणायनों का स्थायित्व –
कार्बऋणायन भी तीन प्रकार के होते हैं – प्राथमिक (1)°, द्वितीयक (2)° तथा तृतीयक (3)° एवं इनके स्थायित्व का क्रम
कार्बधनायन के विपरीत होता है –
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धनात्मक प्रेरणिक प्रभाव (+ I प्रभाव) बढ़ने पर कार्बऋणायनों का स्थायित्व कम होता है क्योंकि + 1 प्रभाव के कारण ऋणावेशित कार्बन पर इलेक्ट्रॉन घनत्व बढ़ जाता है अतः कार्बऋणायनों की क्रियाशीलता बढ़ जाती है। इसके विपरीत ऋणात्मक प्रेरणिक प्रभाव (- I प्रभाव) के कारण कार्बऋणायनों का स्थायित्व बढ़ता है क्योंकि इससे ऋणावेशित कार्बन पर इलेक्ट्रॉन घनत्व कम हो जाता है। इसी कारण क्लोरोमेथिल कार्बऋणायन का स्थायित्व, मेथिल कार्बऋणायन से अधिक होता है।
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कार्बीन:
जब किसी अभिक्रिया में एक ही कार्बन परमाणु से समांश विखण्डन द्वारा दो समूह निकलते हैं तो एक विशेष प्रकार का मध्यवर्ती बनता है। जिसे कान कहा जाता है। यहाँ दोनों बंध समांश विखण्डन द्वारा टूटते हैं, जिसके कारण कार्बन परमाणु पर दो अयुग्मित इलेक्ट्रॉन रह जाते हैं। ये दोनों इलेक्ट्रॉन अलग – अलग बंधों के समांश विखंडन से प्राप्त होते हैं।
उदाहरण:
:CH2 अथवा :CCl2
कार्बान में एक कार्बन परमाणु दो संयोजक बंधों द्वारा दो परमाणुओं से जुड़ा रहता है और इस कार्बन परमाणु पर दो अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं। कार्बान इलेक्ट्रॉन न्यून होते हैं क्योंकि इसके कार्बन परमाणु के बाह्यतम कक्ष में केवल 6 इलेक्ट्रॉन होते हैं।
कार्बन के प्रकार –
कार्बीन मध्यवर्ती दो प्रकार के होते हैं –
एकक (Singlet) कार्बन – इसमें दोनों अयुग्मित इलेक्ट्रॉन एक ही कक्षक में होते हैं और उनका चकण एक – दूसरे के विपरीत होता है, जिससे इसका चुम्बकीय आघूर्ण शून्य हो जाता है।
त्रिक (Triplet) कार्बीन – इस कार्बान में दोनों अयुग्मित इलेक्ट्रॉन दो अलग – अलग कक्षकों में उपस्थित होते हैं और उनका चक्रण भी विपरीत नहीं होता है, जिसके कारण इसमें स्थायी चुम्बकीय आघूर्ण होता है।
कार्बान का बनना –
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नाइट्रीन:
नाइट्रीन, कार्बन के समान ही एक उदासीन इलेक्ट्रॉन न्यून स्पीशीज होती है, जिसमें नाइट्रोजन परमाणु पर चार अयुग्मित इलेक्ट्रॉन और एक सहसंयोजक बंध होता है।
नाइट्रीन भी दो प्रकार के हो सकते हैं –
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रासायनिक अभिक्रियाओं में एकक नाइट्रीन एक इलेक्ट्रॉन स्नेही के समान और त्रिक नाइट्रीन एक द्विमूलक की भाँति व्यवहार करती हैं।
नाइट्रीन का निर्माण –
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उदाहरण – नाइट्रीन हॉफमॉन अभिक्रिया में मध्यवर्ती के रूप में बनता है।

प्रश्न 53.
(अ) मुक्तमूलकों के स्थायित्व एवं अभिक्रियाओं पर प्रकाश डालिये।
(ब) कार्बधनायनों के प्राप्त करने की विधियाँ, अभिक्रियाएँ एवं स्थायित्व की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
(अ) मुक्तमूलकों के स्थायित्व एवं अभिक्रियाओं पर प्रकाश डालिये:
उदासीन मध्यवर्ती स्पीशीज (परमाणु या समूह) जिनमें विषम संख्या में इलेक्ट्रॉन होते हैं उन्हें मुक्त मूलक कहते हैं। मुक्त मूलक समांश विखण्डन से बनते हैं। अन्य मध्यवर्ती स्पीशीज के समान मुक्त मूलक भी अस्थायी तथा क्रियाशील होते हैं। मुक्त मूलक अनुचुम्बकीय होते हैं क्योंकि इनमें अयुग्मित इलेक्ट्रॉन उपस्थित होता है। इनमें अयुग्मित इलेक्ट्रॉन को युग्मित करने की प्रबल प्रवृत्ति होती है अतः ये शीघ्रता से एक – दूसरे के साथ या अन्य अणुओं के साथ अभिक्रिया करके अपने अयुग्मित इलेक्ट्रॉन को युग्मित कर लेते हैं।
मुक्त मूलकों का बनना –
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मुक्त मूलक की कक्षीय संरचना –
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कार्बनिक मुक्त मूलक (जैसे CH3) में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन युक्त कार्बन परमाणु sp2 संकरित अवस्था में होते हैं (इसे sp3 संकरित भी मानते हैं) अतः मेथिल मुक्त मूलक की त्रिकोणीय समतल ज्यामिति होती है। अयुग्मित इलेक्ट्रॉन असंकरित p कक्षक में रहता है।
मुक्त मूलकों का स्थायित्व –
मुक्त मूलकों को तीन प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है – प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक, जब अयुग्मित इलेक्ट्रॉन क्रमशः प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक कार्बन परमाणु पर उपस्थित होता है।
मुक्त मूलकों के स्थायित्व का क्रम भी कार्बधनायनों के समान ही होता है अर्थात् इनके स्थायित्व का क्रम निम्न है जिसका कारण बढ़ता हुआ अतिसंयुग्मन तथा धनात्मक प्रेरणिक प्रभाव है।
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मुक्त मूलक – π बन्ध के अनुनाद के कारण मुक्त मूलकों का स्थायित्व भी बढ़ता है, अतः π बन्ध युक्त मुक्त मूलकों के स्थायित्व का बढ़ता क्रम निम्न प्रकार है –
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मुक्त मूलक प्रतिस्थापन – ये अभिक्रियाएँ मुक्त मूलक द्वारा सम्पन्न होती हैं जिसमें प्रकाश (hv) या परऑक्साइड की उपस्थिति आवश्यक है।
उदाहरण:
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ये अभिक्रियाएँ लगातार चलती रहती हैं अतः इन्हें श्रृंखला अभिक्रियाएँ कहते हैं।
मुक्त मूलक योगात्मक अभिक्रियाएँ – इस प्रकार की अभिक्रियाओं में
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पर मुक्त मूलक, जो कि प्रकाश की उपस्थिति में अभिकर्मक के समांश विखण्डन द्वारा बनता है का योग होकर एक मध्यवर्ती मुक्त मूलक बनता है। यह मध्यवर्ती किसी अन्य परमाणु या यौगिक या मुक्त मूलक से अभिक्रिया कर उत्पाद बनाता है। यह भी एक श्रृंखला अभिक्रिया है तथा खराश के नियम द्वारा होती है।
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(ब) कार्बधनायनों के प्राप्त करने की विधियाँ, अभिक्रियाएँ एवं स्थायित्व:
कार्बधनायन:
वह मध्यवर्ती अस्थायी स्पीशीज जिसमें कार्बन पर धनावेश होता है, उसे कार्बधनायन कहते हैं। पहले इसे कार्बोनियम आयन भी कहा जाता था। कार्बधनायन में धनावेशित कार्बन पर इलेक्ट्रॉनों का षष्टक (6 इलेक्ट्रॉन) (Sextet) होता है अतः यह कार्बन इलेक्ट्रॉन न्यून होता है। तथा इस पर sp2 संकरण होता है एवं इसकी आकृति त्रिकोणीयसमतल होती है। कार्बधनायन अत्यधिक अस्थायी तथा क्रियाशील होते हैं।
कार्बधनायन का बनना – कार्बधनायन सहसंयोजक बंध के विषमांश विखण्डन द्वारा कुछ अभिक्रियाओं में मध्यवर्ती के रूप में बनते हैं।
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कार्बधनायन की आकृति – कार्बधनायन की आकृति त्रिकोणीय समतल होती है, जिसमें धनावेशित कार्बन sp2 संकरित होता है (बन्ध कोण 120°) अत: \(\overset { + }{ C } \)H3 में कार्बन के तीन sp2 संकरित कक्षक हाइड्रोजन के 1s कक्षकों के साथ अतिव्यापन करके C(sp2) – H(1s) सिग्मा बन्ध बनाते हैं तथा असंकरित रिक्त p कक्षक इस तल के लंबवत् होता है।
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कार्बधनायनों को तीन प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है – प्राथमिक (1°), द्वितीयक (2°) तथा तृतीयक (3°) जिनमें धनावेशित कार्बन क्रमशः प्राथमिक, द्वितीयक तथा तृतीयक होता है।
उदाहरण – \(\overset { + }{ C } \)H3 को मेथिल धनायन या मेथिल कार्बधनायन कहते हैं। इसी प्रकार CH3\(\overset { + }{ C } \)H2 को एथिल कार्बधनायन (एक प्राथमिक कार्बधनायन), (CH3)3\(\overset { + }{ C } \)H को आइसोप्रोपिल कार्बधनायन (एक द्वितीयक कार्बधनायन) एवं (CH3)3\(\overset { + }{ C } \) को तृतीयक ब्यूटिलकार्बधनायन (एक तृतीयक कार्बधनायन) कहा जाता है।
कार्बधनायनों का स्थायित्व – कार्बधनायनों के स्थायित्व का क्रम निम्न प्रकार होता है –
तृतीयक > द्वितीयक > प्राथमिक
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ऐल्किल कार्बधनायनों के स्थायित्व की व्याख्या अतिसंयुग्मन तथा प्रेरणिक प्रभाव द्वारा की जा सकती है। अतिसंयुग्मन बढ़ने पर, धनात्मक प्रेरणिक प्रभाव (+ I प्रभाव) में भी वृद्धि होती है जिससे कार्बधनायन के धनावेश का विस्थानीकरण होता है। इसलिए कार्बधनायन का स्थायित्व बढ़ जाता है। अतः धनावेशित कार्बन से जुड़े एल्किल समूहों की संख्या बढ़ने पर कार्बधनायन के स्थायित्व में वृद्धि होती है क्योंकि एल्किल समूह के इलेक्ट्रॉन प्रतिकर्षी गुण के कारण ये इलेक्ट्रॉन न्यून कार्बन की इलेक्ट्रॉन न्यूनता में कमी कर देते हैं। लेकिन ऋणात्मक प्रेरणिक प्रभाव (- I प्रभाव) के कारण कार्बधनायन के स्थायित्व में कमी होती है। वे कार्बधनायन जिनमें π इलेक्ट्रॉनों का अनुनाद होता है। उनका स्थायित्व ऐल्किल कार्बधनायनों से अधिक होता है तथा अनुनाद के बढ़ने पर इनका स्थायित्व बढ़ता है।
उदाहरण –
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इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन – इसमें एक इलेक्ट्रॉनस्नेही का प्रतिस्थापन अन्य इलेक्ट्रॉनस्नेही द्वारा होता है।
उदाहरण – ऐरोमैटिक यौगिकों में वाक्य में प्रतिस्थापन
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इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक अभिक्रियाएँ – ये ऐल्कीन और ऐल्काइन के द्विबंध एवं त्रिबंध पर निम्नलिखित प्रकार से दर्शायी जा सकती हैं –
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उदाहरण –
CH2 = CH2 + HBr → CH3 – CH2 – Br

प्रश्न 54.
नामकरण की रूढ़ प्रणाली को उदाहरण सहित समझाइए, इसकी सीमाएँ क्या हैं?
उत्तर:
रूढ़ पद्धति या सामान्य नाम पद्धति:
कार्बनिक यौगिकों के नामकरण की यह सबसे पुरानी पद्धति है। इस पद्धति में यौगिकों का नाम उनके स्रोत, स्थान, विशिष्ट गुण, आविष्कार तथा उपयोग इत्यादि के आधार पर दिया जाता है। इस प्रकार के नाम सरल तथा छोटे होते हैं लेकिन नियमबद्ध न होने के कारण अलग-अलग याद रखना पड़ता है तथा इनका यौगिक की संरचना से कोई सम्बन्ध नहीं होता है। कुछ महत्त्वपूर्ण यौगिकों के रूढ़ नाम सारणी में दिए गए हैं –
सारणी: कार्बनिक यौगिकों के रूढ़नाम
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कुछ वर्ष पूर्व प्राप्त कार्बन के एक नवीन क्रिस्टलीय अपररूप C60 का नाम ‘बकमिन्स्टर फुलरीन’ रखा गया, क्योंकि इसकी आकृति अल्पांतरी गुंबदों से मिलती है। इसे प्रसिद्ध अमेरिकी वास्तुकार आर. बुक मिन्स्टर फुलर ने लोकप्रिय बनाया।
कार्बनिक यौगिकों के नाम के साथ नार्मल, आइसो तथा नियो प्रयुक्त करने के नियम
1. नार्मल (n): सीधी श्रृंखला युक्त ऐल्केन तथा इनके व्युत्पन्नों के नाम में n का प्रयोग करते हैं लेकिन IUPAC पद्धति में n का प्रयोग नहीं किया जाता है।
CH3 – CH2 – CH2 – CH3 n – ब्यूटेन
CH3 – CH2 – CH2 – CH2 – CH3 n – पेन्टेन
2. आइसो (iso): एल्केन, एल्कीन तथा इनके व्युत्पन्नों में जब यौगिक के एक सिरे पर एक कार्बन से दो मेथिल समूह जुड़े हों
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तथा शेष कार्बन श्रृंखला सीधी हो तब आइसो का प्रयोग करते हैं।
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3. निर्या (Neo): एल्केन तथा इनके व्युत्पन्नों में यौगिक के एक सिरे की तरफ
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समूह हो तथा शेष कार्बन श्रृंखला सीधी हो तो नियो का प्रयोग किया जाता है।
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कुछ कार्बनिक यौगिकों के सामान्य अथवा रूढ़ नाम निम्नलिखित हैं –
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एल्केन के एकसंयोजी मूलक: ऐल्केन में से एक हाइड्रोजन परमाणु हटाने पर प्राप्त मूलक को ऐल्किल मूलक कहते हैं। ऐल्किल समूह का नाम प्राप्त करने के लिए संबंधित ऐल्केन के नाम से ऐन (ane) को इल (yl) द्वारा प्रतिस्थापित किया जाता है।
उदाहरण –
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ब्यूटेन के मूलक – ब्यूटेन (C4H10) के दो समावयवी होते हैं – n – ब्यूटेन तथा आइसोब्यूटेन। n – ब्यूटेन से दो तथा आइसोब्यूटेन से भी दो ऐल्किल मूलक प्राप्त होते हैं। अतः ब्यूटेन के एकसंयोजी मूलक [ब्यूटिल (Bu)] चार होते हैं।
(1) n – ब्यूटेन (C4H10):
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(2) आइसोब्यूटेन (C4H10):
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पेन्टेन के मूलक – पेन्टेन (C5H2) के तीन समावयवी होते हैं – n – पेन्टेन, आइसोपेन्टेन तथा नियोपेन्टेन जिनसे क्रमशः 3, 4 तथा 1 एकसंयोजी मूलक बनते हैं। अतः पेन्टेन के एकसंयोजी मूलक (पेन्टिल) आठ होते हैं। पेन्टिल मूलक को एमिल भी कहा जाता है।
(1) n – पेन्टेन:
CH3 – CH2 – CH – CH2 – CH3
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(2) आइसोपेन्टेन:
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(3) नियोपेन्टेन:
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कुछ महत्वपूर्ण असंतृप्त हाइड्रोकार्बन के मूलक निम्नलिखित हैं –
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कुछ महत्वपूर्ण ऐरोमैटिक मूलक निम्नलिखित हैं –
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सामान्य नाम पद्धति में विभिन्न सजातीय श्रेणियों के कार्बनिक यौगिकों का नामकरण
(i) एल्कीन – ऐल्कीनों को सामान्य नाम ऐल्किलीन होता है तथा द्विबन्ध की स्थिति के आधार पर इनमें α (1), β (2) इत्यादि का प्रयोग किया जाता है।
उदाहरण:

