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RBSE Solutions for Class 12 Biology Chapter 25 मानव का उत्सर्जन तंत्र

June 19, 2019 by Safia Leave a Comment

Rajasthan Board RBSE Class 12 Biology Chapter 25 मानव का उत्सर्जन तंत्र

RBSE Class 12 Biology Chapter 25 पाठ्य पुस्तक के प्रश्न एवं उत्तर

RBSE Class 12 Biology Chapter 25 बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मानव में मुख्य उत्सर्जी पदार्थ होते हैं-
(अ) यूरिक अम्ल
(ब) अमोनिया
(स) यूरिया
(द) ऐमीनो अम्ल
उत्तर:
(स) यूरिया

प्रश्न 2.
मानव का मुख्य उत्सर्जी अंग है-
(अ) फेफड़े
(ब) वृक्क
(स) त्वचा
(द) यकृत
उत्तर:
(ब) वृक्क

RBSE Solutions for Class 12 Biology Chapter 25 मानव का उत्सर्जन तंत्र

प्रश्न 3.
हेनले के लूप में होता है-
(अ) मूत्र
(ब) यूरिया
(स) रुधिर
(द) ग्लोमेरुलर निस्वंद
उत्तर:
(द) ग्लोमेरुलर निस्वंद

प्रश्न 4.
बरटिनी के वृक्क स्तम्भ का सम्बन्ध होता है-
(अ) वृक्क से
(ब) मूत्राशय से
(स) यकृत से
(द) वृषण से
उत्तर:
(अ) वृक्क से

प्रश्न 5.
मानव के वृक्क होते हैं-
(अ) प्रोवेक्रिक।
(ब) मेटानेफ्रिक
(ब) मीसोनेफ्रिक
(द) सभी प्रकार के
उत्तर:
(ब) मेटानेफ्रिक

प्रश्न 6.
परानिस्पंदन कहाँ होता है-
(अ) केशिका गुच्छ
(ब) बोमेन सम्पुट
(स) मूत्राशय
(द) रुधिर वाहिनी
उत्तर:
(अ) केशिका गुच्छ

RBSE Solutions for Class 12 Biology Chapter 25 मानव का उत्सर्जन तंत्र

प्रश्न 7.
ग्लोमेरुलर निस्पंद होता है-
(अ) जल, अमोनिया तथा रुधिराणु का मिश्रण
(ब) रुधिराणु एवं प्लाज्मा प्रोटीन रहित रुधिर
(स) रुधिराणु रहित रुधिर
(द) मूत्र
उत्तर:
(द) मूत्र

प्रश्न 8.
ग्लोमेरुलस में रुधिर लाने वाली वाहिनी कहलाती है-
(अ) अपवाही धमनिका
(ब) वृक्कीय धमनी
(स) अभिवाही धमनिका
(द) वृक्कीय शिरा
उत्तर:
(स) अभिवाही धमनिका

RBSE Class 12 Biology Chapter 25 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
उत्सर्जन किसे कहते हैं ?
उत्तर:
शरीर के भीतर प्रोटीन के अपचय (Catabolism) के परिणाम स्वरूप उत्पन्न अमोनिया, यूरिया और यूरिक अम्ल आदि हानिकारक वर्थ्य पदार्थों को उत्सर्जी अंगों द्वारा शरीर से बाहर निष्कासित करने की क्रिया उत्सर्जन (Excretion) कहलाती है।

प्रश्न 2.
अमोनिया उत्सर्जी प्राणियों को क्या कहते हैं ?
उत्तर:
अमोनिया उत्सर्जी प्राणियों को अमोनोटेलिक (Ammonotelic) कहते हैं।

प्रश्न 3.
यूरिक अम्ल का उत्सर्जन करने वाले प्राणियों को क्या कहते हैं ?
उत्तर:
यूरिक अम्ल का उत्सर्जन करने वाले प्राणियों को यूरिकोटेलिक (Uricotelic) कहते हैं।

