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RBSE Solutions for Class 9 Hindi प्रबोधिनी Chapter 10 कैलाश मानसरोवर यात्रा

May 21, 2019 by Safia Leave a Comment

Rajasthan Board RBSE Class 9 Hindi प्रबोधिनी Chapter 10 कैलाश मानसरोवर यात्रा

RBSE Class 9 Hindi प्रबोधिनी Chapter 10 पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

RBSE Class 9 Hindi प्रबोधिनी Chapter 10 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
विदेश में हिन्दी बोलने वाला लड़का कहाँ का था
(क) तिब्बत
(ख) नेपाल
(ग) भारत
(घ) चीन
उत्तर:
(क) तिब्बत

प्रश्न 2.
तिब्बती मक्खनवाली चाय किस पशु के दूध के मक्खन से बनाई जाती है ?
(क) गाय के
(ख) याक के
(ग) भैंस के
(घ) बकरी के
उत्तर:
(ख) याक के।

RBSE Class 9 Hindi प्रबोधिनी Chapter 10 अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 3.
लेखक को फिर नाश्ते में क्या-क्या मिला था ?
उत्तर:
लेखक को नाश्ते में तली मूंगफली, रस-जैम, चाय, साबूदाने के पापड़ और मिली-जुली सब्जी मिली।

प्रश्न 4.
तकलाकोट से अगला पड़ाव कौन-सा था ?
उत्तर:
तकलाकोट से अगला पड़ाव तारचेन था।

प्रश्न 5.
लोक मान्यता के अनुसार मानसरोवर की खोज किसने की थी ?
उत्तर:
लोक मान्यता के अनुसार महाराज मान्धाता ने मानसरोवर की खोज की थी।

RBSE Class 9 Hindi प्रबोधिनी Chapter 10 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 6.
विदेश में अपनी मातृभाषा के दो शब्द सुनकर मन के तार क्यों झनझना जाते हैं ?
उत्तर:
विदेश में लोग वहीं की भाषा बोलते हैं। जब वहाँ हमें कोई व्यक्ति अपनी मातृभाषा बोलता मिलता है, तो अत्यन्त प्रसन्नता होती है। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी मातृभाषा प्रिय होती है। विदेश में जब किसी से अपनी मातृभाषा के दो शब्द सुनाई देते हैं तो प्रसन्नता से मन झंकृत हो उठता है।

प्रश्न 7.
राक्षस ताल को रावण ह्रद क्यों कहते हैं ?
उत्तर:
मानसरोवर के पास ही राक्षस ताल है। उसको रावण ह्रद भी कहते हैं। लोकमान्यता के अनुसार राक्षसों का राजा रावण कैलाश को लंका ले जा रहा था। मार्ग में वह लघुशंका के लिए रुका। उसी से जो तालाब बना उसे राक्षस ताल कहा गया। रावण से सम्बन्धित होने के कारण यह रावण हृद भी कहा जाता है। यह जल अपवित्र तथा आचमन और पूजा के अयोग्य माना जाता है।

प्रश्न 8.
मानसरोवर का वर्णन किन-किन आदि ग्रन्थों में मिलता है ?
उत्तर:
मानसरोवर का वर्णन भारत के संस्कृत भाषा के आदि ग्रन्थों में मिलता है। रामायण, महाभारत तथा सभी पुराणों में इसका वर्णन पाया जाता है। स्कन्द पुराण में विशेषतः इसका वर्णन पाया जाता है। पाली भाषा के बौद्ध ग्रन्थों में भी मानसरोवर का वर्णन पाया जाता है। प्राचीन संस्कृत साहित्य के वाणभट्ट रचित कादम्बरी, कालिदास रचित रघुवंशम् तथा कुमारसम्भवम् में भी इसका वर्णन मिलता है।

प्रश्न 9.
मानसरोवर की भौगोलिक स्थिति समझाइए।
उत्तर:
मानसरोवर हिमालय के कैलाश शिखर के निकट तिब्बत के पठारी प्रदेश में स्थित है। इसके उत्तर में कैलाश शिखर है तथा दक्षिण में गुरला मान्धाता पर्वत है। इसके पश्चिम में राक्षस ताल है। मानसरोवर समुद्र तल से 14,950 फीट ऊँचाई पर स्थित है। इसका व्यास 54 मील तथा क्षेत्रफल 200 वर्गमील है। इसकी गहराई 300 फीट है।

