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Class 6 Sanskrit Chapter 12 Question Answer आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः
कक्षा 6 संस्कृत पाठ 12 के प्रश्न उत्तर
Class 6 Sanskrit Deepakam Chapter 12 Question Answer
पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1.
अधोलिखितानां प्रश्नानाम् एकपदेन उत्तराणि यच्छन्तु। (अधोलिखित प्रश्नों के उत्तर एक पद में दीजिए।)

उत्तर:
(क) भिक्षुकः किं करोति स्म? – भिक्षाटनम्।
(ख) कदाचित् तेन मार्गेण कः आगच्छति? – धनिकः।
(ग) भिक्षुकः धनिकात् किम् इच्छति? – प्रभूतं धनम्।
(घ) धनिकः भिक्षुकात् किं याचितवान्? – शरीराङ्गानि।
(ङ) सौभाग्येन वयं किं प्राप्तवन्तः? – मानवजन्म।
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प्रश्न 2.
अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि ‘आम्’ अथवा ‘न’ इति पदेन लिखन्तु।
(अधोलिखित प्रश्नों के उत्तर ‘आम्’ (हाँ) अथवा ‘न’ (नहीं) पद के द्वारा लिखिए।)
यथा- ग्रामे कश्चन भिक्षुकः आसीत्। – आम्

उत्तर:
(क) भिक्षुकः उन्नतः दृढकायः च आसीत्। – आम्
(ख) जनाः तस्मै दण्डं यच्छन्ति। – न
(ग) भिक्षुकः प्रभूतं धनम् इच्छति। – आम्
(घ) भिक्षुकः धनिकाय पादौ ददाति। – न
(ङ) भिक्षुकः भिक्षाटनं त्यजति। – आम्
प्रश्न 3.
अधोलिखितेषु वाक्येषु द्वितीयाविभक्तेः शब्दानां द्विवचने परिवर्तनं कृत्वा वाक्यानि लिखन्तु।
(अधोलिखित वाक्यों में द्वितीया विभक्ति के शब्दों को द्विवचन में बदलकर वाक्य लिखिए।)
यथा – चन्द्रशेखरः लेखं लिखति। चन्द्रशेखरः लेखौ लिखति।

उत्तर:
(क) आपणिकः अङ्कनीं ददाति। आपणिकः अङ्कन्यौ ददाति।
(ख) मातामही कथां श्रावयति। मातामही कथे श्रावयति।
(ग) सैनिक: मां रक्षति। सैनिक : आवां रक्षति।
(घ) कृष्णः कन्दुकं गृह्णाति। कृष्णः कन्दुके गृह्णाति।
(ङ) छात्रः श्लोकं पठति। छात्रः श्लोकौ पठति।
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प्रश्न 4.
चित्रं दृष्ट्वा द्वितीयाविभक्तेः वाक्यानि रचयन्तु।
(चित्र देखकर द्वितीय विभक्ति के वाक्यों की रचना कीजिए।)

उत्तर:

प्रश्न 5.
कोष्ठके विद्यमानानां शब्दानां द्वितीयाविभक्तेः एकवचनरूपेण सह वाक्यानि लिखन्तु।
(कोष्ठक में विद्यमान शब्दों के द्वितीया विभक्ति के एकवचन के रूप के साथ वाक्य लिखिए।)
यथा – भक्त: (देव) नमति। भक्तः देवं नमति।

उत्तर:
(क) छात्रा : (ग्रन्थ) पठन्ति। छात्राः ग्रन्थं पठन्ति।
(ख) बालकाः (कथा) लिखन्ति। बालकाः कथां लिखन्ति।
(ग) रमा ( लेखनी) क्रीणाति। रमा लेखनीं क्रीणाति।
(घ) शिक्षक (अस्मद् ) पाठयति। शिक्षकः माँ पाठयति।
(ङ) अर्जुन (नदी) पश्यति। अर्जुनः नदीं पश्यति।
(च) पितामही (रजनी) आह्वयति। पितामही रजनीम् आह्वयति।
(छ) अहं (युष्मद्) नमस्करोमि। अहं त्वां नमस्करोमि।
(ज) कृषक : (क्षेत्र) कर्षति। कृषकः क्षेत्रं कर्षति।
(झ) पर्यटक (कन्याकुमारी) गच्छति। पर्यटक : कन्याकुमारीं गच्छति।
(ञ) चित्रकार: (चित्र) रचयति। चित्रकार: चित्रं रचयति।
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प्रश्न 6.