प्रश्न 4.
परानियंदन किसे कहते हैं ?
उत्तर:
केशिकागुच्छ की रुधिर कोशिकाओं से उत्सर्जी और अन्य उपयोगी पदार्थों को छनकर बोमन सम्पुट की गुहा में जाने की क्रिया परानियंदन (Ultrafiltration) कहलाती है।

प्रश्न 5.
मानव के वृक्क में उत्सर्जन की इकाई का नाम लिखिए।
उत्तर:
मानव वृक्क की उत्सर्जन इकाई/कार्यात्मक इकाई का नाम नेफ्रॉन है।

RBSE Solutions for Class 12 Biology Chapter 25 मानव का उत्सर्जन तंत्र

प्रश्न 6.
वृक्क के केशिका गुच्छ से निकलने वाली रुधिर वाहिनी का नाम लिखिए।
उत्तर:
वृक्क के केशिकागुच्छ से निकलने वाली रुधिरवाहिनी का नाम अपवाही धमनिका (Efferent arteriole) है।

प्रश्न 7.
मूत्र त्याग के समय दर्द की अवस्था को क्या कहते हैं ?
उत्तर:
मूत्र त्याग के समय दर्द की अवस्था को डिसयूरिया (Disurea) कहते हैं।

प्रश्न 8.
केशिकागुच्छ कहाँ पाया जाता है ? इसका प्रमुख कार्य क्या है ?
उत्तर:
केशिकागुच्छ (Glomerulus) बोमन सम्पुट की गुहा में पाया जाता है। इसका प्रमुख कार्य निस्यंदन की क्रिया को सम्पन्न करने में सहायता करना है।

प्रश्न 9.
मैल्पीघीकाय किसे कहते हैं ?
उत्तर:
प्रत्येक वृक्क नलिका का अग्रभाग मैल्पीघीकाय कहलाता है।

प्रश्न 10.
हेनले लूप कहाँ पाया जाता है ?
उत्तर:
हेनले लूप वृक्क नलिका के बीच का और समीपस्थ नलिका के पीछे स्थित पतला व ‘U’ आकृति का नालाकार भाग होता है। .

प्रश्न 11.
बर्टिनी के स्तम्भ किन्हें कहते हैं ?
उत्तर:
वल्कुट (Cortex) के वल्कुटीय भाग के कुछ सँकरे उभार मध्यांश (Medulla) के बाहरी भाग में धंसे रहते हैं। इन्हें ही बर्टिनी के स्तम्भ (Renal columns of Bertini) कहते हैं।

प्रश्न 12.
शरीर में वृक्कों का मुख्य कार्य बताइए।
उत्तर:
वृक्कों का मुख्य कार्य मूत्र निर्माण करना है।

प्रश्न 13.
रक्त अपोहन क्या है ?
उत्तर:
यूरिया व अन्य अपशिष्ट पदार्थों को शरीर से बाहर निकालने के लिए कृत्रिम वृक्कीय युक्ति को अपनाना रक्त अपोहन (Haemodialysis) कहा जाता है।

RBSE Solutions for Class 12 Biology Chapter 25 मानव का उत्सर्जन तंत्र

प्रश्न 14.
रक्त में यूरिया की उपस्थिति को क्या कहते हैं ?
उत्तर:
रक्त में यूरिया की उपस्थिति को यूरेमिया (Uremia) कहते

प्रश्न 15.
ग्लाइकोसूरिया किसे कहते हैं ?
उत्तर:
मूत्र में शर्करा की उपस्थिति व उत्सर्जन ग्लाइकोसूरिया (Glycosurea) कहलाता है। यह एक ऐसा ऐरा जो इन्सुलिन हार्मोन की कमी से होता है।

RBSE Class 12 Biology Chapter 25 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
मानव के वृक्क के अलावा अन्य उत्सर्जी अंग कौन-कौन से हैं ? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मनुष्य के अन्य उत्सर्जी अंगों का विवरण निम्नलिखित है-