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(ii) एल्काइन – कुछ एल्काइनों के सामान्य नाम निम्नलिखित
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निम्नलिखित सजातीय श्रेणियों को सामान्य नाम ऐल्किल या अन्य मूलकों के नाम के आधार पर दिया जाता है।
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उदाहरण –
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दो या दो से अधिक मूलकों युक्त यौगिकों के सामान्य नाम –
(viii) ईथर (R – O – R1) जब R = R1 डाइएल्किल ईथर (सरल ईथर) R ≠ R1 ऐल्किल ऐल्किल1 ईथर (मिश्रित ईथर)
जब ऐल्किल समूह भिन्न – भिन्न होते हैं तो उन्हें अंग्रेजी वर्णमाला क्रम में लिखा जाता है।
उदाहरण – अंग्रेजी वर्णमाला क्रम देखते समय Iso तथा Neo का पहला अक्षर देखा जाता है लेकिन n -, sec., tert. इत्यादि का नहीं।
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जब R = R1 डाइऐल्किल कीटोन (सरल कीटोन)
R ≠ R1 ऐल्किल ऐल्किल1 कीटोन (मिश्रित कीटोन)।
उदाहरण –
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(x) ऐमीन (Amines):
ऐमीन तीन प्रकार के होते हैं-प्राथमिक (1°), द्वितीयक (2°) तथा तृतीयक (3°) ऐमीन जिनके क्रियात्मक समूह क्रमशः – NH2 (ऐमीनो) – NH -(इमीनो) तथा
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(नाइट्रिलो या तृतीयक नाइट्रोजन) हैं। ऐमीनों को सामान्य नाम निम्न प्रकार दिया जाता है –
प्राथमिक ऐमीन (R – NH2) – ऐल्किलऐमीन
उदाहरण –
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द्वितीयक ऐमीन (R – NH – R1)
जब R = R1 डाइऐल्किलऐमीन
R ≠ R1 ऐल्किल ऐल्किल1 ऐमीन (अंग्रेजी वर्णमाला क्रम में)
उदाहरण –
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जब R = R1 = R11 ट्राइऐल्किलऐमीन
लेकिन जब ऐल्किल समूह भिन्न-भिन्न होते हैं तो इन्हें अंग्रेजी वर्णमाला क्रम में लिखा जाता है।
उदाहरण –
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संतृप्त ऐलिफैटिक (खुली श्रृंखलायुक्त) ऐल्डिहाईड, कार्बोक्सिलिक अम्ल तथा अम्ल के व्युत्पन्नों के सामान्य नाम इन श्रेणियों के यौगिकों के सामान्य नाम के लिए निम्नलिखित पूर्वलग्न प्रयुक्त किए जाते हैं –
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(xi) ऐल्डिहाइड (R – CHO): ऐल्डिहाइडों के सामान्य नाम में उपरोक्त पूर्वलग्नों के साथ ऐल्डिहाइड शब्द लगाया जाता है।
उदाहरण –
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(xii) कार्बोक्सिलिक अम्ल (RCOOH): कार्बोक्सिलिक अम्लों का सामान्य नाम लिखने के लिए पूर्वलग्न के साथ इकअम्ल लगाया जाता है।
उदाहरण –
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(xiii) कार्बोक्सिलिक अम्लों के व्युत्पन्न – कार्बोक्सिलिक अम्लों के व्युत्पन्न चार प्रकार के होते हैं। जब कार्बोक्सिलिक अम्लों (RCOOH) का – OH समूह एक भिन्न समूह (Z) द्वारा प्रतिस्थापित होता है तो इनके व्युत्पन्न प्राप्त होते हैं।
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जब Z = X (हैलोजन) तो प्राप्त व्युत्पन्न
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को अम्ल के हैलाइड, Z= NH2 तो अम्ल के ऐमाइड (RCONH2), Z = OR1 ता अम्ल क एस्टर
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तथा Z = – OCOR1 होने पर इन्हें अम्ल के ऐन्हाइड्राइड [(RCO)2] कहते हैं।
• अम्ल के हैलाइड (R – COX): यौगिक का नाम = पूर्वलग्न + इल हैलाइड (yl Halide)
उदाहरण –
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• अम्ल के ऐमाइड (RCONH2)
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• अम्ल के एस्टर
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एस्टरों का सामान्य नाम देने के लिए सर्वप्रथम ऑक्सीजन से जुड़े हुए मूलक का नाम तथा उसके पश्चात् अम्ल (जिससे वह बना है) के सामान्य नाम के अनुसार फॉर्मेट, ऐसीटेट इत्यादि लिखा जाता है।
उदाहरण –
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• अम्ल के ऐन्हाइड्राइड
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ऐन्हाइड्राइड का अर्थ है जल का निकलना, अतः दो – COOH समूहों में से एक जल का अणु निकलने पर ऐन्हाइड्रोइड प्राप्त होते हैं।
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ऐन्हाइड्राइडों का नाम देने के लिए अम्ल के सामान्य नाम (जिससे यह बना है) के साथ ऐन्हाइड्राइड लिखा जाता है।
उदाहरण –
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दो भिन्न – भिन्न अम्लों से ऐन्हाइड्राइड बनने पर उन्हें अंग्रेजी वर्णमाला क्रम में लिखा जाता है।
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प्रश्न 55.
IUPAC नामकरण के नियमों की व्याख्या उदाहरण सहित कीजिए।
उत्तर:
आई.यू.सी. (IUC) / आई.यू.पी.ए.सी. (IUPAC) / सुव्यवस्थित (Systematic) / जेनेवा प्रणाली:
सामान्य या रूढ़ नामों में निम्नलिखित कमियाँ पाई गईं –
(1) किसी एक यौगिक के एक से अधिक होना जैसे मेथिल ऐल्कोहॉल को काष्ठ स्पिरिट (Wood sprit) तथा कार्बिनॉल भी कहा गया।
(2) जब यौगिक में कार्बन श्रृंखला लम्बी होती है तो उनके समावयवों की संख्या बढ़ जाती है जैसे हैप्टेन के नौ (9) समावयवी तथा नोनेन के 35 समावयवी होते हैं जिनके नाम रूढ़ प्रणाली में देना अत्यन्त मुश्किल था। अतः किसी भी यौगिक का अविवादित एवं स्वीकार्य नाम देने के लिए वैज्ञानिकों ने IUPAC प्रणाली को अपनाया।
नामकरण की IUPAC पद्धति एक सुव्यवस्थित पद्धति है जिसमें लाखों यौगिकों का नाम आसानी से दिया जा सकता है तथा उनकी स्पष्ट रूप से पहचान की जा सकती है क्योंकि इसमें यौगिक का नाम उसकी संरचना के अनुसार दिया जाता है। अतः यौगिक के नाम के आधार पर उसकी संरचना आसानी से बनायी जा सकती है। कुछ यौगिकों के IUPAC नाम लंबे तथा जटिल होते हैं अतः उनके सामान्य (रूढ़) नामों को ही अधिक महत्व दिया जाता है। किसी कार्बनिक यौगिक का IUPAC नाम लिखने के लिए सर्वप्रथम मूल हाइड्रोकार्बन तथा उससे जुड़े क्रियात्मक समूहों की पहचान करनी होती है। जनक हाइड्रोकार्बन के नाम में उपयुक्त पूर्वलग्न (Prefix) तथा अनुलग्न (Suffix) जोड़कर यौगिक का नाम दिया जाता है।
उदाहरण –
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ऐल्केनों का IUPAC नामकरण:
I. सीधी श्रृंखलायुक्त ऐल्केन:
कार्बन – कार्बन एकल बन्ध युक्त हाइड्रोकार्बनों (संतृप्त हाइड्रोकार्बन) को ऐल्केन कहते हैं। पहले इन्हें पैराफिन (Paraffins) भी कहा जाता था क्योंकि ये बहुत कम क्रियाशील होते हैं तथा लैटिन भाषा में Para का अर्थ है कम तथा affins का अर्थ है क्रियाशीलता। ऐल्केनों में मेथेन (CH4), एथेन (C2H6), प्रोपेन (C3H8) तथा ब्यूटेन (C4H10) सामान्य नाम है लेकिन IUPAC पद्धति में इन्हीं नामों को मान लिया गया है। ब्यूटेन के पश्चात् शेष एल्केनों के नाम उनकी सीधी श्रृंखला की संरचना पर आधारित होते हैं तथा उनका नाम देते समय कार्बन परमाणुओं की संख्या के आधार पर पूर्वलग्न एवं इसके पश्चात् अनुलग्न ऐन (ane) का प्रयोग किया जाता है।
कुछ सीधी श्रृंखलायुक्त ऐल्केनों के पूर्व लग्न, नाम तथा उदाहरण निम्नलिखित हैं –
सारणी – सीधी श्रृंखलायुक्त ऐल्केनों के नाम
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II. शाखित श्रृंखलायुक्त एल्केन:
शाखित श्रृंखलायुक्त ऐल्केनों में कार्बन परमाणुओं की एक या एक से अधिक छोटी श्रृंखलाएँ जनक श्रृंखला के कई कार्बन परमाणुओं के साथ जुड़ी होती हैं। इन शाखाओं को ऐल्किन मूलक या ऐल्किल समूह कहा जाता है जो कि शाखित तथा अशाखित दोनों प्रकार की होती हैं। ऐल्किल मूलकों के नामों का अध्ययन इसी अध्याय में पूर्व में किया जा चुका है।
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शाखित श्रृंखला युक्त ऐल्केनों का नाम देने के लिए ऐल्किल समूह का नाम पूर्वलग्न के रूप में तथा जनक श्रृंखला ऐल्केन का नाम अनुलग्न के रूप में प्रयुक्त किया जाता है।
शाखित श्रृंखलायुक्त ऐल्केनों के IUPAC नामकरण में प्रयुक्त नियम निम्न प्रकार हैं –
(1) दीर्घतम कार्बन श्रृंखला का चयन:
सर्वप्रथम यौगिक में दीर्घतम कार्बन श्रृंखला का चयन किया जाता है, जिसे जनक श्रृंखला या मूल श्रृंखला (Root Chain) या मुख्य श्रृंखला (Main Chain) कहते हैं। संरचना (I) में जनक श्रृंखला में नौ कार्बन हैं। इसी यौगिक की संरचना II में प्रदर्शित जनक श्रृंखला का चयन सही नहीं है, क्योंकि इसमें आठ कार्बन हैं।
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(2) वरीय कार्बन श्रृंखला का चयन (अधिकतम प्रतिस्थापी चयन नियम):
किसी ऐल्केन में यदि सबसे लम्बी श्रृंखला (समान कार्बन युक्त) की दो या दो से अधिक सम्भावनाएँ हैं तो उस कार्बन श्रृंखला का मुख्य श्रृंखला के रूप में चयन किया जाता है, जिसमें प्रतिस्थापियों या पाश्र्व श्रृंखला की संख्या अधिकतम हो।
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इस यौगिक में सीधी श्रृंखला में कार्बन परमाणुओं की संख्या 5 है। परन्तु इसमें केवल एक ही प्रतिस्थापी (आइसो प्रोपिल) जुड़ा है जबकि अंकित मुख्य श्रृंखला में 5 कार्बन परमाणुओं के साथ दो प्रतिस्थापी (एथिल तथा मेथिल) जुड़े हैं।
(3) कार्बन परमाणुओं की श्रृंखला का क्रमांकन (लघुसंख्यक नियम):
जनक ऐल्केन को ज्ञात करने के लिए चयनित मुख्य श्रृंखला के कार्बन परमाणुओं का अंकन किया जाता है। यह क्रमांकन यौगिक के उस सिरे से प्रारम्भ करते हैं, जिधर से शाखा के रूप में उपस्थित ऐल्किल समूहों को न्यूनतम अंक मिले।
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उपर्युक्त उदाहरण में क्रमांकन बाईं ओर से होना चाहिए (कार्बन संख्या 2 तथा 6 पर शाखा), न कि दाईं ओर से (कार्बन संख्या 4 तथा 8 पर शाखा)।
(4) न्यूनतम प्रतिस्थापी योग नियम:
यदि किसी यौगिक में समान प्रतिस्थापी दोनों सिरों से समान अंक पर स्थित हैं तथा इनके अतिरिक्त कोई अन्य प्रतिस्थापी भी उपस्थित है तो कार्बन श्रृंखला का क्रमांकन उस सिरे से किया जाता
है जिधर से प्रतिस्थापियों की स्थिति के अंकों का योग न्यूनतम हो।
उदाहरणार्थ:
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(5) प्रतिस्थापियों का नामोल्लेख करने के नियम:
शाखा के रूप में स्थित ऐल्किल समूहों के नाम एल्केन के नाम से पहले पूर्वलग्न के रूप में लिखे जाते हैं तथा इन ऐल्किल समूहों (प्रतिस्थापियों) की स्थिति को संख्या द्वारा दर्शाया जाता है। भिन्न – भिन्न प्रकार के ऐल्किल – समूहों के नामों को अंग्रेजी वर्णमाला क्रम में लिखा जाता है चाहे श्रृंखला में उनकी स्थिति कुछ भी हो। ऐल्किल समूह तथा संख्या के मध्य संयोजक – रेखा एवं ऐल्किल समूह तथा जनक श्रृंखला ऐल्केन को मिलाकर लिखा जाता है।
उदाहरण:
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(6) जब यौगिक में दो या दो से अधिक समान प्रतिस्थापी उपस्थित होते हैं तो उनकी संख्याओं के मध्य अल्पविराम (कोमा) लगाते हैं तथा इन प्रतिस्थापी समूहों के नाम को दुबारा न लिखकर इन्हें उचित पूर्वलग्न, जैसे – डाई, ट्राई, टेट्रा इत्यादि द्वारा दर्शाया जाता है। लेकिन इन्हें (डाई, ट्राई) अंग्रेजी वर्णमाला क्रम में नहीं लिया जाता है। तथा यौगिक का नाम लिखते समय प्रतिस्थापी समूहों के नामों को ही अंग्रेजी वर्णमाला के क्रम में लिया जाता है।
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(7) अंग्रेजी वर्णमाला क्रम नियम:
जब किसी यौगिक में दो असमान प्रतिस्थापियों की स्थिति समान होती है तो अंग्रेजी वर्णमाला क्रम में पहले आने वाले प्रतिस्थापी को न्यूनतम अंक दिया जाता है। अतः निम्नलिखित यौगिक का सही नाम 3 – एथिल – 6 – मेथिलऑक्टेन है, न कि 6 – एथिल – 3 – मेथिलऑक्टेन।
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(8) जब प्रतिस्थापी (ऐल्किल समूह) बड़ा एवं जटिल होता है। तथा जिसका कोई सामान्य नाम नहीं होता तो उसका भी IUPAC नाम दिया जाता है जिसमें शाखित श्रृंखला के उस कार्बन को प्रथम अंक दिया जाता है जो जनक श्रृंखला से जुड़ा होता है एवं ऐसे जटिल प्रतिस्थापी का नाम कोष्ठक में लिखा जाता है। जैसे –
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जब प्रतिस्थापियों का सामान्य नाम लिखा जाता है तो उनका अंग्रेजी वर्णमाला क्रम देखते समय आइसो (iso) तथा नियो (ne0) पूर्वलग्नों को मूल ऐल्किल समूह के नाम का भाग माना जाता है। अतः इनका प्रथम अक्षर अंग्रेजी वर्णमाला क्रम में देखा जाता है। परन्तु पूर्वलग्न द्वितीयक (sec -) तथा तृतीयक (tert -) को मूल ऐल्किल समूह के नाम का भाग नहीं माना जाता अतः इनका प्रथम अक्षर अंग्रेजी वर्णमाला क्रम में नहीं देखा जाता है। आइसो तथा अन्य पूर्वलग्नों का प्रयोग आई.यू.पी.ए.सी. पद्धति में भी किया जाता है।
उदाहरण –
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III. असंतृप्त हाइड्रोकार्बन का नामकरण:
वे हाइड्रोकार्बन जिनमें कम से कम एक द्विबन्ध (> C = C <) या एक त्रिआबन्ध (- C = C -) उपस्थित होता है उन्हें अंसतृप्त हाइड्रोकार्बन कहते हैं। > C = C < युक्त यौगिकों को ऐल्कीन तथा – C = C – युक्त यौगिकों को एल्काइन कहा जाता है।
(1) एल्कीनों का नामकरण: एल्कीनों का I.U.PA.C. नामकरण निम्नलिखित नियमों के अनुसार दिया जाता है –
नियम 1.
मुख्य श्रृंखला में द्विआबन्ध को लेकर इसको न्यूनतम अंक दिया जाता है तथा इसके लिए अनुलग्न-इन प्रयुक्त होता है एवं अनुलग्न से पहले द्विबन्ध की स्थिति बतायी जाती है।
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यद्यपि इसमें सीधी श्रृंखला सबसे लम्बी है परन्तु इसमें C = C नहीं है।
नियम 2.
मुख्य श्रृंखला का अंकन करते समय द्वि-आबन्ध को पाश्र्व श्रृंखला (CH3 – अथवा C2H5 – समूह) की तुलना में प्राथमिकता दी जाती है। लेकिन द्विबन्ध दोनों सिरों से समान स्थिति पर आता है तो प्रतिस्थापी को न्यूनतम अंक दिया जाता है।
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नियम 3.
जब किसी यौगिक में द्विआबन्ध तथा त्रिआबन्ध की स्थिति समान होती है तो द्वि – आबन्ध को प्राथमिकता दी जाती है, अन्यथा द्विआबन्ध या त्रिआबन्ध में से जो भी पहले आता है उसी सिरे से अंकन कर दिया जाता है लेकिन नाम लिखते समय पहले ईन तथा इसके पश्चात् आइन लिखा जाता है।
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नियम 4. जब यौगिक में दो द्वि – आबन्ध होते हैं तो इन्हें एल्कोडाइईन कहा जाता है।
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एल्काइनों का नामकरण:
नियम 1. त्रि – आबन्ध को जनक श्रृंखला में लेकर उसे न्यूनतम अंक दिया जाता है तथा शेष नियम एल्कीनों के समान ही होते हैं।
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नियम 2. पाश्र्व श्रृंखला की तुलना में त्रिआबन्ध को प्राथमिकता दी जाती है।
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नियम 3. यौगिक में दो या अधिक त्रिआबन्ध उपस्थित होने पर डाइआइन, ट्राइआइन इत्यादि अनुलग्न प्रयुक्त किए जाते हैं।
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(इस यौगिक में दायीं ओर से अंकन किया गया है क्योंकि इससे द्विआबन्ध तथा त्रिआबन्ध दोनों को न्यूनतम अंक मिले हैं।)
असंतृप्त हाइड्रोकार्बन के अन्य उदाहरण –
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IV. चक्रीय संतृप्त हाइड्रोकार्बनों का नामकरण:
एकल चक्रीय ऐलिसाइक्लिक संतृप्त हाइड्रोकार्बनों का नाम संबंधित खुली श्रृंखला ऐल्केन के नाम से पहले पूर्वलग्न ‘साइक्लो’ लगाकर दिया जाता है। पार्श्व श्रृंखलाओं के नामकरण में खुली (विवृत) श्रृंखला यौगिकों के नियम ही प्रयुक्त होते हैं।
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क्रियात्मक समूह युक्त यौगिकों का IUPAC नामकरण (IUPAC Nomenclature of Compounds having Functional Group)
V. एक क्रियात्मक समूह युक्त यौगिकों का नामकरण:
(i) सर्वप्रथम यौगिक में उपस्थित क्रियात्मक समूह की पहचान की जाती है, ताकि उपयुक्त अनुलग्न का चयन किया जा सके। अनुलग्न भी दो प्रकार के होते हैं – प्राथमिक तथा द्वितीयक। प्राथमिक अनुलग्न कार्बन परमाणुओं के मध्य बन्ध के प्रकार को दर्शाता है जैसे ऐन (C – C), ईन (C = C) तथा आइन (C = C) जबकि क्रियात्मक समूह को प्रदर्शित करने के लिए द्वितीयक अनुलग्न का प्रयोग किया जाता है।
(ii) क्रियात्मक समूह की स्थिति दर्शाने के लिए दीर्घतम श्रृंखला का अंकन उस सिरे से किया जाता है जिधर से उस कार्बन को न्यूनतम अंक मिले जिससे क्रियात्मक समूह जुड़ा हुआ है।
(iii) यौगिक का नाम लिखते समय क्रियात्मक समूह का नाम इसकी स्थिति सहित अनुलग्न के रूप में तथा सभी प्रतिस्थापियों को पूर्वलग्न के रूप में अंग्रेजी वर्णक्रम में लिखा जाता है।
विभिन्न क्रियात्मक समूहों को वरीयता क्रम, उनके अनुलग्न तथा पूर्वलग्न नीचे दी गयी सारणी में दिए गए हैं।
सारणी – विभिन्न क्रियात्मक समूहों को वरीयता क्रम, अनुलग्न तथा पूर्वलग्न
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निम्नलिखित समूह हमेशा प्रतिस्थापी (पूर्वलग्न) के रूप में ही प्रयुक्त होते हैं तथा इनका कोई अनुलग्न नहीं होता है।
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कुछ क्रियात्मक समूहों के अतिरिक्त अनुलग्न भी दिए गए हैं।
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उदाहरण –
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नोट –
(i) यदि क्रियात्मक समूह जनक श्रृंखला के दोनों सिरों से समान स्थिति है तो श्रृंखला का क्रमांकन उस सिरे से किया जाता है। जिधर से प्रतिस्थापी निकट होता है। जैसे –
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(प्रतिस्थापी क्लोरो को अंग्रेजी वर्णमाला क्रम में निम्नतम स्थिति दी गई है)
(ii) यदि किसी यौगिक में एक ही प्रकार के क्रियात्मक समूहों की संख्या एक से अधिक है तो उनके अनुलग्न से पहले डाइ, ट्राई, टेट्रा इत्यादि लिखा जाता है।
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एक क्रियात्मक समूह युक्त विभिन्न सजातीय श्रेणियों के यौगिकों के IUPAC नाम – जब किसी यौगिक में निम्नलिखित क्रियात्मक समूह उपस्थित है या ये प्राथमिक क्रियात्मक समूह के रूप में उपस्थित हैं तो इनके कार्बन को जनक श्रृंखला में लिया जाता है तथा श्रृंखला का अंकन भी इसी कार्बन से प्रारम्भ किया जाता है –
COOH, – COCl, – CONH2, COOR, – CHO, – CN
(i) कार्बोक्जिलिक एसिड:
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(ii) सल्फोनिक अम्ल:
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(iii) एसिड ऐन्हाइड्राइड:
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(iv) एस्टर (Ester): एस्टर के नाम में सर्वप्रथम ऑक्सीजन से जुड़े एल्किल समूह को लिखा जाता है।
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(v) ऐसिड हैलाइड:
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(vi) ऐसिड एमाइड:
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(vii) सायनाइड:
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(viii) आइसोसायनाइड:
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(ix) ऐल्डिहाइड:
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(x) कीटोन:
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(xi) ऐल्कोहॉल:
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(xii) थायो ऐल्कोहॉल:
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(xiii) ऐमीन:
ऐमीन तीन प्रकार के होते हैं –
(a) प्राथमिक (1°)
(b) द्वितीयक (2°) तथा
(C) तृतीयक (3°)
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(a) प्राथमिक ऐमीन:
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(b) द्वितीयक ऐमीन:
द्वितीयक ऐमीन में अधिकतम कार्बन परमाणुओं की जनक श्रृंखला लेकर शेष मूलकों को N-प्रतिस्थापी माना जाता है।
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(c) तृतीयक ऐमीन:
द्वितीयक ऐमीन के समान तृतीयक ऐमीन में भी अधिकतम कार्बन परमाणुओं की जनक श्रृंखला लेकर शेष दो मूलकों को N, N – प्रतिस्थापी माना जाता है।
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(xiv) ईथर:
ईथर में जनक श्रृंखला (अधिकतम कार्बन) का चयन करके शेष समूह के लिए पूर्वलग्न ऐल्कॉक्सी प्रयुक्त किया जाता है। इसमें कोई अनुलग्न नहीं होता है।
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इस उदाहरण में मेथॉक्सी तथा मेथिल की स्थिति समान है लेकिन इन्हें अंग्रेजी वर्णमाला क्रम में लिखा गया है।
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इस उदाहरण में अंकन करते समय मेथिल की तुलना में मेथॉक्सी को महत्व दिया गया है।
(xv) ऐल्किल हैलाइड:
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(xvi) नाइट्रो ऐल्केन:
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VI. बहुक्रियात्मक समूह (एक से अधिक भिन्न – भिन्न क्रियात्मक समूह) युक्त यौगिकों का IUPAC नामकरण –
किसी यौगिक में उपस्थित सभी क्रियात्मक समूहों में से जो समूह . वरीयता क्रम में पहले आता है उसे मुख्य क्रियात्मक समूह तथा अन्य क्रियात्मक समूहों को प्रतिस्थापी माना जाता है। अतः किसी बहुक्रियात्मक समूह युक्त यौगिक में मुख्य क्रियात्मक समूह ज्ञात करने के बाद इस यौगिक को भी एक क्रियात्मक समूह युक्त यौगिक के समान मानकर ही नाम दिया जाता है।
क्रियात्मक समूहों की प्राथमिकता का घटता क्रम निम्न प्रकार होता है –
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बहुक्रियात्मक समूहयुक्त यौगिक के नामकरण के लिए निम्नलिखित नियम प्रयुक्त होते हैं –
(1) सर्वप्रथम उस सर्वाधिक लम्बी कार्बन श्रृंखला (जनक श्रृंखला) का चयन करते हैं जिसमें मुख्य क्रियात्मक समूह उपस्थित होता है। अन्य क्रियात्मक समूह (प्रतिस्थापी) भी जनक श्रृंखला से जुड़े होने चाहिए।
(2) जब – CN, – COX, – CONH2 तथा – COOR समूह प्रमुख क्रियात्मक समूह के रूप में नहीं होते हैं तो इनके कार्बन को जनक श्रृंखला में नहीं लिया जाता है।
(3) जनक श्रृंखला का क्रमांकन उस सिरे से किया जाता है जिस सिरे से मुख्य क्रियात्मक समूह को न्यूनतम अंक मिलता है।
(4) यौगिक का नाम लिखते समय मुख्य क्रियात्मक समूह का अनुलग्न तथा अन्य क्रियात्मक समूहों (प्रतिस्थापी के रूप में) एवं ऐल्किल समूहों को पूर्वलग्न के रूप में अंग्रेजी वर्णमाला क्रम में लिखा जाता है एवं अंकन करते समय भी इनका अंग्रेजी वर्णमाला क्रम ही देखा जाता है।
(5) यदि यौगिक में द्विबन्ध (C = C) अथवा त्रिबन्ध (C = C) भी उपस्थित है तो इसका नाम मुख्य क्रियात्मक समूह के नाम से पहले तथा कार्बन श्रृंखला के नाम के पश्चात् लिखते हैं। द्विबन्ध अथवा त्रिबन्ध की स्थिति भी इसके नाम के साथ दर्शायी जाती है।
(6) जब ऐल्डिहाइड समूह (- CHO) प्रतिस्थापी के रूप में होता है तथा इस समूह का कार्बन जनक श्रृंखला में लिया गया है तो इसके लिए पूर्वलग्न ऑक्सो प्रयुक्त किया जाता है अन्यथा फार्मिल का प्रयोग किया जाएगा।
उदाहरण –
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उदाहरण –
(i) में – CHO समूह का कार्बन जनक श्रृंखला में लिया गया है। अतः पूर्वलग्न ‘ऑक्सो’ का प्रयोग किया गया है जबकि उदाहरण
(ii) में – CHO समूह का कार्बन जनक श्रृंखला में नहीं है, अतः पूर्वलग्न ‘फार्मिल’ प्रयुक्त किया गया है।
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VII. यौगिक के IUPAC नाम से उसकी संरचना लिखना:
किसी यौगिक के IUPAC नाम से संरचना लिखने के लिए सर्वप्रथम नाम के अनुसार कार्बन परमाणुओं की श्रृंखला लिखते हैं तथा किसी एक सिरे से इस श्रृंखला का क्रमांकन कर लेते हैं, इसके पश्चात् नाम में उपस्थित प्रतिस्थापी तथा क्रियात्मक समूह को उनकी स्थिति के अनुसार लिख देते हैं। अब प्रत्येक कार्बन परमाणु की संयोजकता को हाइड्रोजन द्वारा पूर्ण कर देते हैं।
उदाहरण –
(i) 5 – ऐमीनो – 3 – मेथिल – 4- ऑक्सो हेक्स – 2 – ईन – 1 – ऐल –
श्रृंखला के नाम ‘हेक्स’ के अनुसार छ: कार्बन की श्रृंखला बनाते हैं तथा इसका किसी एक सिरे से (माना दायीं ओर से) क्रमांकन करते हैं। अब C5 पर ऐमीनो समूह (- NH2), C3 पर मेथिल समूह तथा C2 – C3 के मध्य द्विबन्ध लगाते हैं। C4 को कीटोनिक समूह
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में तथा प्रथम कार्बन (C1) को एल्डिहाइड समूह (- CHO) में परिवर्तित कर देते हैं, क्योंकि इन दोनों समूहों के कार्बन परमाणु जनक श्रृंखला में गिने जा चुके हैं।
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 कार्बनिक रसायन: कुछ मूल सिद्धान्त और तकनीकें img 188
अब कार्बन परमाणुओं की संयोजकता को पूर्ण करने के लिए आवश्यक हाइड्रोजन परमाणु लगा देते हैं, जिससे निम्नलिखित संरचना प्राप्त होती है –
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VIII. यौगिक के गलत नाम से सही नाम लिखना: किसीयौगिक के गलत नाम को सही करने के लिए निम्न विधि प्रयुक्त की जाती है। सर्वप्रथम गलत नाम से उपर्युक्त विधि के अनुसार यौगिक की संरचना लिख लेते हैं।
उदाहरण – 4 – ऐमीनो – 3 – हाइड्रॉक्सी – ब्यूट – 2 – ईन
यौगिक के नाम के अनुसार सर्वप्रथम चार कार्बन की एक श्रृंखला बनाकर उसका एक सिरे से क्रमांकन कर लेते हैं। अब कार्बन 2 तथा 3 के मध्य एक द्विबन्ध लगाते हैं। कार्बन 3 पर एक – OH समूह तथा कार्बन 4 पर एक – NH2 समूह लगाते हैं। अब प्रत्येक कार्बन की संयोजकता हाइड्रोजन परमाणुओं की आवश्यक संख्या से पूर्ण करते हैं तो निम्नलिखित संरचना प्राप्त होती है –
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इसका सही नाम लिखने के लिए IUPAC नियम के अनुसार जनक श्रृंखला का अंकन करके मुख्य क्रियात्मक समूह का अनुलग्न प्रयुक्त करने पर निम्नलिखित नाम प्राप्त होगा –
1 – ऐमीनोब्यूट – 2 – ईन – 2 – ऑल
(i) बेन्जीन व्युत्पन्नों की नाम पद्धति:
(1) बेन्जीन व्युत्पन्नों (ऐरोमैटिक यौगिकों) का IUPAC नाम देने के लिए पहले बेन्जीन वलय से जुड़े प्रतिस्थापी का नाम पूर्वलग्न के रूप में तथा इसके पश्चात् बेन्जीन लिखा जाता है। लेकिन यौगिकों के रूढ़ नाम (जो कोष्ठक में दिए गए हैं) भी प्रचलन में हैं।
उदाहरण –
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(2) द्विप्रतिस्थापी बेन्जीन व्युत्पन्नों का नाम देते समय प्रतिस्थापी समूहों की स्थितियाँ संख्याओं द्वारा दर्शायी जाती हैं तथा वलय का अंकन इस प्रकार किया जाता है कि प्रतिस्थापियों को न्यूनतम अंक मिलें। जैसे यौगिक (b) का नाम 1, 3 – डाइक्लोरो बेन्जीन होगा न कि 1, 5 डाइक्लोरोबेन्जीन।
उदाहरण –
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 कार्बनिक रसायन: कुछ मूल सिद्धान्त और तकनीकें img 192
(3) एरोमेटिक यौगिकों के नामांकरण की रूढ़ पद्धति में 1, 2 -; 1, 3 – तथा 1, 4 – स्थितियों को क्रमशः ऑर्थो (o), मेटा (m) तथा पैरा (p) पूर्वलग्नों द्वारा दर्शाया जाता है। अतः 1, 3 – डाइक्लोरोबेन्जीन का रूढ़ नाम मेटा डाइक्लोरोबेन्जीन है तथा 1, 2 – तथा 1, 4 – डाइक्लोरोबेन्जीन को क्रमशः ऑर्थों (o) तथा पैरा (p) डाइक्लोरोबेन्जीन कहते हैं।
(4) त्रि तथा बहुप्रतिस्थापी बेन्जीन के IUPAC नामकरण में प्रतिस्थापियों की स्थितियाँ, न्यूनतम संख्या के नियम का पालन करते हुए दी जाती हैं।
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 कार्बनिक रसायन: कुछ मूल सिद्धान्त और तकनीकें img 193
(5) कभी – कभी बेन्जीन व्युत्पन्न के रूढ़ नाम को मूल यौगिक के रूप में (जनक) लिया जाता है तथा मूल यौगिक के प्रतिस्थापी की स्थिति को संख्या 1 देकर इस प्रकार अंकन किया जाता है कि शेष प्रतिस्थापियों को न्यूनतम अंक मिलें तथा प्रतिस्थापियों के नाम अंग्रेजी वर्णमाला क्रम में लिखे जाते हैं।
उदाहरण –
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(6) जब बेन्जीन वलय तथा क्रियात्मक समूह संतृप्त हाइड्रोकार्बन श्रृंखला से जुड़े होते हैं तब बेन्जीन वलय को जनक न मानकर इसे प्रतिस्थापी माना जाता है तथा इसका नाम फेनिल दिया जाता है एवं इसे C6H5 – या संक्षेप में Ph लिखते हैं।
उदाहरण –
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RBSE Solutions for Class 11 Chemistry

RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 11 p – ब्लॉक तत्त्व

June 28, 2019 by Prasanna Leave a Comment

RBSE Class 11 Chemistry Chapter 11 1

Rajasthan Board RBSE Class 11 Chemistry Chapter 11 p – ब्लॉक तत्त्व

RBSE Class 11 Chemistry Chapter 11 पाठ्यपुस्तक के अभ्यास प्रश्न

RBSE Class 11 Chemistry Chapter 11 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्न में से कौनसा लुईस अम्ल है –
(अ) PCl3
(ब) AlCl3
(स) NCl3
(द) AsCl3

प्रश्न 2.
निम्न में से किस तत्त्व की +3 ऑक्सीकरण अवस्था अधिक स्थायी है –
(अ) In
(ब) Ga
(स) Al
(द) Ti

प्रश्न 3.
बोरेक्स के जलीय विलयन की प्रकृति है –
(अ) अम्लीय
(ब) उदासीन
(स) उभयधर्मी
(द) क्षारीय

प्रश्न 4.
निम्न में से कौन बोरेक्स मनका परीक्षण नहीं देगा –
(अ) मैंगनीज लवण
(ब) बेरियम लवण
(स) निकल लवण
(द) कोबाल्ट लवण

प्रश्न 5.
निम्न में से शुष्क बर्फ का सूत्र कौनसा है?
(अ) CO2
(ब) CO
(स) SiO2
(द) Al2O3

प्रश्न 6.
अर्द्ध चालक के रूप में प्रयुक्त किया जाता है –
(अ) कार्बन
(ब) सिलिकन
(स) लेड
(द) टिन

उत्तरमाला:
1. (ब)
2. (स)
3. (द)
4. (ब)
5. (अ)
6. (ब)

RBSE Class 11 Chemistry Chapter 11 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 7.
p – ब्लॉक तत्त्वों के बाह्यतम कोश का सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए।
उत्तर:
p – ब्लॉक तत्त्वों के बाह्यतम कोश का सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास ns2p1-6 होता है।

प्रश्न 8.
बोरॉन का कौनसा यौगिक बुलेट प्रूफ वस्त्र बनाने में प्रयुक्त होता है?
उत्तर:
बोरॉन तन्तुओं का उपयोग बुलेटप्रूफ जैकेट बनाने में किया जाता है।

प्रश्न 9.
ऐलुमिनियम के दो वयस्कों के नाम व सूत्र दीजिए।
उत्तर:
बॉक्साइड Al2O3.2H2O
क्रायोलाइड Na3AlF6

प्रश्न 10.
AlCl3 की चतुष्फलकीय द्विलक संरचना बनाइये।
उत्तर:
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 11 p - ब्लॉक तत्त्व img 1
प्रश्न 11.
डाइबोरेन की संरचना दीजिए।
उत्तर:
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 11 p - ब्लॉक तत्त्व img 2
प्रश्न 12.
बोरॉन तथा ऐलुमिनियम के दो – दो उपयोग दीजिए।
उत्तर:

  • बोरॉन का प्रमुख उपयोग बोरोसिलिकेट के रूप में इनेमले और कांच उद्योग में किया जाता है।
  • 5B10 समस्थानिक का उपयोग नाभिकीय रेऐक्टर में प्रयुक्त नियंत्रक छडों में किया जाता है।

ऐलुमिनियम –

  • ऐलुमिनियम का उपयोग विद्युत तार बनाने में किया जाता है।
  • Al की मिश्र धातु ड्यूरेलुमिन हवाई जहाज के निर्माण में किया जाता है।

प्रश्न 13.
फुलरीन में उपस्थित छः सदस्य तथा पाँच सदस्यीय वलयों की संख्या बताइए।
उत्तर:
फुलरीन में छः सदस्यीय बीस वलय तथा पाँच सदस्यीय बारह वलय होती हैं।

प्रश्न 14.
उष्मागतिक रूप में कार्बन का कौनसा अपररूप सर्वाधिक स्थायी है?
उत्तर:
ग्रेफाइट सर्वाधिक होता है इसकी ΔFH° का मान शून्य मानते हैं।

प्रश्न 15.
हीरा तथा ग्रेफाइट में उपस्थित कार्बन का संकरण बताइये।
उत्तर:
हीरा में Sp3 संकरण होता है एवं इसकी ज्यामिति चतुष्फलकीय होती है जबकि ग्रेफाइट में Sp2 संकरण होता है एवं इसकी ज्यामिति षट्कोणीय होती है।

प्रश्न 16.
Ga की परमाणु त्रिज्या Al की परमाणु त्रिज्या से कम होती है, क्यों?
उत्तर:
ऐलुमिनियम से गैलियम की ओर जाने पर 10 संक्रमण तत्त्व जुड़ने के कारण नाभिकीय आवेश में +18 की वृद्धि हो जाती है। 1 Ga में उपस्थित 10 d इलेक्ट्रॉन बढ़े हुए नाभिकीय आवेश की तुलना में बाह्य इलेक्ट्रॉन पर दुर्बल परिरक्षण प्रभाव डालते हैं जिससे बाह्य इलेक्ट्रॉन एवं नाभिक के मध्य आकर्षण बढ़ जाता है जिससे गैलियम की परमाणु त्रिज्या एलुमिनियम की तुलना में कम हो जाती है।

प्रश्न 17.
बोरॉन का गलनांक असाधारण रूप से उच्च क्यों होता है? समझाइए।
उत्तर:
बोरॉन का उच्च गलनांक इसके ठोस अवस्था में परमाणुओं के मध्य प्रबल सहसंयोजक बन्ध एवं त्रिविमीय संरचना के कारण होता है।

प्रश्न 18.
समूह – 13 के तत्वों की +1 ऑक्सीकरण अवस्था के स्थायितव के बढ़ते क्रम को लिखिए।
उत्तर:
वर्ग में नीचे जाने पर +1 ऑक्सीकरण अवस्था का स्थायित्व बढ़ता जाता है – Al < Ga < In < TI

प्रश्न 19.
ऐलुमिनियम के उभयधर्मी व्यवहार दर्शाने वाली अभिक्रिया दीजिए।
उत्तर:
Al खनिज अम्लों एवं जलीय क्षारों में घुल जाता है। अतः Al उभयधर्मी गुण प्रदर्शित करता है।
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 11 p - ब्लॉक तत्त्व img 3
प्रश्न 20.
बोरॉन BF4– बना सकता है BF6-3 नहीं, कारण समझाइए।
उत्तर:
बोरॉन में d कक्षक अनुपस्थित होता है, अतः इसकी अधिकतम संयोजकता 4 हो सकती है। इसी कारण BF4– बन सकता है। BF6-3 नहीं। परन्तु इस वर्ग के अन्य तत्त्वों में d कक्षक उपस्थिति होने के कारण उनकी संयोजकता 6 हो सकती है।

प्रश्न 21.
बोरिक अम्ल को एक दुर्बल अम्ल माना जाता है, क्यों?
उत्तर:
यह एक दुर्बल एक क्षारकीय अम्ल है लेकिन यह प्रोटोनी अम्ल नहीं है क्योंकि यह प्रोटोन नहीं देता है बल्कि जल के हाइड्राक्सिल आयन से इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण करके लुइस अम्ल के समान व्यवहार करता है।
H3BO3 + 2H2O → [B(OH)4]– + H3O+

RBSE Class 11 Chemistry Chapter 11 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 22.
समूह – 14 के तत्त्वों में पायी जाने वाली विभिन्न ऑक्सीकरण अवस्थाओं को समझाइये।
उत्तर:
इस समूह के तत्त्वों का सामान्य विन्यास ns2np2 होता है। अर्थात् बाह्यतम कोश में चार इलेक्ट्रॉन होते हैं अतः ये M+4 या M4- आयन बनाते हैं। प्रथम चार आयनन एन्थैल्पी का योग उच्च होने के कारण +4 ऑक्सीकरण अवस्था वाले यौगिक सहसंयोजक प्रकृति के होते हैं। ये +4 के साथ – साथ +2 ऑक्सीकरण अवस्था भी प्रदर्शित करते हैं। इस समूह में ऊपर से नीचे जाने पर Ge < Sn < Pb में +2 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करने की प्रवृत्ति बढ़ती जाती है C, Si एवं Ge +4 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करते हैं जबकि Sn की +2 ऑक्सीकरण अवस्था अपचायक तथा +4 ऑक्सीकरण अवस्था ऑक्सीकारक का कार्य करती है। कार्बन में d कक्षक अनुपस्थित होने के कारण +4 से अधिक ऑक्सीकरण अवस्था नहीं हो सकती है जबकि इस समूह के अन्य तत्त्वों में d कक्षक उपस्थित होने के कारण उनकी सहसंयोजकता 4 से अधिक हो सकती है।

प्रश्न 23.
PbI2 बनता है PbI4 नहीं। क्यों ?
उत्तर:
लेड, PbI4 नहीं बनता है क्योंकि Pb – I बन्ध जो प्रारम्भ में बनता है इतनी ऊर्जा उत्पन्न नहीं कर पाता है कि इससे 6s2 इलेक्ट्रॉन उत्तेजित होकर चार अयुग्मित इलेक्ट्रॉन प्राप्त हो सके तथा Pb+4 प्रबल ऑक्सीकारक एवं I– प्रबल अपचायक होता है अतः I– Pb+4 को Pb+2 में अपचयित कर देता है।

प्रश्न 24.
SiCl4 के जल अपघटन की प्रक्रिया को समझाइये।
उत्तर:
यदि Si के d कक्षक के जल से एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण कर SiCl4 प्रारम्भिक तौर पर जल अपघटित होता है तथा अन्त में SiCl4, Si(OH)4 में पूर्ण रूप से जल अपघटित हो जाता है।
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 11 p - ब्लॉक तत्त्व img 4

प्रश्न 25.
हीरा कठोर तथा ग्रेफाइट नर्म व मुलायम होता है, क्यों? समझाइये।
उत्तर:
हीरा में क्रिस्टलीय जालक होता है तथा इसमें प्रत्येक कार्बन परमाणु sp3 संकरित होता है एवं चुम्बकीय ज्यामिति से अन्य चार कार्बन परमाणुओं से जुड़ा रहता है। इसमें कार्बन – कार्बन बन्ध लम्बाई 154 pm होने के कारण कार्बन परमाणुद्धिक (space) में दृढ़ त्रिविमीय जालक का निर्माण होता है अतः हीरा सर्वाधिक कठोर एवं उच्च गलनांक वाला कुचालक होता है जबकि ग्रेफाइट में परताप संरचना होती है। ये परतें वान्डरवाल बल द्वारा जुड़ी रहती हैं। इनमें दो परतों के मध्य दूरी 340 pm होती है। प्रत्येक परत के कार्बन परमाणु षट्कोणीय वलय के रूप में व्यवस्थित होते हैं। इसमें sp2 संकरित कार्बन परमाणु होते हैं अतः ग्रेफाइट की परतों को आसानी से तोड़ा जा सकता है अतः ग्रेफाइट मुलायम एवं चिकना होता है।

प्रश्न 26.
CO2 गैस है जबकि SiO2 ठोस, कारण सहित समझाइए।
उत्तर:
CO2 एक विविक्त अणु के रूप में पाया जाता है क्योंकि कार्बन के छोटे आकार के कारण यह ऑक्सीजन के साथ द्विबन्ध बना लेता है तथा CO2 के अणुओं के मध्य दुर्बल वाण्डरवाल बल पाया जाता है। अतः यह गैस है। लेकिन Si के बड़े आकार के कारण यह ऑक्सीजन के साथ द्विआबन्ध नहीं बना पाता है। अतः SiO2 की एक दीर्घ जटिल संरचना होती है जिसमें परमाणु पास – पास होते हैं इसलिए यह ठोस है।

प्रश्न 27.
CO की विषैली प्रकृति समझाइए।
उत्तर:
कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) हीमोग्लोबिन के साथ स्थायी संकुल बनाती है जिसे कार्बोक्सी – हीमोग्लोबिन कहते हैं। यह ऑक्सीहीमोग्लोबिन से 300 गुना अधिक स्थायी होता है। अतः इस संकुल के बनने के कारण ऑक्सीजन, ऑक्सी – हीमोग्लोबिन संकुल नहीं बना पाती है। इसलिए शरीर को ऑक्सीजन की आपूर्ति नहीं होती तथा पीड़ित व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है।
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प्रश्न 28.
SiCl4 को जल अपघटन हो जाता है CCl4 का नहीं, कारण सहित समझाइए।
उत्तर:
CCl4 में कार्बन के पास इलेक्ट्रॉन की कमी नहीं है तथा इसके पास रिक्त d – कक्षक भी उपलब्ध नहीं है अतः यह जल से क्रिया नहीं करता, जबकि SiCl4 में Si के संयोजी कोश में रिक्त d – कक्षक उपस्थित होने के कारण यह जल के ऑक्सीजन से एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण करके इससे क्रिया कर लेता है अर्थात् इसका जल अपघटन हो जाता है तथा SiO2 बनता है।
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 11 p - ब्लॉक तत्त्व img 6
प्रश्न 29.
सिलिकॉन की एक इकाई का सूत्र लिखिए।
उत्तर:
कार्बसिलिकन बहुलकों का एक वर्ग जिसमें Si – O – Si बन्ध पाया जाता है तथा एक R2SiO2 पुनरावर्ती इकाई होती है उन्हें सिलिकॉन कहा जाता है। सिलिकॉन के निर्माण में प्रयुक्त प्रारम्भिक पदार्थ ऐल्किल तथा ऐरिल प्रतिस्थापी सिलिकन क्लोराइड, [RnSiCl(4-n)] होता है। 573 K ताप पर जब मेथिल क्लोराइड, कॉपर की उपस्थिति में सिलिकन से क्रिया करता है, तो विभिन्न मेथिल प्रतिस्थापी क्लोरोसिलेन (MeSiCl3, Me2SiCl2, Me3SiCl) तथा सूक्ष्म मात्रा में Me4Si बनते हैं, यहाँ Me=CH3।
डाइमेथिल डाइक्लोरो सिलेन (CH3)2SiCl2) के जल अपघटन के पश्चात् संघनन बहुलकीकरण द्वारा श्रृंखला बहुलक बनते हैं।
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प्रश्न 30.
श्रृंखलन का गुण किस तत्त्व में अधिकतम होता है?
उत्तर:
श्रृंखलन का गुण कार्बन में अधिकतम होता है। कार्बन परमाणु परस्पर तथा अन्य परमाणु के साथ सह संयोजन बन्ध द्वारा जुड़कर लम्बी, खुली या बन्द श्रृंखलाओं का निर्माण करते हैं। कार्बन की इस प्रकार की प्रवृत्ति को श्रृंखलन कहते हैं। वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर आकार बढ़ने एवं विद्युत ऋणता घटती है अतः श्रृंखलना का क्रम निम्न प्रकार होता है
C >> Si > Ge = Sn

प्रश्न 31.
Be2C तथा Al4C3 में कार्बन की ऑक्सीकरण अवस्था बताइये।
उत्तर:
Be2C एवं Al4C3 में कार्बन की अवस्था -4 होती है। Be2C में Be+2 एवं कार्बाइड -4 है। इसी प्रकार Al4C3 में Al+3 एवं कार्बन की -4 है।

प्रश्न 32.
TI (+1) एवं (+3) ऑक्सीकरण अवस्था क्यों प्रदर्शित करते हैं?
उत्तर:
यह 13वाँ वर्ग का तत्त्व है जिसके बाहरी कोश का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास ns2np1 है और यह +1 एवं +3 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है परन्तु इसमें +1 ऑक्सीकरण अवस्था +3 ऑक्सीकरण अवस्था से ज्यादा स्थायी होती है क्योंक इसमें अक्रिय युग्म प्रभाव होता है। जिसके अनुसार s कक्षक में उपस्थित इलेक्ट्रॉन युग्म अक्रिय होता है। अर्थात् यह बन्ध बनाने में प्रयुक्त नहीं होती है।

प्रश्न 33.
बोरॉन इलेक्ट्रॉन न्यून यौगिक क्यों बनाता है?
उत्तर:
बोरॉन का अपने वर्ग में सबसे छोटा आकार एवं उच्च आवेश घनत्व होता है। इस कारण यह आयनिक यौगिकों की अपेक्षा सह संयोजक यौगिकों का निर्माण करता है। इसमें 3 सहसंयोजी इलेक्ट्रॉन होने के कारण यह B+3 आयन का निर्माण करता है जो कि बहुत छोटा होने के कारण यह अष्टक की अपेक्षा षष्टक का निर्माण करता है।

प्रश्न 34.
बोरॉन के हैलाइड द्विलक नहीं बनाते जबकि AlCl3 द्विलक Al2Cl6 के रूप में संभव है क्यों?
उत्तर:
बोरॉन के हैलाइड:

  • बोरॉन के छोटे आकार के कारण इसकी प्रथम तीन आयनन एन्थैल्पियों का योग बहुत अधिक होता है। अतः यह +3 ऑक्सीकरण अवस्था (B+3) नहीं दर्शाता है तथा सहसंयोजी यौगिक बनाता है।
  • ऐलुमिनियम की प्रथम तीन आयनन एन्थैल्पियों का योग कम होने के कारण यह आसानी से Al+3 आयन बना लेता है।

Ga, In तथा Tl भी +3 ऑक्सीकरण अवस्था दर्शाते हैं तथा इसके साथ ही ये +1 अवस्था भी दर्शाते हैं तथा वर्ग में नीचे जाने पर भारी तत्वों में +1 अवस्था का स्थायित्व बढ़ता जाता है, इसका कारण अक्रिय युग्म प्रभाव है। d तथा f कक्षकों के दुर्बल परिरक्षण प्रभाव के कारण बढ़ा हुआ नाभिकीय आवेश ns इलेक्ट्रॉनों को प्रबलता से आकर्षित करता है जिससे s कक्षक का इलेक्ट्रॉन युग्म निष्क्रिय हो जाता है, इसे अक्रिय युग्म प्रभाव कहते हैं। यथार्थ में Ga, In एवं TI में +1 तथा +3 दोनों ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रेक्षित होती हैं वर्ग में नीचे जाने पर +1 ऑक्सीकरण अवस्था को स्थायित्व बढ़ता जाता है।
Al < Ga < In < TI

  • Tl में +1 ऑक्सीकरण अवस्था अधिक स्थायी होती है। जबकि T3+ प्रबल ऑक्सीकारक होता है अर्थात् इसमें इलेक्ट्रॉन ग्रहण करके +1 अवस्था में जाने की प्रवृत्ति होती है।
  • +1 ऑक्सीकरण अवस्था वाले यौगिकों की आयनिक प्रकृति, +3 ऑक्सीकरण अवस्था वाले यौगिकों की तुलना में अधिक होती है।

रासायनिक अभिक्रियाशीलता की प्रवृत्ति:

  1. वर्ग 13 के तत्वों की त्रिसंयोजी अवस्था में केन्द्रीय परमाणु के चारों ओर 6 इलेक्ट्रॉन होते हैं, अतः ये इलेक्ट्रॉन न्यून यौगिक होते हैं। जैसे BF3, BCl3 इत्यादि में B पर इलेक्ट्रॉन की कमी के कारण ये लूइस अम्ल की भाँति व्यवहार करते हैं। अतः ये अमोनिया से एक एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण कर उपसहसंयोजक यौगिक बनाते हैं। केन्द्रीय परमाणु पर इलेक्ट्रॉन में वृद्धि के कारण लुईस अम्लीय प्रवृत्ति कम होती है BF3 सरलता पूर्वक NH3 से एक एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण कर BF3 ← NH3 उपसहसंयोजी यौगिक बनाता है।
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    बोरॉन के विभिन्न ट्राइहैलाइडों की लूइस अम्ल सामर्थ्य को क्रम निम्न प्रकार होता है –
    BF3 < BCl3 < BBr3< BI3
    इसका कारण BF3 में F के छोटे आकार के कारण इसके एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म तथा B के रिक्त p – कक्षक के मध्य अधिकतम पश्च बन्धन है।
  2. वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर आकार में वृद्धि होने के कारण इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण करने की प्रवृत्ति कम होती है, अतः लूइस अम्ल गुण भी कम होता जाता है।
  3. AlCl3 में द्विलक (Dimer) बनाने की प्रवृत्ति होती है। अतः यह Al2Cl6 के रूप में पाया जाता है। AlCl3 का द्विलक चतुष्फलकीय एवं स्थायी होता है, जिसमें हैलोजेन परमाणु सेतु के रूप में उपस्थित होता है, जो धातु का अष्टक पूर्ण करता है। लेकिन B के छोटे आकार के कारण BCl3 द्विलक नहीं बनाता है।
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अधिकतर त्रिसंयोजी यौगिक (MCl3) सहसंयोजी होते हैं, अतः ये आसानी से जलअपघटित हो जाते हैं तथा चतुष्फलकीय स्पीशीज [M(OH)4]– बनाते हैं जिनमें M, sp3 संकरित होता है तथा B के अतिरिक्त अन्य तत्व [M(H2O)6]3+ भी बनाते हैं। अतः AlCl3 के अम्लीय जल अपघटन से अष्टफलकीय आयन [Al(H2O)6]3+ बनता है, जिसमें Al की संकरण अवस्था sp3d2 होती है। बोरॉन में ऐसे यौगिक नहीं बनने का कारण इसमें d कक्षकों की अनुपस्थिति है।

सारणी: समूह 13 के तत्त्वों की रासायनिक अभिक्रियाशीलता रासायनिक अभिक्रिया का प्रकार सामान्य अभिक्रिया समीकरण विशिष्ट टिप्पणी
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बोरॉन, अधातु के समान अभिक्रियाएँ देता है। इस प्रकार अपने समूह के अन्य सदस्यों से अलग होता है। बोरॉन अनेक धातुओं के साथ अभिक्रिया करके बोराइड बनाता है जबकि इस समूह के अन्य तत्त्व इस प्रकार की अभिक्रिया नहीं देते हैं।