द्वितीयाविभक्तेः एकवचनशब्दानां बहुवचने परिवर्तनं कृत्वा वाक्यानि रचयन्तु।
(द्वितीया विभक्ति के एकवचन के शब्दों को बहुवचन में बदलकर वाक्यों की रचना कीजिए।)
यथा वयं सुभाषितं वदामः। वयं सुभाषितानि वदामः।

उत्तर:
(क) अरुण दूरवाणीं नयति। अरुणः दूरवाणी: नयति।
(ख) पिता लेखनीम् आनयति। पिता लेखनीः आनयति।
(ग) जननी पाकं पचति। जननी पाकान् पचति।
(घ) मातामहः मां बोधयति। मातामहः अस्मान् बोधयति।
(ङ) अग्रजा त्वाम् आह्वयति। अग्रजा युष्मान् आह्वयति।
प्रश्न 7.
अधः प्रदत्तं चित्रं दृष्ट्वा द्वितीयाविभक्तेः प्रयोगं कृत्वा दश वाक्यानि रचयन्तु।
(नीचे दिये गये चित्र को देखकर द्वितीया विभक्ति का प्रयोग करके दस वाक्यों की रचना कीजिए।)

उत्तर:
(क) अस्मिन चित्रे बालकाः विद्यालयं गच्छन्ति।
(ख) बालकाः कन्दुकं पश्यन्ति।
(ग) शिक्षकः बालकान् व्यायामं शिक्षयति।
(घ) छात्राः व्यायामं कुर्वन्ति।
(ङ) बालिके क्रीडनकं पश्यतः।
(च) शिक्षिका पुस्तकं पाठयति।
(छ) शिक्षक: माम् प्रश्नं पृच्छति।
(ज) अहम् प्रश्नस्य उत्तरं यच्छामि।
(झ) विद्यालये वयं पाठान् पठामः।
(ञ) बालकाः शिक्षकान् नमस्कुर्वन्ति।
Class 6th Sanskrit Chapter 12 Question Answer
प्रश्न 1.
निम्नलिखित प्रश्नानाम् उत्तराणि विकल्पेभ्यः चित्वा लिखत-
(i) मनुष्याणां शरीरस्थो महान् शुत्रः कः?
(अ) परिश्रमः
(ब) आलस्यम्
(स) बलम्
(द) विवेकम्
उत्तर:
(ब) आलस्यम्
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(ii) भिक्षुकः कुत्र आसीत्?
(अ) नगरे
(ब) वने
(स) नदीतटे
(द) ग्रामे
उत्तर:
(द) ग्रामे
(iii) कस्मै दानं करोतु?
(अ) दरिद्राय
(ब) धनिकाय
(स) बालकाय
(द) मित्राय
उत्तर:
(अ) दरिद्राय
(iv) “अहो मम भाग्यम्” इति कः चिन्तयति?
(अ) धनिकः
(ब) शिक्षक:
(स) भिक्षुकः
(द) बालकः
उत्तर:
(स) भिक्षुकः
(v) धनिकः सहस्त्रं रूप्यकाणि दत्वा किम् इच्छति?
(अ) हस्तौ
(ब) पादौ
(स) कर्णौ
(द) दन्ताः
उत्तर:
(ब) पादौ
(vi) धनिकः सहस्त्राधिकैः रूप्यकैः भिक्षुकस्य कानि क्रेतुम् इष्टवान्?