  • त्वचा (Skin)-मनुष्य की त्वचा में अवस्थित स्वेद ग्रन्थियों द्वारा पसीने के साथ अतिरिक्त जल और कुछ नाइट्रोजनी उत्सर्जी पदार्थों को शरीर से बाहर निष्कासित किया जाता है।
  • फेफड़े (Lungs)-कोशिकीय श्वसन के परिणामस्वरूप निर्मित CO2 उत्सर्जी पदार्थ है। इसको श्वसन क्रिया द्वारा शरीर से निष्कासित किया जाता है।
  • यकृत (Liver)-इसकी कोशिकाएँ शरीर में जरूरत से अधिक एमीनो अम्लों में नाइट्रोजनी भाग को अमोनिया में एवं अमोनिया को कम हानिकारक यूरिया में बदलकर मूत्र के रूप में बाहर त्याग करने में मदद करती हैं। यकृत द्वारा ही पित्त वर्णकों का निर्माण किया जाता है।

प्रश्न 2.
गॉउट रोग क्या है ?
उत्तर:
गॉउट रोग-गॉउट (Gout) आनुवंशिक रोग है। इस रोग में रुधिर में यूरिक अम्ल की मात्रा अधिक हो जाती है। यूरिक अम्ल युक्त रुधिर संधियों एवं वृक्क ऊतकों में जमा हो जाता है। यह रोग निर्जलीकरण, उपवास और डाईयूरेटिक से बढ़ता है।

प्रश्न 3.
ब्राइट का रोग को समझाइए।
उत्तर:
ब्राइट का रोग (Bright’s Disease)-यह रोग केशिकागुच्छ में स्ट्रेप्टोकोकाई जीवाणु के संक्रमण के कारण उत्पन्न होता है। इसके कारण ग्लोमेरुलस में सूजन आ जाती है और इसकी झिल्लियाँ अधिक पारगम्य हो जाने से रक्ताणु (RBCs) और प्रोटीन भी छनकर नियंद में आ जाते हैं। उपयुक्त समय पर इस रोग का इलाज न होने पर टाँगें फूल जाती हैं। इस दशा को एडीमा या ड्राप्सी (Edema or Dropsy) कहते हैं।

प्रश्न 4.
परानिस्पंदन तथा चयनात्मक पुनः अवशोषण की मूत्र निर्माण में क्या भूमिका है ?
उत्तर:
परानिस्पंदन की मूत्र निर्माण में भूमिका-परानियंदन की मूत्र निर्माण में अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका होती है। केशिकागुच्छ में जितना रक्त प्रवेश करता है, उतना बाहर नहीं निकल पाता जिसके कारण रुधिर दाब बढ़ जाता है। अधिक दाब के कारण प्रोटीन और रुधिर कणिकाओं को छोड़कर रुधिर का अधिकांश भाग केशिकागुच्छ की पतली भित्ति से छनकर बोमेन सम्पुट के अन्दर आ जाता है। इस छने हुए द्रव में यूरिया, यूरिक अम्ल, ग्लूकोज, जल व अनेक लवण आदि होते हैं।

इस छने हुए तरल को ग्लोमेरुलर फिल्ट्रेट (Glomerular filtrate) या नेफ्रिक निस्पंद (Nephric filtrate) कहते हैं और इस प्रकार छनने की प्रक्रिया को परानियंदन (Ultrafiltration) कहते हैं। चयनात्मक पुनः अवशोषण की मूत्र निर्माण में भूमिका-केशिका गुच्छ में छना हुआ द्रव धीरे-धीरे वृक्क नलिका के समीपस्थ भाग, हेनले लूप व दूरस्थ कुण्डलित नलिका में पहुँचता है। यहाँ तक पहुँचते-पहुँचते कई रासायनिक परिवर्तनों के परिणामस्वरूप मूत्र का निर्माण होता है। इस प्रकार मूत्र निर्माण में चयनात्मक पुनः अवशोषण की भूमिका अत्यन्त महत्वपूर्ण है।