वायु के प्रति अभिक्रियाशीलता:
क्रिस्टलीय बोरॉन अक्रियाशील होता है लेकिन वायु के सम्पर्क में आने पर Al की सतह पर Al2O3 की पतली परत बन जाती है, जिसके कारण आगे अभिक्रिया रुक जाती है। अक्रिस्टलीय B तथा Al को वायु के साथ गर्म करने पर ये O2 से क्रिया करके क्रमश: B2O3 तथा Al2O3 बनाते हैं। इसी प्रकार वर्ग के अन्य तत्व भी वायु की ऑक्सीजन के साथ क्रिया करके E2O3 प्रकार के ऑक्साइड बनाते हैं –
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13वें वर्ग के सभी तत्व उच्च ताप पर नाइट्रोजन के साथ क्रिया करके नाइट्राइड बनाते हैं –
2E (s) + N2 (g) → 2EN (s)
वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर ऑक्साइडों की अम्लीय प्रवृत्ति कम होती है अर्थात् क्षारीय प्रवृत्ति बढ़ती है, जैसे – B2O3 अम्लीय होता है जो क्षारीय ऑक्साइड (धातु – ऑक्साइड) से क्रिया करके धात्विक बोरेट बनाता है। ऐलुमिनियम तथा गैलियम के ऑक्साइड उभयधर्मी। होते हैं, जबकि इंडियम तथा थैलियम के ऑक्साइड क्षारीय होते हैं।

प्रश्न 35.
समूह – 14 में नीचे की ओर जाने पर श्रृंखलन की प्रवृत्ति कम हो जाती है, क्यों?
उत्तर:
वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर आकार बढ़ता है एवं विद्युत ऋणात्मकता घटती जाती है। इस कारण श्रृंखलन प्रवृत्ति घटती जाती है।

प्रश्न 36.
सिलिकॉन क्या है? इसका निर्माण कैसे किया जाता है?
उत्तर:
सिलिकॉन:
सामान्यत: सिलिकॉन
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श्रृंखला युक्त वे यौगिक होते हैं जिनमें ऐल्किल अथवा फेनिल समूह प्रत्येक सिलिकन परमाणु के शेष बंध स्थितियों पर होते हैं। ये जलविरोधी (Hydrophobic) प्रकृति के होते हैं। कार्बसिलिकन बहुलकों का एक वर्ग जिसमें Si – O – Si बन्ध पाया जाता है तथा एक R2SiO2 पुनरावर्ती इकाई (Repeating unit) होती है उन्हें सिलिकॉन कहा जाता है। सिलिकॉन के निर्माण में प्रयुक्त प्रारम्भिक पदार्थ ऐल्किल तथा ऐरिल प्रतिस्थापी सिलिकन क्लोराइड, [RnSiCl(4-n)] होता है। 573 K ताप पर जब मेथिल क्लोराइड, कॉपर की उपस्थिति में सिलिकन से क्रिया करता है, तो विभिन्न मेथिल प्रतिस्थापी क्लोरोसिले्न (MeSiCl3, Me2SiCl2, Me3SiCl) तथा सूक्ष्म मात्रा में Me4Si बनते हैं, यहाँ Me = CH3।
डाइमेथिल डाइक्लोरो सिलेन (CH3)2SiCl2 के जल अपघटन के पश्चात् संघनन बहुलकीकरण द्वारा श्रृंखला बहुलक बनते हैं।
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सिलिकॉन बहुलक श्रृंखला की लम्बाई को नियंत्रित करने के लिए (CH3)3SiCl मिलाया जाता है जो निम्न प्रकार सिरे को बन्द कर देता है –
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सिलिकॉन ट्राइमेथिल मोनोक्लोरोसिलेन (CH3)3SiCl के जल अपघटन से डाइसिलोक्सेन बनते हैं।
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मोनोमेथिल ट्राइक्लोरोसिलेन (CH3SiCl3) के जल अपघटन से क्रास बंधित सिलिकॉन बहुलक प्राप्त होते हैं।
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प्रश्न 37.
वाटर गैस तथा प्रोड्यूसर गैस के सूत्र दीजिए।
उत्तर:
वाटर गैस:
कोक पर भाप प्रवाहित करने पर CO तथा H2 का मिश्रण प्राप्त होता है जिसे भाप अंगार गैस (वाटर गैस) या संश्लेषण गैस कहते हैं।
C (s) + H2O (g) \(\underrightarrow { 472-{ 1273 } } \) CO (g) + H2 (g)
प्रोड्यूसर गैस:
इसमें भाप के स्थान पर वायु का प्रयोग भी किया जा सकता है लेकिन इस स्थिति में CO तथा N2 का मिश्रण प्राप्त होता है जिसे प्रोड्यूसर गैस कहते हैं।
2C (s) + O2 (g) + 4N2 (g) \(\underrightarrow { { 1273 } } \) 2CO (g) + 4N2 (g)
वाटर गैस तथा प्रोड्यूसर गैस महत्वपूर्ण औद्योगिक ईंधन हैं। इनमें उपस्थित कार्बन मोनोऑक्साइड के पुनः दहन से कार्बन डाइऑक्साइड गैस बनती है तथा इस क्रिया में ऊष्मा उत्सर्जित होती है।

प्रश्न 38.
क्या होगा जब फार्मिक अम्ल को सान्द H2SO4 की उपस्थिति में गर्म किया जाए? रासायनिक समीकरण दीजिए।
उत्तर:
फार्मिक अम्ल को सान्द्र H2SO4 की उपस्थिति में गर्म करने पर कार्बन मोनोऑक्साइड का निर्माण होता है।
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RBSE Class 11 Chemistry Chapter 11 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 39.
निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिए –

  1. जीओलाइट
  2. सिलिकेट
  3. सिलिकॉन

उत्तर:

  1. जीओलाइट:
    जब सिलिकन डाइऑक्साइड (SiO2) के त्रिविमीय जालक में से कुछ सिलिकन (Si) परमाणुओं का प्रतिस्थापन ऐलुमिनियम परमाणुओं द्वारा हो जाता है तो इससे प्राप्त सम्पूर्ण संरचना को ऐलुमिनोसिलिकेट कहते हैं जिस पर एक ऋणावेश होता है जिसका संतुलन Na+, K+ तथा Ca2+ इत्यादि धनायनों द्वारा होता है। इनके उदाहरण फेल्डस्पार तथा जीओलाइट हैं। जिओलाइट त्रिविमीय सिलिकेट होते हैं। जीओलाइट का उपयोग पेट्रोरसायन उद्योगों में हाइड्रोकार्बन के भंजन तथा समावयवीकरण में उत्प्रेरक के रूप में होता है। ZSM – 5 (जीओलाइट का एक प्रकार) का उपयोग ऐल्कोहॉल को सीधे गैसोलीन (पेट्रोल) में परिवर्तित करने में किया जाता है। जलयोजित जीओलाइट का उपयोग कठोर जल के मृदुकरण में प्रयुक्त आयन विनिमय रेजिन बनाने में किया जाता है।
  2. सिलिकॉन:
    कार्बसिलिकन बहुलकों का एक वर्ग जिसमें Si – O – Si बन्ध पाया जाता है तथा एक R2SiO2 पुनरावर्ती इकाई (Repeating unit) होती है उन्हें सिलिकॉन कहा जाता है। सिलिकॉन के निर्माण में प्रयुक्त प्रारम्भिक पदार्थ ऐल्किल तथा ऐरिल प्रतिस्थापी सिलिकन क्लोराइड, [RnSiCl(4-n)] होता है। 573 K ताप पर जब मेथिल क्लोराइड, कॉपर की उपस्थिति में सिलिकन से क्रिया करता है, तो विभिन्न मेथिल प्रतिस्थापी क्लोरोसिले्न (MeSiCl3, Me2SiCl2, Me3SiCl) तथा सूक्ष्म मात्रा में Me4Si बनते हैं, यहाँ Me = CH3।
    डाइमेथिल डाइक्लोरो सिलेन (CH3)2SiCl2 के जल अपघटन के पश्चात् संघनन बहुलकीकरण द्वारा श्रृंखला बहुलक बनते हैं।
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    सिलिकॉन बहुलक श्रृंखला की लम्बाई को नियंत्रित करने के लिए (CH3)3SiCl मिलाया जाता है जो निम्न प्रकार सिरे को बन्द कर देता है –
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    सिलिकॉन ट्राइमेथिल मोनोक्लोरोसिलेन (CH3)3SiCl के जल अपघटन से डाइसिलोक्सेन बनते हैं।
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    मोनोमेथिल ट्राइक्लोरोसिलेन (CH3SiCl3) के जल अपघटन से क्रास बंधित सिलिकॉन बहुलक प्राप्त होते हैं।
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    सिलिकॉन के गुण तथा उपयोग –
    (i) अध्रुवीय ऐल्किल समूहों से घिरे होने के कारण सिलिकॉन जल प्रतिकर्पि होते हैं।
    (ii) सिलिकॉन्स का उष्मीय स्थायित्व तथा परावैद्युत सामर्थ्य उच्च होता है।
    (iii) ये रसायनों तथा ऑक्सीकरण के प्रति, प्रतिरोधक होते हैं।
    (iv) सिलिकॉन का उपयोग सीलित ग्रीस (Sealent grease), विद्युतरोधी (Electricinsulater), जलसह – वस्त्र (Waterproof fabrics) तथा शल्यक्रिया व प्रसाधन में भी किया जाता है।उदाहरण – सिलिकॉन क्या है?
    हल –
    सामान्यत: सिलिकॉन
    RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 11 p - ब्लॉक तत्त्व img 23श्रृंखला युक्त वे यौगिक होते हैं जिनमें ऐल्किल अथवा फेनिल समूह प्रत्येक सिलिकन परमाणु के शेष बंध स्थितियों पर होते हैं। ये जलविरोधी (Hydrophobic) प्रकृति के होते हैं।
  3. सिलिकेट:
    सिलिकन डाइ ऑक्साइड को क्षार, क्षारीय ऑक्साइड तथा कार्बोनेटों के साथ उच्च ताप पर गर्म करने पर सिलिकेट का निर्माण होता है। ये सिलिकन – ऑक्सीजन बन्ध युक्त जटिल ठोस होते हैं।
    SiO2 + CaO → CaSiO3
    SiO2 + Na2CO3 → Na2SiO3 + CO2
    सोडियम तथा पोटेशियम के सिलिकेट जल में विलेय होते हैं, जल कांच कहलाते हैं। प्रकृति में बड़ी संख्या में सिलिकेट खनिज पाए जाते हैं। इसके कुछ महत्त्वपूर्ण उदाहरण हैं – फेल्डस्पार (feldspar), जीओलाइट (zeolite), श्वेत अभ्रक (mica) तथा ऐस्बेस्टस (asbestos)। मानव निर्मित दो महत्त्वपूर्ण सिलिकेट काँच तथा सीमेन्ट हैं। सिलिकेट की मूल संरचनात्मक इकाई SiO44- है जिसमें एक सिलिकॉन परमाणु चार ऑक्सीजन परमाणुओं से चतुष्फलकीय रूप में जुड़ा होता है। सिलिकेट में या तो एक विविक्त (Discrete) इकाई उपस्थित होती है अथवा कई सिलिकेट इकाइयाँ आपस में मिलती हैं। जिनमें प्रत्येक सिलिकेट इकाई के 1, 2, 3 अथवा 4 ऑक्सीजन परमाणु कोनों के द्वारा आपस में साझा करती है। सिलिकन ऑक्सीजन बन्ध युक्त ठोस यौगिकों को सिलिकेट कहते हैं। ये सिलिकन के ऑक्सी लवण होते हैं। इस आधार पर सिलिकेट कई प्रकार के होते हैं, जैसे – श्रृंखला (Chain), वलय (Ring), परत (layer) तथा त्रिविमीय (Three Dimensional) सिलिकेट। सिलिकेट की संरचना पर स्थित ऋणावेश, धनावेशित धातु – आयनों द्वारा उदासीन होता है। सिलिकेट में जब चारों कोने अन्य चतुष्फलकीय इकाइयों के साथ साझित होते हैं, तो त्रिविम जालक का निर्माण होता है।
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प्रश्न 40.
निम्नलिखित से आप क्या समझते हैं –

  1. श्रृंखलन
  2. अक्रिय युग्म प्रभाव
  3. अपररूपता

उत्तर:
रासायनिक अभिक्रियाशीलता की प्रवृत्ति:

  1. वर्ग 13 के तत्वों की त्रिसंयोजी अवस्था में केन्द्रीय परमाणु के चारों ओर 6 इलेक्ट्रॉन होते हैं, अतः ये इलेक्ट्रॉन न्यून यौगिक होते हैं। जैसे BF3, BCl3 इत्यादि में B पर इलेक्ट्रॉन की कमी के कारण ये लूइस अम्ल की भाँति व्यवहार करते हैं। अतः ये अमोनिया से एक एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण कर उपसहसंयोजक यौगिक बनाते हैं। केन्द्रीय परमाणु पर इलेक्ट्रॉन में वृद्धि के कारण लुईस अम्लीय प्रवृत्ति कम होती है BF3 सरलता पूर्वक NH3 से एक एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण कर BF3 ← NH3 उपसहसंयोजी यौगिक बनाता है।
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    बोरॉन के विभिन्न ट्राइहैलाइडों की लूइस अम्ल सामर्थ्य को क्रम निम्न प्रकार होता है –
    BF3 < BCl3 < BBr3 < BI3
    इसका कारण BF3 में F के छोटे आकार के कारण इसके एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म तथा B के रिक्त p – कक्षक के मध्य अधिकतम पश्च बन्धन है।
  2. वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर आकार में वृद्धि होने के कारण इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण करने की प्रवृत्ति कम होती है, अतः लूइस अम्ल गुण भी कम होता जाता है।
  3. AlCl3 में द्विलक (Dimer) बनाने की प्रवृत्ति होती है। अतः यह Al2Cl6 के रूप में पाया जाता है। AlCl3 का द्विलक चतुष्फलकीय एवं स्थायी होता है, जिसमें हैलोजेन परमाणु सेतु के रूप में उपस्थित होता है, जो धातु का अष्टक पूर्ण करता है। लेकिन B के छोटे आकार के कारण BCl3 द्विलक नहीं बनाता है।
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  4. अधिकतर त्रिसंयोजी यौगिक (MCl3) सहसंयोजी होते हैं, अतः ये आसानी से जलअपघटित हो जाते हैं तथा चतुष्फलकीय स्पीशीज [M(OH)4]– बनाते हैं जिनमें M, sp3 संकरित होता है तथा B के अतिरिक्त अन्य तत्व [M(H2O)6]3+ भी बनाते हैं। अतः AlCl3 के अम्लीय जल अपघटन से अष्टफलकीय आयन [Al(H2O)6]3+ बनता है, जिसमें Al की संकरण अवस्था sp33d2 होती है। बोरॉन में ऐसे यौगिक नहीं बनने का कारण इसमें d कक्षकों की अनुपस्थिति है।

सारणी: समूह 13 के तत्त्वों की रासायनिक अभिक्रियाशीलता रासायनिक अभिक्रिया का प्रकार सामान्य अभिक्रिया समीकरण विशिष्ट टिप्पणी
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 11 p - ब्लॉक तत्त्व img 27बोरॉन, अधातु के समान अभिक्रियाएँ देता है। इस प्रकार अपने समूह के अन्य सदस्यों से अलग होता है। बोरॉन अनेक धातुओं के साथ अभिक्रिया करके बोराइड बनाता है जबकि इस समूह के अन्य तत्त्व इस प्रकार की अभिक्रिया नहीं देते हैं।

वायु के प्रति अभिक्रियाशीलता:
क्रिस्टलीय बोरॉन अक्रियाशील होता है लेकिन वायु के सम्पर्क में आने पर Al की सतह पर Al2O3 की पतली परत बन जाती है, जिसके कारण आगे अभिक्रिया रुक जाती है। अक्रिस्टलीय B तथा Al को वायु के साथ गर्म करने पर ये O2 से क्रिया करके क्रमश: B2O3 तथा Al2O3 बनाते हैं। इसी प्रकार वर्ग के अन्य तत्व भी वायु की ऑक्सीजन के साथ क्रिया करके E2O3 प्रकार के ऑक्साइड बनाते हैं –
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13वें वर्ग के सभी तत्व उच्च ताप पर नाइट्रोजन के साथ क्रिया करके नाइट्राइड बनाते हैं –
2E (s) + N2 (g) → 2EN (s)
वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर ऑक्साइडों की अम्लीय प्रवृत्ति कम होती है अर्थात् क्षारीय प्रवृत्ति बढ़ती है, जैसे – B2O3 अम्लीय होता है जो क्षारीय ऑक्साइड (धातु – ऑक्साइड) से क्रिया करके धात्विक बोरेट बनाता है। ऐलुमिनियम तथा गैलियम के ऑक्साइड उभयधर्मी। होते हैं, जबकि इंडियम तथा थैलियम के ऑक्साइड क्षारीय होते हैं।

कार्बन (Allotropes): कार्बन में अपररूपता दर्शाने का गुण पाया जाता है।
अपररूपता:
अधात्विक तत्वों का वह गुण जिसमें कोई तत्व प्रकृति में दो या दो से अधिक भिन्न रूपों में पाया जाता है। इन रूपों को अपररूप कहते हैं तथा यह गुण अपररूपता कहलाता है। अपररूपों के भौतिक गुण भिन्न – भिन्न होते हैं, परन्तु इनकी अधिकांश रासायनिक अभिक्रियाएँ समान होती हैं। कार्बन के दो प्रकार के अपररूप होते हैं – क्रिस्टलीय तथा अक्रिस्टलीय।
हीरा तथा ग्रेफाइट कार्बन के दो प्रमुख क्रिस्टलीय अपररूप हैं। कार्बन का तीसरा क्रिस्टलीय अपररूप फुलरीन है जिसकी खोज एच.डब्ल्यू. क्रोटो; ई. स्मैले तथा आर.एफ. कर्ल ने 1985 में की थी, जिसके कारण इन्हें 1996 में नोबेल पुरस्कार दिया गया था।

हीरा:
हीरा में क्रिस्टलीय जालक होता है। इसमें प्रत्येक कार्बन परमाणु sp3 संकरित अवस्था में होता है तथा अन्य चार कार्बन परमाणुओं से चतुष्फलकीय ज्यामिति में जुड़ा होता है। इसमें कार्बन – कार्बन बंध लम्बाई 154 pm होती है तथा कार्बन परमाणु द्विक् (space) में दृढ़ त्रिविमीय जालक (rigid three dimensional network) का निर्माण करते हैं। हीरे की संरचना में सम्पूर्ण जालक में दिशात्मक सहसंयोजक बंध पाए जाते हैं। अतः इस विस्तृत सहसंयोजक बंधन को तोड़ना कठिन होता है, इसलिए हीरा पृथ्वी पर पाया जाने वाला सर्वाधिक कठोर ठोस पदार्थ है। इसका घनत्व, गलनांक तथा अपवर्तनांक उच्च होता है। हीरे में मुक्त इलेक्ट्रॉन अनुपस्थित होने के कारण यह विद्युत का कुचालक होता है। यह अक्रिय होता है लेकिन उच्च ताप (975K) पर ऑक्सीजन में जल कर CO2 बनाता है। हीरे का उपयोग धार तेज करने के लिए अपघर्षण (Abrasive) के रूप में, रूपदा (Dies) बनाने में तथा प्रकाश विद्युत लैम्प में टंग्स्टन तंतु बनाने में किया जाता है।
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 11 p - ब्लॉक तत्त्व img 29

ग्रेफाइट:
ग्रेफाइट गहरे धूसर रंग का होता है तथा इसकी परतीय संरचना (layered structure) होती है। ये परतें वान्डरवाल बलों द्वारा जुड़ी होती हैं तथा दो परतों के बीच की दूरी 340 pm होती है। प्रत्येक परत में कार्बन परमाणु षट्कोणीय वलय के रूप में व्यवस्थित होते हैं, जिसमें C – C बंध लम्बाई 141.5 pm होती है। इसमें प्रत्येक कार्बन परमाणु sp2 संकरित होता है तथा तीन निकटवर्ती कार्बन परमाणुओं से तीन सिग्मा बंध बनाता है। जबकि चौथा इलेक्ट्रॉन -बंध बनाता है। ये इलेक्ट्रॉन परतों के मध्य विस्थानीकृत तथा गतिशील होते हैं, अतः ग्रेफाइट विद्युत का सुचालक होता है तथा ग्रेफाइट को आसानी से तोड़ा जा सकता है। इसी कारण ग्रेफाइट मुलायम (soft) तथा चिकना (slippery) होता है।
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ग्रेफाइट में धात्विक चमक होती है तथा यह कार्बन का स्थायी अपररूप है। उच्च ताप पर जिन मशीनों में स्नेहक के रूप में तेल का प्रयोग नहीं हो सकता उनमें ग्रेफाइट को शुष्क स्नेहक के रूप में प्रयुक्त किया जाता है।

फुलरीन्स:
एच.डब्ल्यू. क्रोटो, ई स्मैले तथा आर.एफ. कर्ल ने सन् 1985 में कार्बन के एक अन्य रूप फुलरीन की खोज की। इस खोज के कारण इन्हें सन् 1996 में नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। हीलियम, आर्गन आदि उत्कृष्ट गैसों की उपस्थिति में ग्रेफाइट को विद्युत आर्क (Electric arch) में गर्म करने पर फुलरीन का निर्माण होता है। वाष्पित तथा छोटे Cn अणुओं को संघनित करने पर एक कज्जली पदार्थ प्राप्त होता है जिसमें मुख्यत: C60, कुछ मात्रा में C70 तथा अतिसूक्ष्म मात्रा में 350 या अधिक समसंख्या (even number) में कार्बन फुलरीन में पाए जाते हैं। फुलरीन कार्बन का शुद्धतम रूप है, क्योंकि फुलरीन में किसी प्रकार का झूलता बंध (dangling bonds) नहीं होता है। फुलरीन की संरचना पिंजरानुमा होती है। (C60) अणु की आकृति सॉकर बॉल (फुटबॉल) के समान होती है। अतः इसे बकमिन्स्टर फुलरीन (Buckminster) या बकी बॉल (Bucky ball) भी कहा जाता है।
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फुलरीन की संरचना फुलरीन में बीस वलय, छः सदस्यीय (षट्कोणीय) तथा बारह वलय, पाँच सदस्यीय (पंचकोणीय) होती हैं। एक छः सदस्यीय वलय छः अथवा पाँच सदस्यीय वलय के साथ संगलित (Fused) होती है, जबकि पाँच सदस्यीय वलय केवल छः सदस्यीय वलय के साथ संगलित होती है। फुलरीन के सभी कार्बन परमाणु समान होते हैं तथा ये sp2 संकरित होते हैं। इसका प्रत्येक कार्बन परमाणु अन्य तीन कार्बन परमाणुओं के साथ तीन बंध बनाता है तथा चौथा इलेक्ट्रॉन पूरे अणु पर विस्थानीकृत रहता है, अत: फुलरीन में ऐरोमैटिक गुण होता है। फुलरीन के गेंदनुमा अणु में 60 उदग्र (vertices) होते हैं तथा प्रत्येक उदग्र पर एक कार्बन परमाणु होता है जिस पर एकल तथा द्विबंध दोनों होते हैं, जिनकी C – C बन्ध लम्बाई क्रमशः 143.5 pm तथा 138.3 pm होती है। फुलरीन एक सममित अणु है तथा इसके यौगिक विद्युत का चालन करते हैं। ऊष्मागतिक रूप से कार्बन का सर्वाधिक स्थायी अपररूप ग्रेफाइट है, अतः इसकी मानक संभवन ऊष्मा (ΔfH⊝) को शून्य माना जाता है तथा हीरा व फुलरीन के लिए ये मान क्रमशः 1.90 तथा 38.1 kJ mol-1 होते हैं। कार्बन के अन्य रूप कार्बन ब्लैक, कोक तथा चारकोल हैं। जो कि ग्रेफाइट तथा फुलरीन के अशुद्ध रूप होते हैं। जब हाइड्रोकार्बन को वायु की सीमित मात्रा में जलाया जाता है तो कार्बन ब्लैक प्राप्त होता है तथा लकड़ी या कोयला को वायु की अनुपस्थिति में गर्म करने पर चारकोल तथा कोक प्राप्त होते हैं।

प्रश्न 41.
निम्नलिखित समीकरणों को पूर्ण करते हुए सन्तुलित कीजिए –
(i) ZnO+ CO →
(ii) C + H2O →
(iii) B2H6+ O2 →
(iv) H3BO3 \(\underrightarrow { \Delta } \)
(v) Al + NaOH →
(vi) BF3 + NH3 →
उत्तर:
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 11 p - ब्लॉक तत्त्व img 31