(अ) पात्राणि
(ब) वस्त्राणि
(स) गृहाणि
(द) शरीराङ्गानि
उत्तर:
(द) शरीराङ्गानि
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(vii) केन समः बन्धुः नास्ति?
(अ) परिश्रमेण
(ब) आलस्येन
(स) धनेन
(द) बलेन
उत्तर:
(अ) परिश्रमेण
(viii) किं कृत्वा मनुष्यः नावसीदति?
(अ) भिक्षाटनम्
(ब) आलस्यम्
(स) उद्यमम्
(द) दुग्धपानम्
उत्तर:
(स) उद्यमम्
(ix) “अहं कथं भिक्षां स्वीकरोमि।” रेखाङ्कितपदे का विभक्ति:?
(अ) प्रथमा
(ब) द्वितीया
(स) तृतीया
(द) पञ्चमी
उत्तर:
(ब) द्वितीया
(x) सौभाग्येन वयं किं प्राप्तवन्तः?
(अ) धनम्
(ब) भोजनम्
(स) निवासम्
(द) मानवजन्म
उत्तर:
(द) मानवजन्म
प्रश्न 2.
कोष्ठकात् उचितपदं चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत-
(i) ………. ग्रामे भिक्षुकः आसीत्। (एकस्य एकस्मिन्)
(ii) भिक्षुकः ………. वदति। (धनिकः धनिकं)
(iii) अहं प्रभूतं धनम् ………. । (इच्छामि/इच्छति)
(iv) त्वं ………. तव पादौ यच्छ। (माम्/मह्यम्)
(v) विना ………. कथं वा चलामि? (पादौ / पादा:)
उत्तर:
(i) एकस्मिन्
(ii) धनिकं
(iii) इच्छामि।
(iv) मह्यम्
(v) पादौ
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प्रश्न 3.
एकपदेन उत्तराणि लिखन्तु-
(i) जनाः कस्मै धनं यच्छन्ति?
(ii) “कृपया दानं करोतु” इति भिक्षुकः कं प्रति कथयति?
(iii) धनिकः कस्य शरीराङ्गानि क्रेतुम् इच्छति?
(iv) “इतः गच्छ, शुभं भवतु ” इति कः वदति?
(v) किं कृत्वा नरः नावसीदति?
उत्तर:
(i) भिक्षुकाय।
(ii) धनिकं प्रति।
(iii) भिक्षुकस्य।
(iv) धनिकः।
(v) उद्यमम्।
प्रश्न 4.
पूर्णवाक्येन उत्तराणि लिखन्तु-
(क) जीवने कः सफलतां प्राप्नोति?
उत्तर:
यः परिश्रमं करोति सः एव जीवने सफलतां प्राप्नोति।
(ख) भिक्षुकः कीदृशः युवकः आसीत्?
उत्तर:
भिक्षुकः उन्नतः दृढकायः च युवकः आसीत्।
(ग) धनिकं दृष्ट्वा भिक्षुकः मनसि किं चिन्तयति?
उत्तर:
धनिकं दृष्ट्वा भिक्षुकः मनसि चिन्तयति यत्- “अहो मम भाग्यम्। अद्य अहं प्रभूतं धनं प्राप्नोमि” इति।
(घ) भिक्षुकः किं त्यक्त्वा कथञ्च जीवनयापनम् आरब्धवान्?
उत्तर:
भिक्षुकः भिक्षाटनं त्यक्त्वा परिश्रमेण धनार्जनं च कृत्वा सगौरवं जीवनयापनम् आरब्धवान्।
(ङ) कस्य सफलतार्थं प्रयत्नं करणीयम्?
उत्तर:
मानवजीवनस्य सफलतार्थं प्रयत्नं करणीयम्।
प्रश्न 5.