RBSE Class 9 Hindi प्रबोधिनी Chapter 10 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 10.
मानसरोवर के सौन्दर्य का वर्णन करते हुए इसके माहात्म्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
मानसरोवर हिमालय के तिब्बती पठार में स्थित मानव इतिहास की सर्वप्रथम ज्ञात झील है। यह समुद्र तल से 14,950 फीट ऊँचाई पर स्थित है तथा इसका क्षेत्रफल 200 वर्गमील है। यह 300 फीट गहरी है। मानसरोवर का जल आकाश के समान ही नीले रंग का है। यह पता नहीं चल पाता कि कहाँ सरोवर का अन्त है और कहाँ आकाश शुरू हो रहा है। इसका पानी अत्यन्त निर्मल है। उसके तल के पत्थर दूर से दिखाई दे जाते हैं। इसमें समुद्र के समान लहरें उठती रहती हैं। इसका पानी अत्यन्त मीठा है। मानसरोवर के तट पर रंगीन फूलों वाली घास है, जिस पर रखने पर पैर धंसने लगते हैं।

मानसरोवर का वर्णन संस्कृत के प्राचीन ग्रन्थों तथा पुराणों में मिलता है। इस सरोवर को अत्यन्त पवित्र माना गया है। स्कन्द पुराणों में इसका विशेष वर्णन मिलता है। शिव पुराण में कहा गया है कि इसमें स्नान करने से पूर्वजों को मुक्ति प्राप्त होती है। इसके निकट ही कैलाश पर्वत स्थित है। इसको शिवजी का स्थान माना जाता है। लोग मानसरोवर में स्नान करके कैलाश के दर्शन करते हैं। मानसरोवर प्राकृतिक दृष्टि से तो सुन्दर है ही, धार्मिक तथा आध्यात्मिक दृष्टि से भी इसका बहुत महत्व है। बौद्ध ग्रन्थों में इसको अनोतप्त अथवा अनवतप्त कहते हैं। इसका अर्थ है कि मानसरोवर समस्त पापों और कष्टों से मुक्ति दिलाने वाला है।

प्रश्न 11.
“आज तो खजाना लुटाने का मन था।” लेखक की इस अनुभूति को सकारण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्राचीनकाल में राजा-महाराजा तथा सम्पन्न लोग खुशी के मौके पर खूब दान-दक्षिणा देते थे। राजा लोग अपने खजाने के दरवाजे जरूरतमंदों के लिए खोल देते थे। लेखक जब मानसरोवर पहुँचा और उस सुन्दर झील के दर्शन किए, तो उसका मन उल्लास से भर उठा। उसको लगा कि उस दिन उसकी मुंहमॉगी मुराद पूरी हो गई थी। उसने मानसरोवर के दर्शन किए उसके मधुर जल का आचमन किया और फिर उसमें स्नान भी किया। इससे उसके मन को आध्यात्मिक सन्तुष्टि प्राप्त किए। मानसरोवर के साथ ही उसको पवित्र कैलाश पर्वत पर ज्योतिस्वरूप शिवलिंग के भी दर्शन प्राप्त हुए।

इससे उसकी मनोकामना की पूर्ति हुई। मानसरोवर के प्राकृतिक सौन्दर्य को देखकर भी वह अभिभूत हो गया। उसको मन परम प्रसन्नता से भर गया। मानसरोवर और कैलाश के दर्शन होने के बाद उसके मन में कोई इच्छा बाकी नहीं रही थी। इसको देखकर उसे ईश्वर के साक्षात् दर्शन का सुख मिल रहा था। इस प्रकार मानसरोवर पहुँचकर लेखक को भौतिक और आध्यात्मिक सुखों की प्राप्ति हुई थी। उसका मन परम आनन्द की भावना से भर उठा था। अत: उसका मन हो रहा था कि वह इस अवसर पर वह खजाना लुटा दे।

RBSE Class 9 Hindi प्रबोधिनी Chapter 10 अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

RBSE Class 9 Hindi प्रबोधिनी Chapter 10 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
बस की खिड़की से दिखाई दिए पर्वत के बारे में गाइड ने क्या बताया ?
उत्तर:
गाइड ने बताया कि वह गुरला मान्धाता पर्वत था। यह बात प्रसिद्ध थी कि महाराजा मान्धाता ने मानसरोवर की खोज की थी। उनके ही नाम पर उस पर्वत को गुरला मान्धाता पर्वत कहा जाता है।