प्रश्न 42.
इलेक्ट्रॉन न्यून यौगिक क्या होते हैं? क्या BCl3 तथा SiCl4 इलेक्ट्रॉन न्यून यौगिक हैं? समझाइये।
उत्तर:
वे सहसंयोजक यौगिक जिनमें केन्द्रीय परमाणु में इलेक्ट्रॉन की कमी होती है अर्थात् वे लूइस अम्ल की भाँति व्यवहार प्रदर्शित करते हैं। इनके अपूर्ण अष्टक के कारण इनका एक रिक्त P2 कक्षक हैलोजन परमाणु के आबन्धी इलेक्ट्रॉन युग्म युक्त P2 कक्षक के साथ अतिव्यापन कर लेती है उन्हें इलेक्ट्रॉन न्यून यौगिक कहते हैं। BCl3 एवं SiCl4 इलेक्ट्रॉन न्यून यौगिक होते हैं। BCl3 में बोरोन परमाणु पर रिक्त P कक्षक एवं अष्टक अपूर्ण होने के कारण यह इलेक्ट्रॉन न्यून होता है। अतः इलेक्ट्रॉन को ग्रहण करने की प्रवृत्ति बहुत प्रदत्त होती है। इस कारण यह प्रबल इलेक्ट्रॉन ग्राही के रूप में कार्य करता है। इसी प्रकार SiCl4 हैलाइड आयनों के साथ हेक्सा हेलो संकुल बनाते हैं जिससे Si की उपसहसंयोजन संख्या 4 से बढ़कर 6 हो जाती है अर्थात् SiCl4 हैलाइड आयनों से इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण करके इलेक्ट्रॉन न्यून यौगिक एवं प्रबल लूइस अम्ल के समान व्यवहर प्रदर्शित करता है।

प्रश्न 43.
निम्नलिखित को कारण सहित समझाइए –

  1. लेड (+2) क्लोराइड Cl2 से क्रिया कर PbCl4 देता है।
  2. लेड (+4) क्लोराइड उष्मा के प्रति अत्यधिक स्थाई है।
  3. सान्द HNO3 का परिवहन ऐलुमिनियम के पात्र द्वारा किया जा सकता है।
  4. ग्रेफाइट शुष्क स्नेहक के रूप में प्रयुक्त होता है।

उत्तर:

  1. लेड (+2) क्लोराइड Cl2 से क्रिया कर PbCl4 देता है –
    Be2C एवं Al4C3 में कार्बन की अवस्था -4 होती है। Be2C में Be+2 एवं कार्बाइड -4 है। इसी प्रकार Al4C3 में Al+3 एवं कार्बन की -4 है।
  2. लेड (+4) क्लोराइड उष्मा के प्रति अत्यधिक स्थाई है –
    बोरॉन का अपने वर्ग में सबसे छोटा आकार एवं उच्च आवेश घनत्व होता है। इस कारण यह आयनिक यौगिकों की अपेक्षा सह संयोजक यौगिकों का निर्माण करता है। इसमें 3 सहसंयोजी इलेक्ट्रॉन होने के कारण यह B+3 आयन का निर्माण करता है जो कि बहुत छोटा होने के कारण यह अष्टक की अपेक्षा षष्टक का निर्माण करता है।
  3. सान्द HNO3 का परिवहन ऐलुमिनियम के पात्र द्वारा किया जा सकता है –
    ऐलुमिनियम की रासायनिक अभिक्रियाशीलता बहुत कम होती है। क्योंकि इसकी सतह पर अक्रिय ऑक्साइड की परत का निर्माण हो जाता है। इसी कारण ऐलुमिनियम सान्द्र नाइट्रिक अम्ल के प्रति निष्क्रिय होता है, अमलगमित ऐलुमिनियम तल पर ऑक्साइड परत नहीं चढ़ती है अतः अमलगमित ऐलुमिनियम कमरे के ताप पर शीघ्रता से वायुमण्डलीय ऑक्सीजन तथा जल द्वारा ऑक्सीकृत हो जाते हैं। ऐलुमिनियम खनिज अम्लों तथा जलीय क्षारों से क्रिया करके उनमें घुल जाता है, अतः यह उभयधर्मी होता है। यह तनु HCl से क्रिया करके हाइड्रोजन उत्सर्जित करता है।
    2Al (s) + 6HCl (aq) → 2Al3+(aq) + 6Cl–(aq) + 3H2
    सान्द्र नाइट्रिक अम्ल, ऐलुमिनियम की सतह पर ऑक्साइड की परत बनाकर उसे निष्क्रिय बना देता है। लेकिन ऐलुमिनियम तनु H2SO4 से क्रिया करके हाइड्रोजन गैस मुक्त करता है। 2Al (s) + 3H2SO4 (aq) →Al2(SO4)3 (aq) + 3H2 (g)
    तनु
    Al सान्द्र H2SO4 को SO2 में अपचयित कर देते हैं।
    2Al (s) + 6H2SO4 (l) → Al2(SO4)3 + 3SO2 (g) + 6H2O (l)
    सान्द्र ऐलुमिनियम जलीय NaOH (क्षार) के साथ क्रिया करके हाइड्रोजन गैस देता है तथा एक संकुल यौगिक बनाता है।
    RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 11 p - ब्लॉक तत्त्व img 32
  4. ग्रेफाइट शुष्क स्नेहक के रूप में प्रयुक्त होता है –
    ग्रेफाइट गहरे धूसर रंग का होता है तथा इसकी परतीय संरचना (layered structure) होती है। ये परतें वान्डरवाल बलों द्वारा जुड़ी होती हैं तथा दो परतों के बीच की दूरी 340 pm होती है। प्रत्येक परत में कार्बन परमाणु षट्कोणीय वलय के रूप में व्यवस्थित होते हैं, जिसमें C – C बंध लम्बाई 141.5 pm होती है। इसमें प्रत्येक कार्बन परमाणु sp2 संकरित होता है तथा तीन निकटवर्ती कार्बन परमाणुओं से तीन सिग्मा बंध बनाता है। जबकि चौथा इलेक्ट्रॉन -बंध बनाता है। ये इलेक्ट्रॉन परतों के मध्य विस्थानीकृत तथा गतिशील होते हैं, अतः ग्रेफाइट विद्युत का सुचालक होता है तथा ग्रेफाइट को आसानी से तोड़ा जा सकता है। इसी कारण ग्रेफाइट मुलायम (soft) तथा चिकना (slippery) होता है।
    RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 11 p - ब्लॉक तत्त्व img 33
    ग्रेफाइट में धात्विक चमक होती है तथा यह कार्बन का स्थायी अपररूप है। उच्च ताप पर जिन मशीनों में स्नेहक के रूप में तेल का प्रयोग नहीं हो सकता उनमें ग्रेफाइट को शुष्क स्नेहक के रूप में प्रयुक्त किया जाता है।

RBSE Solutions for Class 11 Chemistry

RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 10 s-ब्लॉक तत्त्व

June 27, 2019 by Prasanna Leave a Comment

Rajasthan Board RBSE Class 11 Chemistry Chapter 10 s-ब्लॉक तत्त्व

RBSE Class 11 Chemistry Chapter 10 पाठ्यपुस्तक के अभ्यास प्रश्न

RBSE Class 11 Chemistry Chapter 10 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्न में से कौनसा क्षारीय मृदा धातु कार्बोनेट ताप के प्रति सबसे अधिक स्थायी है –
(अ) MgCO3
(ब) CaCO3
(स) SrCO3
(द) BaCO3

प्रश्न 2.
निम्न में से कौनसा यौगिक साल्वे अमोनिया प्रक्रम में सह उत्पाद के रूप में प्राप्त होता है –
(अ) कार्बन डाइ ऑक्साइड
(ब) अमोनिया
(स) कैल्सियम क्लोराइड
(द) कैल्सियम कार्बोनेट

प्रश्न 3.
क्षार धातु हेलाइडों में सबसे कम जालक ऊर्जा होती है –
(अ) LiF
(ब) NaCl
(स) KBr
(द) CsI

प्रश्न 4.
निम्न में से किसके द्वारा ज्वाला परीक्षण नहीं दिया जाता है –
(अ) Be
(ब) K
(स) Sr
(द) Na

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में से किस धातु का गलनांक न्यूनतम है –
(अ) Na
(ब) K
(स) Rb
(द) Cs

उत्तरमाला:
1. (द)
2. (स)
3. (द)
4. (अ)
5. (द)

RBSE Class 11 Chemistry Chapter 10 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 6.
वर्ग I के तत्त्व क्षार धातु क्यों कहलाते हैं?
उत्तर:
ये मुलायम, विद्युत के सुचालक एवं धात्विक प्रकृति के होते हैं एवं ये जल के साथ अभिक्रिया करके क्षारीय प्रकृति के हाइड्रॉक्साइड बनाते हैं। अतः इन्हें क्षार धातु कहते हैं।

प्रश्न 7.
एक आवर्त में क्षार धातुओं के गलनांक क्षारीय मृदा धातुओं से कम क्यों होते हैं?
उत्तर:
क्षार धातुओं के संयोजकता कोश में एक इलेक्ट्रॉन उपस्थित होने के कारण इनके बीच दुर्बल धात्विक बन्ध पाये जाते हैं परन्तु बायें से तत्त्वदायें अर्थात् क्षारीय मृदा धातुओं में परमाणु क्रमांक बढ़ने के कारण आकार छोटा एवं अधिक निबिड़ संकुलित संरचना के कारण इनके गलनांक क्षारीय धातुओं से अधिक होते हैं।

प्रश्न 8.
क्षार धातुएँ प्रकृति में प्रबल विद्युत धनी हैं, क्यों?
उत्तर:
क्षार धातुओं के बाह्यतम कोश में केवल एक इलेक्ट्रॉन होता है जो कि थोड़ी सी ऊर्जा देने पर वे आसानी से निकल जाते हैं अतः ये प्रकृति में प्रबल विद्युत धनी हैं।

प्रश्न 9.
कौनसे धातु आयन हमारे शरीर में रक्त का थक्का जमने के लिए उत्तरदायी है?
उत्तर:
Ca++ आयन शरीर में रक्त का थक्का जमने के लिए काम आता है।

प्रश्न 10.
क्षार धातुओं के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास दीजिये।
उत्तर:
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 10 s-ब्लॉक तत्त्व img 1
प्रश्न 11.
Na2O2 में सोडियम की ऑक्सीकरण अवस्था ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
Na2O2
2x + 2(-1) = 0
2x – 2 = 0
2x = 2
x = 1 अर्थात् +1 होती है।

प्रश्न 12.
पोटेशियम की तुलना में सोडियम कम क्रियाशील है क्यों?
उत्तर:
11Na 1s22s22p63s1
19K 1s22s22p63s23p64s1
सोडियम की आयनिक एन्थेल्पी पोटेशियम से कम होती है एवं पोटेशियम सोडियम की अपेक्षा अधिक विद्युत धनात्मक है। सोडियम एवं पोटेशियम दोनों के बाहरी कोश में 1 इलेक्ट्रॉन है परन्तु पोटेशियम का आकार सोडियम से बड़ा होने के कारण पोटेशियम से आसानी से इलेक्ट्रॉन निकाला जा सकता है, अतः पोटेशियम सोडियम की तुलना में ज्यादा क्रियाशील होता है।

प्रश्न 13.
क्षार धातुएँ तथा क्षारीय मृदा धातुएँ रासायनिक अपचयन विधि से क्यों नहीं प्राप्त किए जा सकते हैं?
उत्तर:
क्षार धातुएँ एवं क्षारीय मृदा धातुएँ बहुत अधिक अपचायक एजेन्ट हैं, अतः इनके ऑक्साइड या हेलाइड को किसी भी अन्य तत्त्व या यौगिक से अपचयित नहीं किया जा सकता है।

प्रश्न 14.
पोटेशियम कार्बोनेट साल्वे विधि द्वारा नहीं बनाया जा सकता है? क्यों?
उत्तर:
साल्वे विधि द्वारा पोटेशियम कार्बोनेट का निर्माण नहीं किया जा सकता है क्योंकि इससे बनने वाला पोटेशियम हाइड्रोजन कार्बोनेट KCl विलेयन में विलेय होता है।

प्रश्न 15.
बिना बुझे चूने को जब सिलिका के साथ गरम किया जाता है तब क्या अभिक्रिया होती है?
उत्तर:
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 10 s-ब्लॉक तत्त्व img 2

प्रश्न 16.
क्षार धातुओं के द्वितीय आयनन विभव के मान प्रथम से अधिक क्यों होते हैं?
उत्तर:
प्रथम इलेक्ट्रोन निकालने के बाद इलेक्ट्रोन की संख्या प्रोटोन से कम हो जाती है अतः उस परमाणु का आकार छोटा हो जाता है जिससे अब उस परमाणु से इसका इलेक्ट्रॉन निकालने के लिए अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है इसी कारण द्वितीय आयनन विभव प्रथम से अधिक होता है।

प्रश्न 17.
लीथियम यौगिक सहसंयोजक प्रकृति के क्यों होते हैं?
उत्तर:
लीथियम का आकार अन्य क्षार धातुओं की अपेक्षा छोटा होता है। इस कारण यह हेलाइडों का ध्रुवण कर देते हैं जिससे इनमें सह संयोजक गुण प्रदर्शित करते हैं।

प्रश्न 18.
लीथियम एल्युमिनियम हाइड्राइड कैसे निर्मित करते हैं?
उत्तर:
लीथियम हाइड्राइड की एल्यूमिनियम क्लोराइड के इथरी विलयन से अभिक्रिया कराते हैं तो लीथियम एल्यूमिनियम हाइड्राइड का निर्माण होता है।
4LiH + AlCl3 → LiAlH4 + 3LiCl

प्रश्न 19.
हाइड्रोलिथ क्या है? यह जल से कैसे क्रिया करता है?
उत्तर:
कैल्सियम हाइड्राइड (CaH2) को हाइड्रोलिथ कहते हैं।
CaH2 + HO4 → Ca(OH)2 + H2O
यह पानी से क्रिया करके तेजी से हाइड्रोजन गैस देता है।

प्रश्न 20.
NaOH और Mg(OH)2 में से कौनसा प्रबल क्षार है?
उत्तर:
NaOH, Mg(OH)2 की तुलना में प्रबल क्षार होता है। क्योंकि Mg की तुलना में Na की आयनन एन्थैल्पी कम होती है अतः इसकी इलेक्ट्रोन देने की प्रवृत्ति अधिक होती है इसलिए NaOH के आयनन से OH– आसानी से प्राप्त होते हैं।

RBSE Class 11 Chemistry Chapter 10 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 21.
निम्नलिखित के सन्दर्भ में क्षार धातुओं एवं क्षारीय मृदा धातुओं की तुलना कीजिए –

  • आयनन एन्थैल्पी
  • परमाण्वीय व आयनिक त्रिज्जाएँ।

उत्तर:

क्षार धातु क्षारीय मृदा धातु
आयनन एन्थैल्पी इनकी आयनन एन्थैल्पी कम होती है क्योंकि इनका इनका आकार बड़ा होता है एवं नाभिकीय आवेश कम होता है। आयनन एन्थैल्पी अपेक्षाकृत उच्च होती है क्योंकि इनका नाभिकीय आवेश अधिक होता है।
परमाण्वीय त्रिज्या इनका नाभिकीय आवेश अपेक्षाकृत कम होने के कारण परमाण्वीय त्रिज्या अधिक होती है। नाभिकीय आवेश अपेक्षाकृत अधिक होने के कारण परमाण्वीय त्रिज्या अपेक्षाकृत कम होती है।

प्रश्न 22.
प्रकाश विद्युत सेल में लीथियम के स्थान पर पोटेशियम एवं सीजियम क्यों प्रयुक्त किये जाते हैं?
उत्तर:
पोटेशियम एवं सीजियम का आकार लीथियम की तुलना में काफी अधिक होता है अतः इनमें इलेक्ट्रॉन ढीले बन्धे होते हैं इसलिए इनका आयनन विभव भी बहुत कम होता है। इसी कारण थोड़ी सी भी प्रकाशीय ऊर्जा से इसके इलेक्ट्रोन बाहर निकल जाते हैं अर्थात् इनमें प्रकाश विद्युत प्रभाव आसानी से होता है, अतः इनका उपयोग प्रकाश विद्युत सेल में किया जाता है जबकि लीथियम का आकार काफी छोटा होने के कारण इलेक्ट्रोन नहीं निकल पाते हैं।

प्रश्न 23.
सोडियम क्लोराइड से प्रारम्भ करके निम्नलिखित को आप कैसे बनायेंगे –

  1. सोडियम हाइड्रोक्साइड
  2. सोडियम कार्बोनेट।

उत्तर:

  1. सोडियम हाइड्रॉक्साइड (NaOH):
    औद्योगिक स्तर पर NaOH का निर्माण कास्टनर कैलनर सेल में NaCl के जलीय विलयन का विद्युत अपघटन करके किया जाता है। इस सेल में Hg का कैथोड तथा ग्रेफाइट का एनोड लिया जाता है। जब विलयन में विद्युत धारा प्रवाहित करते हैं तो Na धातु मर्करी कैथोड पर विसर्जित होकर मर्करी के साथ मिलकर सोडियम अमलगम बनाता है तथा एनोड पर क्लोरीन मुक्त होती है। रासायनिक अभिक्रियाएँ निम्न प्रकार होती हैं –
    RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 10 s-ब्लॉक तत्त्व img 3
    इस प्रकार से बना सोडियम अमलगम जल से क्रिया करके NaOH तथा H2 गैस देता है।
    RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 10 s-ब्लॉक तत्त्व img 4
  2. सोडियम कार्बोनेट (Na2CO3):
    सोडियम कार्बोनेट को साल्वे प्रक्रम द्वारा बनाया जाता है। इसके लिए पहले NaCl से (NH4)2 CO3 बनाते हैं फिर NH4HCO3 तथा अंत में Na2CO3 बनाते हैं। अभिक्रियाएँ निम्न प्रकार होती हैं –
    2NH3 + CO2 + H2O → (NH4)2CO3
    (NH4)2CO3 + CO2 + H2O → 2NH4HCO3
    NH4HCO3 + NaCl → NH4Cl + NaHCO3
    2NaHCO3 \(\overrightarrow { \Delta } \) Na2CO3 + CO2↑+ H2O

प्रश्न 24.
निम्नलिखित की संरचना बताइए –

  1. BaCl2 (वाष्प)
  2. BeCl2 (ठोस )

उत्तर:
ठोस अवस्था में यह बहुलक श्रृंखला संरचना प्रदर्शित करता है जिसमें Be परमाणु चार क्लोरीन परमाणुओं से घिरा रहता है – दो क्लोरीन परमाणु सहसंयोजक बन्धों से जबकि दो उपसहसंयोजक बन्धों द्वारा आबंधित होता है।
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 10 s-ब्लॉक तत्त्व img 5
लेकिन वाष्प अवस्था में BeCl2 क्लोरो सेतु द्विलक बनाता है जो 1200K के उच्च ताप पर रेखीय एकलक में वियोजित हो जाता है।
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 10 s-ब्लॉक तत्त्व img 6
प्रश्न 25.
क्षार धातुएँ द्रव अमोनिया में नीला रंग क्यों देती हैं?
उत्तर:
क्षार धातुएँ द्रव NH3 में विलेय होती हैं एवं इस विलयन का रंग गहरा नीला होता है। यह विलयन मुक्त इलेक्ट्रॉन के कारण विद्युत का सुचालक होता है।
M + (x + y) NH3+ [M(NH3)x]+ + [e(NH3)y]–
इस विलयन का नीला रंग अमोनीकृत इलेक्ट्रॉन के कारण होता है। ये इलेक्ट्रॉन प्रकाश के दृश्य क्षेत्र की ऊर्जा का अवशोषण करके विलयन को नीला रंग प्रदान करते हैं।

प्रश्न 26.
H2 अणु है लेकिन He2 अणु अज्ञात है। समझाइए क्यों?
उत्तर:
हाइड्रोजन परमाणु की बाहरी कक्षा में एक इलेक्ट्रॉन होता है अतः दो हाइड्रोजन परमाणु आपस में अतिव्यापन करके H2 अणु का निर्माण करते हैं जिसमें कोश पूर्ण हो जाता है (2n2) परन्तु He के परमाणु की बाहरी कक्षा में 2 इलेक्ट्रॉन होते हैं एवं यह स्थायी कोश है अतः दोनों He परमाणुओं में अतिव्यापन नहीं हो पाता है इसलिए He2 अणु का निर्माण नहीं होता है।

प्रश्न 27.
ऑक्साइड, परऑक्साइड और सुपर ऑक्साइड क्या हैं? उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर:
ऑक्साइड में ऑक्सीकरण स्टेट – 2 होता है जैसे Na2O, Fe2O3, BaO परऑक्साइडों में [- O – O -]2- आयन होता है इसी कारण ये प्रतिचुम्बकीय तथा प्रबल सुपर ऑक्सीकारक होते हैं। ऑक्साइडों में [O2–] आयन होता है इसलिए ये अयुग्मित इलेक्ट्रोन की उपस्थिति के कारण अनुचुम्बकीय तथा रंगीन (LiO2 NaO2– पीला, KO2 नारंगी, RbO2– भूरा तथा CSO2 नारंगी) होते हैं। अर्थात् ऑक्साइड में ऑक्सीकरण स्टेट – 2 होती है, परॉक्साइड में -1 होती है जबकि सुपर, ऑक्साइड में \(\frac { { -{ 1 } } }{ 2 } \) होती है।

प्रश्न 28.
निर्जल कैल्सियम क्लोराइड निर्जली कारक के रूप में प्रयुक्त होता है, क्यों?
उत्तर:
कैल्सियम क्लोराइड एक विशेष प्रकार का धात्विक हेलाइड है जो कि आर्द्रताग्राही होता है। इसकी पानी सोखने की क्षमता लगभग 90% होती है अतः पानी अणुओं को वायुमण्डल से भी आकर्षित कर लेता है। इस कारण इस यौगिक को जिस विलयन में डाला जाता है उसमें से पानी को सोख लेता है। इस कारण इसको निर्जलीकारक के रूप में प्रयुक्त किया जाता है।

प्रश्न 29.
LiF जल में लगभग अविलय होता है जबकि LiCl न सिर्फ जल में, बल्कि एसीटोन में भी विलेय होता है। कारण बताइए।
उत्तर:
LiF आयनिक यौगिक है लेकिन Li+ तथा F– के छोटे आकार के कारण इसकी जालक एन्थैल्पी अधिक होती है अत: इसकी जलयोजन एन्थैल्पी, जालक एन्थैल्पी से अधिक नहीं होती। इसलिए LiF जल में अविलेय है जबकि LiCl में Cl– के बड़े आकार के कारण Li+ के द्वारा इसका ध्रुवण हो जाता है। अत: LiCl में आंशिक आयनिक तथा आंशिक सहसंयोजी गुण होता है इस कारण यह जल तथा कम ध्रुवीय विलायक जैसे ऐसीटोन में भी विलेय होता है।

प्रश्न 30.
Na2CO3 का विलयन क्षारीय होता है, क्यों?
उत्तर:
Na2CO3 को जल में डालने पर, जल अपघटन के कारण प्रबल क्षार (NaOH) तथा दुर्बल अम्ल (H2CO3) बनता है। चूँकि NaOH से प्राप्त \(\overset { – }{ O } \)H आयन, H2CO3 से प्राप्त H+ आयनों से अधिक होते हैं अतः Na2CO3 का जलीय विलयन क्षारीय होता है। यहाँ वास्तव में CO32- जल से क्रिया करके OH– की सान्द्रता बढ़ाते हैं।
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 10 s-ब्लॉक तत्त्व img 7

प्रश्न 31.
निम्नलिखित के उपयोग लिखिए –

  1. चूना पत्थर
  2. सोडियम कार्बोनेट।

उत्तर:
1. चूना पत्थर के उपयोग निम्नलिखित हैं –

  • संगमरमर के रूप में भवन निर्माण
  • बुझे चूने का निर्माण
  • आयन के निष्कर्षण में गालक के रूप में
  • कागज के निर्माण में
  • एन्टासिड, टूथपेस्ट, च्यूइंगम तथा सौन्दर्य प्रसाधनों के निर्माण में।

2. सोडियम कार्बोनेट –

  • जल को मृदु (soft) करने में
  • कपड़े धोने के साबुन बनाने में
  • काँच, बोरेक्स, साबुन एवं कास्टिक सोडा बनाने में
  • प्रयोगशाला में गुणात्मक एवं मात्रात्मक विश्लेषण में अभिकर्मक के रूप में।