रेखाङ्कितपदम् अधिकृत्य प्रश्ननिर्माणं कुर्वन्तु-
(i) सः भिक्षाटनं करोति स्म।
(ii) दरिद्राय दानं करोतु।
(iii) भिक्षुकः सविनयम् उक्तवान्।
(iv) मह्यं तव हस्तौ यच्छ।
(v) उद्यमेन समः बन्धुः नास्ति।
उत्तर:
प्रश्ननिर्माणम्-
(i) सः किं करोति स्म?
(ii) कस्मै दानं करोतु?
(iii) क: सविनयम् उक्तवान्?
(iv) मह्यं तव कौ यच्छ?
(v) केन समः बन्धु नास्ति?
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प्रश्न 6.
क्रमानुसारं शब्दार्थ-मेलनं कुर्वन्तु-
(क) – (ख)
(i) दृढकाय – ददातु
(ii) प्रभूतम् – बलहीनम्
(iii) दुर्बलम् – दृढशरीर:
(iv) भिक्षुक: – परिश्रमः
(v) यच्छतु – याचकः
(vi) उद्यम: – पर्याप्तम्
उत्तर:
(i) दृढकाय: – दृढशरीरः।
(ii) प्रभूतम्-पर्याप्तम्।
(iii) दुर्बलम्-बलहीनम्।
(iv) भिक्षुक :- याचकः।
(v) यच्छतु- ददातु।
(vi) उद्यम – परिश्रमः।
प्रश्न 7.
“आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः” इति कथायाः सारं हिन्दी भाषायां लिखन्तु।
उत्तर:
कथा-सार- प्रस्तुत पाठ में वर्णित कथा के माध्यम आलस्य को मनुष्य का शत्रु बतलाते हुए आलस्य त्यागकर परिश्रम करने की प्रेरणा दी गई है।
कथा के अनुसार किसी गाँव में एक भिखारी रहता था। वह शरीर से दृढ़ एवं उन्नत युवक था, किन्तु भिक्षा माँगने के लिए घूमता रहता था। एक बार किसी धनवान् को देखकर उसने मन में सोचा कि इससे आज मैं अत्यधिक धन प्राप्त करूँगा। वह धनवान् से बोला कि “मैं बहुत गरीब हूँ। कृपया दान दीजिए।” धनवान् ने पूछा कि तुम क्या चाहते हो? उसने कहा कि मैं पर्याप्त धन चाहता हूँ।
इसके बाद धनवान् व्यक्ति ने कहा कि “मैं तुम्हें एक हजार रुपये दूँगा, तुम मुझे अपने दोनों पैर दे दो।” भिखारी ने कहा कि “बिना पैरों के मैं कैसे चलूँगा?” इसके बाद धनवान् ने कहा कि “मैं तुम्हें पाँच हजार रुपये दूँगा, तुम अपने दोनों हाथ मुझे दे दो।” किन्तु भिखारी ने कहा कि “बिना हाथों के मैं भीख कैसे लूँगा?” इसी प्रकार धनवान् ने हजारों रुपये देकर उसके शरीर के अन्य अंगों को खरीदना चाहा, किन्तु भिखारी ने मना कर दिया।
तब धनवान ने उससे कहा कि “मित्र! देखो, तुम्हारे पास ही हजारों मूल्य की वस्तुएँ हैं, फिर किसलिए तुम स्वयं को दुर्बल मानते हो? सौभाग्य से प्राप्त इस मानव- जीवन की सफलता के लिए प्रयत्न करो।
उस दिन से भिखारी ने भीख माँगना छोड़कर परिश्रम से धन कमाते हुए गौरवपूर्ण जीवन प्रारम्भ कर दिया। वस्तुतः सही कहा गया है- आलस्य मनुष्यों के शरीर में रहने वाला परम शत्रु है और परिश्रम के समान कोई मित्र नहीं है। परिश्रम करके व्यक्ति कभी दुःखी नहीं होता है।
Deepakam Class 6 Chapter 12 आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः Summary