RBSE Solutions for Class 12 Biology Chapter 25 मानव का उत्सर्जन तंत्र

प्रश्न 5.
वृक्क प्रत्यारोपण से आप क्या समझते हैं ? संक्षेप में समझाइए।
उत्तर:
वृक्क प्रत्यारोपण-जब रोगग्रस्त मनुष्य में वृक्क पूरी तरह कार्य करना बन्द कर देते हैं तो इनका उपचार सम्भव नहीं हो पाता। ऐसी स्थिति में एकमात्र विकल्प दूसरे स्वस्थ व्यक्ति का वृक्क कार्य करना बन्द कर चुके वृक्कों के स्थान पर लगाना होता है। वृक्क परिवर्तन की इस क्रिया को ही वृक्क प्रत्यारोपण कहते हैं।

RBSE Class 12 Biology Chapter 25 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
मानव के उत्सर्जन तन्त्र का सचित्र वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मानव का उत्सर्जन तन्त्र-मानव के प्रमुख उत्सर्जी अंग वृक्क होते हैं। वृक्कों के अलावा मूत्रवाहिनी, मूत्राशय और मूत्र मार्ग भी उत्सर्जन क्रिया को सम्पन्न करते हैं।

वृक्क (Kidney)-मनुष्य में एक जोड़ी वृक्क पाये जाते हैं। ये उदरगुहा के पृष्ठ भाग में कशेरुक दण्ड के दोनों ओर स्थित होते हैं। दाहिना वृक्क बायें वृक्क से थोड़ा-सा आगे स्थित होता है। दोनों वृक्क एक महीन पेरिटोनियम झिल्लीनुमा वलन के माध्यम से उदरगुहा की पृष्ठ भित्ति से जुड़े रहते हैं। वृक्क का निर्माण भ्रूणीय मीसोडर्म से होता है। मानव वृक्क पश्चवृक्क अथवा मेटानेफ्रिक प्रकार के होते हैं। मनुष्य के वृक्क गहरे लाल रंग और सेम की बीज जैसी आकृति के होते हैं। मनुष्य का प्रत्येक वृक्क लगभग 10-11 सेमी. लम्बा, 5-6 सेमी. चौड़ा, 2.5-3 सेमी. मोटा और लगभग 120-170 ग्राम वजनीय होता है। वृक्क का बाहरी तल उत्तल (Convex) और भीतरी तल अवतल (Concave) होता है। अवतल सतह की तरफ एक गड्ढे जैसी संरचना होती है जिसे वृक्क नाभि या हाइलम (Hilum) कहा जाता है। हाइलम वाले हिस्से से वृक्क धमनी (Renal artery) और तन्त्रिका (Nerve) वृक्क में प्रवेश करती है। वृक्क शिरा (Renal vein), लसिका वाहिनी (Lymph duct) एवं मूत्रवाहिनी (Ureter) वृक्क से बाहर निकलती हैं। वृक्क के ऊपरी हिस्से को अधिवृक्क (Adrenal) ग्रन्थि, जो कि अन्त:स्रावी ग्रन्थि है, टोपीनुमा आकार में ढके रहती है।
RBSE Solutions for Class 12 Biology Chapter 25 मानव का उत्सर्जन तंत्र 1

RBSE Solutions for Class 12 Biology Chapter 25 मानव का उत्सर्जन तंत्र

मूत्र वाहिनियाँ (Ureters)-यह प्रत्येक वृक्क की नाभि (Hilum) से निकलती है। यह पेशीय भित्ति से निर्मित, लम्बी और सँकरी नलिका होती है। इसका वृक्क में स्थित प्रारम्भिक भाग चौड़ा और कीपनुमा होता है। इसको वृक्क श्रोणि (Pelvis) कहते हैं। पेल्विस से शुरू होकर दोनों मूत्र वाहिनियाँ नीचे की ओर जाकर मूत्राशय में खुलती हैं। मूत्र वाहिनियों की भित्ति मोटी और पेशीय होती है। पेशियाँ वाहिनियों में मूत्र को आगे बढ़ाने के लिए क्रमाकुंचक तरंगें पैदा करती हैं।
RBSE Solutions for Class 12 Biology Chapter 25 मानव का उत्सर्जन तंत्र 2