प्रश्न 32.
निम्नलिखित तथ्यों को समझाइये –

  1. BeO जल में अविलेय है जबकि BeSO4 विलेय है।
  2. BaO जल में विलेय है जबकि BaSO4 अविलेय है।

उत्तर:

  1. BeO में O2- के छोटे आकार के कारण जालक:
    एन्थैल्पी का मान जलयोजन एन्थैल्पी से अधिक होता है। अतः यह जल में अविलेय है जबकि BeSO4 में SO42- के बड़े आकार के कारण इसकी जालक एन्थैल्पी, जलयोजन एन्थैल्पी से कम होती है अतः यह जल में विलेय है।
  2. BaO में Ba2+ के बड़े आकार के कारण इसकी जालक एन्थैल्पी, जलयोजन एन्थैल्पी की तुलना में कम होती है। अतः यह जल में विलेय है जबकि BaSO4 में Ba2+ तथा SO42- दोनों के बड़े आकार के कारण इसकी जलयोजन एन्थैल्पी का मान जालक एन्थैल्पी से बहुत कम होता है अतः यह अविलेय है।

प्रश्न 33.
निम्नलिखित के मध्य क्रियाओं के सन्तुलित समीकरण लिखिये –

  1. Be2C एवं जल
  2. KO2 एवं जल
  3. लीथियम एवं नाइट्रोजन।

उत्तर:

  1. बेरीलियम कार्बाइड की जल के साथ अभिक्रिया कराने पर मेथेन गैस का निर्माण होता है –
    Be2C + 4H2O → 2Be(OH)2 + CH4
  2. KO2 एवं जल की क्रिया से KOH तथा H2O2 का निर्माण होता है।
    2KO2 (s) + 2H2O(2) → 2KOH (aq) + O2 (g) + H2O2 (aq)
  3. Li (s) + N2 (g) → 2Li3N (s)

प्रश्न 34.
विकर्ण सम्बन्ध क्या है? बेरीलियम किस प्रकार एल्यूमिनियम से समानता दर्शाता है?
उत्तर:
बेरीलियम के गुण अन्य क्षार मृदा धातुओं के गुणों से भिन्न होते हैं परन्तु यह एल्यूमिनियम के गुणों से अधिक समानता प्रदर्शित करता है जो कि वर्ग III का दूसरा तत्त्व है एवं बेरोलियम की विकर्ण स्थिति पर होता है। बेरीलियम एवं एल्यूमिनियम के इस सम्बन्ध को विकर्ण सम्बन्ध कहते हैं।
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 10 s-ब्लॉक तत्त्व img 8

  • Be एवं Al के यौगिकों में सहसंयोजी गुण होता है अतः वे कार्बनिक विलायकों में विलेय होते हैं।
  • Be(OH)2 तथा Al(OH)3 उभयधर्मी होते हैं।
  • Be एवं Al दोनों ही हाइड्रोजन से सीधे क्रिया करके हाइड्राइड नहीं बनाते हैं।

प्रश्न 35.
लीथियम अपने वर्ग के अन्य तत्त्वों से समानता नहीं रखता, इसका क्या कारण है?
उत्तर:
लीथियम निम्न कारणों से अपने वर्ग के अन्य तत्त्वों से समानता नहीं रखता है –

  • लीथियम परमाणु तथा उसके आयन (Li+) का अत्यधिक आकार छोटा होता है।
  • लीथियम आयन (Li+) की अधिक ध्रुवण क्षमता के परिणामस्वरूप लीथियम यौगिकों में सहसंयोजक गुण अधिक पाये जाते
  • लीथियम की उच्च आयनन ऊर्जा तथा सबसे कम विद्युत धनी प्रकृति।
  • d कक्षकों की अनुपस्थिति के कारण अधिकतम चार संयोजकता प्रदर्शित कर सकता है।

RBSE Class 11 Chemistry Chapter 10 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 36.
वर्ग I तथा वर्ग II धातुओं के गुण बताइए। बेरोलियम हाइड्राइड की संरचना को समझाइये।
उत्तर:
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 10 s-ब्लॉक तत्त्व img 9

  1. परमाणु एवं आयनिक त्रिज्या:
    क्षार धातुओं की परमाणु त्रिज्या (आकार) आवर्त सारणी के किसी आवर्त में सर्वाधिक होती है। इनके एक संयोजी आयन (M+) का आकार अपने जनक परमाणु के आकार की तुलना में छोटा होता है। क्षार धातुओं की परमाणु तथा आयनिक त्रिज्या वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर बढ़ती है, अर्थात् इनका आकार Li से Cs तक बढ़ता है, क्योंकि कोशों की संख्या बढ़ती जाती है।
  2. घनत्व:
    क्षार धातुओं के बड़े आकार के कारण इनका घनत्व कम होता है अतः ये हल्के होते हैं। वर्ग में नीचे जाने पर घनत्व का मान कम होता जाता है, क्योंकि आयतन की तुलना में द्रव्यमान अधिक बढ़ता है।
    d = \(\frac { M }{ V } \)
    लेकिन पोटैशियम का घनत्व सोडियम के घनत्व से कम होता है क्योंकि K के तीसरे कोश में 8 इलेक्ट्रॉन हैं जबकि इसकी क्षमता 18 इलेक्ट्रॉन (2n2) की है अतः इलेक्ट्रॉनों का फैलाव होकर, द्रव्यमान की तुलना में आयतन अधिक बढ़ जाता है। अतः वर्ग -1 के तत्त्वों के घनत्व का क्रम निम्न प्रकार होता है –
    Li < K < Na < Rb < Cs
  3. गलनांक एवं क्वथनांक:
    क्षार धातुओं के गलनांक तथा क्वथनांक कम होते हैं, क्योंकि इनके संयोजी कोश में मात्र एक इलेक्ट्रॉन उपस्थित होता है अतः परमाणुओं के मध्य धात्विक बंध दुर्बल होता है। वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर परमाणु आकार बढ़ने के कारण धात्विक बन्ध की प्रबलता कम होती जाती है अतः इनके गलनांक तथा क्वथनांक के मान भी कम होते जाते हैं।
  4. आयनन एन्थैल्पी:
    क्षार धातुओं की आयनन एन्थैल्पी का मान बहुत कम होता है अतः ये आसानी से एक इलेक्ट्रॉन देकर उत्कृष्ट गैस विन्यास प्राप्त कर लेते हैं। आयनन एन्थैल्पी का मान वर्ग में लीथियम से सीजियम की ओर नीचे जाने पर कम होता जाता है क्योंकि बढ़ते हुए नाभिकीय आवेश की तुलना में बढ़ते हुए परमाणु – आकार का प्रभाव अधिक होता है तथा परिरक्षण प्रभाव भी बढ़ता है। क्षार धातुओं की आयनन एन्थैल्पी का मान अपने आवर्त में न्यूनतम होता है। प्रथम वर्ग के सभी तत्त्व धातु हैं। ये अपने बाह्यतम कोश में उपस्थित s इलेक्ट्रॉन को आसानी से त्याग देते हैं अतः ये अत्यधिक विद्युत धनी तथा क्रियाशील तत्त्व हैं। (हाइड्रोजन को छोड़कर) वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर आयनन एन्थैल्पी का मान कम होता है अतः इनका. धात्विक गुण (विद्युत धनी गुण) तथा क्रियाशीलता बढ़ती है। क्षार धातुओं की द्वितीय आयनन एन्थैल्पी का मान बहुत उच्च होता है क्योंकि –
    1. M+ आयन का विन्यास स्थायी (ns2np6) होता है।
    2. M+ आयन का आकार नाभिकीय आवेश में वृद्धि के कारण छोटा होता है।
  5. ज्वाला परीक्षण:
    क्षार धातुएँ तथा इनके लवण ऑक्सीकारक ज्वाला को विशेष रंग प्रदान करते हैं क्योंकि ज्वाला की ऊष्मा इनके बाह्यतम इलेक्ट्रॉन को उच्च ऊर्जा – स्तर तक उत्तेजित कर देती है। जब यह इलेक्ट्रॉन पुनः अपनी मूल अवस्था में आता है, तो दृश्य क्षेत्र में विकिरण के उत्सर्जन के कारण ज्वाला को रंग प्रदान करते हैं जो कि भिन्न – भिन्न धातुओं के लिए भिन्न – भिन्न होता है। अतः क्षार धातुओं को इनके ज्वाला परीक्षण द्वारा पहचाना जा सकता है तथा इनकी सान्द्रता का निर्धारण ज्वाला प्रकाशमापी द्वारा किया जाता है।
    RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 10 s-ब्लॉक तत्त्व img 10
    ज्वाला के रंग की तीव्रता ‘फोटो विद्युत सेल’ द्वारा नापी जा सकती है जो कि धातु की सान्द्रता पर निर्भर करती है। क्षार धातुओं को परमाणवीय अवशोषण स्पेक्ट्रोमिति द्वारा भी पहचाना जा सकता है।
  6. प्रकाश विद्युत प्रभाव:
    धातु की सतह पर प्रकाश के गिरने पर इलेक्ट्रॉनों का उत्सर्जन प्रकाश विद्युत प्रभाव कहलाता है तथा उत्सर्जित इलेक्ट्रॉनों को फोटो इलेक्ट्रॉन कहते हैं। क्षार धातुओं में K तथा Cs की आयनन एन्थैल्पी का मान बहुत कम होता है अतः ये प्रकाश विद्युत प्रभाव दर्शाते हैं।
  7. अपचायक गुण:
    क्षार धातुओं के मानक इलेक्ट्रॉड विभव के मान उच्च ऋणात्मक होते हैं अतः ये प्रबल अपचायक होते हैं। आयनन एन्थैल्पी के आधार पर लीथियम का अपचायक गुण सबसे कम होना चाहिए लेकिन वास्तव में लीथियम सबसे प्रबल अपचायक होता है क्योंकि इसका मानक इलेक्ट्रॉड विभव उच्चतम ऋणात्मक होता है। इसका कारण Li+ को छोटा आकार है। जिसके कारण इसकी जलयोजन एन्थैल्पी का मान बहुत अधिक होता है।
    RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 10 s-ब्लॉक तत्त्व img 11
    इलेक्ट्रॉड विभव = जल योजन एन्थैल्पी – (आयनन एन्थैल्पी + ऊर्ध्वपातन एन्थैल्पी)
    अतः क्षार धातुओं के अपचायक गुण का क्रम निम्न प्रकार होता है –
    Na < K < Rb < Cs < Li
    Li+ > Na+ > K+ > Rb+ > Cs+
    (जलयोजन ऊर्जा का क्रम)
    पद III में उत्सर्जित जलयोजन ऊर्जा पद II की उच्च आयनन ऊर्जा को समायोजित कर देती है, इससे इलेक्ट्रॉन का परित्याग आसानी से हो जाता है। इस प्रकार लीथियम का न्यूनतम अपचयन विभव मान उसकी प्रबलतम अपचायक प्रवृत्ति को प्रदर्शित करता है।
  8. ऑक्सीकरण अवस्था:
    सभी क्षार धातुएँ एक संयोजी धनायन (M+) बनाती हैं क्योंकि ये एक इलेक्ट्रॉन त्याग कर उत्कृष्ट गैस के समान स्थायी विन्यास प्राप्त कर लेती हैं।
  9. रंगहीन तथा प्रतिचुम्बकीय आयन:
    सभी क्षार धातु धनायनों (M) में उत्कृष्ट गैस विन्यास होने के कारण इनमें सभी इलेक्ट्रॉन युग्मित होते हैं अतः ये रंगहीन तथा प्रतिचुम्बकीय होते हैं।

क्षारीय मृदा धातुओं के भौतिक गुण:
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 10 s-ब्लॉक तत्त्व img 12
क्षारीय मृदा धातुएँ भी बहुत अधिक क्रियाशील होती हैं अतः ये मुक्त अवस्था में नहीं पायी जाती हैं परन्तु सिलिकेट, कार्बोनेट, सल्फेट एवं फास्फेट के रूप में प्रकृति में पायी जाती हैं।
बेरीलियम भू – पर्पटी पर भारात्मक रूप में पाया जाने वाला 51वां तत्त्व है। यह कुछ मात्रा में बेरिल (Be3Al2Si6O18) तथा फिनासाइट (Be2SiO4) में भी पाया जाता है। इसी प्रकार भूपर्पटी में कैल्सियम एवं मैग्नीशियम का क्रमश: इवां एवं छठा स्थान है। मैग्नीशियम कार्बोनेट सिलिकेट एवं सल्फेट के रूप में पाया जाता है। यह समुद्री जल में भी (0.13%) कुछ भाग में क्लोराइड एवं सल्फेट के रूप में पाया जाता है।
कैल्सियम मुख्य रूप से लाइम स्टोन, संगमरमर एवं चॉक CaCO3 के रूप में पाया जाता है। फ्लुओरो पैराइट [3CCa3(PO4)2CaF2] तथा जिप्सम [CaSO4.2H2O] कैल्सियम के मुख्य अयस्क हैं। Sr एवं Ba कम मात्रा में पाये जाते हैं। रेडियम एक रेडियोधर्मी तत्त्व है जो आग्नेय शैल में केवल 10-10% पाये जाते हैं।

इलेक्ट्रॉनिक विन्यास:
वर्ग 2 के तत्त्वों का बाह्यतम सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास ns2 होता है। यहाँ n = 2 से 7 अर्थात् क्षारीय मृदा धातुओं के बाह्यतम कोश (संयोजी कोश) में दो इलेक्ट्रॉन होते हैं तथा इसके पूर्व के कोश में उत्कृष्ट गैस के समान विन्यास पाया जाता है।

  1. परमाणु तथा आयनिक त्रिज्या:
    क्षार धातुओं की तुलना में क्षारीय मृदा धातुओं की परमाणु तथा आयनिक त्रिज्या कम होती है क्योंकि आवर्त सारणी में किसी आवर्त में बाएँ से दाएँ जाने पर नाभिकीय आवेश में वृद्धि से नाभिकीय आकर्षण बल बढ़ जाता है जिससे त्रिज्या कम हो जाती है। प्रथम वर्ग के समान इनमें भी वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर परमाणु तथा आयनिक त्रिज्या बढ़ती है। लेकिन आयनिक त्रिज्या का मान परमाणु त्रिज्या से काफी कम होता है, क्योंकि धनायन (M2+) बनते समय बाह्यतम कोश ही समाप्त हो जाता है।
  2. घनत्व:
    वर्ग 2 के तत्त्वों का घनत्व, वर्ग 1 के तत्त्वों की तुलना में अधिक होता है क्योंकि इनका आकार छोटा होता है। वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर क्षारीय मृदा धातुओं के घनत्व में नियमितता नहीं होती है। Be से Ca तक घनत्व कम होता है, इसके पश्चात् बढ़ता है, इसका कारण इनकी क्रिस्टल संरचना में अन्तर है। अतः क्षारीय मृदा धातुओं में घनत्व का क्रम इस प्रकार है –
    Ca < Mg < Be < Sr < Ba
  3. गलनांक तथा क्वथनांक:
    क्षारीय मृदा धातुओं के गलनांक तथा क्वथनांक क्षार धातुओं की तुलना में उच्च होते हैं, क्योंकि इनका आकार छोटा होता है। वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर गलनांक तथा क्वथनांक का मान कम होता है। क्योंकि परमाणु आकार बढ़ने के कारण धात्विक बन्ध की प्रबलता कम होती है। लेकिन कैल्सियम का गलनांक तथा क्वथनांक अपेक्षाकृत अधिक होते हैं क्योंकि इसमें d – कक्षक बन्ध बनाने में प्रयुक्त होते हैं। जिनके अधिक दिशात्मक गुण के कारण बन्ध की प्रबलता अधिक होती है तथा d – कक्षक कैल्सियम से ही प्रारम्भ होते हैं। अत: वर्ग 2 के तत्वों के गलनांक तथा क्वथनांक को क्रम निम्न प्रकार होता है –
    गलनांक Be > Ca > Sr > Ba > Mg
    क्वथनांक Be > Ba > Ca > Sr > Mg
  4. आयनन एन्थैल्पी:
    क्षारीय मृदा धातुओं के बड़े परमाणु आकार के कारण इनकी आयनने एन्थैल्पी के मान कम होते हैं। वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर परमाणु आकार बढ़ता है, अतः इनकी आयनन एन्थैल्पी कम होती जाती है। क्षारीय मृदा धातुओं की प्रथम आयनन एन्थैल्पी क्षार धातुओं की प्रथम आयनन एन्थैल्पी की तुलना में अधिक होती है। यह इनके क्षार धातुओं की तुलना में छोटे आकार के कारण होती है, लेकिन इनके द्वितीय आयनन एन्थैल्पी के मान क्षार धातुओं के द्वितीय आयनन एन्थैल्पी के मानों की तुलना में कम होते हैं क्योंकि दो इलेक्ट्रॉन निकलने से इनमें उत्कृष्ट गैसों के समान स्थायी विन्यास प्राप्त हो जाता है।
    RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 10 s-ब्लॉक तत्त्व img 13
    सोडियम धातु में दूसरा इलेक्ट्रॉन एक संयोजी धनायन से [उत्कृष्ट गैस (Ne)] निकलता है जबकि मैग्नीशियम एक संयोजी धनायन से दूसरा इलेक्ट्रॉन आसानी से त्याग कर उत्कृष्ट गैस Ne – विन्यास प्राप्त करता है। वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर क्षारीय मृदा धातुओं की आयनन ऊर्जा का मान
    आकार तथा परिरक्षण प्रभाव बढ़ने के कारण कम होता जाता है।
  5. ज्वाला परीक्षण:
    क्षार धातुओं के समान क्षारीय मृदा धातु भी ज्वाला को निम्न प्रकार से रंग प्रदान करती है –
    RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 10 s-ब्लॉक तत्त्व img 14
    बेरीलियम तथा मैग्नीशियम के अतिरिक्त अन्य क्षारीय मृदा धातु ज्वाला परीक्षण देते हैं क्योंकि ज्वाला में उच्च ताप पर (वाष्प – अवस्था में) क्षारीय मृदा धातुओं के बाह्यतम कोश के इलेक्ट्रॉन उत्तेजित होकर उच्च ऊर्जा – स्तर में चले जाते हैं। ये इलेक्ट्रॉन जब पुनः अपनी मूल अवस्था में आते हैं, तो दृश्य प्रकाश के रूप में ऊर्जा उत्सर्जित करते हैं, जिससे ज्वाला को विशेष रंग प्राप्त होता है। कैल्सियम (Ca) ईंट जैसा लाल (Brick Red), स्ट्रॉन्शियम (Sr) किरमिजी लाल (Crimson Red) तथा बेरियम (Ba) ज्वाला को सेब जैसा हरा (Apple Green) रंग प्रदान करता है। इसी कारण गुणात्मक विश्लेषण में इन मूलकों की पुष्टि ज्वाला परीक्षण के आधार पर की जाती है। बेरिलियम तथा मैग्नीशियम के बाह्यतम कोशों के इलेक्ट्रॉन इतनी दृढ़ता से बँधे होते हैं कि ज्वाला की ऊर्जा द्वारा ये उत्तेजित नहीं हो पाते हैं अतः ये ज्वाला को कोई विशेष रंग प्रदान नहीं करते हैं।
  6. धात्विक तथा धनविद्युती गुण:
    निम्न आयनन एन्थैल्पी के कारण क्षारीय मृदा धातु प्रबल धन – विद्युती होते हैं तथा धन – विद्युती गुण ऊपर से नीचे जाने पर (Be से Ba) बढ़ता है। इनका धनविद्युती गुण (धात्विक गुण) क्षार धातुओं की तुलना में कम होता है, क्योंकि छोटे आकार के कारण इनकी आयनन एन्थैल्पी का मान अपेक्षाकृत अधिक होता है।
  7. ऑक्सीकरण अवस्था:
    सभी क्षारीय मृदा धातु द्विसंयोजी धनायन (M2+) बनाती हैं, क्योंकि ये दो इलेक्ट्रॉन देकर उत्कृष्ट गैस के समान स्थायी विन्यास प्राप्त कर लेती हैं।
  8. रंगहीन तथा प्रतिचुम्बकीय आयन:
    क्षारीय मृदा धातुओं के धनायन (M2+) रंगहीन तथा प्रतिचुम्बकीय होते हैं क्योंकि इनमें स्थायी उत्कृष्ट गैस विन्यास पाया जाता है जिसमें सभी इलेक्ट्रॉन युग्मित होते हैं।
  9. मानक इलेक्ट्रॉड विभव:
    क्षारीय मृदा धातुओं के मानक इलेक्ट्रॉड विभव के मान उच्च ऋणात्मक होते हैं (क्षार धातुओं की अपेक्षा कम), अतः ये अपचायक होते हैं। वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर यह मान कम होता जाता है। इसलिए इनकी क्रियाशीलता भी कम होती है। इसी कारण Be सबसे कम तथा Ba सर्वाधिक क्रियाशील क्षारीय मृदा धातु है।

हाइड्रोजन से अभिक्रिया:
बेरिलियम के अतिरिक्त अन्य सभी क्षारीय मृदा धातुओं को हाइड्रोजन के साथ गर्म करने पर संगत हाइड्राइड बनते हैं। BeH2 को BeCl2 तथा LiAlH4 की अभिक्रिया से बनाया जाता है।
M + H2 \(\overrightarrow { \Delta } \) MH2
2BeCl2 + LiAlH4 → 2BeH2 + LiCl + AlCl3
BeH2 सहसंयोजी होता है लेकिन अन्य हाइड्राइड आयनिक होते हैं। ये हाइड्राइड्स जल से क्रिया करके हाइड्रोजन गैस मुक्त करते हैं।
MH2 + 2H2O → M(OH)2 + 2H2↑
इन हाइड्राइडों का तापीय स्थायित्व वर्ग में कम होता है।
BeH2 > MgH2 > CaH2 > SrH2 > BaH2
BeH2 तथा MgH2 इलेक्ट्रॉन न्यून एवं सहसंयोजक यौगिक होते हैं। इलेक्ट्रॉन न्यूनता के कारण ये बहुलकी संरचना प्रदर्शित करते हैं।
RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 10 s-ब्लॉक तत्त्व img 15
CaH2, SrH2 तथा CaH2 आयनिक प्रकृति के होते हैं। CaH2 को ‘हाइड्रोलिथ’ कहते हैं। क्षारीय मृदा धातु हाइड्राइड जल के साथ क्रिया करके H2 गैस निकालते हैं। इस प्रकार ये अपचायक की तरह व्यवहार प्रदर्शित करते हैं।
MH2 + 2H2O → M (OH)2 + 2H2
CaH2 + 2H2O → Ca(OH)2 + 2H2

प्रश्न 37.
जैव द्रवों में Na, K, Mg तथा Ca के महत्त्व को समझाइये।
उत्तर:
सोडियम तथा पोटेशियम का जैविक महत्त्व:
Na+ तथा K+ दोनों ही आयन जैविक तरल (Fluid) के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण अवयव हैं। 70kg वजन वाले एक सामान्य व्यक्ति में लगभग 90gm सोडियम तथा 170gm पोटैशियम पाया जाता है। कोशिका में कई ऋणावेशित वृहद् अणु पाये जाते हैं उन पर उपस्थित ऋण आवेश को सन्तुलित करने के लिए अधिक मात्रा में I वर्ग एवं II वर्ग के धातु धनायनों की आवश्यकता होती है।