पाठ – परिचय – प्रस्तुत पाठ में माता द्वारा एक कथा के माध्यम से पुत्र को आलस्य के बारे में बतलाया गया है। इसमें आलस्य को मनुष्य का शत्रु बतलाते हुए सदैव परिश्रम करने की सुन्दर प्रेरणा दी गई है। आलस्य से मनुष्य का पतन हो जाता है एवं परिश्रम से जीवन उन्नत होता है। आलस्य के कारण कोई भी कार्य सिद्ध नहीं होता है। किन्तु परिश्रम करने से सभी कार्य पूर्ण होते हैं एवं मनुष्य कभी भी दुःखी नहीं होता है।
कठिन शब्दार्थ, हिन्दी अनुवाद एवं पठितावबोधन
मातः! अद्य तु ……………………………….. एतां कथां पठ।
कठिन शब्दार्थ- अद्य = आज। तु = तो। सम्पूर्णदिने = पूरे दिन। करिष्यामि = करूँगा। न = नहीं। बहु = अधिक/बहुत। करोषि = करते हो। उत्तिष्ठ = उठो। कुरु = करो। उत्तीर्णः = उत्तीर्ण। यः = जो। प्राप्नोति = प्राप्त करता है। तत् = वह। कथम् = किस प्रकार। ज्ञातुम् = जानने के लिए।
हिन्दी अनुवाद-
पुत्र- माता! आज तो अवकाश का दिन है। आज मैं पूरे दिन विश्राम करूँगा।
माता- अवकाश विद्यालय का है, स्वाध्याय का नहीं। बहुत आलस्य करते हो। उठो, परिश्रम करो।
पुत्र- मैं उत्तीर्ण हो जाऊँगा। अधिक परिश्रम से क्या लाभ?
माता- जो परिश्रम करता है, वही जीवन में सफलता प्राप्त करता है। परिश्रम ही मनुष्य का मित्र है। आलस्य तो शुत्र के समान है।
पुत्र- वह किस प्रकार माता?
माता- यदि जानना चाहते हो तो इस कथा को पढ़ो।
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एकस्मिन् विशाले ग्रामे ……………………………….. केचन च तर्जयन्ति।
कंठिन शब्दार्थ – विशाले = बहुत बड़े। ग्रामे = गाँव में। कश्चन = कोई। भिक्षुकः = भिखारी। उन्नतः = ऊँचा। दृढकायः = दृढ़ शरीर वाला। तथापि = फिर भी। भिक्षाटनम् = भीख के लिए घूमना। मिलति = मिलता है। तम् = उसको। यच्छतु = दीजिए। दरिद्राय = गरीब के लिए। जनाः = लोग। तस्मै = उसके लिए। तर्जयन्ति = प्रताड़ित करते हैं।
हिन्दी अनुवाद- एक बहुत बड़े गाँव में कोई भिखारी रहता था। यद्यपि वह ऊँचे और मजबूत (दृढ़) शरीर वाला युवक था, फिर भी वह भीख माँगने के लिए घूमता रहता था। मार्ग में जो कोई भी मिलता उसको वह कहता- “कृपया भीख दीजिए। गरीब के लिए दान करो। पुण्य प्राप्त करो।” कुछ लोग उसको धन दे देते हैं और कुछ उसे प्रताड़ित करते थे।
पठित अवबोधनम् –
प्रश्नाः- I. एकपदेन उत्तरं लिखतु-
(i) जनाः कस्मै धनं यच्छन्ति?
(ii) दरिद्राय किं करोतु?
उत्तर:
(i) भिक्षुकाय।
(ii) दानम्।
II. पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखतु-
दृढकाय: युवकः किं करोति स्म?
उत्तर:
दृढकाय: युवक: भिक्षाटनं करोति स्म।
III. प्रदत्तविकल्पेभ्यः समुचितम् उत्तरं चित्वा निर्देशानुसारं लिखतु-
(i) “केचन जनाः तं तर्जयन्ति’- अत्र क्रियापदं किम्?
(अ) केचन
(ब) तर्जयन्ति
(स) तम्
(द) जनाः
उत्तर:
(ब) तर्जयन्ति
(ii) “उन्नतः दृढकायः च युवकः आसीत्।” अत्र विशेष्यपदं किम्?