प्रश्न 2.
मान्धाता पर्वत के आगे का यात्रा-मार्ग किस तरह का था ?
उत्तर:
वह क्षेत्र एकदम मैदानी था। वह पहाड़ी क्षेत्र से भिन्न था तथा पठारी प्रदेश था। वह ऊँचाई पर स्थित रेगिस्तानी मैदान जैसा था। वहाँ छोटी टीले जैसी पहाड़ियाँ और छोटे-छोटे टीले थे।

प्रश्न 3.
‘राक्षस ताल’ को ‘रावण हृद’ क्यों कहते हैं ?
उत्तर:
लंकाधिपति रावण ने राक्षस ताल बनवाया था। इस कारण उस ताल को राक्षस ताल कहते हैं।

प्रश्न 4.
राक्षस ताल को अपावन मानने का क्या कारण
उत्तर:
इसका निर्माण शुद्ध जल से नहीं, रावण द्वारा लघुशंका करने से हुआ है। अतः इसको अपावन माना जाता है।

प्रश्न 5.
‘कैलाश मानसरोवर-यात्रा’ आपकी दृष्टि में कैसी रचना है ?
उत्तर:
‘कैलाश मानसरोवर-यात्रा’ ‘यात्रा वृत्तान्त’ के नाम से जानी जाने वाली एक गद्य-विधा है।

RBSE Class 9 Hindi प्रबोधिनी Chapter 10 लघूत्तरात्मक प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
टेम्पा कौन था ? उसका संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर:
लेखक से तकलाकोट के गेस्ट हाउस में हिन्दी में बात करने वाला लड़का टेम्पा था। वह तिब्बती था। वह देहरादून में पला और बड़ा हुआ था। एक बार वह चुपचाप अपने रिश्तेदारों से मिलने तिब्बत पहुँचा। घर वापस होते समय पकड़ा गया। किसी तरह छूटा तो तकलाकोट में ही बस गया, वहीं शादी कर ली। वह लेखक को अपने घर ले गया और उत्साहपूर्वक उसको तिब्बती मक्खनवाली चाय पिलाई।

प्रश्न 2.
एच. सी. बराई और एच. एच. हैडन की पुस्तक में मानसरोवर के बारे में क्या कहा गया है ?
उत्तर:
एच. सी. बराई और एच. एच. हैडन की पुस्तक में मानसरोवर को मानव सभ्यता की सबसे प्राचीन ज्ञात झील कहा गया है। भूगोलविदों की जानकारी में आने वाली मानसरोवर सबसे पहली झील है। यह तिब्बत में स्थित है। तिब्बती लोग इसे ‘त्सो मावांग’ या त्सो माफांग’ कहते हैं।

प्रश्न 3.
मानसरोवर तट पर पहुँचने पर लेखक को क्या अनुभव हुआ ?
उत्तर:
मानसरोवर के तट पर पहुँचा तो लेखक को लगा कि वह किसी दूसरे लोक में आ गया है। विस्तृत नीले आकाश के नीचे स्वच्छ जल की विशाल नीले रंग की जलराशि उसके सामने बिखरी थी। उसके तट पर फूलों वाली घास उगी हुई थी। सूर्य की किरणें परावर्तित होकर सूर्य के अनेक प्रतिबिम्ब जल में बना रही थीं। जलराशि में लहरें बार-बार उठ रही थीं। सम्पूर्ण दृश्य अतीव मनोहर था।

प्रश्न 4.
कैलाश दर्शन के पश्चात् लेखक की जो मनोदशा हुई उसको अपने शब्दों में प्रकट कीजिए।
उत्तर:
मानसरोवर में स्नान के बाद लेखक पहाड़ी के ऊपर फैले मैदान के कोने पर पहुँचा। ठीक सामने ज्योतिरूप शिवलिंग के आकार का हिमखण्ड दिखाई दिया। वह एकमात्र अत्यन्त ऊँचा, शुभ्र आभामय शिखर था। उसको दण्डवत प्रणाम कर सब चुप बैठ गए। लेखक का मन श्रद्धा और प्रेम से भर उठा। वह मौन बैठा था। दिलीप सिंघवी उससे गले मिले। उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे। गला सँध गया था।