RBSE Solutions for Class 12 Biology Chapter 25 मानव का उत्सर्जन तंत्र

मूत्राशय (Urinary Bladder)-यह एक थैले के समान पेशीय संरचना होती है। मूत्राशय में मूत्र का स्थाई रूप से संग्रह होता है। मूत्राशय की भित्ति में तीन स्तर पाये जाते हैं-

  • बाह्यस्तर-यह पेरीटोनियम का सीरोसा स्तर होता है।
  • मध्य स्तर-यह अरेखित पेशी का स्तर होता है।
  • आन्तरिक स्तर-यह श्लेष्मिक स्तर होता है।

मूत्राशय का आकार शंकुरूपी होता है। इसका ऊपरी भाग चौड़ा तथा निचला भाग सँकरा होता है। सँकरा भाग एक छिद्र के माध्यम से मूत्रजनन मार्ग (Urethra) में खुलता है। इस छिद्र में अरेखित पेशी से निर्मित अवरोधनी (Sphincter) पायी जाती है। नर में मूत्राशय मलाशय (Rectum) से आगे और मादा में योनि (Vagina) के ऊपर अवस्थित होता है। मूत्राशय में 700-800 मिली. मूत्र का संग्रह होता है।

मूत्रमार्ग (Urethra)-मूत्राशय की ग्रीवा से निकलने वाली पतली नलिका को मूत्रमार्ग (Urethra) कहते हैं। मूत्र मार्ग द्वारा ही मूत्र शरीर से बाहर निकलता है। मूत्र मार्ग पर अवरोधनी पेशी शिथिल हो जाती है। इसके कारण मूत्र आसानी से बाहर निकल जाता है। पुरुषों में मूत्रमार्ग लगभग 15 सेमी. लम्बा होता है। यह शिश्न से होकर गुजरता है। स्त्रियों में मूत्रमार्ग लगभग 4 सेमी. लम्बा होता है।

नर में मूत्रमार्ग तीन भागों से निर्मित होता है, जिसका विवरण निम्नलिखित है-
(a) प्रोस्टेट भाग या यूरिथल भाग (Prostatic or Urethral Part)-इसकी लम्बाई 2.5 सेमी. होती है। यह प्रोस्टेट ग्रन्थि (Prostate Gland) के बीच से गुजरता है। दोनों शुक्रवाहिनियाँ इसी भाग में खुलती हैं।

(b) झिल्लीनुमा भाग (Membranous Part)-प्रोस्टेट ग्रन्थि और शिश्न के बीच का यह छोटा भाग होता है।

(c) शिश्नी भाग (Penile Part)-यह लगभग 15 सेमी. लम्बा मार्ग है। यह शिश्न (Penis) के कार्पस स्पंजियोसम (Corpus spongiosum) से निकलकर शिश्न मुण्ड के ऊपरी छोर पर बाह्य मूत्र छिद्र के रूप में बाहर खुलता है।

RBSE Solutions for Class 12 Biology Chapter 25 मानव का उत्सर्जन तंत्र

प्रश्न 2.
मानव वृक्क नलिका की कार्यात्मक आन्तरिकी का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
संकेत-उपर्युक्त प्रश्न के उत्तर के लिए-