(अ) आसीत्
(ब) दृढकाय
(स) उन्नतः
(द) युवक:
उत्तर:
(द) युवक:
(iii) ‘पापम्’ इति पदस्य गद्यांशे विलोमपदं किम्?
(अ) पुण्यम्
(ब) दानम्
(स) भिक्षाम्
(द) धनम्
उत्तर:
(अ) पुण्यम्
(iv) “तथापि सः भिक्षाटनं करोति” – अत्र सर्वनामपदं किम्?
(अ) करोति
(ब) तथा
(स) सः
(द) भिक्षाटनम्
उत्तर:
(स) सः
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एकदा तेन मार्गेण ……………………………….. सविनयम् उक्तवान्।
कठिन शब्दार्थ – एकदा एक बार धनिकः = धनवान्। मनसि = मन में। चिन्तयति सोचता है। प्रभूतम् = अत्यधिक। प्राप्नोमि = प्राप्त करता हूँ। दरिद्रः = निर्धन। पृष्टवान् = पूछा। इच्छसि = चाहते हो। सविनयम् = विनम्रतापूर्वक उक्तवान् = कहा।
हिन्दी अनुवाद- एक बार उस मार्ग से कोई धनवान् व्यक्ति आ रहा था। वह भिखारी मन में ही सोचता है कि- “मेरा अहोभाग्य है। आज मैं ढेर सारा धन प्राप्त करूँगा।” भिखारी धनवान् व्यक्ति से कहता है- “आर्य! मैं अत्यधिक गरीब हूँ। कृपया दान कीजिए।”
धनवान् व्यक्ति ने उससे पूछा- “तुम क्या चाहते हो?” “आर्य! मैं ढेर सारा धन चाहता हूँ”- ऐसा उसने (भिक्षुक ने) विनम्रतापूर्वक कहा।
पठित-अवबोधनम् –
प्रश्ना:- I. एकपदेन उत्तरं लिखतु-
(i) धनिकः कं पृष्टवान्?
(ii) “अहो मम भाग्यम्” इति कः चिन्तयति?
उत्तर:
(i) भिक्षुकम्।
(ii) भिक्षुकः।
II. पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखतु –
भिक्षुकः धनिकं किम् वदति?
उत्तर:
भिक्षुकः धनिकं वदति – “आर्य! अहम् अतीव दरिद्रः अस्मि। कृपया दानं करोतु” इति।
III. प्रदत्तविकल्पेभ्यः समुचितम् उत्तरं चित्वा निर्देशानुसारं लिखतु-
(i) “आर्य! अहम् अतीव दरिद्रः अस्मि” अत्र ‘अस्मि’ क्रियायाः कर्तृपदं किम्?
(अ) दरिद्रः
(ब) आर्य
(स) अहम्
(द) अतीव
उत्तर:
(स) अहम्
(ii) “आर्य! अहं प्रभूतं धनम् इच्छामि” – अत्र विशेषणपदं किम्?
(अ) प्रभूतम्
(ब) अहम्
(स) धनम्
(द) इच्छामि
उत्तर:
(अ) प्रभूतम्
(iii) “धनिकः तं पृष्टवान्”- अत्र ‘तम्’ इति सर्वनामपदस्य स्थाने संज्ञापदं किम्?
(अ) जनम्
(ब) धनिकम्
(स) दानम्
(द) भिक्षुकम्
उत्तर:
(द) भिक्षुकम्
(iv) ‘धनिकः’ इति पदस्य गद्यांशे विलोमपदं किम् अस्ति?