  • सोडियम आयन मुख्यतः अंतराकाशीय द्रव में उपस्थित रक्त प्लाज्मा, जो कोशिकाओं को घेरे रहता है, में पाया जाता है।
  • सोडियम आयन तंत्रिका (शिरा) आवेग संकेतों के संचरण में भाग लेते हैं, जो कोशिका झिल्ली में जलप्रवाह को नियमित करते हैं तथा कोशिकाओं में शर्करा एवं एमीनो अम्लों के प्रवाह को भी नियंत्रित करते हैं।
  • सोडियम तथा पोटैशियम रासायनिक दृष्टि से समान होते हैं लेकिन इनकी कोशिका झिल्ली को पार करने की तथा एन्जाइम को सक्रिय करने की क्षमता भिन्न होती है। इसीलिए कोशिका द्रव में पोटैशियम आयन अधिक होते हैं; जहाँ ये एन्जाइम को सक्रिय करते हैं तथा ग्लूकोज के ऑक्सीकरण से ATP बनने में भी भाग लेते हैं।
  • कोशिका झिल्ली के अन्य भागों में पाए जाने वाले सोडियम तथा पोटैशियम आयनों की सान्द्रता भिन्न – भिन्न होती है। जैसे रक्त प्लाज्मा में लाल रक्त कोशिकाओं में सोडियम की मात्रा 143 m molL-1 होती है, जबकि पोटैशियम की मात्रा केवल 5 m molL-1 होती है। Na में यह सान्द्रता 10 m molL-1 तक तथा K+में यह 105 m molL-1 तक परिवर्तित हो सकती है। इस असाधारण आयनिक उतार – चढ़ाव को ‘सोडियम पोटैशियम पम्प’ कहते हैं।
  • यह उतार – चढ़ाव सेल झिल्ली पर होता है, जिसमें मनुष्य की विश्रामावस्था में प्रयुक्त ATP का एक – तिहाई से अधिक का उपयोग हो जाता है तथा यह विश्राम की अवस्था वाले मनुष्य में 15 Kg प्रति 24 घण्टे तक हो सकता है।
  • 70 किलोग्राम वजन वाले एक सामान्य व्यक्ति में लगभग 90 ग्राम सोडियम तथा 170 ग्राम पोटैशियम होता है। जबकि आयरन केवल 5 ग्राम तथा कॉपर 0.06 ग्राम होता है।

मैग्नीशियम तथा कैल्सियम की जैव महत्ता:

  • समस्त एन्जाइम, जो फॉस्फेट के संचरण में ATP का उपयोग करते हैं, वे सह – घटक के रूप में मैग्नीशियम का उपयोग करते हैं।
  • पौधों में प्रकाश – अवशोषण के लिए आवश्यक मुख्य रंजक क्लोरोफिल में भी मैग्नीशियम उपस्थित होता है।
  • शरीर में कैल्सियम का 99% भाग दाँतों तथा हड्डियों में होता है।
  • कैल्सियम, तंत्रिकीय पेशीय कार्यप्रणाली, अंतर तंत्रिकीय प्रेषण, कोशिक झिल्ली अखण्डता तथा रक्त के स्कंदन में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
  • प्लाज्मा में कैल्सियम की सान्द्रता लगभग 100 mgL होती है जिसे बनाए रखने के लिए दो हार्मोन कैल्सिटोनिन तथा पैराथायराइड उत्तरदायी होते हैं।
  • मनुष्य में हड्डियों में लगभग 400 mg कैल्सियम प्रतिदिन विलेय तथा निक्षेपित होता है जो कि प्लाज्मा में से होकर ही गुजरता है।
  • एक सामान्य वयस्क व्यक्ति के शरीर में करीब 25 ग्राम मैग्नीशियम एवं 1200 ग्राम कैल्सियम होता है। मानव शरीर में इनकी दैनिक आवश्यकता 200 – 300 mg तक होती है।

प्रश्न 38.
औद्योगिक स्तर पर सोडियम कार्बोनेट बनाने की विधि का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
कैल्सियम के मुख्य यौगिक:
कैल्सियम के महत्त्वपूर्ण यौगिक कैल्सियम ऑक्साइड (CaO) कैल्सियम हाइड्रॉक्साइड [Ca(OH)2], कैल्सियम सल्फेट (CaSO4), कैल्सियम कार्बोनेट (CaCO3) तथा सीमेन्ट हैं। ये सभी यौगिक औद्योगिक रूप से महत्त्वपूर्ण हैं। इन यौगिकों का व्यापारिक मात्रा में निर्माण, गुण तथा उपयोग निम्नलिखित हैं –

  1. कैल्सियम ऑक्साइड या बिना बुझा चूना:
    कैल्सियम ऑक्साइड को बिना बुझा चूना भी कहते हैं। CaO का वाणिज्यिक निर्माण घूर्णित भट्टी (Rotary Kiln) में चूने के पत्थर को गर्म करके किया जाता है। अभिक्रिया की तीव्रता को बनाये रखने के लिए CO2 को हटाते रहते हैं तथा उच्च ताप (1070 – 1270 K) को बनाये रखते हैं। अभिक्रिया निम्न प्रकार होती है
    CaCO3 \(\underrightarrow { \Delta } \) CaO + CO2↑ ΔH = + 179.9 kJK
    यह अभिक्रिया उत्क्रमणीय होती है इस कारण CO2 को अभिक्रिया से शीघ्रातिशीघ्र हटाते रहते हैं जिससे अभिक्रिया अग्र दिशा में अग्रसर होती रहे। अभिक्रिया का ताप 1270K से अधिक नहीं होना चाहिये नहीं तो लाइम स्टोन में अशुद्धि के रूप में उपस्थित सिलिका CaO से क्रिया करके कैल्सियम सिलिकेट बना देता है।
    CaO + SiO2 \(\underrightarrow { { >{ 1270 } } } \) 1270K CaSiO3

    गुण:
    1. यह श्वेत अक्रिस्टलीय ठोस है। इसका गलनांक 2870K
    2. ऑक्सी – हाइड्रोजन ज्वाला में गर्म करने पर चमकीला सफेद प्रकाश उत्सर्जित होता है जिसे लाइम प्रकाश भी कहते हैं।
    3. वायुमण्डल में खुला छोड़ने पर यह वायुमण्डल से नमी एवं कार्बनडाइ ऑक्साइड अवशोषित कर लेता है।
    RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 10 s-ब्लॉक तत्त्व img 16
    4. सामान्यतया, यह कठोर पिंडक (Lumps) के रूप में प्राप्त होता है। इसमें जल मिलाने पर चूने के पिंडक टूट जाते हैं। इस प्रक्रिया में बुझने की आवाज आती है और ऊष्मा उत्पन्न होती है, जो जल को वाष्प में बदल देती है। इस प्रक्रिया को ‘चूना बुझाने की प्रक्रिया’ (Slaking of lime) कहते हैं। इस क्रिया में जो पाउडर प्राप्त होता है उसे बुझा चूना (slaked lime) कहते हैं।
    CaO + H2O → Ca(OH)2 ; ΔH = – 64.5 kJmol-1
    5. बिना बुझा चूना जब कास्टिक सोडा के साथ बुझाया जाता है तो सोडालाइम (CaO + Na(OH) का निर्माण होता है।
    6. CaO एक क्षारीय ऑक्साइड है इस कारण अम्ल और अम्लीय ऑक्साइड से उच्च ताप पर क्रिया कर लवण का निर्माण करता है।
    CaO + 2HCl → CaCl2 + H2O
    CaO + SiO2 \(\underrightarrow { \Delta } \) CaSiO3
    6CaO+P4O10 \(\underrightarrow { \Delta } \) 2Ca3 (PO4)2
    CaO+ SO2 → CaSO3
    7. कैल्सियम ऑक्साइड अमोनियम लवणों के साथ गर्म करने पर NH3 प्रदान करता है।
    CaO + 2NH4Cl → CaCl2 + 2NH3 + H2O
    8. कोक के साथ विद्युत भट्टी में 2273 – 3273K तक गर्म करने पर कैल्सियम कार्बाइड का निर्माण होता है।
    CaO + 3C \(\underrightarrow { { { 2273-3273{ K } } } } \) CaC2 + COउपयोग:
    1. यह प्राथमिक पदार्थ के रूप में बहुत उपयोगी होता है एवं क्षारों से सस्ता होता है।
    2. ऐल्कोहॉल तथा गैसों को सुखाने में।
    3. सोडालाइम, कैल्सियम, सीमेन्ट, काँच, रंजक तथा विरंजक चूर्ण आदि के निर्माण में।
    4. कास्टिक सोडा से सोडियम कार्बोनेट बनाने में।
    5. धातुकर्म में गालक के रूप में।
    6. भट्टियों में बेसिक अस्तर लगाने में।
    7. शर्करा के शुद्धिकरण में।
    8. मृदा की अम्लीयता दूर करने में।
  2. कैल्सियम कार्बोनेट:
    कैल्सियम कार्बोनेट प्रकृति में कई रूपों में पाया जाता है, जैसेचूना पत्थर (Lime Stone), खड़िया (Chalk) तथा संगमरमर (Marble) इत्यादि। कैल्सियम कार्बोनेट को चूने का पत्थर (lime stone) भी कहते हैं। यह प्रकृति में चॉक, संगमरमर, कैल्साइट के रूप में पाया जाता है। यह MgCO3 के साथ डोलोमाइट (CaCO3 + MgCO3) के रूप में मिलता है।
    विरचन:
    1. बुझे हुए चूने पर CO2 गैस प्रवाहित करने पर CaCO3 बनता है।
    Ca(OH)2 + CO2 → CaCO3 + H2O
    इस अभिक्रिया में कार्बन डाइऑक्साइड का आधिक्य नहीं होना चाहिए, क्योंकि इसकी अधिकता से जल विलेय, कैल्सियम हाइड्रोजन – कार्बोनेट Ca(HCO3)2 बन सकता है।
    2. कैल्सियम के किसी लवण की सोडियम, पोटैशियम या अमोनियम कार्बोनेट के साथ क्रिया से भी CaCO3 प्राप्त होता है।
    CaCl2 + Na2CO3 → CaCO3 + 2NaCl
    Ca(NO)2 + K2CO3 → CaCO3 + 2KNO3
    गुण:
    1. कैल्सियम कार्बोनेट सफेद चूर्ण होता है, जिसे 1200 K तक गर्म करने पर यह विघटित हो जाता है।
    RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 10 s-ब्लॉक तत्त्व img 17
    2. यह जल में लगभग अविलेय होता है।
    3. CO2 युक्त जल में विलेय होकर यह कैल्सियम हाइड्रोजन कार्बोनेट बनाता है।
    CaCO3 + H2O + CO2 → Ca(HCO3)2
    4. CaCO3 की तनु अम्लों के साथ क्रिया से CO2 गैस मुक्त होती है।
    CaCO3 + 2HCl → CaCl + H2O + CO2
    CaCO3 + H2SO4 → CaSO4 +H2O + CO2उपयोग:
    CaCO3 के महत्त्वपूर्ण उपयोग निम्नलिखित
    1. CaCO3 से पाउडर, टूथपेस्ट तथा चॉक का निर्माण किया जाता है।
    2. इसे संगमरमर के रूप में भवन तथा मूर्ति निर्माण में प्रयुक्त किया जाता है।
    3. यह सीमेन्ट, चूना, काँच आदि के निर्माण में भी प्रयुक्त होता है।
    4. इसको मैग्नीशियम कार्बोनेट के साथ लोहे जैसी धातुओं के निष्कर्षण में गालक (Flux) के रूप में प्रयुक्त किया जाता है।
    5. यह उच्च गुणवत्ता वाले कागज के निर्माण में भी प्रयुक्त होता है।
    6. CaCO3 च्यूइंगम का एक घटक होता है।
    7. यह सौन्दर्य प्रसाधनों में पूरक के रूप में प्रयुक्त होता है।
    8. CaCO3 को प्रति अम्ल (Ant acid) के रूप में भी प्रयुक्त किया जाता है।
  3. कैल्सियम हाइड्रॉक्साइड (बुझा चूना):
    विरचन:
    1. कैल्सियम हाइड्रॉक्साइड को CaO की जल से अभिक्रिया द्वारा बनाया जाता है। यह अभिक्रिया ऊष्माक्षेपी होती है। इसे बुझा हुआ चूना भी कहते हैं।
    CaO + H2O + Ca(OH)2
    2. CaCl2 की NaOH के साथ अभिक्रिया द्वारा भी इसे बनाया जा सकता है।
    CaCl2 + 2NaOH → Ca(OH)2 + 2NaCl
    गुणधर्म:
    1. कैल्सियम हाइड्रॉक्साइड एक श्वेत चूर्ण है, जो कि जल में आंशिक रूप से विलेय है। इसे 673K तक गर्म करने पर यह CaO में बदल जाता है।
    Ca(OH)2 \(\overrightarrow { \Delta } \) CaO + H2O
    2. Ca(OH)2 के जलीय निलम्बन (Suspension) को दूधिया चूना या चूने का दूध (Milk of Lime) कहते हैं, जिसका प्रयोग भवनों की सफेदी करने (White wash) में किया जाता है। चूने का जल में स्वच्छ विलयन, जिसमें चूने की मात्रा बहुत कम होती है, उसे चूने का पानी (Lime Water) कहते हैं।
    3. CO2 से क्रिया:
    चूने के पानी में CO2 गैस प्रवाहित करने पर CaCO3 बनने के कारण यह दूधिया हो जाता है लेकिन इसमें अधिक मात्रा में CO2 गैस प्रवाहित करने पर विलेय कैल्सियम हाइड्रोजन कार्बोनेट बनने के कारण दूधियापन गायब हो जाता है।
    RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 10 s-ब्लॉक तत्त्व img 18
    इस विलयन को गर्म करने पर पुनः कैल्सियम कार्बोनेट बन जाता है जिससे विलयन पुनः दूधिया हो जाता है।
    RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 10 s-ब्लॉक तत्त्व img 19
    इस अभिक्रिया का उपयोग CO32- मूलक के परीक्षण में किया जाता है।
    4. Cl2 से क्रिया:
    ठण्डे चूने के पानी पर Cl2 की क्रिया से कैल्सियम हाइपोक्लोराइट बनता है जो कि विरंजक चूर्ण का एक अवयव है।
    RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 10 s-ब्लॉक तत्त्व img 20
    लेकिन शुष्क Ca(OH)2 पर क्लोरीन गैस प्रवाहित करने पर विरंजक चूर्ण (Bleaching Powder) बनता है तथा गरम चूने के पानी पर Cl2 की क्रिया से CaCl2 तथा कैल्सियम क्लोरेट बनते हैं।
    RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 10 s-ब्लॉक तत्त्व img 21
    Uses:
    कैल्सियम हाइड्रॉक्साइड के मुख्य उपयोग निम्नलिखित हैं –
    1. वृहद स्तर पर चूना लेप (Mortar) के रूप में भवन निर्माण में।
    2. शर्करा के शोधन में।
    3. दीवारों पर सफेदी करने में क्योंकि यह रोगाणुनाशी है।
    4. काँच एवं विरंजक चूर्ण के निर्माण में।
    5. चमड़े की टैनिंग में।
    6. अम्लीय ऑक्साइडों के अवशोषण में।
  4. कैल्सियम सल्फेट प्लास्टर ऑफ पेरिस:
    परिचय:
    कैल्सियम सल्फेट प्रकृति में दो रूपों में पाया जाता है –
    अनार्दै (CasO4) तथा जलयोजित (CasO4.2H2O), जलयोजित अवस्था में इसे जिप्सम कहते हैं। इनके अतिरिक्त इसका एक रूप कैल्सियम सल्फेट अर्धहाइड्रेट (Hemihydrate) भी होता है। जिसे प्लास्टर ऑफ पेरिस कहते हैं।
    बनाने की विधियाँ:
    1. CaCl2 पर H2SO4 तथा Na2SO4 की क्रिया से CaSO4 बनता है।
    CaCl + H2SO4 → CaSO4 + 2HCl
    CaCl + Na2SO4 → CaSO4 + 2NaCl
    2. CaSO4.2H2O को 393K पर गरम करने से प्लास्टर ऑफ पेरिस बनता है।
    2(CaSO4.2H2O) \(\overrightarrow { \Delta } \) (CasO4)2H2O + 3H2O
    3. 393 K से उच्च ताप पर इसमें क्रिस्टलन जल नहीं बचता है तथा शुष्क कैल्सियम सल्फेट (CasO4) प्राप्त होता है, इसे ‘मृत तापित प्लास्टर’ (Dead Burnt Plaster) कहा जाता है। इसमें पानी मिलाने पर यह पुनः कठोर नहीं होता है।
    4. पर्याप्त मात्रा में जल मिलाने पर यह एक प्लास्टिक जैसा द्रव्य बनाता है, जो 5 से 15 मिनट में जमकर कठोर तथा ठोस हो जाता है।
    (CaSO4)2H2O + 3H2O → 2(CasO4.2H2O)
    गुण:
    जिप्सम, श्वेत क्रिस्टलीय ठोस पदार्थ है। यह जल में अल्प विलेय होता है। ताप बढ़ने के साथ – साथ इसकी जल में विलेयता बढ़ती है। यह तनु अम्लों में विलेय रहता है तथा द्विक लवण बनाता है। गर्म करने पर इसका विघटन हो जाता है।
    CaSO4 \(\underrightarrow { 673{ K } } \) CaO + SO3
    उपयोग:
    1. जिप्सम को प्लास्टर आफ पेरिस, सीमेन्ट तथा अमोनियम सल्फेट बनाने में उपयोग में लिया जाता है।
    2. प्लास्टर ऑफ पेरिस के उपयोग निम्नलिखित हैं –
    • मूर्तियाँ तथा खिलौने बनाने में।
    • दंत चिकित्सा में, दाँतों का सेट बनाने में।
    • भवन निर्माण में सजावट कार्य में।
    • टूटी हुई हड्डियों पर प्लास्टर चढ़ाने में।
  5. सीमेन्ट:
    सीमेन्ट एक महत्त्वपूर्ण भवन – निर्माण सामग्री है। इसका उपयोग सर्वप्रथम ब्रिटेन में 1824 में जोसेफ एस्पिडन ने किया था। इसे ‘पोर्टलैंड सीमेन्ट’ भी कहते हैं, क्योंकि यह ब्रिटेन के पोर्टलैंड टापू पर प्राप्त प्राकृतिक चूने के पत्थर के समान है।
    सीमेन्ट का बनाना:
    सीमेन्ट बनाने के लिए चूने के आधिक्य वाले पदार्थ, CaO को मिट्टी के साथ मिलाया जाता है। मिट्टी में SiO2, Al, Fe तथा Mg के ऑक्साइड उपस्थित होते हैं।
    मानक दशा में पोर्टलैण्ड सीमेन्ट का संगठन निम्न प्रकार होता है –
    CaO → 50 से 60%
    MgO → 2 से 3%
    SiO2 → 20 से 25%
    SO3 → 1 से 2%
    Al2O3 → 5 से 10%
    Fe2O3 → 1 से 2%
    एक अच्छी गुणवत्ता वाले सीमेन्ट में SiO2 तथा Al2O3 का अनुपात 2.5 से 4, CaO तथा अन्य ऑक्साइडों (SiO2,Al2O3 तथा  Fe2O3) का अनुपात लगभग 2 होना चाहिए। सीमेन्ट के निर्माण में कच्चे माल के रूप में चूने के पत्थर (Limestone) तथा चिकनी मिट्टी का प्रयोग किया जाता है। जब इन्हें तेजी से गरम करते हैं तो ये संगलित होकर अभिक्रिया करते हैं तथा सीमेन्ट क्लिंकर बनता है। इस क्लिंकर में 2 – 3% (भारात्मक) जिप्सम (CaSO4.2H2O) मिलाकर सीमेन्ट बनाया जाता है।
  6. इस प्रकार पोर्टलैंड सीमेन्ट के मुख्य घटक डाइकैल्सियम सिलिकेट (Ca2SiO4) 26%, ट्राइकैल्सियम सिलिकेट (Ca3SiO5) 51% तथा ट्राइकैल्सियम ऐलुमिनेट (Ca2Al2O6) 11% हैं।
    सीमेन्ट का जमना – जल मिलाने पर सीमेन्ट जमकर कठोर हो जाता है। इसका कारण घटक पदार्थों के अणुओं का जलयोजन तथा पुनः व्यवस्थित होना है। सीमेन्ट के जमने की प्रक्रिया को धीमा करने के लिए। ही इसमें जिप्सम मिलाया जाता है ताकि यह पूरी तरह ठोस हो सके।
    उपयोग:
    लोहा तथा स्टील के पश्चात् सीमेन्ट ही एक ऐसा पदार्थ है, जो किसी देश की उपयोगी वस्तुओं की श्रेणी में रखा जा सकता है। सीमेन्ट का उपयोग कंक्रीट (Concrete), प्रबलित कंक्रीट (Reinforced Concrete), प्लास्टरिंग, पुल – निर्माण तथा – भवन निर्माण इत्यादि में किया जाता है।

प्रश्न 39.
क्षार धातुओं के रासायनिक गुणों का वर्णन कीजिए तथा इनमें Li की आयनन ऊर्जा सर्वाधिक है फिर भी यह प्रबलतम अपचायक है, क्यों?
उत्तर:
क्षार धातुओं के रासायनिक गुण:
क्षार धातुओं के बड़े परमाणु आकार तथा निम्न आयनन एन्थैल्पी के कारण ये अत्यधिक क्रियाशील होती हैं तथा वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर इनकी क्रियाशीलता बढ़ती है क्योंकि परमाणु आकार बढ़ता है, अतः आयनन एन्थैल्पी का मान कम होता जाता है। क्षार धातुओं की वायु तथा नमी के साथ उच्च क्रियाशीलता के कारण इन्हें कैरोसिन में रखा जाता है।