वृक्क नलिकाएँ या नेफ्रॉन की संरचना (Structure of Uriniferous Tubule or Nephron)
वृक्क नलिकाएँ वृक्क की संरचनात्मक व क्रियात्मक इकाइयाँ हैं। मनुष्य के प्रत्येक वृक्क में सामान्यतया 10-12 लाख महीन, लम्बी और कुण्डलित नलिकाएँ पायी जाती हैं, जिन्हें वृक्क नलिका या नेफ्रान कहा जाता है। इनमें मूत्र का निर्माण होता है। मूत्र में नाइट्रोजनी पदार्थ घुले रहते हैं।

मानव शरीर में पायी जाने वाली प्रत्येक वृक्क नलिका निम्नलिखित हिस्सों में विभक्त होती है-

  • मैल्पीघी काय (Malpighion body)
  • ग्रीवा (Neck)
  • समीपस्थ कुण्डलित नलिका (Proximal convoluted tubule)
  • हेनले का लूप (Henle’s Loop)
  • दूरस्थ कुण्डलित नलिका (Distal convoluted tubule)
  • संग्रह नलिकाएँ (Collecting tubules)

मैल्पीघी काय (Malpighion Body)
प्रत्येक वृक्क नलिका का अगला हिस्सा मैल्पीघीकाय कहा जाता है। यह दो भागों में विभक्त होता है-
RBSE Solutions for Class 12 Biology Chapter 25 मानव का उत्सर्जन तंत्र 3

RBSE Solutions for Class 12 Biology Chapter 25 मानव का उत्सर्जन तंत्र

(a) बोमन सम्पुट (Bowman’s Capsule)-इसकी संरचना प्यालेनुमा होती है। इसी में केशिकागुच्छ धंसा रहता है। इसकी भित्ति महीन तथा द्विस्तरीय होती है। बोमन सम्पुट के स्तर शल्की उपकला से निर्मित होते हैं। इनकी भीतरी सतह पर विशेष प्रकार की कोशिकाएँ पायी जाती हैं। इन्हें पदाणु या पोडोसाइट्स (Podocytes) कहते हैं। पोडोसाइट्स के प्रवर्ध और रुधिर केशिकाओं की भित्तियाँ परस्पर मिलकर महीन ग्लोमेरुलस कला का निर्माण करती हैं। इस कला अथवा झिल्ली में अनेकानेक सूक्ष्म छिद्र (Fenestra) पाये जाते हैं। इन्हीं के कारण यह झिल्ली अधिक पारगम्य होती है।
RBSE Solutions for Class 12 Biology Chapter 25 मानव का उत्सर्जन तंत्र 4

RBSE Solutions for Class 12 Biology Chapter 25 मानव का उत्सर्जन तंत्र

(b) केशिका गुच्छ (Glomerulus)-केशिका गुच्छ बोमन सम्पुट की गुहा में पाया जाता है। केशिकागुच्छ में रुधिर लाने का कार्य वृक्क धमनी की अभिवाही धमनिका (Afferent arteriole) करती है। अपवाही धमनिका (Efferent arteriole) केशिकागुच्छ से रुधिर को बाहर ले जाती है। अभिवाही धमनिका 50 शाखाओं में बँटकर केशिकागुच्छ का निर्माण करती है। अभिवाही धमनिका का व्यास अपवाही धमनिका की तुलना में अधिक होता है। कोशिकाओं की भित्ति अथवा दीवार एण्डोथिलियम से निर्मित होती है। इस भित्ति में 500 से 1000 A व्यास के रंध्र पाये जाते हैं। बोमन सम्पुट की एपिथिलियम एवं रुधिर कोशिकाओं की एण्डोथिलियम संयुक्त होकर नियंदन स्तर का कार्य सम्पन्न करती हैं।