(अ) धनम्
(ब) दरिद्रः
(स) प्रभूतम्
(द) निर्धन
उत्तर:
(ब) दरिद्रः
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तदा धनिकः वदति ……………………………….. भिक्षुकः निराकृतवान्।
कठिन-शब्दार्थ – तदा = तब तुभ्यम् = तुम्हारे लिए। सहस्त्रम् = हजार। यच्छामि = देता हूँ। मह्यम् = मुझे। पादौ = दोनों पैर अस्तु = ठीक है। हस्तौ दोनों हाथ। सहस्त्राधिकैः = हजारों से शरीराङ्गानि = शरीर के अंग। क्रेतुम् = खरीदना। इष्टवान् = इच्छा की। निराकृतवान् = अस्वीकार/मना कर दिया।
हिन्दी अनुवाद – तब धनवान् कहता है- “मैं तुम्हें एक हजार रुपये देता हूँ। तुम मुझे तुम्हारे दोनों पैर दे दो।”
भिखारी कहता है- “मैं मेरे दोनों पैर तुम्हें कैसे दे सकता हूँ? अथवा बिना पैरों के मैं कैसे चलूँगा?”
धनवान् कहता है— “ठीक है, तुम पाँच हजार रुपये स्वीकार करो। मुझे तुम्हारे दोनों हाथ दे दो।”
भिखारी बोला- “दोनों हाथों के बिना मैं किस प्रकार भीख ग्रहण करूँगा?”
इसी प्रकार धनवान् व्यक्ति हजारों रुपयों के द्वारा उसके शरीर के अनेक अंगों को खरीदना चाहता था। किन्तु भिखारी ने उसे अस्वीकार कर दिया।
पठित-अवबोधनम् –
प्रश्नाः – I. एकपदेन उत्तरं लिखतु-
(i) धनिकः भिक्षुकस्य हस्तयोः मूल्यं कति रुप्यकाणि वदति?
(ii) “विना पादौ कथं वा चलामि” इति कः वदति?
उत्तर:
(i) पञ्चसहस्त्रम्।
(ii) भिक्षुकः।
II. पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखतु –
धनिकः सहस्त्राधिकैः रुप्यकैः भिक्षुकस्य कानि क्रेतुम् इष्टवान्?
उत्तर:
धनिकः सहस्त्राधिकैः रूप्यकैः भिक्षुकस्य अनेकानि शरीराङ्गानि क्रेतुम् इष्टवान्।
III. प्रदत्तविकल्पेभ्यः समुचितम् उत्तरं चित्वा निर्देशानुसारं लिखतु-
(i) “अहं मम पादौ तुभ्यं कथं ददामि।” अत्र ‘ददामि क्रियायाः कर्त्ता क:?
(अ) मम
(ब) अहम्
(स) तुभ्यम्
(द) पादौ
उत्तर:
(ब) अहम्
(ii) “मह्यं तव हस्तौ यच्छ।” अत्र ‘मह्यम्’ इति सर्वनामपदस्य स्थाने संज्ञापदं किम्?
(अ) धनिकाय
(ब) भिक्षुकाय
(स) दरिद्राय
(द) जनाय
उत्तर:
(अ) धनिकाय
(iii) “त्वं पञ्चसहस्त्रं रूप्यकाणि स्वीकुरु।” अत्र विशेषणपदं किम?
(अ) स्वीकुरु
(ब) त्वम्
(स) रूप्यकाणि
(द) पञ्चसहस्त्र
उत्तर:
(द) पञ्चसहस्त्र
(iv) “विना पादौ कथं वा चलामि।” अत्र रेखाङ्कितपदे का विभक्तिः ?