RBSE Class 9 Hindi प्रबोधिनी Chapter 10 निबन्धात्मक प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
मानसरोवर के तट पर पहुँचते ही यात्रियों के हृदयों में भावुकता, भक्ति और आस्था की त्रिवेणी लहरी उठी।’ इस कथन पर पाठ के आधार पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
मानसरोवर के तट पर पहुँचते ही सभी यात्री वहाँ के मनमोहक प्राकृतिक सौन्दर्य को देखकर सुध-बुध खो बैठे। ठण्ड को भूलकर, डॉ. अनिल और उनकी धर्मपत्नी का अनुकरण करते हुए स्नान के लिए सरोवर में उतर गए। डॉ. अनिल को तो अपनी सात पीढ़ियों के उद्धार का पूर्ण विश्वास हो गया। मानस में स्नान करके सूर्यदेव को अर्घ्य दिया, गायत्री तथा महामृत्युंजय मंत्रों का जप किया और कपड़े बदलकर सामने पहाड़ी पर दौड़ लिए। कैलाश दर्शन की घड़ी सामने देख लेखक अत्यन्त भावुक हो उठा। उस समय लेखक ने जो चाहा था वही उसे मिल गया।

उसका मन हो रहा था कि अगर उसके पास कोई खजाना होता तो वह उसे वहीं लुटा देता। 15 पिनट भाड़ी पड़ गए। पहाड़ के ऊपर स्थित मैदान के किनारे पहुँचते ही उन्हें सामने ज्योतिर्मय शिवलिंग के आकार का हिमखंड दिखाई दिया जो था तो बहुत दूर पर भगवान शिव के प्रति आत्मिक लगाव के कारण बहुत पास ही प्रतीत हो रहा था। नीले आकाश के नीचे वहाँ दूर तक कुछ नहीं था केवल वही अत्यन्त ऊँचा शिखर अपनी श्वेत आभा बिखेर रहा था। लगता था जैसे ज्यातिर्मय स्वरूप में स्वयं भगवान शिव ही बिराजे हों। सब अवाक् होकर उस भव्य दृश्य को देखे जा रहे थे। सभी भक्ति भाव से नमन करके वहीं बैठ गये। लेखक के लिए वह अनुभव साक्षात् शिव-दर्शन के समान था।

– तरुण विजय

पाठ-परिचय

‘कैलाश मानसरोवर यात्रा’ तरुण विजय द्वारा लिखित एक प्रसिद्ध यात्रा वृत्तान्त है। लेखक ने इसमें कैलाश तथा मानसरोवर की यात्रा का सजीव चित्रण किया है। इसमें इन स्थलों की धार्मिक मान्यता तथा सांस्कृतिक महत्व का उल्लेख हुआ है। लेखक ने इनके प्राकृतिक मनोहारी सौन्दर्य का भी भलीभाँति उद्घाटन किया है। यह यात्रा-वृत्तान्त इतना सजीव है कि पाठक को स्वयं एक यात्री के समान इसके रोमांच का अनुभव होता है।

शब्दार्थ-तार झनझनाना = प्रसन्नता होना। स्फटिक = एक मणि। ह्रद = तालाब। निवृत्त = मुक्त। रश्मि = किरण। उद्गम = नदी के निकलने का स्थान। पंक = कीचड़। कलमजीवी = लेखन जिसकी जीविका का साधन हो।

प्रश्न 1.
लेखक ‘तरुण विजय’ का जीवन परिचय संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
लेखक परिचय जीवन-परिचय-राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत पत्रकार एवं चिन्तक तरुण विजय का जन्म 2 मार्च, सन् 1956 ई. में हुआ था। आप 22 वर्ष तक राष्ट्रीय विचारधारा के साप्ताहिक ‘पाञ्चजन्य’ के सम्पादक रहे हैं। प्रसिद्ध सम्पादक करंजिया के ‘ब्लिट्ज’ से आपने पत्रकारिता का अपना कैरियर आरम्भ किया था। आप ‘श्यामा प्रसाद मुखर्जी शोध संस्थान के अध्यक्ष हैं। आपने दादर और नगर हवेली में आदिवासियों के मध्य सक्रिय रहकर सेवा कार्य किया है। आप एक सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक, पत्रकार तथा फोटोग्राफर हैं। वर्तमान में आप राज्यसभा के सदस्य हैं। साहित्यिक विशेषताएँ-तरुण विजय एक प्रतिष्ठित लेखक हैं। आपने हिन्दी में अनेक यात्रा-वृत्तान्त लिखे हैं। हिमालय आपको प्रिय है। सिन्धुनदी, कैलाश पर्वत, चुशूल इत्यादि स्थानों पर आपने अपनी लेखनी चलाई है। आपके यात्रा वृत्तान्तों में आपका राष्ट्र-प्रेम, संस्कृति से लगाव, प्रकृति के प्रति आकर्षण तथा मानवीय चिन्तन, स्पष्ट दिखाई देता है। रचनाएँ-कैलाश मानसरोवर यात्रा’ आपकी सचित्र पुस्तक है।