संग्रह नलिकाएँ (Collecting Tubules) वृक्क नलिका की दूरस्थ कुण्डलित नलिका संग्रह नलिका में खुलती है। प्रत्येक संग्रह नलिका में अनेक वृक्क नलिकाएँ खुलती हैं। अनेक संग्रह नलिकाएँ संयुक्त होकर एक मोटी प्रमुख संग्रह नलिका को निर्मित करती हैं। इस नलिका को बेलिनाई की वाहिनी (Duct of Bellini) कहते हैं। ये नलिकाएँ वृक्क श्रोणि (Pelvis) में खुलती हैं। पेल्विस मूत्रवाहिनी का चौड़ा कीपनुमा भाग होता है। ये नलिकाएँ वृक्क के पिरैमिड में अवस्थित होती हैं एवं एक स्तरीय ग्रन्थिल उपकला द्वारा आस्तरित होती हैं।

प्रश्न 3.
मानव के अन्य उत्सर्जी अंगों का वर्णन करो।
उत्तर:
संकेत-उपर्युक्त प्रश्न के उत्तर के लिए-

मानव के अन्य उत्सर्जी अंग (Other Excretory Organs in Human)
मनुष्य के अन्य उत्सर्जी अंगों का विवरण निम्नलिखित है-

(i) त्वचा (Skin)-मनुष्य की त्वचा में अवस्थित स्वेद ग्रन्थियों द्वारा पसीने के साथ अतिरिक्त जल और कुछ नाइट्रोजनी उत्सर्जी पदार्थों को शरीर से बाहर निष्कासित किया जाता है।

(ii) फेफड़े (Lungs)-कोशिकीय श्वसन के परिणामस्वरूप निर्मित CO2 उत्सर्जी पदार्थ है। इसको श्वसन क्रिया द्वारा शरीर से निष्कासित किया जाता है।

(iii) यकृत (Liver)-इसकी कोशिकाएँ शरीर में जरूरत से अधिक एमीनो अम्लों में नाइट्रोजनी भाग को अमोनिया में एवं अमोनिया को कम हानिकारक यूरिया में बदलकर मूत्र के रूप में बाहर त्याग करने में मदद करती हैं। यकृत द्वारा ही पित्त वर्णकों का निर्माण किया जाता है।

RBSE Solutions for Class 12 Biology Chapter 25 मानव का उत्सर्जन तंत्र

प्रश्न 4.
उत्सर्जन सम्बन्धी विभिन्न रोगों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
संकेत-उपर्युक्त प्रश्न के उत्तर के लिए-

उत्सर्जन सम्बन्धी रोग (Disorders Related to Excretion)
मानव में उत्सर्जन सम्बन्धी विभिन्न रोगों का विवरण निम्नलिखित है-