(अ) तृतीया
(ब) पञ्चमी
(स) द्वितीया
(द) सप्तमी
उत्तर:
(स) द्वितीया
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तदा धनिकः उक्तवान् ……………………………….. शुभं भवतु” इति।
तस्माद् दिनात् भिक्षुकः ……………………………….. सज्जनाः वदन्ति।
कठिन शब्दार्थ – तदा = तब। उक्तवान् = कहा। पश्य = देखो। समीपे = पास में। आत्मानम् = स्वयं को। मन्यसे = मानते हो। प्राप्तवन्तः = प्राप्त किया है। इतः = यहाँ से। शुभम् = शुभ/कल्याण। तस्माद् दिनात् = उस दिन से। त्यक्त्वा = छोड़कर। धनार्जनम् = धन कमाकर। सगौरवम् = गौरवपूर्वक। आरब्धवान् = प्रारम्भ किया।
हिन्दी अनुवाद – तब धनवान् ने कहा- “देखो मित्र! तुम्हारे पास ही हजारों रुपये मूल्य की वस्तुएँ हैं। फिर भी किसलिए तुम स्वयं को दुर्बल मानते हो? सौभाग्य से ही हमें मानव-जीवन प्राप्त हुआ है। इसकी सफलता के लिए प्रयत्न करो। यहाँ से जाओ, आपका कल्याण (शुभ) होवे।”
उसी दिन से भिखारी ने भीख माँगना छोड़कर परिश्रम के द्वारा धन कमाकर गौरवपूर्ण जीवन यापन करना प्रारम्भ
कर दिया। इसीलिए सज्जन कहते हैं-
पठित-अवबोधनम् –
प्रश्ना:- I. एकपदेन उत्तरं लिखतु-
(i) क: आत्मानं दुर्बलं मन्यते?
(ii) सौभाग्येन वयं किं प्राप्तवन्तः?
उत्तर:
(i) भिक्षुकः।
(ii) मानवजन्म।
II. पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखतु –
कस्य सफलतार्थं प्रयत्नं करणीयम्?
उत्तर:
मानवजीवनस्य सफलतार्थं प्रयत्नं करणीयम्।
III. प्रदत्तविकल्पेभ्यः शुद्धम् उत्तरं चित्वा निर्देशानुसारं लिखतु-
(i) ‘मित्र ! तव समीपे एव सहस्त्राधिक मूल्यकानि वस्तूनि सन्ति।’ अत्र विशेष्यपदं किम्?
(अ) वस्तूनि
(ब) तव
(स) मित्र!
(द) मूल्यका
उत्तर:
(अ) वस्तूनि
(ii) ‘किमर्थं त्वम् आत्मानं दुर्बलं मन्यसे ।’ अत्र ‘मन्यसे क्रियायाः कर्तृपदं किम्?
(अ) दुर्बलम्
(ब) आत्मानं
(स) त्वम्
(द) किमर्थम्
उत्तर:
(स) त्वम्
(iii) ‘दुर्भाग्येन’ इति पदस्य गद्यांशे विलोमपदं किम्?
(अ) परिश्रमेण
(ब) सौभाग्येन
(स) प्रयत्नेन
(द) सुखेन
उत्तर:
(ब) सौभाग्येन
(iv) ‘अस्य सफलतार्थं प्रयत्नं कुरु।’ अत्र सर्वनापदं किम्?
(अ) कुरु
(ब) प्रयत्नं
(स) सफलतार्थं
(द) अस्य
उत्तर:
(द) अस्य
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आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति॥
पदच्छेदः – आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थः महान् रिपुः, न अस्ति उद्यमसमः बन्धुः कृत्वा यं न अवसीदति।
अन्वयः – आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थः महान् रिपुः (अस्ति)। उद्यमसमः बन्धुः नास्ति यं कृत्वा न अवसीदति।
कठिन – शब्दार्थ- शरीरस्थः = शरीर में रहने वाला। रिपुः = शत्रु। उद्यमसमः = परिश्रम के समान। यम् = जिसको। कृत्वा = करके। न अवसीदति दुःखी नहीं होता है ।
हिन्दी अनुवाद / भावार्थ – आलस्य मनुष्यों के शरीर में स्थित महान् शत्रु है। क्योंकि आलस्य के कारण कार्य सिद्ध नहीं होता है। इसी प्रकार परिश्रम के समान बन्धु भी नहीं, क्योंकि परिश्रम करके कोई भी व्यक्ति दुःख को प्राप्त नहीं करता है। अत: हमें आलस्य का त्याग करके सदैव परिश्रम करना चाहिए।
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