महत्वपूर्ण गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्याएँ

प्रश्न 2.
निम्नलिखित गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए

1. इस यात्रा के रोमांच और उत्तेजना के बारे में क्या कहा जाए! लगता है बस अब जीवन सफल हो गया। अब कुछ भी हो जाए परवाह नहीं। मानसरोवर में स्नान के बाद कैलाश दर्शन हो जाए तो फिर और क्या शेष रह जाता है। चाहने को? तो साहब, सुबह बस चलते ही गणपति बप्पा मोरिया के जयघोष से तकलाकोट गूंज उठा। गणेश चतुर्थी के दिन पहले गणपति-स्मरण किया फिर भजन गूंजने लगे। (पृष्ठ : 72)

सन्दर्भ एवं प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी प्रबोधिनी’ में संकलित तरुण विजय द्वारा लिखित यात्रा-वृत्तान्त ‘कै लाश मानसरोवर यात्रा’ से लिया गया है। कैलाश मानसरोवर की यात्रा आरंभ करते हुए यात्रियों के उत्साह का वर्णन लेखक ने किया है।

व्याख्या-लेखक कहता है कि कैलाश मानसरोवर की यात्रा अत्यन्त रोमांचकारी थी। सभी यात्री अत्यन्त उत्तेजित हो रहे थे। उनको ऐसा लग रहा था कि इस यात्रा पर आने से उनका जीवन सफल हो गया है। इसके बाद यदि कुछ अप्रिय घटना भी हो जाय तो उसकी कोई चिन्ता उनको नहीं थी। उनको मानसरोवर में स्नान करने के बाद कैलाश के दर्शन का अवसर मिल जाय तो उनकी इच्छा पूरी हो जाएगी। उनकी यही मनोकामना थी। इसके पूरा होने के बाद वह कुछ और नहीं चाहते थे। सबेरे बस के चलते ही सभी यात्रियों ने विपति विनाशक ‘गणपति बप्पा’ का जयघोष किया। लगा कि सारा तकला कोट इस जयकार से भर उठा है। क्योंकि उस दिन गणेश चतुर्थी थी, अत: पहले सभी ने गणेश जी का स्मरण किया और फिर बस में भजन प्रारम्भ हो गए।

विशेष-
(1) सरल, विषयानुरूप प्रवाहपूर्ण भाषा है।
(2) शैली वर्णनात्मक है।

2. मानसरोवर-मानसरोवर ही है। उसकी उपमा नहीं दी जा सकती है। सूर्य की रश्मियाँ मानस के जल में परावर्तित हो अनंत सूर्यों का आभास करा रही थीं। मानसरोवर की लहरें सागर की लहरों की तरह उठतीं-गिरतीं, क्षितिज और मानस के जल का रंग एक जैसा-एक रूप! कहाँ जल की सीमा खत्म होती है और क्षितिज शुरू होता है, जान पाना असम्भव है। चारों ओर पठारी मैदान और कुछ-कुछ छोटी पहाड़ियाँ, मध्य में यह दैवी अपार जलराशि जिसे स्वयं ब्रह्मा ने अपने मानस से रचा और जहाँ देवगण स्नान करने आते हैं। तट के आस-पास रंगीन फूलों वाली घास थी जिस पर पाँव रखते ही धंसते थे। (पृष्ठ – 73)

सन्दर्भ एवं प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी प्रबोधिनी’ के ‘कैलाश मानसरोवर यात्रा’ शीर्षक पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता तरुण विजय हैं। लेखक ने इस यात्रा वृत्तान्त में मानसरोवर की सुन्दरता का वर्णन किया है। लेखक अपने साथियों के साथ दिन में ग्यारह बजे मानसरोवर के तट पर पहुँचा।