  • यूरेमिया (Uremia)-यह रोग तब उत्पन्न होता है जब रक्त में यूरिया की मात्रा 10-30 mg/100 ml से अधिक हो जाती है। रक्त में अधिक यूरिया के एकत्रित होने से रोगी व्यक्ति की मृत्यु भी हो सकती है।
  • गॉउट (Gout)-गॉउट आनुवंशिक (Heriditary) रोग है। इसमें रक्त में यूरिक अम्ल की मात्रा अधिक हो जाती है। यूरिक अम्ल संधियों और वृक्क ऊतकों में जमा हो जाता है। गॉउट निर्जलीकरण, उपवास और डाईयूरेटिक के कारण बढ़ता है।
  • वृक्कपथरी (Kidney stones)-इस स्थिति में वृक्क श्रोणि (Renal Pelvis) में यूरिक अम्ल के क्रिस्टल, कैल्सियम के आक्जेलेट, फॉस्फेट लवण इत्यादि पथरी के रूप में जमा हो जाते हैं। इसके कारण रोगी को मूत्र त्याग में बाधा आती है तथा दर्द होता है।
  • ब्राइट का रोग या नेफ्रिटिस (Bright’s Disease or Nephritis)-यह रोग केशिकागुच्छ (ग्लोमेरुलस) में स्ट्रेटोकोकाई जीवाणु के संक्रमण से उत्पन्न होता है। इस रोग के कारण केशिकागुच्छ अथवा ग्लोमेरुलस में सूजन आ जाती है। झिल्लियाँ अधिक पारगम्य होने से रक्ताणु (RBC) और प्रोटीन भी छनकर निस्वंद में आ जाते हैं। यदि नेफ्रेटिस का समय पर इलाज न किया जाय तो ऊतकों में तरल जमा हो जाने के कारण टाँगें फूल जाती हैं। इस दशा को एडीमा या ड्रोप्सी (Edema or Dropsy) कहा जाता है।
  • ग्लाइकोसूरिया (Glycosuria)-मूत्र में शर्करा की उपस्थिति होना और इसके उत्सर्जन की क्रिया ग्लाइकोसूरिया कहलाता है। यह रोग इंसुलिन की कमी के कारण उत्पन्न होता है। रोग की यह अवस्था डाइबिटीज मैलिटस कहलाती है।
  • डिसयूरिया (Disurea)-मूत्र विसर्जन के समय दर्द होने की दशा को डिसयूरिया कहा जाता है।
  • पोलीयूरिया (Polyurea)-इस रोग को बहुमूत्रता भी कहा जाता है। यह नेफ्रॉन के द्वारा जल का पुनः अवशोषण न होने पाने से मूत्र का आयतन बढ़ने की अवस्था है।
  • सिस्टिटिस (Cystitis)-इस रोग में जीवाणु के संक्रमण, रासायनिक अथवा यान्त्रिक क्षति के कारण मूत्राशय में सूजन आ जाती
  • डायबिटीज इन्सिपिडस (Diabetes Insipidus)ऐण्टीडाईयूरेटिक हार्मोन (ADH) के अल्प श्रावण से दूरस्थ कुण्डलित नलिका में जल का अवशोषण नहीं हो पाता है जिसके कारण मूत्र का आयतन बढ़ जाता है। इस कारण रोगी बार-बार अधिक मात्रा में मूत्र को त्याग करता है।
  • ओलीगोयूरिया (Oligourea)-यह ऐसा रोग है जिसमें मूत्र की मात्रा सामान्य से बहुत कम बनती है।
  • प्रोटीन्यूरिया (Proteinurea)-मूत्र में प्रोटीन की मात्रा सामान्य से ज्यादा होना प्रोटीन्यूरिया कहलाता है।
  • एल्ब्यूमिनयूरिया (Albuminurea)-इस रोग के कारण मूत्र में एल्ब्यूमिन प्रोटीन की मात्रा बढ़ जाती है।
  • कीटोन्यूरिया (Ketonuria)-मूत्र में कीटोनकाय जैसे-ऐसीटो ऐसीटिक अम्ल आदि की मात्रा का बढ़ना कीटोन्यूरिया कहलाता है।
  • हीमेटोयूरिया (Haematourea)-मूत्र के साथ लाल रुधिर कणिकाओं (RBCs) का शरीर से बाहर निकलना हीमेटोयूरिया कहलाता
  • हीमोग्लोबिन यूरिया (Haemoglobin urea)-मूत्र में हीमोग्लोबिन का विद्यमान होना हीमोग्लोबिन यूरिया कहलाता है।
  • पाइयूरिया (Pyurea)-मूत्र में मवाद कोशिकाओं (Pus cell) की उपस्थिति पाइयूरिया कहलाता है।
  • पीलिया (Jaundice)-मूत्र में पित्त वर्णकों का अत्यधिक मात्रा में पाया जाना पीलिया कहलाता है। यह सामान्यतया हिपेटाइटिस अथवा पित्त नलिका में रुकावट के समय दिखाई देता है।
  • एल्कैप्टोन्यूरिया (Alcaptonurea)-मूत्र में एल्कैप्टोन अथवा होमोजेन्टीसिक अम्ल की उपस्थिति एल्कैप्टोन्यूरिया कहलाता है। जब एल्कैप्टोन वायु के सम्पर्क में आता है तो मूत्र काले रंग का दिखाई देता है। इसे कृष्ण मूत्र रोग (Black urine disease) भी कहते हैं।

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