  1. वायु के साथ अभिक्रिया:
    क्षार धातुएँ नम वायु में उपस्थित O2 तथा H2O से क्रिया करके ऑक्साइड तथा हाइड्रॉक्साइड बनाती हैं, जिनकी परत धातुओं पर जम जाती है। जिससे ये मलिन (Tarmish) हो जाती हैं। ये ऑक्सीजन से तेजी से क्रिया करके ऑक्साइड बनाती हैं। लीथियम और सोडियम क्रमशः मोनोऑक्साइड, Li2O (कुछ परॉक्साइड Li2O2) तथा परॉक्साइड, Na2O2 (कुछ सुपर ऑक्साइड) बनाती हैं, जबकि अन्य धातुएँ (K, Rb तथा Cs) सुपर ऑक्साइड बनाती हैं।
    4Li + O2 → 2Li2O (लीथियम मोनोऑक्साइड)
    2Na + O2 → Na2O2 (सोडियम परॉक्साइड)
    M + O2 → MO2 (सुपर ऑक्साइड)
    (M = K, Rb तथा Cs) सुपर ऑक्साइडों में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन उपस्थित होता है अतः ये अनुचुम्बकीय तथा रंगीन होते हैं। Li+ आयन का आकार छोटा होने के कारण छोटे ऐनायन, एवं O2–, के साथ संयुक्त होकर स्थायी आयनिक आबंध बना लेता है जबकि K, Rb+ तथा Cs+ आयन का आकार बड़ा होने के कारण बड़े ऐनायन एवं O2–, के साथ सुपर ऑक्साइड बनाता है। इस प्रकार सभी क्षारीय धातुओं में सुपर ऑक्साइड बनाने की प्रवृत्ति धातु आयनों का आकार बढ़ने के साथ – साथ बढ़ती जाती है। इसे जालक ऊर्जा प्रभाव (Lattice energy effect) कहते हैं।
    (i) धन विद्युती गुण बढ़ने के साथ – साथ ऑक्साइडों का क्षारीय गुण तथा तापीय स्थायित्व बढ़ता जाता है।
    (ii) परऑक्साइडों में [- O – O -]2- आयन होता है इसी कारण ये प्रतिचुम्बकीय तथा प्रबल ऑक्सीकारक गुण प्रदर्शित करते हैं।
    (iii) सुपर ऑक्साइडों में [O2–] आयन होता है, इसलिए ये अयुग्मित इलेक्ट्रॉन की उपस्थिति के कारण अनुचुम्बकीय तथा रंगीन (LiO2, NaO2– पीला, KO2– नारंगी, RbO2–भूरा तथा CsO2– नारंगी) होते हैं।
    (iv) लीथियम वायु में उपस्थित नाइट्रोजन से अभिक्रिया करके आयनिक नाइट्राइड (Li3N) बनाता है।
    इस प्रकार लीथियम का व्यवहार अन्य क्षार धातुओं से भिन्न है। Li3N को उच्च ताप पर गर्म करने पर यह अपने तत्त्वों में अपघटित हो। जाता है तथा जल अपघटन से अमोनिया एवं लीथियम हाइड्रॉक्साइड देता है।
    Li3N + 3H2O → 3LiOH + NH3
    क्षार धातुओं को वायु एवं जल के प्रति अति क्रियाशील होने के कारण सामान्यतया इन्हें कैरोसीन में रखा जाता है।
  2. जल के साथ क्रियाशीलता:
    क्षार धातुएँ जल एवं अन्य अम्लीय हाइड्रोजन परमाणु युक्त यौगिकों (एल्कोहल, गैसीय अमोनिया, ऐल्काइन आदि) के साथ क्रिया करके हाइड्रोजन गैस प्रदान करती हैं।
    2Na + 2H2O → 2NaOH + H2
    2Na + 2HX → 2NaX+ H2 (X = हैलोजन)
    2Na + 2CH ≡ CH → 2NaC ≡ CH + H2
    2M + 2H2O → 2M+ + 2OH– + H2
    M = (Li, Na, K, Rb, Cs)
    जैसे –
    2Na + 2H2O → 2Na + OH– + H2
    यद्यपि लीथियम के मानक इलेक्ट्रॉड विभव (E⊝) का मान उच्चतम ऋणात्मक होता है, लेकिन इसकी जल के साथ क्रिया सोडियम की तुलना में धीमी होती है, जबकि सोडियम के मानक इलेक्ट्रॉड विभव का मान अन्य क्षार धातुओं की अपेक्षा कम ऋणात्मक होता है। लीथियम के इस व्यवहार का कारण इसका छोय आकार तथा अधिक जलयोजन ऊर्जा का होना है। सोडियम तथा पोटैशियम की जल के साथ अभिक्रिया तेजी से होती है एवं Rb तथा Cs की अभिक्रिया तो इतनी तेज होती है कि विस्फोट होता है।
  3. ऑक्साइडों की क्षारीय प्रकृति:
    क्षार धातुओं के ऑक्साइड जल द्वारा अपघटित होने पर हाइड्राक्साइड देते हैं।
    RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 10 s-ब्लॉक तत्त्व img 22
    प्रबल क्षार इनके हाइड्रॉक्साइड प्रबल क्षार होते हैं। Na, K, Rb तथा Cs के हाइड्रॉक्साइड जल में अत्यधिक विलेयशील तथा माप के प्रति स्थायी होते हैं। जबकि लीथियम हाइड्रॉक्साइड जल में बहुत कम विलेय होते हैं एवं गर्म करने पर तीव्रता से अपघटित हो जाते हैं।
    2LiOH → Li2O+ H2O
    क्षार धातुओं के हाइड्रॉक्साइडों की क्षारीय प्रकृति वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर बढ़ती जाती है, क्योंकि आयनन ऊर्जाओं में कमी के कारण क्षार धातु तथा हाइड्रॉक्साइड आयन के मध्य आबंध कमजोर हो जाता है। जिससे विलयन में OH– आयन सान्द्रता बढ़ जाती है।
  4. डाई हाइड्रोजन से क्रियाशीलता:
    क्षार धातुएँ लगभग 673K ताप पर हाइड्रोजन के साथ क्रिया करके हाइड्राइड बनाती हैं। लेकिन लीथियम की क्रियाशीलता कम होने के कारण इसके लिए 1073K ताप की आवश्यकता होती है।
    2M+ H2 → 2M+H–
    M = Li, Na, K
    ये हाइड्राइड ठोस, आयनिक तथा प्रबल अपचायक होते हैं। इनके गलनांक भी उच्च होते हैं। इन हाइड्राइडों के तापीय स्थायित्व का क्रम निम्न प्रकार होता है
    LiH > NaH > KH > RbH > CsH
  5. हैलोजन के साथ अभिक्रिया:
    क्षार धातुएँ हैलोजनों के साथ तेजी से अभिक्रिया करके हैलाइड बनाती हैं जो कि आयनिक होते हैं। लेकिन लीथियम हैलाइड में आंशिक सहसंयोजी लक्षण होता है।
    2M + X2 → 2M+X–
    लीथियम हैलाइड में सहसंयोजी लक्षण होने का कारण लीथियम की उच्च ध्रुवण क्षमता है क्योंकि Li+ के छोटे आकार के कारण इसकी ध्रुवण क्षमता अधिक होती है। लीथियम के हैलाइडों में LiI का सहसंयोजक गुण सर्वाधिक होता है क्योंकि I– के बड़े आकार के कारण यह आसानी से ध्रुवित हो जाता है।
    क्षार धातु हैलाइडों में सहसंयोजक गुण निम्न प्रकार से है –
    LiCl > NaCl > KCI > RbCl > CsCl
    Lil > LiBr > LiCl > LiF
    क्षार धातु हैलाइड उच्च गलनांक व क्वथनांक (उच्च जालक ऊर्जा के कारण) वाले रंगहीन, क्रिस्टलीय ठोस पदार्थ हैं। इन हैलाइडों को ऑक्साइड, हाइड्रॉक्साइड या कार्बोनेट की HX के साथ अभिक्रिया करके बनाया जाता है। इस प्रकार प्राप्त हैलाइडों की संभवन एन्थैल्पी उच्च ऋणात्मक होती है। क्षार धातुओं के फ्लुओराइडों की संभवन ऊर्जा ΔHf0 का मान वर्ग के रूप में नीचे की ओर बढ़ने पर कम ऋणात्मक होता जाता है। अतः क्षार धातु फ्लुओराइड सबसे अधिक स्थायित्व को प्रदर्शित करते हैं।
    फ्लुओराइड की संभवन ऊर्जा के ऋणात्मक मान Li से Cs तक जाने पर कम होते जाते हैं। अतः इनके स्थायित्व का क्रम निम्न प्रकार से होता है
    LiF > NaF > KF > RbF > CsF
    सभी क्षार धातु हैलाइड जल में विलयशील होते हैं। जल में LiF की निम्न विलेयता इसकी उच्च जालक ऊर्जा के कारण तथा CSI की निम्न विलेयता Cs+ तथा I– की निम्न जलयोजन ऊर्जा के कारण होती है। लीथियम के अन्य हैलाइड एथेनॉल, ऐसीटोन तथा एथिल ऐसीटेट में विलेय होते हैं।
  6. द्रव अमोनिया में विलेयता:
    क्षार धातुएँ द्रव NH3 में विलेय होती हैं, तथा इस विलयन का रंग गहरा नीला होता है। यह विलयन विद्युत का सुचालक होता है, जिसका कारण मुक्त इलेक्ट्रॉन है। क्षार धातुओं की द्रव NH3 में विलेयता का कारण आयनों तथा इलेक्ट्रॉनों का विलायकन है।
    M + (x + y)NH3 → [M(NH3)x]+ + [e(NH3)y]–
    इस विलयन का नीला रंग अमोनीकृत इलेक्ट्रॉनों के कारण होता है। ये इलेक्ट्रॉन प्रकाश के दृश्य क्षेत्र की ऊर्जा का अवशोषण करके विलयन को नीला रंग प्रदान करते हैं। यह विलयन अनुचुम्बकीय प्रकृति का होता है क्योंकि इसमें स्वतन्त्र (अमोनीकृत) इलेक्ट्रॉन उपस्थित होते हैं। इस विलयन को कुछ समय तक पड़े रहने पर ऐमाइड बनते हैं तथा हाइड्रोजन गैस मुक्त होती है।
    RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 10 s-ब्लॉक तत्त्व img 23
    (यहाँ ‘am’ अमोनीकृत विलयन को दर्शाता है।)
    क्षार धातुओं के अमोनिया में विलयन की सान्द्रता बढ़ाने पर नीला रंग, ब्रॉन्ज रंग में परिवर्तित हो जाता है तथा विलयन अनुचुम्बकीय से प्रतिचुम्बकीय हो जाता है।
  7. ऑक्सो – अम्लों के लवण:
    वे अम्ल जिनमें अम्लीय प्रोटोन से युक्त हाइड्रॉक्सिल समूह (OH) तथा ऑक्सो समूह (= O) एक ही परमाणु से जुड़े होते हैं, उन्हें ऑक्सो अम्ल कहते हैं, जैसे – कार्बोनिक अम्ल H2CO3 [OC(OH)2], सल्फ्यूरिक अम्ल H2SO4 [O2S(OH)2] इत्यादि।
    क्षार धातुएँ सभी ऑक्सो अम्लों के साथ लवण बनाती हैं। ये सामान्यतः जल में विलेय होते हैं तथा ताप के प्रति स्थायी होते हैं। इनके कार्बोनेट (M2CO3) तथा हाइड्रोजन कार्बोनेटों (MHCO3) का तापीय स्थायित्व अधिक होता है एवं वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर स्थायित्व बढ़ता है। लेकिन ठोस LiHCO3 का अस्तित्व नहीं होता है।
  8. धातु कार्बोनेटों को स्थायित्व तथा विलेयता:
    क्षार धातु कार्बोनेट उच्च ताप पर भी स्थायी होते हैं लेकिन लीथियम कार्बोनेट का स्थायित्व अपेक्षाकृत कम होता है क्योंकि Li+ के छोटे आकार के कारण यह बड़े ऋणायन CO32- का ध्रुवण कर देता है। अतः इसको गर्म करने पर यह अपघटित होकर ऑक्साइड देता है।
    Li2CO3 \(\overrightarrow { \Delta } \) Li2O + CO2
    वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर कार्बोनेटों का स्थायित्व बढ़ता है, जिसका कारण धातु आयन के आयनिक विभव का कम होना है।
    RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 10 s-ब्लॉक तत्त्व img 24
    वर्ग में धनायन की त्रिज्या बढ़ती है जिससे आयनिक विभव का मान कम होता है। अतः धातु आयन की कार्बोनेट आयन में से ऑक्साइड आयन को आकर्षित करने की क्षमता कम हो जाती है अर्थात् CO32- का ध्रुवण नहीं हो पाता है इसलिए धातु कार्बोनेट का विघटन नहीं होता है। प्रथम समूह के तत्त्वों के कार्बोनेट जल में विलेय होते हैं (Li2CO3 के अलावा) तथा वर्ग में विलेयता बढ़ती है।
  9. नाइट्रेटों को स्थायित्व तथा विलेयता:
    क्षार धातु नाइट्रेटों को गर्म करने पर ये नाइट्राइट तथा ऑक्सीजन देते हैं।
    2NaNO3 \(\overrightarrow { \Delta } \) 2NaNO2 + O2
    2KNO3 \(\underrightarrow { \Delta } \) 2KNO2 + O2
    लेकिन लीथियम नाइट्रेट को गरम करने पर यह Li2O देता है।
    4LiNO3 → 2Li2O + 4NO2 + O2
    क्षार धातु नाइट्रेट जल में विलेय होते हैं तथा वर्ग में नीचे जाने पर विलेयता बढ़ती है।
  10. सल्फेटों को स्थायित्व तथा विलेयता:
    क्षार धातुओं के सल्फेट स्थायी होते हैं। तथा ये जल में विलेय होते हैं। वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर सल्फेटों की विलेयता बढ़ती है।
    क्षार धातुओं के यौगिकों के सामान्य अभिलक्षण –
    क्षार धातुओं के अधिकांश यौगिक आयनिक होते हैं। इनमें से कुछ मुख्य यौगिकों के सामान्य अभिलक्षण निम्नलिखित हैं –
    ऑक्साइड एवं हाइड्रॉक्साइड:
    क्षार धातुओं का वायु के आधिक्य के साथ दहन करने पर Li, मुख्य रूप से मोनोऑक्साइड, Li2O (कुछ परॉक्साइड), Na, परॉक्साइड Na2O2 (कुछ सुपर ऑक्साइड) बनाते हैं जबकि K, Rb तथा Cs सुपर ऑक्साइड (MO2) बनाते हैं। विभिन्न प्रकार के ऑक्साइडों के स्थायित्व का क्रम निम्न प्रकार होता है –
    सामान्य ऑक्साइड > परॉक्साइड > सुपर ऑक्साइड
    शुद्ध अवस्था में सामान्य ऑक्साइड तथा परॉक्साइड रंगहीन श्वेत क्रिस्टलीय ठोस होते हैं लेकिन सुपर ऑक्साइड पीले या नारंगी होते हैं। सुपर ऑक्साइडों में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन उपस्थित होने के कारण ये अनुचुम्बकीय होते हैं तथा Na2O2 (सोडियम परॉक्साइड) ऑक्सीकारक होता है। प्रथम वर्ग की सभी धातुओं के ऑक्साइड क्षारीय होते हैं तथा वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर इनका क्षारीय गुण बढ़ता है क्योंकि M – O बन्ध की आयनिक प्रकृति बढ़ने के कारण M+ तथा O2- आसानी से बनते हैं जिससे इनकी OH– देने की प्रवृत्ति बढ़ती है।
    ऑक्साइडों की जल से अभिक्रिया:
    सभी प्रकार के क्षार धातु ऑक्साइड जल से अभिक्रिया करके हाइड्रॉक्साइड बनाते हैं।
    सामान्य ऑक्साइड –
    M2O + H2O → 2M+ + 2OH–
    परॉक्साइड –
    M2O2 + 2H2O → 2M+ + 2OH– + H2O
    सुपर ऑक्साइड
    2MO2 + 2H2O → 2M+ + 2OH– + H2O2 + O2
    ये हाइड्रॉक्साइड धातुओं की जल के साथ अभिक्रिया द्वारा भी बनते हैं। क्षार धातुओं के हाइड्रॉक्साइड प्रबल क्षार होते हैं तथा ये जले में आसानी से घुल जाते हैं जिसका कारण तीव्र जलयोजन है। इस प्रक्रम में ऊष्मा उत्सर्जित होती है तथा वर्ग में हाइड्रॉक्साइडों की विलेयता बढ़ती है। ऑक्साइडों के समान क्षार धातु हाइड्रॉक्साइडों का क्षारीय गुण भी वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर बढ़ता है क्योंकि धातु की आयनन एन्थैल्पी का मान कम होने से OH आयन बनाने की प्रवृत्ति बढ़ती है।
    अतः इन हाइड्रॉक्साइडों के क्षारीय गुण का क्रम निम्न प्रकार होता है –
    LiOH < NaOH < KOH < RbOH < CsOH
    हाइड्रॉक्साइडों का तापीय स्थायित्व भी वर्ग में बढ़ता है।
    हैलाइड (Halides):
    क्षार धातुएँ, हैलोजनों के साथ क्रिया करके MX प्रकार के हैलाइड बनाती हैं।
    2M + X2 → 2M+X–
    इन हैलाइडों को उपयुक्त ऑक्साइड, हाइड्रॉक्साइड या कार्बोनेट की हाइड्रोहेलिक अम्ल (HX) के साथ अभिक्रिया द्वारा भी बनाया जा सकता है। सभी हैलाइडों की संभवन एन्थैल्पी (ΔfH⊝) का मान उच्च ऋणात्मक होता है। क्षार धातुओं के फ्लुओराइडों की संभवन एन्थैल्पी का मान वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर कम ऋणात्मक होता जाता है, जबकि अन्य हैलाइडों के लिए इसका विपरीत होता है। लेकिन किसी धातु के लिए संभवन एन्थैल्पी का मान फ्लुओराइड से आयोडाइड तक कम ऋणात्मक होता जाता है।
    ये हैलाइड उच्च गलनांक युक्त रंगहीन, क्रिस्टलीय ठोस होते हैं। तथा सामान्यतः ये आयनिक होते हैं लेकिन धनायन का आकार कम होने तथा ऋणायन का आकार बढ़ने पर इनमें सहसंयोजी गुण आता है। इन हैलाइडों के गलनांक तथा क्वथनांक का सामान्य क्रम निम्न प्रकार होता है –
    MF > MCI > MBr > MI
    क्षार धातुओं के सभी हैलाइड जल में विलेय होते हैं लेकिन LiF की जल में विलेयता कम होती है, क्योंकि इसकी जालक ऊर्जा उच्च होती है। इसी प्रकार CsI की जल में विलेयता भी कम होती है क्योंकि Cs+ तथा I– के बड़े आकार के कारण जलयोजन ऊर्जा का मान कम होता है। लीथियम के अन्य हैलाइड कार्बनिक विलायकों जैसे एथेनॉल, ऐसीटोन तथा एथिल ऐसीटेट में विलेय होते हैं क्योंकि ये सहसंयोजक होते हैं। अतः क्षार धातु हैलाइडों की जल में विलेयता का क्रम निम्न प्रकार होता है –
    LiF < LICI < LiBr < Lil
    LiF < NaF < KF < RbF < CsF
    LiCl, जल से क्रिया करके (जल अपघटन) LiOH तथा HCl देता है जबकि अन्य क्षार धातु हैलाइडों का जल अपघटन कम होता है।
    LiCl + H2O → LiOH + HCl

प्रश्न 40.
वर्ग I के निम्नलिखित यौगिकों की तुलना वर्ग II के संगत यौगिकों में विलेयता एवं तापीय स्थायित्व के आधार पर कीजिए –

  1. नाइट्रेट
  2. सल्फेट
  3. कार्बोनेट।

उत्तर:

  1. नाइट्रेट:
    क्षार धातु नाइट्रेटों को गर्म करने पर ये नाइट्राइट तथा ऑक्सीजन देते हैं।
    2NaNO3 \(\overrightarrow { \Delta } \) 2NaNO2+ O2
    2KNO3 \(\underrightarrow { \Delta } \) 2KNO2 + O2
    लेकिन लीथियम नाइट्रेट को गरम करने पर यह Li2O देता है।
    4LiNO3 → 2Li2O + 4NO2 + O2
    क्षार धातु नाइट्रेट जल में विलेय होते हैं तथा वर्ग में नीचे जाने पर विलेयता बढ़ती है।

    1. सल्फेट:
      क्षार धातुओं के सल्फेट स्थायी होते हैं। तथा ये जल में विलेय होते हैं। वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर सल्फेटों की विलेयता बढ़ती है।
      क्षार धातुओं के यौगिकों के सामान्य अभिलक्षण –
      क्षार धातुओं के अधिकांश यौगिक आयनिक होते हैं। इनमें से कुछ मुख्य यौगिकों के सामान्य अभिलक्षण निम्नलिखित हैं –
      ऑक्साइड एवं हाइड्रॉक्साइड:
      क्षार धातुओं का वायु के आधिक्य के साथ दहन करने पर Li, मुख्य रूप से मोनोऑक्साइड, Li2O (कुछ परॉक्साइड), Na, परॉक्साइड Na2O2 (कुछ सुपर ऑक्साइड) बनाते हैं जबकि K, Rb तथा Cs सुपर ऑक्साइड (MO2) बनाते हैं। विभिन्न प्रकार के ऑक्साइडों के स्थायित्व का क्रम निम्न प्रकार होता है –
      सामान्य ऑक्साइड > परॉक्साइड > सुपर ऑक्साइड
      शुद्ध अवस्था में सामान्य ऑक्साइड तथा परॉक्साइड रंगहीन श्वेत क्रिस्टलीय ठोस होते हैं लेकिन सुपर ऑक्साइड पीले या नारंगी होते हैं। सुपर ऑक्साइडों में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन उपस्थित होने के कारण ये अनुचुम्बकीय होते हैं तथा Na2O2 (सोडियम परॉक्साइड) ऑक्सीकारक होता है। प्रथम वर्ग की सभी धातुओं के ऑक्साइड क्षारीय होते हैं तथा वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर इनका क्षारीय गुण बढ़ता है क्योंकि M – O बन्ध की आयनिक प्रकृति बढ़ने के कारण M+ तथा O2- आसानी से बनते हैं जिससे इनकी OH– देने की प्रवृत्ति बढ़ती है।
      ऑक्साइडों की जल से अभिक्रिया:
      सभी प्रकार के क्षार धातु ऑक्साइड जल से अभिक्रिया करके हाइड्रॉक्साइड बनाते हैं।
      सामान्य ऑक्साइड –
      M2O + H2O → 2M+ + 2OH–
      परॉक्साइड –
      M2O2 + 2H2O → 2M+ + 2OH– + H2O
      सुपर ऑक्साइड
      2MO2 + 2H2O → 2M+ + 2OH– + H2O2 + O2
      ये हाइड्रॉक्साइड धातुओं की जल के साथ अभिक्रिया द्वारा भी बनते हैं। क्षार धातुओं के हाइड्रॉक्साइड प्रबल क्षार होते हैं तथा ये जले में आसानी से घुल जाते हैं जिसका कारण तीव्र जलयोजन है। इस प्रक्रम में ऊष्मा उत्सर्जित होती है तथा वर्ग में हाइड्रॉक्साइडों की विलेयता बढ़ती है। ऑक्साइडों के समान क्षार धातु हाइड्रॉक्साइडों का क्षारीय गुण भी वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर बढ़ता है क्योंकि धातु की आयनन एन्थैल्पी का मान कम होने से OH आयन बनाने की प्रवृत्ति बढ़ती है।
      अतः इन हाइड्रॉक्साइडों के क्षारीय गुण का क्रम निम्न प्रकार होता है –
      LiOH < NaOH < KOH < RbOH < CsOH
      हाइड्रॉक्साइडों का तापीय स्थायित्व भी वर्ग में बढ़ता है।
      हैलाइड (Halides):
      क्षार धातुएँ, हैलोजनों के साथ क्रिया करके MX प्रकार के हैलाइड बनाती हैं।
      2M + X2 → 2M+X–
      इन हैलाइडों को उपयुक्त ऑक्साइड, हाइड्रॉक्साइड या कार्बोनेट की हाइड्रोहेलिक अम्ल (HX) के साथ अभिक्रिया द्वारा भी बनाया जा सकता है। सभी हैलाइडों की संभवन एन्थैल्पी (ΔfH⊝) का मान उच्च ऋणात्मक होता है। क्षार धातुओं के फ्लुओराइडों की संभवन एन्थैल्पी का मान वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर कम ऋणात्मक होता जाता है, जबकि अन्य हैलाइडों के लिए इसका विपरीत होता है। लेकिन किसी धातु के लिए संभवन एन्थैल्पी का मान फ्लुओराइड से आयोडाइड तक कम ऋणात्मक होता जाता है।
      ये हैलाइड उच्च गलनांक युक्त रंगहीन, क्रिस्टलीय ठोस होते हैं। तथा सामान्यतः ये आयनिक होते हैं लेकिन धनायन का आकार कम होने तथा ऋणायन का आकार बढ़ने पर इनमें सहसंयोजी गुण आता है। इन हैलाइडों के गलनांक तथा क्वथनांक का सामान्य क्रम निम्न प्रकार होता है –
      MF > MCI > MBr > MI
      क्षार धातुओं के सभी हैलाइड जल में विलेय होते हैं लेकिन LiF की जल में विलेयता कम होती है, क्योंकि इसकी जालक ऊर्जा उच्च होती है। इसी प्रकार CsI की जल में विलेयता भी कम होती है क्योंकि Cs+ तथा I– के बड़े आकार के कारण जलयोजन ऊर्जा का मान कम होता है। लीथियम के अन्य हैलाइड कार्बनिक विलायकों जैसे एथेनॉल, ऐसीटोन तथा एथिल ऐसीटेट में विलेय होते हैं क्योंकि ये सहसंयोजक होते हैं। अतः क्षार धातु हैलाइडों की जल में विलेयता का क्रम निम्न प्रकार होता है –
      LiF < LICI < LiBr < Lil
      LiF < NaF < KF < RbF < CsF
      LiCl, जल से क्रिया करके (जल अपघटन) LiOH तथा HCl देता है जबकि अन्य क्षार धातु हैलाइडों का जल अपघटन कम होता है।
      LiCl + H2O → LiOH + HCl
  2. कार्बोनेट:
    क्षार धातु कार्बोनेट उच्च ताप पर भी स्थायी होते हैं लेकिन लीथियम कार्बोनेट का स्थायित्व अपेक्षाकृत कम होता है क्योंकि Li+ के छोटे आकार के कारण यह बड़े ऋणायन CO32- का ध्रुवण कर देता है। अतः इसको गर्म करने पर यह अपघटित होकर ऑक्साइड देता है।
    Li2CO3 \(\overrightarrow { \Delta } \) Li2O + CO2
    वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर कार्बोनेटों का स्थायित्व बढ़ता है, जिसका कारण धातु आयन के आयनिक विभव का कम होना है।
    RBSE Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 10 s-ब्लॉक तत्त्व img 25
    वर्ग में धनायन की त्रिज्या बढ़ती है जिससे आयनिक विभव का मान कम होता है। अतः धातु आयन की कार्बोनेट आयन में से ऑक्साइड आयन को आकर्षित करने की क्षमता कम हो जाती है अर्थात् CO32- का ध्रुवण नहीं हो पाता है इसलिए धातु कार्बोनेट का विघटन नहीं होता है। प्रथम समूह के तत्त्वों के कार्बोनेट जल में विलेय होते हैं (Li2CO3 के अलावा) तथा वर्ग में विलेयता बढ़ती है।

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