व्याख्या-मानसरोवर के दर्शन कर मुग्ध हुआ लेखक कहता है कि मानसरोवर अनुपम है। उसकी तुलना किसी अन्य सरोवर से नहीं हो सकती। सूर्य की किरणें मानसरोवर के जल में पड़ रही थीं। उनके परावर्तित होने से सरोवर के पानी में सूर्य के अनेक बिम्ब बन रहे थे। सरोवर की लहरें समुद्र की लहरों के समान उठ रही और गिर रही थीं। सरोवर के पानी का रंग भी क्षितिज के जैसा ही गहरा नीला था। सरोवर अत्यन्त विशाल था। वह दूर क्षितिज तक फैला हुआ था। यह पता नहीं चल रहा था कि क्षितिज कहाँ से शुरू होता है। और मानसरोवर के जल की सीमा कहाँ तक है। चारों ओर पठार का मैदानी प्रदेश और छोटी-छोटी पहाड़ियाँ थीं। उनके बीच मानसरोवर की विशाल जलराशि थी। मान्यता है कि इनकी रचना स्वयं ब्रह्मा जी ने की थी। देवता इस सरोवर में स्नान करने आते थे। मानसरोवर के किनारों पर रंगीन फूलों वाली घास उगी थी। उस पर पैर रखते ही धंसने लगते थे।

विशेष-
(1) सरल एवं विषयानुरूप भाषा है।
(2) शैली वर्णनात्मक और चित्रात्मक है।

3. नीला आकाश आस-पास कुछ नहीं, मात्र एक-एक ही केवल अत्युच्य शिखर, शुभ्र आभायुक्त, प्रभु का ज्योति स्वरूप। मौन व्याप गया था सर्वत्र। किसी को किसी का ध्यान न रहा। दंडवत प्रणाम कर सब चुप बैठ गए। दिलीप सिंघवी दूर तक शूटिंग करते चले गए थे। दौड़कर लौटे और लिपट गये। मेरे कंधे उनके प्रेमाश्रुओं से गीले हो गए-कुछ कहते ही नहीं बनता था-गला सँधा था। मुझ सरीखे राजनीतिक पंक से घिरे कागज काले करने वाले कलमजीवी के लिए यह अनुभव साक्षात प्रभु दर्शन से कम न था। (पृष्ठ – 74)

सन्दर्भ एवं प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी प्रबोधिनी’ में संकलित ‘कैलाश मानसरोवर यात्रा’ शीर्षक पाठ से अवतरित है। इस यात्रा-वृतान्त के रचयिता तरुण विजय हैं। लेखक और उसके सहयात्री कैलाश के दर्शन कर अत्यन्त प्रसन्न थे। प्रसन्नता के अतिरेक में कुछ बोल नहीं पा रहे थे।

व्याख्या-लेखक कहता है कि वहाँ एकमात्र पर्वत शिखर था। वह था कैलाश शिखर। वह अत्यन्त ऊँचा, श्वेत प्रभाधारी और आकर्षक था। उसमें परमात्मा की ज्योति का आभास हो रहा था। उसके चारों ओर नीला आकाश फैला था। इस सुन्दर दृश्य को देखकर सभी यात्री मौन रह गए। वे प्रसन्नता के कारण कुछ बोल ही नहीं पा रहे थे। सबने उस शिखर को सादर प्रणाम किया। उस कैलाश शिखर पर ही सबका ध्यान था, उनका ध्यान एक-दूसरे के प्रति भी नहीं था। दिलीप सिंघवी फोटो खींचते दूर तक चले गए थे। वह लौटे और दौड़कर लेखक से लिपट गए। उनके नेत्रों से प्रेम के आँसू टपक रहे थे। उनसे लेखक का कंधा भीग रहा था। गला सँधा था। वह कुछ बोल नहीं रहे थे। लेखक स्वयं को अब तक राजनीति के पंक से घिरा एक श्रमजीवी पत्रकार तथा कागज काला करने वाला लेखक मानकर कहता है कि कैलाश के दर्शन उसको ईश्वर के साक्षात् दर्शन जैसे ही लग रहे थे।

विशेष-
(1) भाषा सरल, तत्सम शब्दमयी तथा विषयानुरूप है।
(2) शैली वर्णनात्मक और भावनात्मक है।

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